अनुवाद

तमिल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
तमिल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 30 मई 2014

यदि आप सांसद हैं तो ध्यान दें, आपनेवोट भारतीय भाषा में मांगे थे; अब शपथ भी लीजिए!

आदरणीय

दिनांक ४ एवं ५ जून २०१४ को नई संसद के सभी सांसद शपथ ग्रहण करेंगे। कितना अच्‍छा हो यदि इस बार सभी सांसद हिन्दीतमिल, कन्नड़, मराठी, संस्‍कृत या किसी भारतीय भाषा में शपथ ग्रहण करें। यदि उनका मतदाता चाहेगा तो वे ऐसा अवश्‍य करेंगे। नीचे अनुरोध पत्र के दो प्रारूप अंकित हैं। कृपया इन्‍हें आप स्‍वयं भी भेजें और अधिक से अधिक लोगों को भेजने के लिए प्रेरित भी करें। ध्‍यान रखें हमारे पास अपनी बात अपने जन प्रतिनिधि तक पहुंचाने के लिए समय बहुत कम है मात्र  २ जून २०१४ तक। 

प्रारूप १

सेवा में
श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी,
माननीय प्रधान मंत्रीभारत सरकार,
प्रधानमंत्री कार्यालय,  दक्षिणी खण्ड,  नई दिल्ली

विषय: सांसदों को शपथ केवल भारतीय भाषाओं में दिलाए जाने हेतु अनुरोध 

महोदय,  

कृपया इस बार सभी सांसदों को हिन्दीसंस्‍कृततमिलकन्नडतेलुगूबंगाली अथवा किसी अन्य भारतीय भाषा में ही शपथ लेने के लिए प्रेरित कीजिए। साथ ही भाजपा के सभी सांसदों को स्पष्ट निर्देश बिना विलम्ब के जारी करवाने की कृपा करेंहमें आपसे बहुत आशाएँ  हैंआप भारत का गौरव लौटाएँगे । 

अब समय आ गया है जब भारतभारत सरकार और भारतीय संसद अंग्रेजी की अंतहीन गुलामी से मुक्त हो। यह महान कार्य केवल आपके निमित्त से ही हो सकता है।  

निवेदक


टिप्पण:- इस प्रारूप में निवेदक के बाद अपना नाम एवं पता अंकित कर pmosb@gov.in,publicwing.pmo@gov.in पर प्रेषित करें। तत्‍काल असर होगा।


प्रारूप २

माननी़य सासंद  महोदय,  
कृपया  इस  बार  सांसद पद की शपथ  हिन्दी अथवा अपनी मातृभाषा में ही ग्रहण करॆं, ऐसा हमारा आपसे विनम्र अनुरोध है। अब समय आ गया है जब भारतभारत सरकार और भारतीय संसद अंग्रेजी की अंतहीन गुलामी से मुक्त हो और आप इस महान कार्य में सहभागी बनें 


निवेदक
-------------------------

टिप्पण :-
यह प्रारूप व्‍यक्‍गित रूप से सभी सांसदों के लिए है, इसे आप कई तरीकों से सांसदों तक पहुंचा सकते हैं.
जैसे :
१)समक्ष भेंट कर (सर्वोत्तम तरीका)
२)यदि आपके पास सांसद महोदय का कोई ईमेल पता हो तो उस पर भेज दें लेकिन सामान्‍यत: ये लोग स्‍वयं मेल देख नहीं पाते हैं।
३)इंटरनेट पर उपलब्‍ध सांसद के ट्विटर, फेसबुक पेज के माध्‍यम से।
४) अपने सांसद का ईमेल/मोबाइल आदि आप चुनाव आयोग की वेबसाइट पर ‘शपथ-पत्र’ लिंक से प्राप्त कर सकते हैं:

शनिवार, 20 जुलाई 2013

मैकाले का भूत हर भारतीय पर सवार हो जाए उससे पहले जागो, अपनी भाषाओं का हक़ मांगो

भारतीय भाषाओं के पक्ष में अकेला अभियान : श्याम रूद्र पाठक 

पिछले कई दिनों से एक समाचार रह रह कर ध्यान खींच रहा था। श्याम रुद्र पाठक नाम का एक व्यक्ति अकेला ही एकसूत्रीय अभियान को ले कर लम्बे समय से धरने पर बैठा हुआ था। 

