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मंगलवार, 2 सितंबर 2014

भारत में देसी भाषाओं की नहीं कोई इज्ज़त

गणपत तेली
जनसत्ता 1 सितंबर, 2014: भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की उपेक्षा और दोयम दर्जे के व्यवहार का मुद्दा कुछ समय से बराबर उठता रहा है। संघ लोक सेवा आयोग की प्रशासनिक सेवाओं के अतिरिक्त भी अधिकतर प्रतियोगी परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की स्थिति ऐसी ही है। प्रश्नपत्रों पर यह स्पष्ट लिखा रहता है कि प्रश्नों के पाठ में भिन्नता होने पर अंग्रेजी  वाला पाठ मान्य होगा और कई प्रश्नपत्रों में तो यह भी लिखा नहीं होता है, जबकि अक्सर हिन्दी पाठ अबूझ और कई बार गलत तक होता है। यह बात विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा से लेकर सामान्य प्रतियोगी परीक्षाओं तक में देखी जा सकती है। इन आंदोलनकारियों को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने भारतीय भाषाओं की इस उपेक्षा को फिर से बहस में ला दिया।

यह कोई प्रशासनिक सेवाओं का अलग-थलग मसला नहीं है, बल्कि हमारे देश की उस अकादमिक व्यवस्था का एक विस्तार है, जहां भारतीय भाषाओं की इसी तरह की उपेक्षा होती है और जो इन भाषाओं के पठन-पाठन की गतिविधियों और इनके विद्यार्थियों के लिए अकादमिक और पेशेगत अवसरों को सीमित करती है। अगर हम उच्च शिक्षा की स्थिति पर एक नजर डालें तो स्पष्ट हो जाएगा कि सरकारी नीतियां इस असमान व्यवस्था को प्रोत्साहित करती हैं। 

आजादी के बाद हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने महसूस किया कि अन्य विकासमूलक मानकों पर विकसित देशों की बराबरी करने में हमें वक्त लगेगा, तकनीक और विज्ञान का क्षेत्र ऐसा है जिसमें और जिसके जरिए हम तत्काल विकसित देशों की पंक्ति में जा खड़े होंगे। फलत: हमारी सरकारें (चाहे किसी भी पार्टी की हों) तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देती हैं, उसके बाद ही सामाजिक विज्ञान के अनुशासनों का स्थान आता है। और अंत में, भाषा और साहित्य जैसे मानविकी के विषय रह जाते हैं। 

अभी हमारे देश में सोलह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (भाप्रौस -आइआइटी) हैं, जिनमें छह-सात काफी प्रतिष्ठित हैं और अन्य अभी आकार ले रहे हैं। इसके अतिरिक्त तीस राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (राप्रौस -एनआइटी) हैं। विज्ञान-शिक्षा के क्षेत्र में पांच भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (भाविशिअस-आइआइएसइआर) हैं। साथ ही, भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु, भारतीय प्रतिरक्षा संस्थान, नई दिल्ली के अलावा भी विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के लिए कई संस्थान और परिषदें हैं। 
समाज विज्ञान की शिक्षा के क्षेत्र में भी ऐसी कई संस्थाएं हैं- टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (मुंबई और हैदराबाद), गोखले अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान संस्थान (पुणे), कलिंग सामाजिक विज्ञान संस्थान (भुवनेश्वर), मद्रास विकास अध्ययन संस्थान, विकास अध्ययन संस्थान कोलकाता जैसी कई संस्थाएं हैं। लेकिन भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भारतीय भाषा संस्थान मैसूर, केंद्रीय हिन्दी संस्थान, केन्द्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान अथवा सेंट्रल इंस्टीट्यूट आन क्लासिकल तमिल जैसी गिनी-चुनी संस्थाओं के अलावा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय ही हैं। 

इसी तरह उच्च शिक्षा में शोध के लिए वैज्ञानिक एवं औद्योगिक शोध परिषद (वैऔशोप-सीएसआइआर), वैज्ञानिक एवं अभियांत्रिकी शोध परिषद (वैअशोप-एसइआरसी) जैसी संस्थाएं वैज्ञानिक शोध को प्रोत्साहित करती हैं। समाजविज्ञान के क्षेत्र में इंडियन काउंसिल फॉर सोशल साइंस रिसर्च अकादमिक शोध को बढ़ावा देती है। इसके अलावा समाजविज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में भी कई संस्थान हैं। इतिहास के क्षेत्र में ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद और दर्शनशास्त्र के लिए इंडियन काउंसिल फॉर फिलोसोफिकल रिसर्च ऐसी ही परिषदें हैं। इसी तरह नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय आधुनिक भारत के इतिहास से जुड़े विभिन्न प्रसंगों पर शोध को बढ़ावा देता है। 

