अनुवाद

अंग्रेजी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अंग्रेजी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 10 जून 2020

उच्चतम न्यायालय ने हरियाणा के निचले न्यायालयों में हिन्दी को आधिकारिक भाषा बनाने के विरुद्ध याचिका की निरस्त


*9 जून 2020*.
उच्चतम न्यायालय ने हरियाणा के निचले न्यायालयों और राज्य के सभी अधिकरणों में कामकाज की आधिकारिक भाषा हिन्दी लागू करने के राज्य सरकार के निर्णय में हस्तक्षेप करने से सोमवार को इनकार कर दिया।
हरियाणा में निचले न्यायालयों और अधिकरणों में कामकाज की आधिकारिक भाषा हिन्दी बनाने संबंधी हरियाणा राजभाषा (संशोधन)अधिनियम, 2020 की वैधानिकता को कुछ वकीलों ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी।
मुख्य न्यायमूर्ति एस.ए. बोबड़े, न्यायमूर्ति ए.एस. बोपन्ना और न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय की पीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं से प्रश्न किया कि इस विधान में क्या गलत है क्योंकि लगभग 80 प्रतिशत वादकारी अंग्रेजी नहीं समझते हैं। पीठ ने इस तरह का विधान बनाने को उचित बताते हुए कहा कि हिन्दी को कुछ राज्यों में निचले न्यायालयों में कामकाज की भाषा बनाने में कुछ भी गलत नहीं है। ब्रिटिश राज में भी साक्ष्य दर्ज करने का काम क्षेत्रीय भाषाओं में ही होता था।
याचिकाकर्ता समीर जैन का कहना था कि वह न्यायालय की कार्यवाही हिन्दी या किसी अन्य क्षेत्रीय भाषा में किए जाने के विरुद्ध नहीं हैं, लेकिन चूंकि वह दिल्ली-एनसीआर के हैं, इसलिए हरियाणा के न्यायालयों में वकीलों के लिए हिन्दी में बहस करना कठिन होगा। उन्होंने कहा कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भी अपने मुकदमों की बहस हिन्दी में करना कठिन होगा।
इस पर न्यायालय ने कहा कि इस विधान के तहत अंग्रेजी को अलग नहीं किया गया है और न्यायालय की अनुमति से इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय शुरू में इस मसले पर नोटिस जारी करना चाहती थी, लेकिन राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता अरुण भारद्वाज ने कहा कि राज्य में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 272 और दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 137 (2) के तहत प्रदत्त अधिकार के अंतर्गत ही यह विधान लागू किया गया है।
उन्होंने कहा कि राज्य को न्यायालय की कार्यवाही में पारदर्शिता लाने और यह वादकारियों की समझ में आने के लिए इस तरह का विधान बनाने का अधिकार है। न्यायालय ने कहा कि इस संशोधन की धारा 3ए में कुछ भी गलत नहीं है और इससे किसी भी मौलिक अधिकार का हनन नहीं होता है।
मुख्य न्यायमूर्ति ने कहा कि मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में न्यायालय की कार्यवाही हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं में हो रही है। इस पर याचिकाकर्ताओं ने याचिका वापस लेने और राहत के लिए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय जाने की छूट देने का पीठ से अनुरोध किया।
समीर जैन सहित पांच वकीलों ने राज्य के उस विधान को चुनौती दी थी जिसमें दीवानी और फौजदारी न्यायालयों, राजस्व न्यायालयों और किराया अधिकरणों तथा राज्य के दूसरे अधिकरणों की कार्यवाही हिन्दी भाषा में करने का प्रावधान किया गया है। इन वकीलों की दलील थी कि हरियाणा राजभाषा संशोधन अधिनियम, 2020 असंवैधानिक है और राज्य में निचले न्यायालयों में कामकाज की भाषा के रूप में हिन्दी को मनमाने तरीके से थोपा जा रहा है। 

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

भारत का अतीत स्वर्णिम है !


जब कभी बात होती है कि भारत को "इंडिया नहीं भारत कहो" , तो एक स्वाभाविक सा प्रश्न आता है कि भारत पर क्यों?  

भारत का स्वर्णिम अतीत है !
1.        सबसे पहले एक अंग्रेज़ जिसका नाम है ‘थॉमस बैबिंगटन मैकाले’, ये भारत में आया और करीब 17 साल रहा। इन 17 वर्षों में उसने भारत का काफी प्रवास किया, पूर्व भारत, पश्चिम भारत, उत्तर भारत, दक्षिण भारत में गया। अपने 17 साल के प्रवास के बाद वो इंग्लैंड गया और इंग्लैंड की पार्लियामेंट ‘हाउस ऑफ कोमेन्स’ में उसने 2 फ़रवरी 1835 को ब्रिटिश संसद एक लंबा भाषण दिया। उसका अंश पुन: प्रस्तुत करूँगा उसने कहा था :: “ I have travelled across the length and breadth of India and have not seen one person who is a beggar, who is a thief, such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such calibre, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation.
2.      ”इसी भाषण के अंत में वो एक वाक्य और कहता है : वो कहता है ”भारत में जिस व्यक्ति के घर में भी मैं कभी गया, तो मैंने देखा की वहाँ सोने के सिक्कों का ढेर ऐसे लगा रहता हैं, जैसे की चने का या गेहूं का ढेर किसानों के घरों में रखा जाता है और वो कहता है की भारतवासी इन सिक्को को कभी गिन नहीं पाते क्योंकि गिनने की फुर्सत नही होती है इसलिए वो तराजू में तौलकर रखते हैं। किसी के घर में 100 किलो, इसी के यहा 200 किलो और किसी के यहाँ 500 किलो सोना है, इस तरह भारत के घरों में सोने का भंडार भरा हुआ है।”

रविवार, 11 जनवरी 2015

भारत का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय अभी भी अंग्रेजों के अधीन है!