मांग भी अजीब सी थी कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय की कार्यवाही भारतीय भाषाओं में होनी चाहिये। इस व्यक्ति की बात अधिक गंभारता से समझने की इच्छा हुई। 

उनका ही एक आलेख मुझे प्रवक्ता वेब पत्रिका पर पढ़ने को मिला और कुछ मोटे मोटे तर्क मैं समझ सका। उदाहरण के लिये संविधान के अनुच्छेद ३४८ के खंड (१) के उपखंड (क) के तहत उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होंगी। यद्यपि इसी अनुच्छेद के खंड(२) के तहत किसी राज्य का राज्यपाल उस राज्य के उच्च न्यायालयों में हिंदी भाषा या उस राज्य की राजभाषा का प्रयोग राष्ट्रपति की पूर्व सहमति के पश्चात् प्राधिकृत कर सकेगा। 

इस बात का सीधा सा अर्थ निकलता है कि भारतीय भाषाओं को न्याय की भाषा के रूप में हक दिलाने का रास्ता वस्तुत संविधान संशोधन के रास्ते से ही निकलता है। इस संदर्भ पर पाठक अपने लेख में आगे अपनी मांग को स्पष्ट करते हैं कि संविधान के अनुच्छेद ३४८ के खंड (१) में संशोधन के द्वारा यह प्रावधान किया जाना चाहिए कि उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी अथवा कम-से-कम किसी एक भारतीय भाषा में होंगी। 

इसके तहत मद्रास उच्च न्यायालय में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम तमिल, कर्नाटक उच्च न्यायालय में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम कन्नड़, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड और झारखंड के उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम हिंदी और इसी तरह अन्य प्रांतों के उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम उस प्रान्त की राजभाषा को प्राधिकृत किया जाना चाहिए और सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम हिंदी को प्राधिकृत किया जाना चाहिए। 

इस मांग को जिस प्रमुख तर्क के साथ सामने रखा गया है वह है कि किसी भी नागरिक का यह अधिकार है कि अपने मुकदमे के बारे में वह न्यायालय में बोल सके, चाहे वह वकील रखे या न रखे। परन्तु अनुच्छेद ३४८ की इस व्यवस्था के तहत देश के चार उच्च न्यायालयों को छोड़कर शेष सत्रह उच्च न्यायालयों एवं सर्वोच्च न्यायालय में यह अधिकार देश के उन सन्तानवे प्रतिशत (९७%) नागरिकों से प्रकारान्तर से छीन लिया है जो अंग्रेजी बोलने में सक्षम नहीं हैं। 

मांग सर्वधा उचित है तथा इस दिशा में नीति-निर्धारकों का ध्यान खींचा जाना आवश्यक है। 

बोलने वाली बकरी की कथा

मुल्ला नसीरुद्दीन की बोलने वाली बकरी की कथा सर्वव्यापी है। बाजार में सबसे मंहगी बकरी बिक रही थी। राजा पहुँच गया विशेषतायें जानने। मुल्ला ने कहा कि बोलती है मेरी बकरी हुजूर और वह भी आदमी की भाषा में। बुलवाया गया बकरी से। मुल्ला ने सवाल किया कि बता यहाँ बकरी कौन? उत्तर मिला मैं…” अगला सवाल कि बता दूध यहाँ कौन देता है तो फिर वही उत्तर मैं….”। 

असल में यह बोली-भाषा का झगड़ा सुलझता ही नहीं चूंकि सवाल भी सुविधा वाले हैं और जवाब भी तय से हैं। यहाँ गधा कौन? तो इसका उत्तर भी यही आता मैं….” लेकिन भाषा का खेल चतुराई से खेला गया है इस लिये इस बकरी को लाखों की कीमत मे बेचा जाना तय है। भारतीय भाषाओं के साथ भी यही दिक्कत है। इसकी नियती तय कर दी गयी है, इसके सवाल तय हैं कि विज्ञान की अच्छी किताबें कहाँ उपलब्ध नहीं हो सकतीं? उत्तर है भारतीय भाषाओं में”; कार्यालय में किस भाषा में काम करने में व्यावहारिक कठिनाई है? उत्तर है भारतीय भाषाओं में”; किस भाषा में न्याय पाना संभव नहीं है? उत्तर है भारतीय भाषाओं में।