ये  परिषदें और संस्थाएं न केवल शोध के लिए विभिन्न शोधवृत्तियां देती हैं, बल्कि फील्ड वर्क को भी प्रोत्साहित करती हैं। यही नहीं, ये संस्थाएं संबंधित क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्राय: देश के अलग-अलग हिस्सों में शोध पद्धति की कार्यशालाओं का आयोजन करती हैं, जिनमें युवा संकाय सदस्य और शोधार्थी भाग लेते हैं। उक्त सरकारी संस्थाओं के अतिरिक्त कई गैर-सरकारी संस्थाएं भी सामाजिक विज्ञान और विज्ञान के क्षेत्रों में कार्यरत हैं। ये सभी अपने-अपने क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने का काम करती हैं। साथ ही साथ, ये अपनी परियोजनाओं और कार्यक्रमों के जरिए रोजगार के अवसर भी मुहैया कराती हैं।
वहीं अगर हम भाषा और साहित्य की तरफ नजर डालें तो भारतीय भाषाओं की साहित्य अकादमियों के अलावा कुछ खास है नहीं। उक्त साहित्य अकादमियां और अन्य निजी न्यास या संस्थान भी साहित्यिक पुरस्कारों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, नए शोध के लिए शोधवृत्तियां प्राय: नहीं देते और न ही शोध से संबंधित गतिविधियां आयोजित करते हैं। हालांकि इन अकादमियों और निजी न्यासों का दायरा उच्च शिक्षा नहीं है, फिर भी ये पुरस्कारों की स्थापना के साथ कुछ शोधवृत्तियां स्थापित करेंगे तो उस भाषा और साहित्य का शैक्षणिक विस्तार ही होगा। इसलिए ऐसा किया जाना चाहिए। 

हम इस तरह देखते हैं कि सरकारें भारतीय भाषाओं को कोई विशेष महत्त्व नहीं देती हैं। हां, इन भाषाओं के तकनीकी विकास पर अवश्य ध्यान दिया जा रहा है, जिसके तहत प्रगत संगणन विकास केंद्रों (सीडैक), केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान मैसूर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में बहुत-सी अकादमिक गतिविधियां चल रही हैं। इस पूरी परिघटना की सबसे बड़ी विडंबना है कि भाषा और साहित्य जैसे मानविकी विषयों को रोजगारमूलक शिक्षा के नाम पर नजरअंदाज किया जा रहा है, जबकि बेरोजगारी तो बढ़ ही रही है। सही है कि रोजगार एक आवश्यक तत्त्व है, लेकिन शिक्षा महज रोजगार के लिए नहीं हो सकती। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को अपने समाज, राजनीति और संस्कृति के यथार्थ से रूबरू कराना भी होता है। 

अपने समाज और परिवेश से विद्यार्थियों को जोड़ने और संपूर्ण शिक्षा देने के इसी उद्देश्य से आइआइटी, एनआइटी जैसी तकनीकी संस्थाओं में सामाजिक विज्ञान और मानविकी विभाग भी स्थापित किए गए। उच्च शिक्षा के लिए बनाई गई यशपाल समिति की रिपोर्ट में भी यह एक महत्त्वपूर्ण सिफारिश थी। लेकिन यह फलीभूत नहीं हुई, क्योंकि शायद ही किसी संस्थान में हिन्दी या किसी अन्य भारतीय भाषा को स्थान मिला हो। इन सभी संस्थानों के मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभागों में सामाजिक विज्ञान के कुछ विषय पढ़ाए जाते हैं, जबकि साहित्य और भाषा के नाम पर अंग्रेजी  पढ़ाई जाती है, हिन्दी या अन्य कोई भारतीय भाषा नहीं। यही स्थिति राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की है। एक-दो अपवाद और हिन्दी दिवस जैसी औपचारिकताओं को छोड़ दें तो भारतीय भाषा संबंधी गतिविधियां प्राय: इन संस्थानों में नहीं होतीं। भारतीय प्रबंधन संस्थान तो इस मामले में और भी पीछे हैं।