शीर्षक पढ़कर आपको आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि देखा जाए तो भारत आज भी स्वतंत्र नहीं हुआ है, जबकि पूरी भारत सरकार ही अंग्रेजी दासता से ग्रस्त है जिसका नाम है गवर्नमेंट ऑफ़ इण्डिया. जिस शासन का नाम भी ६८ वर्षों बाद अंग्रेजी में हो वहाँ आप कैसी स्वतंत्रता की कल्पना करेंगे? १५ अगस्त १९४७ के बाद बस बदलाव इतना आया है कि पहले ब्रिटेन से आए हुए शासक हम पर शासन करते थे और अब भारत में जन्मे अंग्रेज हम पर शासन कर रहे हैं.

पिछले तीन वर्षों से मैं और देश के अनेक भाषा-प्रेमी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में राजभाषा का प्रयोग ना किए जाने और जनता से  जुड़ी सभी ऑनलाइन सुविधाएँ सिर्फ अंग्रेजी में थोपने की कई बार शिकायतें कर चुके हैं, कई बार आर टी आई आवेदन भी लगा चुके हैं पर क्या करें हम लोगों के सारे प्रयास व्यर्थ जा रहे हैं, हिन्दी के लिए आवाज उठाने वालों की सुनता भी कौन है? 

शायद मंत्रालय में एक भी ऐसा अधिकारी नहीं है जो आम जनता की सुविधा/उनके दुःख-कष्ट समझने को लेकर गंभीर हो, अन्यथा इस मंत्रालय का कामकाज राजभाषा/जनभाषा #हिन्दी में हो रहा होता, ऑनलाइन सेवाएँ हिन्दी/अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं में होतीं, मंत्रालय की वेबसाइटों पर हिन्दी में जानकारी, नियम, नीतियाँ, आदेश, अधिनियम आदि उपलब्ध होते, हिन्दी में ऑनलाइन शिकायतें दर्ज करवाने के विकल्प उपलब्ध होते. पर  ऐसा नहीं हुआ. ये अधिकारी अपने अंग्रेजी कामकाज के पीछे एक ही तर्क लेते हैं कि संविधान ने अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा दिया है और भारत की जनता पर विशेष रूप से दक्षिण की जनता पर हिन्दी लागू करने से देश के टुकड़े हो जाएँगे, राजनीतिक अराजकता फ़ैल जाएगी पर वे भूल जाते हैं कि वे देश सत्तानवे प्रतिशत नागरिकों  पर बलात अंग्रेजी थोप रहे हैं! उनके हिसाब से अंग्रेजी में काम करना बहुत आसान है और अंग्रेजी में कामकाज होने से देश के सत्तानवे प्रतिशत लोग कभी समझ ही नहीं पाते कि हो क्या रहा है इसलिए वे इन अधिकारियों के कामकाज पर ऊँगली नहीं उठा पाते हैं, सरकारी अधिकारी ऐसा करके स्वयं का भला करे हैं, यदि यही काम हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में किया गया तो उनको अप्रिय प्रश्नों का सामना करना होगा. दूसरी बात, इन अधिकारियों को आम नागरिकों की सुविधा की तनिक भी चिंता नहीं है इसलिए सारे नियम, अधिनियम, दिशा-निर्देश, नीतियाँ केवल अंग्रेजी में ही तैयार किए जाते हैं और उन्हें अंग्रेजी में ही जनता के सुझावों के लिए जारी कर दिया जाता है. अब जब नीतियाँ-नियम अंग्रेजी में जारी होंगे तो उन पर सुझाव कौन दे सकेगा? अरे भई, वही आदमी दे सकेगा जो अंग्रेजी पढ़ सकता हो, उसे समझ सकता हो और पढ़-समझने के बाद अपना सुझाव अंग्रेजी में लिख सकने की योग्यता रखता हो. मेरे विचार में भारत में अंग्रेजी के ऐसे निष्णात विद्वानों की संख्या २-३ प्रतिशत से अधिक नहीं है. ऐसा सरकारी अधिकारी इसलिए करते हैं ताकि देश की आम जनता किसी भी प्रकार से नीति-नियम के निर्माण में भाग ना ले सके, इस देश में जो अंग्रेजी ना समझ सकता हो वह तीसरे दर्जे का आदमी है, उसकी क्या हैसियत कि वो आईएएस अधिकारियों को अपनी मातृभाषाओं में सुझाव देने की जुर्रत करे?

तो देश में २-३ प्रतिशत लोगों की सुविधा के अनुसार नीतियाँ और कानून बनाए जाते हैं और उन्हें देश के 100% लोगों पर लागू कर दिया जाता है. अभी २-३ दिन पहले स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति' का प्रारूपण अपनी वेबसाइट पर अंग्रेजी में डाला है और इस पर ऑनलाइन सुझाव देने की व्यवस्था भी अंग्रेजी में शुरू की है. (लिंक: http://www.mohfw.nic.in/index1.php?lang=1&level=1&sublinkid=4883&lid=3013 ) क्या यही लोकतंत्र है जहाँ राजभाषा का प्रयोग ना किया जाए, जहाँ  नीति निर्माण से  देश की सत्तानवे प्रतिशत जनता हो सिर्फ इसलिए अलग रखा जाए क्योंकि वह जनता अंग्रेजी नहीं जानती है? भारत सरकार का आम जनता से जुड़ा हर कामकाज एक ऐसी भाषा में किया जा रहा है जिसे देश की सत्तानवे प्रतिशत जनता समझ भी नहीं सकती है. 