भारत विविधताओं का देश है। हमें विविधता को मान्यता देनी ही होगी और इसी में हमारी एकता सन्निहित है। लाखों रुपये की फीस खसोंट कर पूंजीपती होते जा रहे वकीलों के लिये भाषा की यह पाबंदी एक सुविधा है। 

एक आम आदमी अपनी भाषा में अपने ऊपर घटे अपराध अथवा आरोप की बेहतर पैरवी कर सकता है अथवा माननीय अदालतों में हो रही उस जिरह को समझ सकता है जो अंतत: उसकी ही नियति का फैसला करने जा रही हैं। न्याय को तो आमजन की समझ तक पहुँचना ही चाहिये। 

व्यवस्था पर उंगली उठाने में हम लोग अग्रणी पंक्ति में खड़े रहते हैं लेकिन अपने लोकतंत्र के संवर्धन के लिये हमारे पास न तो कोई योजना है न ही सोच। लोकतंत्र देखते देख बूढ़ा हो गया और हम कहाँ से कहाँ पहुँच गये

शिक्षा, न्याय और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों से हमारी अवांछित दूरी इस भाषा ने ही बना दी है। ये तीनों ही अधिकार अब आम आदमी की पकड़ और उसके जेब से बाहर की बात हो गये हैं। 

चलिये हम झंडा नहीं पकड़ सकते हैं लेकिन इन आवश्यक विषयों पर अपना समर्थन तो व्यक्त कर ही सकते हैं कि वो भी नहीं 

श्री श्याम रुद्र पाठक को उनके साहस और भारतीय भाषा के अधिकारों की इस लडाई के लिये हार्दिक साधुवाद। कल उन्हें सत्याग्रह करने के अपराध में दिल्ली पुलिस नें धारा १०७/१०५ के तहत गिरफ्तार कर लिया है। कहते हैं कि नदी का रास्ता कोई नहीं रोक सकता अत: श्री पाठक की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए अपने आलेख के उपसंहार में इतना ही कहना चाहता हूँ कि भारतीय भाषाओं के हक की यह लडाई किसी अकेले व्यक्ति की नहीं है। इस मशाल की लपट हर भारतवासी तक फैलाना ही होगा।


सोमवार, 1 अप्रैल 2013

कौन हैं श्यामरुद्र पाठक : क्यों माँग रहे तमिल भाषा में न्याय

रिहा होते ही पाठक पहुंच जाते हैं सत्याग्रह करने 10 जनपथ 

नई दिल्ली। १ अप्रैल २०१३ 
आईआईटी की भाषा को बदल चुके श्याम रुद्र पाठक अब कानून की भाषा को बदलने के लिए सत्याग्रह कर रहे हैं। कोर्ट की भाषा देश की भाषा हो, इसके लिए वे 4 दिसंबर २०१२ से लगातार यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के आवास 10 जनपथ के सामने धरना देने पहुंचते हैं, जहां से तुगलक रोड थाने की पुलिस उन्हें हिरासत में लेकर थाने पहुंचा देती है। इस प्रकार ११४ दिन से पुलिस पाठक को हिरासत में ले रही है और 23 घंटे बाद रिहा कर दे रही है। रिहा होने के बाद वे फिर लौटकर 10 जनपथ धरना देने पहुंच जा रहे हैं। श्याम रुद्र पाठक वह शख्सियत हैं जिन्होंने दिल्ली आईआईटी में अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट हिन्दी भाषा में लिखी थी, जिसे संस्थान द्वारा स्वीकार नहीं किया जा रहा था। 

भगवत झा आजाद द्वारा यह मामला संसद में उठाया गया। इसके बाद पाठक की प्रोजेक्ट रिपोर्ट स्वीकार की गयी और आईआईटी में अंग्रेजी के अलावा हिन्दी भाषा में भी प्रोजेक्ट रिपार्ट लिखने का कानूनी हक छात्रों को मिल गया। पाठक के आंदोलन की देन है कि आईआईटी की प्रवेश परीक्षा या प्रश्नपत्र से अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता खत्म हो गई और वर्ष 1990 से अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी भाषा में भी प्रश्नपत्र जारी होने लगा। अभियांत्रिकी में अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता को खत्म करा चुके पाठक अब कानून की भाषा को बदलने के लिए सत्याग्रह कर रहे हैं। 