यही हाल उन निजी विश्वविद्यालयों का है, जो पिछले कुछ वर्षों में धूमधाम से खुले हैं। अधिकतर निजी विश्वविद्यालय विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन आदि अध्ययन के लिए ही हैं, जिनमें भाषा-साहित्य के नाम पर बस अंग्रेजी  है। लेकिन जो निजी विश्वविद्यालय सामाजिक विज्ञान और मानविकी को बराबर स्थान देने का दावा करते हैं, वहां भी प्राय: भारतीय भाषाओं को कोई स्थान नहीं मिलता है। उदाहरण के लिए, एमिटी विश्वविद्यालय में जर्मन, स्पेनिश, फ्रांसीसी और अंग्रेजी  में स्नातक की पढ़ाई होती है, लेकिन भारतीय भाषाओं में सिर्फ संस्कृत को यह स्थान देता है। जोधपुर नेशनल यूनिवर्सिटी जैसे कुछ ही विश्वविद्यालय भारतीय भाषाओं के पाठ्यक्रम प्रस्तावित करते हैं। 

इन अपवादों को छोड़ दें, तो ऐसे निजी विश्वविद्यालयों की फेहरिस्त लंबी है, जहां भारतीय भाषाओं का अस्तित्व ही नहीं है और उनमें साहित्य के नाम पर अंग्रेजी  साहित्य या कहीं-कहीं तुलनात्मक साहित्य पढ़ाया जाता है। कई सरकारी विश्वविद्यालय भी तुलनात्मक साहित्य के अध्यापकों के लिए योग्यता तुलनात्मक साहित्य या अंग्रेजी  (अन्य किसी भाषा में नहीं) में एमए निर्धारित करते हैं। अंग्रेजी  साहित्य पढ़ाए जाने से कोई समस्या नहीं है, लेकिन भारतीय भाषाओं का साहित्य भी इन्हें अवश्य पढ़ाना चाहिए। अगर अंग्रेजी साहित्य पढ़ाया जा सकता है, तो हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, बांग्ला, मराठी, असमी, मलयालम, तमिल, तेलुगू, ओड़िया, गुजराती आदि भाषाओं का साहित्य क्यों नहीं पढ़ाया जा सकता!

निजी विश्वविद्यालय संबंधित राज्य की विधानसभा द्वारा पारित अधिनियम के तहत स्थापित किए जाते हैं और इन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी मान्यता देता है, तो क्यों नहीं इन२के लिए यह आवश्यक किया जाए कि ये कम से कम उस राज्य की भाषा और उसके साहित्य के कुछ पाठ्यक्रम प्रस्तावित करें। यही बात आइआइटी और आइआइएम पर भी लागू होनी चाहिए। कितना अच्छा हो, अगर देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित इन संस्थानों में अलग-अलग भारतीय भाषाएं भी पढ़ाई जाएं। इसके विपरीत वर्तमान व्यवस्था के कारण अधिकतर छात्र-छात्राओं की पढ़ाई की भाषा व्यवहार की भाषा से अलग हो जाती है। जब उनकी ज्ञान की प्रक्रिया से ही इन भाषाओं को काट दिया गया है, तो फिर यह शिकायत कहां से जायज है कि अमुक अनुशासन भारतीय भाषाओं में नहीं पढ़ाए जा सकते! यह एक सर्वविदित तथ्य है कि हमारे देश में प्राय: उच्च शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं नहीं हैं। कुछ राज्यों के विश्वविद्यायलों में अवश्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से पठन-पाठन होता है, लेकिन इसके लिए उन्हें दोयम दर्जे की पाठ्यपुस्तकों पर निर्भर रहना पड़ता है। फलस्वरूप, अक्सर वे उस विषय में पारंगत होने और आगे की पढ़ाई से वंचित हो जाते हैं। इसके अलावा भारतीय भाषाओं के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की विशेष वित्तीय सहायता से संचालित कार्यक्रम या पुस्तकालय भी प्राय: नहीं दिखाई देते। 