पिछले तीन वर्षों से मैंने निम्न बिंदु उठाए:
  1. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की मुख्य वेबसाइट पूर्ण रूप से हिन्दी में बनाई जाए.
  2. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की अधीनस्थ सभी वेबसाइटों को हिन्दी में बनाया जाए.
  3. आयुष विभाग की हिन्दी वेबसाइट पर हिन्दी में जानकारी डाली जाए.
  4. 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति' का प्रारूपण अविलम्ब हिन्दी में उपलब्ध हो, ऑनलाइन सुझाव की सुविधा हिंदी में शुरू की जाए. आगे हमेशा जनता के सुझाव चाहने वाले सभी मसौदों को हिन्दी में जारी किया जाए.
  5. मंत्रालय की सभी ऑनलाइन सेवाएँ अनिवार्य रूप से द्विभाषी हों.
  6. मंत्रालय द्वारा सभी प्रारूप/मुहरें/पत्रशीर्ष/लिफ़ाफ़े अनिवार्य रूप से द्विभाषी छपाए जाएँ.
  7. मंत्रालय की अधीनस्थ कंपनियों के उत्पादों पर जानकारी हिन्दी में भी छापी जाए.
  8. मंत्रालय द्वारा विज्ञप्तियाँ हिंदी में जारी की जाएँ/आमंत्रण/कार्यक्रमों के बैनर/पोस्टर/नामपट/बैज आदि द्विभाषी छपवाए जाएं. (एक-दो अपवाद छोड़ हमेशा अंग्रेजी में होते हैं)
  9. मंत्रालय एवं अधीनस्थ कार्यालयों के द्वारा जारी होने वाले लाइसेंस/प्रमाण-पत्र/पंजीयन -पत्र आदि अनिवार्य रूप से द्विभाषी जारी किए जाएँ.
  10. भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की वेबसाइट एवं ऑनलाइन लाइसेंस/पंजीयन सुविधा हिन्दी में शुरू करवाई जाए.

आप देखेंगे कि उक्त दस बिन्दुओं में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा राजभाषा अधिनियम, राजभाषा नियमावली, निर्देश अथवा संसदीय राजभाषा समिति की अनुशंसाओं पर जारी हुए राष्ट्रपति जी के अनेक आदेशों का निरंतर उल्लंघन किया जा रहा है. 

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

अंग्रेजीपरस्तों का कोरा झूठ: अंग्रेजी भारत की सम्पर्क भाषा है

जनसत्ता 6 अगस्त, 2014 : संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं को लेकर चल रहे आंदोलन ने एक बार फिर अंग्रेजी  समर्थकों को बुरी तरह परेशान कर दिया है, उन्हें अपनी भाषा का वर्चस्व हर बार की तरह इस बार फिर से खतरे में दीखने लगा है, खासकर अर्णव गोस्वामी जैसे लोग तो पगलाए-घबराए से लग रहे हैं। उन्होंने पिछले सप्ताह अपने अंग्रेजी  चैनल पर आए एक कन्नड़भाषी को- जो अंग्रेजी  बढ़िया जानते हैं मगर इस आंदोलन के समर्थक हैं- तंग आकर पूछा कि कहीं आप किसी पार्टी से संबद्ध तो नहीं हैं, और जब उन सज्जन ने निराश करते हुए कहा कि कतई नहीं, तो अर्णवजी बहुत हताश हुए, क्योंकि उन सज्जन पर इस मामले का राजनीतिकरण करने का चालू आरोप लगाना उनके लिए मुश्किल हो गया। 

वे इस बात से डर गए कि फिर तो इस कन्नड़ की बात को उनके श्रोता विश्वसनीय मान सकते हैं, तो वे तुरंत एक अंग्रेजी  समर्थक की तरफ मुड़ गए और उस कन्नड़भाषी को आगे बोलने नहीं दिया, जैसा कि अपनी पसंद की बात न करने वालों के साथ वे अक्सर किया करते हैं। अर्णवजी और तमाम ऐसे सज्जन बार-बार यह याद दिला रहे हैं कि अंग्रेजी  ही देश की संपर्क भाषा है और उसके बगैर देश का काम नहीं चल सकता और अंग्रेजी  के प्रति नफरत का वातावरण बनाया गया तो यह देश टूट जाएगा। यह अलग बात है कि किसी ने ऐसी कोई बात उनके चैनल पर नहीं कही। 

खासतौर पर नब्बे के दशक में बाजारीकरण की शुरुआत के बाद से अंग्रेजी  का आकर्षण तेजी से बढ़ा है और हर कोई अंग्रेजी  के पीछे पड़ा है कि जैसे अंग्रेजी  रोजगार और जीवन में सफलता की पक्की गारंटी है। अब गली-गली मोहल्ले-मोहल्ले गरीबों के लिए भी अंग्रेजी  स्कूल खुल गए हैं, लेकिन न तो सरकारी स्कूल और न आशा के नए द्वीप बने ये निजी  स्कूल अंग्रेजी  के प्रचार-प्रसार में कोई खास योगदान दे रहे हैं। 2007 में सरकारी स्कूलों में पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों के अंग्रेजी  ज्ञान का जो सर्वे हुआ था, उसमें बताया था कि ये बच्चे दूसरी कक्षा की अंग्रेजी  पाठ्यपुस्तक भी बमुश्किल पढ़ पाते हैं। 2010 में पुन: हुआ ऐसा ही सर्वे बताता है कि पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले आधे छात्र दूसरी कक्षा की अंग्रेजी  पाठ्यपुस्तक भी नहीं पढ़ पाते। 