अपने दो साथियों विनोद कुमार पांडेय और गीता मिश्रा के साथ तुगलक रोड थाने से रिहा होने के बाद सोनिया गांधी के निवास, 10 जनपथ धरना देने पहुंचने पर श्याम रुद्र पाठक को हर दिन पुलिस ने हिरासत में ले लेती है । औपचारिक बातचीत के दौरान पाठक ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-348 में न्यायालय की भाषा अंग्रेजी है। 

वे न्यायालय की भाषा अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म कराने के लिए सत्याग्रह कर रहे हैं और सरकार से संविधान में संशोधन की मांग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं को अदालती कामकाज की भाषा बनाया जाए। जिससे वकीलों को अपनी भाषा में जिरह करने की छूट मिल सके और मुवक्किल को भी निर्णय की प्रति उसकी भाषा में मिल सके। ध्यातव्य है कि सत्याग्रह शुरू करने से पहले श्याम रुद्र पाठक तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल, प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, लोकसभा अध्यक्ष, भाजपा अध्यक्ष समेत 30 जनप्रतिनिधियों को पत्र लिखकर इस हेतु अवगत करा चुके हैं। 

21 सितम्बर २०१२ को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आस्कर फर्नांडीस ने श्री पाठक को फोन कर बातचीत के लिए कांग्रेस मुख्यालय बुलाया था। इसके बाद 23 से 30 अक्टूबर के बीच पांच दौर की बातचीत कांग्रेस मुख्यालय में हुई। इस दौरान आस्कर ने बताया कि उन्होंने सोनिया गांधी को रिपोर्ट सौंप दी है। इसके अलावा तत्कालीन विधिमंत्री सलमान खुर्शीद को भी रिपोर्ट सौंपी जा चुकी है।

बहरहाल कैबिनेट में संविधान संशोधन के लिए विधेयक लाया जाएगा या नहीं, इसको लेकर कोई आश्वासन नहीं मिला। पाठक ने फिर 14 नवम्बर को सोनिया गांधी को पत्र लिखकर ध्यान आकर्षित किया। लेकिन जवाब नहीं मिलने पर 28 नवम्बर को उन्होंने पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा आला नेताओं को पत्र लिखकर 4 दिसंबर २०१२ से सत्याग्रह करने का ऐलान कर दिया। न्याय एवं विकास अभियान संस्था के बैनर तले 4 दिसंबर २०१२ से वह लगातार अपने दो साथियों के साथ सोनिया गांधी के निवास के सामने धरना देने पहुंचते हैं और तुगलक रोड थाने की पुलिस उन्हें हिरासत में ले लेती है। महिला होने के नाते गीता मिश्रा को देर रात पुलिस अपनी जिप्सी में बैठाकर उनके घर छोड़ देती है और वह सुबह होते ही तुगलक रोड थाने आ जाती हैं।

चूंकि 24 घंटे तक पुलिस उन्हें कानूनी तौर पर थाने में नहीं रख सकती, लिहाजा 23 घंटे बाद रिहा कर दिया जाता है। मात्र तीन सत्याग्रही होने के नाते धारा 144 का उल्लंघन भी नहीं हो रहा है। ऐसे में पुलिस गिरफ्तार भी नहीं कर पा रही है। पाठक ने कहा कि उनका सत्याग्रह तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार ठोस आश्वासन नहीं दे देती। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी हमारे ऊपर शासन करने वाले विदेशियों की भाषा है। अभिजात्य वर्ग की इस भाषा को खत्म करने के लिए उनका सत्याग्रह चलता रहेगा।

शनिवार, 9 जून 2012

वर्चस्व और हाशिए की भाषा

महीप सिंह,
जनसत्ता 4 मई, 2012:

हमारे देश में भारतीय भाषाओं की स्थिति बड़ी विडंबनापूर्ण है। हमारा संपूर्ण लोकतंत्र भारतीय भाषाओं पर टिका हुआ है। लोकसभा और सभी विधानसभाओं के लिए चुनाव-प्रचार भारतीय भाषाओं के माध्यम से होता है। इस सीमा तक ये भाषाएं महत्त्वपूर्ण हैं। इससे आगे की क्रिया में उस भाषा का प्रवेश होता है, जो दो प्रतिशत लोगों की भी भाषा नहीं है। अंग्रेजी के माध्यम से अगर कोई प्रत्याशी अपने मतदाताओं को रिझाने का प्रयास करे तो वह दो प्रतिशत मत भी प्राप्त कर सकेगा, इसमें संदेह है, मगर वर्चस्व इसी भाषा का दिखता है। चुनाव संबंधी जो बहसें, अनुमान और विश्लेषण प्रचार माध्यमों द्वारा किए जाते हैं उनमें अंग्रेजी सबसे आगे होती है। हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाएं यहां गौण भूमिका निभाती हैं।

प्रश्न है कि इस देश में भारतीय भाषाएं अपनी दूसरे और तीसरे दर्जे की भूमिका कब तक निभाती रहेंगी? कब तक संभ्रांतता, अधिक प्रबुद्ध, सुयोग्य होने का मुकुट केवल अंग्रेजी पहने रहेगी

जो भाषाएं अपनी मत-शक्ति से संसद और विधानसभाओं का निर्माण करती हैं, करोड़ों बच्चों को विद्यालय  जाने और कुछ शिक्षा प्राप्त करने योग्य बनाती हैं, भावी पीढ़ी का निर्माण करती हैं, सामान्य से सामान्य जन के बीच संवाद का माध्यम बनती हैं वे कब तक उस भाषा के सम्मुख हीनताभाव से ग्रस्त रहेंगी, जिसे कुछ मुट्ठीभर लोग अपने निहित स्वार्थों के लिए देश के कंधों पर लादे रखना चाहते हैं?

भारतीय भाषाओं को सम्मान और उचित स्थान दिलाने के लिए प्रयत्नशील लोग, कम से कम पिछले सौ वर्षों से इन प्रश्नों से जूझ रहे हैं।

स्वतंत्रता के पश्चात् से तो यह प्रश्न निरंतर चर्चा और विवाद के केंद्र में रहा है और अनेक कोणों से इस पर विचार किया गया है। इस देश में भाषा के आधार पर राज्यों का गठन ही इसलिए किया गया था कि सभी क्षेत्रीय भाषाओं को अपने-अपने राज्यों में राजभाषा बनने का गौरव प्राप्त हो और उन्हें सभी दृष्टियों से प्रगति का अवसर मिले। इसी के साथ इस बात को भी आवश्यक समझा गया कि सभी भाषाओं में संवाद, पत्र-व्यवहार, अनुवाद और आदान-प्रदान में संपर्क भाषा की भूमिका निभाने का दायित्व हिंदी को हो, जो देश के अधिकतर भागों में बोली और समझी जाती है तथा केंद्र और उत्तर भारत के अनेक राज्यों ने उसे अपनी राजभाषा के रूप में मान्यता दी है। 

पिछले कुछ सालों में इस दृष्टि से उल्लेखनीय प्रगति भी हुई है। अब अनेक राज्यों का राजकीय कार्य बड़ी मात्रा में उनकी भाषाओं में होता है। जहां कुछ कमी है वहां उसे पूरा भी किया जा रहा है, पर इस स्थिति की सबसे बड़ी कमी यह है कि जब इन भाषाओं का केंद्र से संपर्क होता है या आपसी संवाद का अवसर आता है तो अंग्रेजी की शरण में जाए बिना इन्हें और कोई विकल्प नहीं सूझता। इस बिंदु पर अंग्रेजी की संप्रभुता स्वीकार कर ली जाती है। 

अंग्रेजीदां व्यक्ति यह समझने लगता है कि उसके बिना इस देश में न कोई सार्थक संवाद हो सकता है, न किसी प्रकार का कोई निर्णय किया जा सकता है। वह समझता है कि कार की पिछली पूरी सीट पर मैं अकेला पसर कर बैठूंगा। भारतीय भाषा वाले व्यक्ति को ड्राइवर के साथ वाली आधी सीट पर ही बैठना चाहिए।

उसका काम सिर्फ इतना है कि जब कभी भटकने की स्थिति जाए तो वह कार की खिड़की से झांक कर सही रास्ते के संबंध में कुछ पूछताछ कर ले। भारत सरकार भी कभी-कभी भारतीय भाषाओं के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करती है।