अब जरा उस शिकायत पर भी नजर डालते हैं, जो भारतीय भाषाओं, खासकर हिन्दी के लेखक-प्रकाशक करते हैं कि साहित्य को पाठक नहीं मिल रहे हैं। मिलेंगे कहां से, जब संभावित पाठकों की पूरी पीढ़ी को ही व्यवस्थित तरीके से उसके साहित्य, भाषा और समाज से दूर कर दिया जाता है। यह स्थिति अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में हिन्दी में ज्यादा विकट है।


यह मुद्दा चाहे सीधे रूप से प्रतियोगी परीक्षाओं से न जुड़ता हो, इससे अलहदा नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक परिदृश्य से संबद्ध है, जहां भारतीय भाषाएं उपेक्षित हैं और जहां यह माना जाता है कि वे अंग्रेजी  से पिछड़ी हुई हैं, ज्ञान का माध्यम नहीं बन सकती हैं और संवाद-कौशल या व्यक्तित्व-विकास का पर्याय तो अंग्रेजी  ही है। एक बार यह मान लेने के बाद अकादमिक संसाधनों का असमान वितरण आम स्वीकृति पा जाता है, जो भारतीय भाषाओं को और हाशिये पर धकेल देता है। इसलिए इन भाषाओं के इस मसले को समग्रता में देखा जाना चाहिए

WWW.JANSATTA.COM

बुधवार, 9 जुलाई 2014

संघ लोक सेवा आयोग: सीसैट का विरोध, आमरण अनशन पर बैठे छात्र

संघ लोक सेवा आयोग में सीसैट का विरोध कर रहे छात्रों को संबोधित करते राजनीतिक विश्लेषक वेद प्रकाश वैदिक।
नई दिल्ली. ८ जुलाई २०१४ (नवभारत टाइम्स के सौजन्य से)
संघ लोक सेवा आयोग (संलोसेआ)  में हिन्दी के साथ भेदभाव खत्म करने और सीसैट को हटाने को लेकर छात्रों का विरोध दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। विरोध जताने के क्रम में मुखर्जी नगर में 50 से अधिक सिविल के छात्र 6 जुलाई से ही आमरण अनशन पर बैठे हुए हैं। इनमें करीब 20 लड़कियां भी शामिल हैं। 
हैरत की बात यह है कि अभी तक सरकार की ओर  से कोई प्रतिनिधि अनशन पर बैठे छात्रों से बात करने तक नहीं आया है। इससे पहले भी करीब 15000 छात्र 27 जून को अपनी मांगों को लेकर रेसकोर्स भी गए थे, वहां सारी रात बैठे रहे लेकिन सरकार की ओर  से न तो कोई प्रतिनिधि इनकी बातों को सुनने आया न ही किसी प्रकार का आश्वासन ही उन्हें मिला। 
छात्रो की मांग है कि बदलाव के बाद प्रारंभिक परीक्षा में शामिल किए गए सीसैट को हटाया जाए जिसका सीधा लाभ इंजीनियरी  और प्रबंधन के छात्रों को मिल रहा है। कई बार प्रदर्शन कर चुके इन छात्रों का कहना है कि अब उनके पास इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं हैं क्योंकि हमारी बातों को कहीं नहीं सुना जा रहा है। 
इन छात्रों की संघ लोक सेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षा 24 अगस्त को है। छात्रों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान संघ लोक सेवा आयोग ने अपने पाठ्यक्रम में व्यापक बदलाव किया है जिससे ग्रामीण और मानविकी  पृष्ठभूमि के छात्रों के साथ हिन्दी माध्यम से परीक्षा देने वाले छात्रों के चयन में नाटकीय रूप से गिरावट दर्ज की गई है। अब हाल यह हो गया है कि 2013 के संघ लोक सेवा आयोग के रिजल्ट में 1122 लोगों का चयन हुआ है जिसमें हिन्दी माध्यम के छात्रों की संख्या केवल 26 है। 
चयन में इस गिरावट के लिए छात्र यूपीएसी की अंग्रेजी परस्ती को और प्रारंभिक परीक्षा में शामिल किए गए सीसैट को जिम्मेदार मान रहे हैं। संघ लोक सेवा आयोग की तौयारी कर रहे छात्र दुष्यंत का कहना है कि सीसैट के कारण इंजीनियरी  और प्रबंधन के छात्रों काफी लाभ मिल रहा है जबकि मानविकी एवं हिन्दी माध्यम के छात्र इससे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। 
संघ लोक सेवा आयोग की तैयारी करने वाले छात्र अतहर कहते हैं कि यही वजह है कि हम सीसैट को तत्काल प्रभाव से हटाने की मांग कर रहे हैं। अतहर ने कहा, 'हमारी मांग है कि मुख्य परीक्षा में जो अंग्रेजी अर्हता का प्रश्न पत्र है उसे भी अन्य भारतीय भाषाओं के स्तर का बनाया जाए।
जबकि एक और छात्र सम्पूर्णानंद कहते हैं कि संघ लोक सेवा आयोग के प्रश्न जो मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किये जाते हैं उसका हिन्दी अनुवाद काफी जटिल और कई जगहों पर गलत भी होता है। हमारी मांग यह है कि मूल प्रश्न पत्र हिन्दी में ही तैयार किए जाएं। छात्रों की मानें तो साक्षात्कार में भी हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के छात्रों को अंग्रेजी बोलने के लिए बाध्य किया जाता है। छात्र प्रारंभिक परीक्षा की तिथि को भी आगे बढ़ाने की मांग कर रहे हैं क्योंकि आंदोलन और अनशन की वजह से उन्हें पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है।