चलिए थोड़ी देर के लिए सरकारी स्कूल तो मान लिया कि सरकारी स्कूल ही हैं और उनका अब कुछ नहीं हो सकता, शायद इसीलिए गरीब तबका भी अगर संभव होता है तो अपने बच्चों को इन स्कूलों में नहीं भेजता। मगर जिन निजी  स्कूलों में भेजता है वहां भी चौंसठ प्रतिशत बच्चों की ठीक यही हालत है। तो गरीब वर्गों तक अंगेरजी की पहुंच जरूर हो रही है मगर इस तरह जिसका कोई मतलब नहीं है, जिससे उन बच्चों के अभिभावकों के वे सपने पूरे नहीं हो सकते, जिसके लिए उन्होंने इन स्कूलों में दाखिल करवाया है। इसके अलावा अंग्रेजी , अंग्रेजी  में भी बहुत बड़ा जातिभेद है। किसने कहां अंग्रेजी  पढ़ी, यह एक बड़ा मुद््दा है। इसे समझने में शायद अभी वक्त लगेगा।

इसके बावजूद अंग्रेजी  को देश की संपर्क भाषा घोषित करने वाले अंग्रेजी  के प्रभाव के बारे में तरह-तरह के बड़े-बड़े दावे पेश करते रहे हैं। उधर राष्ट्रीय ज्ञान आयोग- जो अंग्रेजी दाओं से भरा हुआ है, उसने 2006-2009 की अपनी रिपोर्ट में यह आंखें खोल देने वाली बात कही थी कि अब भी देश के एक प्रतिशत से ज्यादा लोग अंग्रेजी  का उपयोग दूसरी भाषा के रूप में भी नहीं करते, पहली भाषा में उसे बरतने की बात तो भूल ही जाएं। अगर यह गलत है तो या तो आयोग झूठा है, लेकिन तब क्या जनगणना के आंकड़े भी झूठे हैं? 2001 की जनगणना (अभी भाषा संबंधी रिपोर्ट 2011 की नहीं आई है) बताती है कि भारत में कुल 2,26,449 लोग प्रथम भाषा के रूप में अंग्रेजी  का प्रयोग करते हैं। 

सवा अरब की आबादी में सवा दो लाख लोगों की भाषाई हैसियत क्या है? खरिया और कोंध भाषा- जिनके बारे में ज्यादातर लोग कुछ नहीं जानते- भी इतने ही लोग बोलते हैं जितने लोग भारत में अंग्रेजी  को अपनी मातृभाषा मानते हैं। इससे पहले 1981 की जनगणना में भी बताया गया था कि देश के कुल 2,02,400 लोग ही प्रथम भाषा के रूप में अंग्रेजी  बोलते हैं यानी आबादी के अनुपात में महज 0.03 प्रतिशत लोग। 

ये आंकड़े किसी हिन्दी वादी द्वारा पैदा नहीं किए गए हैं, न किसी अंग्रेजी -विरोधी ने ये गढ़े हैं, लेकिन अंग्रेजी  जानने और सत्ता का सुख लूटते रहने का दंभ पालने वाले इस क्रूर सच्चाई को नहीं समझना चाहते। 2001 की जनगणना के कथित आंकड़ों के आधार पर- जो आंकड़े जनसंख्या आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं हुए- इनका दावा है कि भारत में हिन्दी  के बाद दूसरी सबसे बड़ी भाषा अंग्रेजी  है जिसने बांग्ला सहित तमाम भारतीय भाषाओं को पीछे छोड़ दिया है। 

इस हास्यास्पद दावे का आधार वही कथित अनुपलब्ध रिपोर्ट है जो यह बताती है कि करीब सवा दो लाख लोगों की मातृभाषा ही अंग्रेजी  है लेकिन 8.60 करोड़ लोगों की दूसरी भाषा अंग्रेजी  है और तीसरी भाषा के तौर पर इसे 3 करोड़ 12 लाख लोग इस्तेमाल करते हैं।

मगर 2 लाख लोगों की प्रथम भाषा अचानक 8.60 करोड़ लोगों की दूसरी भाषा कैसे हो सकती है, यह आश्चर्य का विषय है और अगर ऐसा कोई दावा सचमुच ही 2001 की जनगणना रिपोर्ट करती है तो इसका बड़ा आधार हमारी हीनता-ग्रंथि ही हो सकती है जो हम तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों को बाध्य करती है कि वे दूसरी भाषा के तौर पर अंग्रेजी  को दर्ज करवा कर देश के संभ्रातों में शामिल होने का गौरव मन ही मन लूटें। दूसरी भारतीय भाषाओं को सीखने के प्रति हमारी उदासीनता भी- खासकर उन लोगों में जो जीवन भर अपने भाषा-क्षेत्र में ही तमाम कारणों से सीमित रह जाते हैं- इसका कारण हो सकती है। चूंकि स्कूल-स्तर पर लोगों ने अक्सर किसी भारतीय भाषा के बजाय टूटी-फूटी अंग्रेजी  ही पढ़ी होती है, इसलिए उसे ही वे दूसरी भाषा के रूप में दर्ज करवा देते होंगे, जबकि अंग्रेजी  का उनका ज्ञान हास्यास्पद स्तर का हो सकता है। मैं अपने अनुभवों से जानता हूं कि चालीस साल पहले भी जिन छात्र-छात्राओं ने स्कूल-कॉलेज स्तर पर अंग्रेजी  पढ़ी है, उनमें से ज्यादातर का इस भाषा का ज्ञान दरअसल कितना सतही है (कॉलेज में मेरे अंग्रेजी  के अध्यापक खुलेआम कुंजी लेकर कक्षा में आते थे और उसमें से प्रश्नोत्तर लिखवा देते थे और उनका काम खत्म हो जाता था)। अंग्रेजी  बोलने-लिखने वालों के दावों को लेकर इंगलिश इंडियाज नेक्स्ट पुस्तिका के लेखक डेविड ग्रेडोल ने इस बारे में उपलब्ध विभिन्न आंकड़ों का हवाला देते हुए और इन सबकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए लिखा है कि दरअसल कोई निश्चित रूप से नहीं जानता कि भारत में कितने लोग अंग्रेजी  जानते हैं। 