कुछ वर्ष  पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भारतीय भाषा प्रोन्नयन परिषद की स्थापना का निर्णय किया था। इस परिषद के अध्यक्ष प्रधानमंत्री और उपाध्यक्ष मानव संसाधन विकास मंत्री हैं। देश के विभिन्न भागों से बाईस विद्वानों और भाषाविदों को इस परिषद का सदस्य बनाया गया था। इस परिषद का काम था सरकार को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भारतीय भाषाओं के विकास, प्रचार-प्रसार और प्रोन्नयन के लिए किए जाने वाले उपायों पर सलाह देना। यह बहुत स्वागतयोग्य कदम था। 

भारतीय भाषाओं के विकास प्रचार-प्रसार और प्रोन्नयन के लिए भारत सरकार सभी प्रकार के प्रयास करे, यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन मेरी दृष्टि में इससे भी बड़ी समस्या इन भाषाओं में आपसी संवाद, सौहार्द और आदान-प्रदान की है।

भारतीय भाषाओं के बीच यह नहीं है और अगर है तो बहुत थोड़ा है। यही कारण है कि हम अभी तक भारतीय साहित्य का कोई समग्र या समन्वित चित्र नहीं उभार सके हैं। साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएं जो कुछ करती हैं, वह अंग्रेजी के माध्यम से करती हैं और भारतीय साहित्य को समर्पित उनके अधिकतर समारोह अंग्रेजी समारोह मात्र होते हैं।

भारतीय भाषाओं के मध्य ऐसी संवादहीनता का लाभ अंग्रेजी उठाती है और सूचीबद्ध भाषाओं के बीच वह दाल-भात में मूसलचंद कहावत को चरितार्थ करती हुई सबके बीच में अध्यक्ष की कुर्सी अनायास ही प्राप्त कर लेती है। इस स्थिति से निपटना सरल नहीं है। 

व्यापक दृष्टि से अंग्रेजी ने हम सभी के अंदर गहरा हीनता भाव उत्पन्न कर दिया है। अंग्रेजी में हम बातचीत करना, अंग्रेजी अखबार और पुस्तकें पढ़ना, अंग्रेजी संगीत सुनना, अंग्रेजी फिल्में देखना और बड़े विश्वास से अंग्रेजी में ही यह मत व्यक्त करना कि यह तो अंतरराष्ट्रीय भाषा है। ज्ञान-विज्ञान की सभी खिड़कियां इसी भाषा के माध्यम से खुलती हैं। इसलिए अंग्रेजी ही हमारे व्यक्तित्व का सही प्रतिबिंब लोगों के सामने रखती है।

हमारे लेखक-आलोचक भी इस हीनता भाव से मुक्त नहीं हैं। वे सभी धाक जमाने के लिए अपने भाषणों और लेखों में जितने उदाहरण और उद्धहरण देते हैं उन सभी में यूरोप और अमेरिका की चर्चा होती है। अनेक अवसरों पर गलत-सलत अंग्रेजी बोलना उन्हें ठीक-ठाक हिंदी बोलने से अधिक तृप्ति देता है। ऐसे हीनता भाव पर किस प्रकार विजय प्राप्त की जा सकती है! 

इस वर्ष  फरवरी के पहले हफ्ते में महाराष्ट्र के चंद्रपुर में पचासीवां अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन आयोजित हुआ। इस सम्मेलन की विशेषता यह है कि इसमें किसी गैर-मराठी लेखक को विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित कर उसका सम्मान किया जाता है। इस वर्ष सम्मेलन के आयोजकों ने मुझे आमंत्रित किया था। 

मुझे यह बात लगातार अनुभव होती रही है कि भारत की विभिन्न भाषाओं में आपसी संवाद नहीं के बराबर है। सभी भाषाओं के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मेलन होते रहते हैं। लेकिन ऐसे सम्मेलन प्राय: उसी भाषा के लेखकों और विद्वानों तक सीमित रहते हैं।