रविवार, 29 जून 2014

रिज़र्व बैंक से सवाल: ग्राहकों को अपनी भाषा में बैंकिंग सेवाएँ कब मिलेंगी?

सेवा में,
केन्द्रीय जन सूचना अधिकारी
ग्राहक सेवा विभाग
भारतीय रिज़र्व बैंक 
केंद्रीय कार्यालय, पहली मंजिल,
अमर भवन, सर पीएम मार्ग
मुंबई– 400 001

विषय: सूचना का अधिकार अधिनियम के अधीन आवेदन

महोदय,

हम जानना चाहते हैं कि राजभाषा को प्रोत्साहन देने एवं भारत की आम जनता को उनकी अपनी भाषाओं में बैंकिंग और वित्त सम्बन्धी सेवाएँ दिलाने के लिए भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक कितने सजग व तत्पर हैं? वैसे तो आधुनिक युग की सभी ऑनलाइन सेवाएँ केवल अंग्रेजी जानने वाले मुट्ठीभर लोगों के लिए शुरू की करवाई जा रही हैं, सभी उच्चाधिकारी, भारतीय बैंक संघ आदि को आम जनता की कठिनाई से कोई मतलब नहीं है अन्यथा आज ऑनलाइन सेवाएँ हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं में मिल रही होतीं. इसीलिए वित्तीय समावेशन केवल एक दिखावा है.

जब तक ग्राहक को उसकी भाषा में बैंकिंग सेवाएँ नहीं मिलेंगी तो वो बैंक से जुड़ेगा ही क्यों? रिज़र्व बैंक ने आज तक ग्राहकों को उनकी भाषा में सेवाएँ मिलें इसलिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया है और सारे बैंक और वित्तीय संस्थान अंग्रेजी थोप रहे हैं. अंग्रेजी ना जानने वाले भारत के ग्राहक किसी बैंक से जुड़ जाएँ तो अंग्रेजी के दम पर बैंक उसका शोषण करते ही रहेंगे और उसे पता भी नहीं चलेगा. अतः निम्न प्रश्न  जन सूचना अधिकार के अंतर्गत पूछे जाते हैं, कृपया 30 दिनों के अंदर हिन्दी में बिन्दुबार स्पष्ट उत्तर देने की कृपा करें:

1.    वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के लिए रिज़र्व बैंक कौन-सी मोबाइल बैंकिंग सेवा निकट भविष्य में शुरू करने जा रहा है, जो उन बैंक ग्राहकों के लिए होगी जो कि स्मार्टफोन (इंटरनेट और अन्य सुविधाओं से लैस मोबाइल फोन) का इस्तेमाल नहीं करते हैं? (बिजनेस स्टैण्डर्ड हिन्दी में छपी खबर संलग्न है)
2.    उक्त सेवा को किस-किस भारतीय भाषा में उपलब्ध करवाने के लिए रिज़र्व बैंक ने दूरसंचार कंपनियों से अनुबंध किया है?
3.    यदि उक्त सेवा केवल अंग्रेजी में शुरू होगी तो जो 95% बैंक ग्राहक अंग्रेजी नहीं जानते है उनका वित्तीय समावेशन रिज़र्व बैंक किस प्रकार करेगा, उसके लिए क्या योजना है?
4.    रिज़र्व बैंक ने निजी बैंकों को भारत के आम बैंक-ग्राहकों को एसएमएस चेतावनी एवं ऑनलाइन बैंकिंग/नेट बैंकिंग सेवा अंग्रेजी के अलावा किस-२ भाषा में उपलब्ध करवाने के निर्देश अब तक जारी किए हैं? निर्देशों की प्रति उपलब्ध करवाएँ.
5.    भारत रिज़र्व बैंक ने सार्वजनिक क्षेत्र बैंकों को भारत के बैंक ग्राहकों को एसएमएस चेतावनी एवं ऑनलाइन बैंकिंग/नेट बैंकिंग सेवा अंग्रेजी के अलावा किस-२ भारतीय भाषा में उपलब्ध करवाने के निर्देश अब तक जारी किए हैं? और अब तक सार्वजनिक क्षेत्र के किस-२ बैंक ने ग्राहकों को उनकी भाषा में ये दोनों सेवाएँ देना आरंभ कर दिया है? निर्देशों की प्रति उपलब्ध करवाएँ.
6.    भारत रिज़र्व बैंक ने निजी बैंकों के लिए वेबसाइट बनाने के सम्बन्ध में क्या नियम बनाए हैं और निजी बैंकों की वेबसाइट अंग्रेजी के अलावा किस-२ भाषा में बनाई जानी चाहिए? निर्देशों की प्रति उपलब्ध करवाएँ.
7.    केवल अंग्रेजी में नेट बैंकिंग/एसएमएस अलर्ट/क्रेडिट कार्ड/एटीएम पर्ची आदि की सुविधा (सच्चाई में असुविधा) से भारत के उन 95% ग्राहकों के अधिकारों का भी हनन हो रहा है, जो बैंकों की सेवाएँ लेते हैं तथा अंग्रेजी का एबीसी भी नहीं जानते. इस सम्बन्ध में कानून का उल्लंघन रोकने एवं ग्राहकों को बैंकिंग सेवाएँ भारतीय भाषाओं में दिलवाने हेतु रिज़र्व बैंक क्या कदम उठा रहा है?
8.    निजी बैंक/ सरकारी बैंक व अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा जो सेवाएँ हिन्दी एवं स्थानीय भाषाओं में देने के लिए अनिवार्य नियम बनाए गए हैं उनके अनुपालन के रिजर्व बैंक ने क्या प्रभावी कदम उठाए हैं? उनकी निगरानी कैसे की जाती है?
9.    मेरे बैंक ने मुझे नेट बैंकिंग, एसएमएस अलर्ट एवं क्रेडिट कार्ड मासिक विवरण की सुविधा हिन्दी में देने से साफ़ मना कर दिया है और बैंक ने मुझे अपना खाता बंद करने की सलाह दी है, कृपया बताएँ कि मैं बैंक इस भेदभाव के खिलाफ रिजर्व बैंक में किससे संपर्क करूँ?
 
10. रिज़र्व बैंक ने द्विभाषी वेबसाइट (एकसाथ दोनों भाषाएँ होनी चाहिए) की बजाय वेबसाइट दो भाषाओं (हिंदी-अंग्रेजी में अलग-२) में बनाई है जो राजभाषा सम्बन्धी प्रावधानों का उल्लंघन है  और भारत की राजभाषा हिन्दी की उपेक्षा करते हुए अंग्रेजी वेबसाइट को प्राथमिकता दी गई है. अंग्रेजी वेबसाइट निरंतर और त्वरित अद्यतित की जाती है. इस उल्लंघन के लिए कौन ज़िम्मेदार है? (हिंदी में सूचना कानून की जानकारी २०१० के बाद अद्यतित नहीं की गई, ऐसे अनेक उदाहरण हैं)
11. देशभर में क्षेत्रीय ग्रामीणों बैंकों को बैंकिंग सेवाएँ, वेबसाइट, नेटबैंकिंग की सेवाएँ किस-२ भाषा में उपलब्ध करवाने के निर्देश जारी किए गए हैं? क्षेत्रीय ग्रामीणों बैंकों में अंग्रेजी की कतई आवश्यकता नहीं है पर लगभग सारे क्षेत्रीय ग्रामीणों बैंकों में ८०-९०% कामकाज अंग्रेजी में किया जा रहा है. ग्रामवासियों पर अंग्रेजी किस नियम के तहत थोपी जा रही है? दस्तावेज उपलब्ध करवाएँ?