फिर जो किसी भारतीय भाषा को अपनी मातृभाषा बताते हैं और जो अंग्रेजी  को अपनी दूसरी या तीसरी भाषा बताते हैं इनकी आपस में तुलना कैसे की जा सकती है? दूसरी और तीसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी  या किसी और भाषा का ज्ञान प्रथम भाषा के रूप में किसी अन्य भाषा के ज्ञान से तुलनीय कैसे हो सकता है? यह कैसे कहा जा सकता है कि चूंकि बांग्ला जानने वाले लोगों की कुल संख्या (दूसरी-तीसरी भाषा के रूप में इसे इस्तेमाल करने वालों सहित) अंग्रेजी  जानने वालों से कम है इसलिए बांग्ला अंग्रेजी  से पिछड़ गई है, जबकि बांग्ला को प्रथम भाषा के रूप में इस्तेमाल करने वाले लोग आठ करोड़ तैंतीस लाख हैं और अंग्रेजी  का प्रथम भाषा के रूप मे प्रयोग करने वाले चौथाई करोड़ भी नहीं हैं। 

अब आते हैं इस बात पर कि भारत की संपर्क भाषा दरअसल क्या है- अंग्रेजी  है या हिन्दी ? अगर भारत के लोगों के आपसी संपर्क का अर्थ यहां आइएएस-आइपीएस अधिकारियों, उच्च और उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीशों, अकादमिशियनों, कॉरपोरेट घरानों के लोगों-प्रतिनिधियों, उच्च और उच्चमध्यवर्गियों का आपसी संपर्क होना ही है, आम जनता का आपसी संपर्क होना नहीं है तो निश्चित रूप से अंग्रेजी  ही भारत की संपर्क भाषा है।

अगर भारत को भारत यहां के किसान, मजदूर, अल्पसंख्यक, आदिवासी, दलित, पिछड़े और स्त्रियां बनाती हैं, यहां कि भाषाएं-बोलियां बोलने वाले लोग बनाते हैं तो संपर्क भाषा अंग्रेजी  कतई नहीं हो सकती।  वे आंकड़े जो अंग्रेजी को हिन्दी  के बाद दूसरी बड़ी भाषा घोषित करते हैं, वे ही यह भी बताते हैं कि हिन्दी को प्रथम भाषा के रूप में बरतने वाले 42 करोड़ लोग (अंग्रेजी  को बरतने वाले सवा दो लाख) हैं तथा दूसरी और तीसरी भाषा के रूप में बरतने वाले बाकी तेरह करोड़ से अधिक लोग हैं यानी कुल 55.14 करोड़ लोग हिन्दी  बोलते-लिखते-समझते हैं। अगर दूसरे जटिल सांस्कृतिक-भाषाई उलझनों को फिलहाल छोड़ दिया जाए तो उर्दू बोलने वाले भी तो लिपि को छोड़ कर वही हिन्दी  या वही हिंदुस्तानी बोलते-बरतते हैं जो बाकी हिन्दी भाषी कहलाने वाले लोग बोलते-बरतते हैं। ऐसे लोग जो उर्दू को अपनी प्रथम भाषा बताते हैं उनकी तादाद भी कम नहीं है- 5 करोड़ 15 लाख है। 

यानी व्यावहारिक रूप से हिन्दी या हिंदुस्तानी जानने वाले लोग देश में 2001 तक साठ करोड़ से भी ज्यादा थे, जिनमें उर्दू को दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में बरतने वालों की संख्या शामिल नहीं है क्योंकि इसके आंकड़ों के बारे में हमें नहीं मालूम; यानी देश की आधी आबादी हिन्दी  लिखती-बोलती-समझती है। अगर अंग्रेजी  के विवादास्पद दावे को थोड़ी देर को सही भी मान लें तो उससे चार गुना ज्यादा लोग हिन्दी या कहें हिंदुस्तानी जानते-समझते हैं। लेकिन संपर्क भाषा फिर भी अंग्रेजी  ही है, यह कितना बड़ा मजाक है?

हिन्दी  या भारतीय भाषाओं की पचास दूसरी समस्याएं हैं (क्या अंग्रेजी  की नहीं हैं?) और निस्संदेह हिन्दी  के मुकाबले अंग्रेजी  बोलने-समझने-पढ़ने वाले दुनिया भर में बहुत ज्यादा हैं, मगर भारत की संपर्क  भाषा अंग्रेजी  किसी तौर पर नहीं है, भ्रम चाहे ऐसा होता हो। निश्चित रूप से अंग्रेजी  को इस देश की नौकरशाही-न्यायप्रणाली-कॉरपोरेट जगत का अकुंठ समर्थन हासिल है जिसमें राजनीतिकों का भी एक बड़ा और प्रभावशाली तबका शामिल है। उसकी सत्ता का आधारस्तंभ अंग्रेजी  है, अगर वह आधार ही ढह गया तो आभिजात्य का विशाल किला भरभरा कर गिर जाएगा। 