कई विश्व हिंदी सम्मेलनों में मैंने भाग लिया है। अनेक विश्व पंजाबी सम्मेलन भी हो चुके हैं। मैं पंजाबी में लिखता हूं, इसलिए उनमें भी मेरी भागीदारी रही है। पर मुझे यह स्मरण नहीं होता कि ऐसे सम्मेलनों में कभी इतर भाषा के लेखकों को आमंत्रित किया गया हो। साहित्य अकादमी ऐसे आयोजन अवश्य करती है, पर उनमें संवाद और विचार-विमर्श की भाषा सदैव अंग्रेजी होती है। 

इस दृष्टि से अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन का कार्य बहुत सराहनीय है। स्वाभाविक है कि सम्मेलन का सारा कार्य, वक्तव्य और विचार-विमर्श मराठी में हुआ था। मेरे जैसे व्यक्ति ने वहां अपना भाषण हिंदी में दिया था। 20 जुलाई, 2011 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय हिंदी समिति की बैठक हुई थी। उसमें भी मैंने राष्ट्रीय भाषा आयोग के गठन की बात उठाई थी, जिसका अनेक सदस्यों ने समर्थन किया था। पश्चात् में मैंने विस्तार से ऐसे आयोग के गठन की रूपरेखा देते हुए प्रधानमंत्री को एक पत्र भी लिखा था। 

यह आवश्यक है कि भारत सरकार एक राष्ट्रीय भाषा आयोग का गठन करे। यह आयोग उसी प्रकार और स्तर का हो जैसे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग, पिछड़ा वर्ग आयोग, अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग या मानवाधिकार आयोग है।

इस आयोग का दायित्व और कार्य कुछ इस प्रकार हो सकते हैं-
v सभी भारतीय भाषाओं के विकास, प्रचार-प्रसार और प्रोन्नयन के लिए योजनाएं बनाना और उनके कार्यान्वयन के लिए केंद्र और राज्य सरकारों से संपर्क करना और सलाह देना। 
v सभी भारतीय भाषाओं में आपसी संवाद, आदान-प्रदान और अनुवाद कार्य को प्रोत्साहित करना, उसके लिए योजनाएं बनाना और इसके कार्यान्वयन के लिए साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट और राज्यों की भाषा और साहित्य अकादमियों से संपर्क करना और सलाह देना। 
v भारतीय भाषाओं के लेखकों-भाषाविदों-रंगकर्मियों के मिलेजुले सम्मेलन कराना, जिनमें सभी लोग आपस में विचार-विमर्श कर सकें, नई प्रवृत्तियों और रचनाओं से परिचित हो सकें।
v एक भाषा के लेखकों को दूसरी भाषा के क्षेत्र में भेजना, जिससे वे उस भाषा और उसके साहित्य का अंतरंग परिचय प्राप्त और क्षेत्रीय संस्कृति की विशेषताओं से अपना तादात्म्य स्थापित कर सकें। 
v भारतीय भाषाओं के मिलेजुले विश्व सम्मेलन आयोजित करना और उनमें विदेशों में बसे विभिन्न भारतीय भाषा-भाषियों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना। 
v भारतीय साहित्य के एक समग्र और समन्वित स्वरूप के विकास की दिशा में ठोस कदम उठाना।
v भारतीय भाषाओं के बहुख्यात साहित्यकारों की जयंतियां अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित करना। 
v एक से अधिक भारतीय भाषाओं में सिद्धता प्राप्त करके एक भाषा से दूसरी भाषा में सीधा अनुवाद कर सकने वालों को प्रोत्साहित करना।
v विश्वविद्यालयों में भारतीय साहित्य के समग्र और समन्वित पाठ्यक्रम तैयार कराना और उन्हें स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर अध्ययन के लिए प्रोत्साहित करना। संभव हो तो इस कार्य के लिए एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना करना। 
v सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि सभी भारतीय भाषाओं के बीच विचार-चर्चा और पत्र-व्यवहार के लिए हिंदी को संपर्क और संवाद की भाषा के रूप में आगे बढ़ाना।
v ये कुछ सूत्र हैं, जिन्हें राष्ट्रीय राजभाषा आयोग अपने कार्य क्षेत्र में सम्मिलित कर सकता है। इसमें अन्य अनेक सूत्र और जोड़े जा सकते हैं। ऐसे आयोग की रचना के संबंध में अगर भारत सरकार कदम उठाए तो भारतीय भाषाओं को वह स्थान प्राप्त करना सुलभ हो जाएगा, जिसकी हम सभी कामना करते हैं।