आवेदक:

शुक्रवार, 27 जून 2014

भारत में उपभोक्ता को अपनी भाषा में उत्पाद सम्बन्धी जानकारी पाने का अधिकार क्यों नहीं?

कृपया इस पत्र को ईमेल द्वारा हमारे प्रम #नमो को भेज दें

#प्रधानमंत्री जी <pmosb@gov.in>
#प्रधानमंत्री जी <publicwing.pmo@gov.in>

सेवा में 
प्रधानमंत्री जी 
भारत सरकार 
नई दिल्ली 

विषय: उपभोक्ता को अपनी भाषा में उत्पाद सम्बन्धी जानकारी पाने का अधिकार क्यों नहीं?

महोदय

देश भर में सभी बड़ी कम्पनियाँ /फार्मा कम्पनियाँ/विनिर्माता आदि अपने उपभोक्ता उत्पादों पर सारी जानकारी केवल अंग्रेजी में छापते हैं जिसे देश की 95 प्रतिशत जनता ना तो पढ़ सकती है ना समझ सकती है, उपभोक्ताओं पर अंग्रेजी थोपकर उनका शोषण किया जा रहा है.

हम लोग कम्पनियों को शिकायत करते हैं तो उनका कहना है “देश में ऐसा कोई कानून नहीं जो कहे कि #ग्राहक की #भाषा में जानकारी दो, तो हम तो कानून के हिसाब से अंग्रेजी में छापते हैं. जो कानून है वह अंग्रेजी अथवा हिन्दी में लेबल छापने के लिए कहता है, #हिन्दी में छापकर हम अपना खर्चा क्यों बढ़ाएँयदि अनिवार्य नियम बन जाए तो हम छापेंगे, पर अभी नहीं छाप सकते. आपको इसलिए आप सरकार को लिखिए, वैसे भारत सरकार में कोई भी नहीं सोचता कि ग्राहक को उसकी अपनी भाषा में जानकारी मिले वर्ना क्या वे अंग्रेजी अनिवार्य करते? फिर भी कोशिश करके देख लो.”

क्या जिनको #अंग्रेजी नहीं आती है उनके कोई उपभोक्ता अधिकार नहीं हैं? क्या अंग्रेजी ना जानने वाली देश की आबादी को अपनी भाषा में अथवा भारत की राजभाषा #हिन्दी में उत्पाद सम्बन्धी कोई जानकारी पाने का हक नहीं? क्या जागो ग्राहक जागो का नारा केवल दिखावा है? आप ही बताएँ खाने के सामान पर लिखा best before six months या directions of use देश के कितने लोग पढ़ या समझ सकते हैं? पिछले ६७ सालों में हर जगह #अंग्रेजी थोपी गई है और सरकारों ने कभी नहीं चाहा कि जनता को उसके अधिकार मिलें; हमें आशा है आप विरोधियों से डरे बिना जनहित में कठोर निर्णय करेंगे, हमने आपको पूर्ण बहुमत इसीलिए दिया है.


आपसे अनुरोध है सभी खाद्य पदार्थों और दवाओं पर वस्तु का नाम, कीमत, वज़न, उपयोग, निर्माण-अवसान तिथि, निर्माता आदि की जानकारी हिन्दी एवं प्रमुख भारतीय भाषाओं में छापने का अनिवार्य नियम बनाया जाए, कम्पनियाँ तो विरोध करेंगी क्योंकि वे नहीं चाहती हैं कि जनता को/उपभोक्ता को सवाल-जवाब करने का मौका मिले, देश में अंग्रेजी उपभोक्ताओं/ग्राहकों के शोषण का बड़ा हथियार है इसलिए उनके विरोध से सख्ती से निपटा जाए ताकि ग्राहकों को उनके अधिकार मिल सकें, वरना उपभोक्ता कानून केवल दिखावा बने रहेंगे.