वैसे अंग्रेजीदांओं ने यह खबर भी सुनी होगी कि तमिलनाडु- जहां आज भी हिन्दी -विरोध की राजनीति खेली जाती है- अंग्रेजी दां निजी  स्कूलों में हिन्दी  पढ़ाई जाती है ताकि बेहतर सरकारी और निजी सेवाएं हासिल करने के लिए देश के किसी भी हिस्से में कोई दिक्कत न आए। यहां तक कि हिन्दी -विरोधी द्रमुक तमिलनाडु के हिन्दी भाषियों के वोट हासिल करने के लिए पर्चे हिन्दी  में छापती है। बहरहाल, हिन्दी  एक ऐसा यथार्थ है जिसकी उपेक्षा करना अंग्रेजी  वालों को ही भारी पड़ सकता है। थोड़ा-थोड़ा शायद यह अरणब बाबू भी समझते हैं, तभी अपने कार्यक्रम में वे हिन्दी  भी अक्सर आजकल बोलने लगे हैं।

सौजन्य: जनसत्ता 

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय में नहीं होता जनभाषा में काम


To: jatchaudhary1@yahoo.com, secy-ol@nic.in, "Joint Secy, OL" <jsol@nic.in>, poonam juneja <junejapoonam9@gmail.com>



दिनांक : 17 नवम्बर 2013 

प्रति,
निदेशक (शिकायत)
राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय,
भारत सरकार,
नई दिल्ली 

विषय : अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा राजभाषा सम्बन्धी प्रावधानों की अनदेखी और अंग्रेजी को बढ़ावा

आदरणीय महोदय,

भारत की राजभाषा हिन्दी है तथा विभिन्न राज्यों की अपनी राजभाषाएँ हैं, भारत में लगभग तीन प्रतिशत लोग अंग्रेजी जानते हैं और सत्तानवे प्रतिशत लोग अंग्रेजी नहीं जानते हैं. यहाँ ध्यान देने योग्य है कि देश कि छप्पन करोड़ जनता की मातृभाषा हिन्दी है और लगभग पच्चीस करोड़ लोग हिन्दी का कार्यसाधक ज्ञान रखते हैं.

इन तथ्यों से पता चलता है कि देश के सत्तानवे प्रतिशत नागरिकों पर अंग्रेजी थोपने की बजाए उन्हें उनकी भाषा में अथवा कम से कम हिन्दी भाषा में दी जानी चाहिए पर ऐसा नहीं हो रहा है उन पर अंग्रेजी थोपी जा रही है. 

यहाँ यह कहना उचित होगा कि अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय मंत्रालय का कामकाज अंग्रेजी में ही हो रहा है और शायद मंत्रालय यह मानकर चल रहा है कि भारत के सभी अल्पसंख्यक इंग्लैंड से अंग्रेजी पढ़कर आए हैं ऐसे में मंत्रालय हिंदी में काम कैसे कर सकता है आखिर मंत्रालय के अधिकारियों के सम्मान का प्रश्न है. मंत्रालय को अल्पसंख्यकों के विकास की चिंता नहीं है बल्कि अंग्रेजी की चिंता है इसलिए अंग्रेजी में काम करते चलो और जब कभी ज़रूरत पड़े तो दो-चार दस्तावेजों को हिंदी में अनुवाद करवा दो पर हम हिंदी में काम तो करेंगे ही नहीं, फिर अनुवादकों की सेवाएँ कब काम आएंगी?

राजभाषा हिन्दी है और काम अल्पसंख्यकों के विकास का है फिर भी प्राथमिकता अंग्रेजी को, सारी योजनाएँ अंग्रेजी में पहले बनती हैं, सभी योजनाओं की जानकारी केवल अंग्रेजी में अंग्रेजी वेबसाइट पर डाली जाती है, सारे आवेदन, शपथपत्र के प्रारूप केवल अंग्रेजी में अंग्रेजी वेबसाइट पर डाले गए हैं, अंग्रेजी दस्तावेज पहले बनेंगे, परिपत्र अंग्रेजी में जारी होंगे. ऐसा देश है मेरा !!!

अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा निरंतर राजभाषा अधिनियम, राजभाषा नियम, राजभाषा नीति और राजभाषा विभाग के निर्देशों का उल्लंघन किया जा रहा है:

उल्लंघन के उदाहरण:
1.    अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की वेबसाइट केवल अंग्रेजी में बनाई गई है और वेबसाइट पर दो-चार दस्तावेजों के अतिरिक्त अन्य कोई भी जानकारी हिंदी में उपलब्ध नहीं है, ना ही हिंदी वेबसाइट बनाने के लिए मंत्रालय ने कोई काम किया गया है, आगामी दशकों में भी हिंदी वेबसाइट बनाने की भी कोई योजना मंत्रालय की नहीं है. वैसे भी मंत्रालय की स्थापना के सात वर्षों में कोई काम नहीं हुआ.
2.    एक-दो अपवाद छोड़कर  अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के सभी निविदा-पत्र, परिपत्र, कार्यालय ज्ञापन, करार, अनुबंध(ताज़ा अनुबंध अक्टूबर 2013 में हुआ) , समझौते, प्रेस विज्ञप्ति, विज्ञापन, कार्यक्रमों के बैनर, पोस्टर, दिशा-निर्देश, फॉर्म, सूचना का अधिकार अधिनियम सम्बन्धी सभी विवरण/ सूचना अधिकारियों के नाम पते आदि का केवल अंग्रेजी में जारी किए जा रहे हैं. वेबसाइट पर हिंदी में विज्ञप्ति, नीति, नियम, भर्ती सूचना, अधिसूचना कुछ भी उपलब्ध नहीं है. कृपया मंत्रालय द्वारा राजभाषा विभाग को भेजी गई राजभाषा अनुपालन की त्रैमासिक रिपोर्टों की छानबीन करते हुए भौतिक परीक्षण किया जाए ताकि इन रिपोर्टों की सत्यता सामने आ सके.
3.    सभी ऑनलाइन सेवाएँ केवल अंग्रेजी में उपलब्ध हैं.
4 . अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा रबर की मुहरें, लिफ़ाफ़े और योजनाओं के लाभ लेने हेतु सभी आवेदन फॉर्म द्विभाषी ना छपाकर केवल अंग्रेजी में जारी किए/छापे गए हैं.
5. अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की सम्पूर्ण कार्यवाही अंग्रेजी में की जाती है, बैनर-पोस्टर-बैज-आमंत्रण-पत्र-पाठ्य सामग्री, प्रेस विज्ञप्ति, शिलान्यास-पट आदि केवल अंग्रेजी में तैयार किये जाते/की जाती है.
६. अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा हिन्दी में प्राप्त ईमेल के कोई जवाब नहीं दिए जाते।

