अनुवाद

मंगलवार, 19 मई 2020

350 वर्षों से जैन समाज की कर्मभूमि है आमची मुंबई और जन्मभूमि भी


23 सितंबर 1668 को आमची मुंबई के वाणिज्यिक राजधानी बनने का बीजारोपण हुआ था। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने द्वीपों के एक समूह पर ब्रिटिश राजघराने से इसे पट्टे पर लेकर अपना पैर रखा। उसके पहले यह द्वीप पुर्तगालियों के हाथों में थे तो इसे वाणिज्यिक शहर बनाने की कल्पना किसी ने नहीं की थी। उन्होंने इसे केवल अपना नाम दिया, बॉम्बे। परंतु फिरंगी ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे आधुनिक शहरी केंद्र में रूप में विकसित करने का सपना देखा, मुंबई के रूप आज एक वास्तविकता के रूप में विद्यमान है।

फिरंगी कंपनी के आने से पूर्व कैथोलिक पुर्तगाली शासन के अंतर्गत् इन द्वीपों में धार्मिक सहिष्णुता बहुत कम थी, इसलिए व्यापारी लोग यहाँ बसने से कतराते थे। अंग्रेजों ने धार्मिक स्वतंत्रता एवं सुरक्षा का आश्वासन दिया तो जैन और पारसी व्यापारियों ने सूरत एवं आसपास से निकल कर मुंबई में स्थायी रूप से बसने का निश्चय किया और किले के आसपास के क्षेत्रों में आकर रहने लग गए।

1668 में बॉम्बे को प्रमुख शहर और भारत की वाणिज्यिक राजधानी के रूप में विकसित करने का सपना पारसी शिपबिल्डर्स और जैन व्यापारियों के सहयोग के बिना सम्भव नहीं था।

जैन अहिंसा में विश्वास रखने वाला सेवाभावी धार्मिक संप्रदाय है। धीरे धीरे गुजरात एवं राजस्थान से बड़ी संख्या में जैन परिवार मुंबई में आकर स्थायी रूप से रहने लगे। मुंबई में 250 वर्ष प्राचीन जैन मंदिर इस बात के प्रमाण हैं कि जैनों ने मुंबई को अपनी कर्मभूमि के साथ अपनी आने वाली पीढ़ियों की जन्मभूमि के रूप में भी स्वीकार कर लिया था।

वैसे तो जैन समाज बहुत छोटा समाज है पर मुंबई के विकास में उनका योगदान अति महत्वपूर्ण है। जैनों ने मुंबई को अपना आशियाना बनाया। अपने पूर्वजों की जन्मभूमि से उनका नाता धीरे-धीरे शिथिल होता गया और मुंबई को मातृभूमि मान कर आमची मुंबई से अपनी घनिष्ठता को सुदृढ़ करते रहे। 350 वर्ष के इतिहास के उपरांत उन्होंने सरकार से मुफ़्त में किसी भी वस्तु को पाने की आशा नहीं की। सरकारी भूमि को हथिया कर उन्होंने अपने खेलकूद एवं आनंद के लिए एक भी जिमखाना नहीं बनाया।

सन् 1918 तक कोलकाता व्यापारिक क्षेत्र में मुंबई से बहुत आगे था। 1918 में महामारी में भारी संख्या में लोग काल कवलित हुए, परंतु वह भयावह महामारी भी जैनों को मुंबई से अलग नहीं कर पायी, क्योंकि जैन मुंबई को आमची मुंबई मान चुके थे। 1918 की महामारी का प्रभाव 1920 तक समाप्त हुआ। कठिन परिस्थिति में भी जैन व्यापारी मुंबई को वाणिज्यिक राजधानी बनाने सपने को पूरा करने के लिए निरंतर कड़ा परिश्रम करते रहे।

जैन व्यापारियों द्वारा किये गये कड़े परिश्रम के फल पकने लगे और अंग्रेज कोलकाता को छोड़कर मुंबई को प्रमुख वाणिज्यिक राजधानी के रूप में देखने के लिए विवश हुए। कोलकाता से बिड़ला, डालमिया जैसे हिंदू व्यापारी मुंबई आकर स्थायी रूप से रहने लगे।

मुंबई एवं उसके आसपास आज लगभग 20 लाख जैन निवास करते हैं। जब भी मुंबई किसी प्राकृतिक आपदा से घिरी है, जैन समाज सदैव सेवा के लिए आगे आया है। जैनों की प्रमुख संस्थाएँ जीतो, भारतीय जैन संघटना, समस्त महाजन एवं महावीर इंटरनेशनल ने बिना किसी भेदभाव एवं राजनीतिक अपेक्षा के मानवसेवा के लिए अपने धन का सदुपयोग किया है।

कोरोना विषाणु रोग- 2019 महामारी के कारण बहुत सारे लोग मुंबई छोड़ कर अपने-2 प्रांत में जा रहे हैं परंतु जैन समाज आमची मुंबई को अपनी मातृभूमि मान कर सेवा के कार्यों के लिए समर्पित होकर मुंबई में डटा हुआ है। कोरोना महामारी के थमते ही फिर से परिश्रम और लगन के साथ आमची मुंबई को वाणिज्यिक राजधानी बनाये रखने के लिए लगा रहेगा। बिना किसी अपेक्षा से अपनी कर्मभूमि एवं जन्मभूमि के उत्थान के लिए निष्ठावान व प्रयत्नशील बना रहेगा। जैन समाज अहिंसा, धार्मिकता एवं सेवाभाव के गुणों से ओतप्रोत होने के कारण सदा प्रसन्नचित्त रहता है परंतु उसे पीड़ा तो तब अनुभव होती है जब कोई 350 वर्षों से मुंबई के निर्माण में जैन समाज के योगदान को भुलाकर पर-प्रांतीय मान कर उन्हें प्रताड़ित करने के प्रयास करता है।

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