भवदीय,

अपना नाम लिखें :

पता लिखें :
ईमेल:

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

शर्मनाक: भारत के उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषाओं में न्याय दिए जाने की मांग करने वाला एक भारतीय दिल्ली में गिरफ्तार

श्याम रुद्र पाठक को १६ जुलाई २०१३ को दिल्ली पुलिस (दिपु) ने कांग्रेस मुख्यालय, २४ अकबर रोड से भादवि की धारा १०५/१०७ के अधीन बंदी बना लिया है वे पिछले २२५ दिनों से मांग कर रहे थे कि भारत के सभी उच्च न्यायालयों में संबंधित राज्य की राजभाषा में आम जनता को न्याय पाने का अधिकार दिया जाए  अर्थात मद्रास उच्च न्यायालय में तमिल में कार्यवाहियाँ हों और बम्बई उच्च न्यायालय में मराठी में, कोलकाता में बंगाली और कर्नाटक में 'कन्नड़' को यह अधिकार मिले.

श्याम रुद्र जैसे योद्धा के लिए हिंदी मीडिया ने भी कभी एक पट्टी की खबर भी नहीं चलाई.



निरंकुश सरकार अथवा कांग्रेस पार्टी ने श्यामरुद्र पाठक जी की बात पर ध्यान देना तो दूर उन्हें कभी अपनी बात कहने के लिए मिलने भी नहीं बुलाया. वे हर दिन सोनिया गाँधी के नाम चिट्ठी लिखकर उनके प्रहरी को देते रहे पर एक का भी उत्तर नहीं दिया गया. वे साढ़े सात महीने से धरना दे रहे थे. हर रात उन्होंने पुलिस थाने में गुजारी.

देश में भाषाओँ को लेकर अनेक संगठन हैं, अनेक क्षेत्रीय भाषाओं के समाचार चैनल और अख़बार हैं पर किसी ने भी इस मुद्दे पर पाठक जी की आवाज़ को आगे पहुँचाने का काम नहीं किया.


इन साढ़े सात महीनों में उनका स्वास्थ्य बहुत गिर चुका है वे हर दिन थाने से लौटकर कांग्रेस मुख्यालय के सामने धरना दे रहे थे, बाहर का भोजन खरीदकर खा रहे थे, उन्होंने सर्दी के तीन महीने फिर गर्मी के चार महीने फिर वर्षा को सहा- झेला, किसके लिए ?

दुनिया भर में छोटे-२ देश अपनी भाषाओं को लेकर बड़े संवेदनशील हैं पर भारत के नागरिकों के रक्त में तो जैसे अंग्रेजी प्रवाहित हो रही है, कहीं कोई हल चल नहीं कहीं कोई रोष नहीं. सब अंग्रेजी देवी के चरणों में नत-मस्तक हैं. क्या हम अपनी हिंदी, तमिल, मराठी, कन्नड़, गुजराती, अथवा बंगाली के लिए इन सरकारों के सामने अपनी आवाज़ नहीं उठाएँगे? 

देश की हर भाषा पर संकट है, भाषाई विद्यालय बंद हो रहे हैं, उच्च शिक्षा में देशी भाषाओं का कोई अस्तित्व नहीं. क्या भारत सचमुच 'इण्डिया' बन गया है?
क्या मैकाले का सपना १००% सच हो चुका है? क्या हम सब दिखने में भारतीय पर अंग्रेज बन चुके हैं? 



पर एक बात सनद रहे 'एक भाषा का अवसान केवल भाषा का अवसान नहीं बल्कि समूची सभ्यता और संस्कृति का घातक विनाश है.' आने वाली पीढ़ी हमें कभी क्षमा नहीं करेगी.


श्यामरुद्र जी की गिरफ्तारी पर सभी भारतीयों/राष्ट्रवादियों से अनुरोध है, समय निकाल कर अपनी-२ प्रतिक्रिया और विचार यहाँ रखें और सरकार के इस गैरजिम्मेदार कदम की खबर को अपने ट्विटर, फेसबुक, गूगल प्लस और व्हाट्सऐप पर सबके साथ साझा करें। २४ जुलाई २०१३ को पटियाला न्यायालय में उनकी पेशी है दिल्ली के आसपास वाले लोग उस दिन न्यायालय में सुबह १० बजे एकत्र हों. अधिक जानकारी के लिए संयोजक श्रीमती गीता मिश्रा 'रतन से संपर्क करें : ९८९१५-५७०७७ in Eng: 98915-57077

उनको संबल और समर्थन की आवश्यकता है. यही मेरी करबद्ध  प्रार्थना है.