आपसे अनुरोध है कि अब ६६ साल बीत गए हैं हिंदी के नाम पर ढोंग करने वाले मंत्रालयों पर कार्यवाही सख्त कीजिए ताकि भारत के नागरिकों को उनकी भाषा में सेवाएं मिलें और सच्चे लोकतंत्र की स्थापना हो, संविधान निर्मातओं की राजभाषा हिंदी की स्थापना की भावना पूरी हो, ये भारत है अंग्रेजों का देश नहीं कि हम पर ६६ साल बाद भी अंग्रेजी थोपी जा रही है.
केंद्रीय हिंदी सलाहकार समिति की बैठक तुरंत बुलवाइए, वर्षों से नहीं हुई है, कुछ ठोस कीजिए, सिर्फ चिट्ठी भेजने भर से कुछ नहीं होगा।
कृपया तुरंत कार्यवाही की जाए और की गई कार्यवाही से मुझे अवगत करवाया जाए.

भवदीय

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

दिल्ली पुलिस द्वारा भाषाई आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव की शिकायत


प्रेषक: tushar kothary <kotharytushar@gmail.com>

दिनांक: 25 अक्तूबर 2013 1:39 pm
विषय: दिल्ली पुलिस द्वारा भाषाई आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव की शिकायत
प्रति: manmohan@sansad.nic.in





दिनांक: २५ अक्तूबर २०१३



प्रति,

आदरणीय प्रधानमन्त्री जी

भारत सरकार, नई दिल्ली



विषय:दिल्ली पुलिस द्वारा भाषाई आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव की शिकायत


आदरणीय महोदय,


प्रधानमन्त्री का अगस्त 1999, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय का सितम्बर 1999 का आदेश एवं संसदीय राजभाषा समिति की संस्तुति संख्या 44 को स्वीकार करने वाले माननीय राष्ट्रपतिजी के आदेश को प्रसारित करते हुए राजभाषा विभाग के (राजपत्र में प्रकाशित) पत्रांकI/20012/07/2005-रा.भा.(नीति-1) दिनांक 02.07.2008 के अनुसार जब भी कोई मंत्रालय/विभाग या उसका कोई कार्यालय या उपक्रम अपनी वेबसाइट तैयार करे तो वह अनिवार्य रूप से द्विभाषी तैयार की जाए | जिस कार्यालय का वेबसाइट केवल अंग्रेजी में है उसे द्विभाषी बनाए जाने की कार्यवाही की जाए|” 


इसका आशय है कि भारत सरकार के नियमानुसार हिन्दी में वेबसाइट बनाना और उसे समय-२ पर अंग्रेजी वेबसाइट के साथ अद्यतन करना कानूनन अनिवार्य है.


यह राजभाषा अधिनियम १९६३ एवं भारत के संविधान के अनुच्छेद ३४३ एवं ३५१ का स्पष्ट उल्लंघन है. आपसे विनम्र निवेदन है कि हिन्दी वेबसाइट तुरंत उपलब्ध करवाई जाए । हिन्दी वेबसाइट पर  अंग्रेजी सामग्री, अंग्रेजी पीडीएफ /वर्ड फाइलें,अंग्रेजी प्रेस-विज्ञप्तियाँ ना डाली जाएँ एवं उसके स्थान पर हिन्दी सामग्री को डाला जाए. वेबसाइट के बैनर पर "दिल्ली पुलिस"का नाम हिन्दी को ऊपर/आगे रखते हुए हिन्दी में भी प्रदर्शित किया जाए. 


हिन्दी वेबसाइट पर भारत सरकार की अन्य वेबसाइट के लिंक भी संबंधित हिन्दी वेबसाइट के ही दिए जाएँ ना कि अंग्रेजी वेबसाइट के. 


दिल्ली पुलिस द्वारा नागरिकों को कोई भी जानकारी हिन्दी में उपलब्ध नहीं करवाई जा रही है, जिन नागरिकों को अंग्रेजी नहीं आती वे परेशां हो रहे हैं, ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं उनके साथ भाषाई आधार पर अन्याय हो रहा है, सारी सुविधा केवल अंग्रेजी जानने वालों के मिल रही है. पुलिस थानों में छापे हुए फ़ार्म भी केवल अंग्रेजी में होते हैं. इस तरह हिन्दीभाषी समाज के साथ भारी भेदभाव किया जा रहा है. इस सम्बन्ध में कई नागरिकों और संस्थानों ने दिल्ली पुलिस के पदाधिकारियों और आपको भी शिकायत की है पर दिल्ली पुलिस पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है.



महोदय, 


ये कैसा देश है जहाँ नागरिकों के जानकारी/जागरूक रहने के मूलभूत अधिकार का अंग्रेजी थोपकर हनन किया जा रहा है, आप ही बताइए आपको जो भाषा ना आती हो और सामने वाला आपको सारी जानकारी उसी भाषा में दे तो ऐसी जानकारी आपके किस काम की? 


क्या सरकार नागरिकों को उनकी भाषा में सूचना/जानकारी पाने के अधिकार को भी सुनिश्चित नहीं कर सकती?


"दिल्ली पुलिस" के  प्रतीक-चिन्ह में अनिवार्य रूप से हिंदी के अक्षर अंग्रेजी के अक्षरों से पहले/आगे होने चाहिए, अभी जो चिन्ह है उसमें हिन्दी में 'दिल्ली पुलिस' अंग्रेजी के Delhi Police के बाद इस्तेमाल हुआ है इसी तरह 'DP' अक्षर चिन्ह के बीचों बीच अंग्रेजी में है इसलिए कृपया इसमें शीघ्र सुधार किया जाए एवं हिंदी को प्राथमिकता दी जाए.  इस सम्बन्ध में राजभाषा अधिनियम के प्रावधानों को http://rajbhasha.nic.in/ पर देखा जा सकता है.


दिल्ली पुलिस द्वारा राजभाषा हिंदी के उल्लंघन के और भी उदाहरण हैं:


1. पूरी दिल्ली में दिल्ली पुलिस के सभी वाहनों/बैरिकेड्स/ ठहरिये वाले/अवरोध बोर्ड आदि पर 'दिल्ली पुलिस' एवं 'ठहरिए' शब्द केवल अंग्रेजी में ही इस्तेमाल किया जाता है।

2. कई पुलिस थानों के नाम के बोर्ड पर अंग्रेजी को हिंदी के ऊपर/पहले इस्तेमाल किया जाता है।

3. वेबसाइट पर उपलब्ध सभी फॉर्म केवल अंग्रेजी में उपलब्ध हैं जबकि राजभाषा नियमों के अनुसार ऐसे सभी फॉर्म हिंदी अथवा द्विभाषी होने चाहिए।


चूंकि दिल्ली देश की राजधानी है और देश की राजभाषा हिंदी है और इसलिए दिल्ली पुलिस की भाषा भी हिंदी हुई, इन सब कमियों को यथाशीघ्र दूर करवाया जाए।

इस सम्बन्ध में की गई कार्यवाही से मुझे अवगत करवाया जाए, ऐसी मेरी प्रार्थना है.



निवेदक:

भारत का एक सामान्य नागरिक

तुषार कोठारी


क्या मेरी मदद करेंगे?

विनम्र अनुरोध:

मेरे भैया गाँव में रहते हैं और एसबीआई के ग्राहक हैं, हाल ही में वे मुंबई आये थे, बैंक के तीन-चार एसएमएस उन्होंने मुझे दिखाए और बोले इन्हें पढ़कर बताओ. मैंने  कहा कि आपको भी तो अंग्रेजी आती है फिर क्यों ? 

उनका जवाब था आती है पर तेरे जितनी नहीं इसलिए कई बार एसएमएस समझ नहीं आता है क्या बैंक ऐसे अलर्ट हिंदी में नहीं भेज सकता? क्या तू बैंक वालों से बात करके इस सेवा को हिंदी में नहीं करवा सकता?

मुद्दा मेरी रुचि का था इसलिए लगा कि भैया की बात एकदम सही है, देश के करोड़ों लोग बैंक ग्राहक हैं पर सारी सूचना उन्हें अंग्रेजी में दी जा रही है इसलिए वे उनका इस्तेमाल ही नहीं कर पाते और जागरूक भी नहीं हो पाते? ग्राहक का शोषण होता है क्योंकि वो बहुत सारी बातें समझ ही नहीं पाता.

क्या हम सब उनके लिए दस मिनट का समय दे सकते हैं ? 
इसलिए यह अभियान शुरू किया है :

यदि आप एसबीआई के ग्राहक हैं तो इस लिंक https://prepaid.onlinesbi.com/CMS/ पर जाकर १. एसएमएस अलर्ट सेवा, २. नेटबैंकिंग एवं ३. मोबाइल एप्प (एसबीआई फ्रीडम/ एसबीआई सिक्योर) को हिंदी में उपलब्ध ना होने की तीन अलग -२ शिकायत दर्ज करवाएँ, (अक्षर सीमा २०० है ).

फॉर्म अंग्रेजी में है इसलिए शिकायत रोमन में लिखें पर याद रहे अंग्रेजी में शिकायत ना लिखें और आप शिकायत करने की सूचना मुझे दें.

बैंक का कहना है कि यदि सौ-दौ सौ ग्राहक मांग करते हैं तो हम इस माँग पर विचार कर सकते हैं?

यदि एसएमएस अलर्ट सेवा हिंदी में शुरू हो जाती है तो उससे देश के करोड़ों ग्राहक [जो हमारी तरह मुंबई-दिल्ली अथवा इंदौर में नहीं रहते और अंग्रेजी नहीं जानते-समझ पाते हैं] लाभान्वित होंगे जो एसएमएस वांच भी नहीं पाते, समझेंगे कहाँ से?

और  बैंक तो बाकायदा इस सेवा के पंद्रह रुपये प्रति तिमाही के हिसाब से वसूल कर रहा है.

आप चाहें तो यह ईमेल आगे अपने समान विचारधारा वाले दोस्तों को भेज सकते हैं. ताकि हमें इस अभियान के लिए अधिक से अधिक लोगों का समर्थन प्राप्त हो सके.