अनुवाद

शनिवार, 22 जुलाई 2017

तो क्या हिंदी वाले आईएएस बनने का सपना अब छोड़ ही दें?

                                                                        निखिलेश सिंह की रिपोर्ट। 


सफलता के हज़ार साथी होते हैं, किन्तु असफलता एकान्त में विलाप करती है। यूँ तो सफलता या असफलता का कोई निश्चित गणितीय सूत्र नहीं होता, किन्तु जब पता चले कि आपकी असफलता कहीं न कहीं पूर्व नियोजित है, तो वह स्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक है। देश की सबसे बड़ी मानी जाने वाली भारतीय प्रशासनिक सेवा (भाप्रसे) अथवा आईएएस की परीक्षा को आयोजित करने वाली संस्था 'संघ लोक सेवा आयोग' (संलोसेआ) आज घोर अपारदर्शिता और विभेदपूर्ण व्यवहार में लिप्त है।

हिंदी माध्यम के सिविल सेवा अभ्यर्थियों का विशेषतः 2011 के बाद से गिरता हुआ चयन अनुपात सारी कहानी बयान करता है। सम्पूर्ण रिक्तियों का लगभग 3 या 4% ही केवल हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के हिस्से में आ पा रहा है। हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के चयन की गिरती दर का कारण क्या उनकी अयोग्यता/अक्षमता को ठहराया जा सकता है? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है, इसके पीछे कोई तार्किक आधार नहीं है।
यह सर्वविदित है इस परीक्षा के लिए तैयारी करने वालों में सबसे अधिक संख्या हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों की ही है, और उनके परिश्रम तथा क्षमताओं को ख़ारिज करने का कोई तार्किक आधार किसी के पास नहीं है। असली समस्या संघ लोक सेवा आयोग के भेदभावपूर्ण रवैये और अपारदर्शिता में निहित है, उस मानसिकता में निहित है जो चाहती है कि ग्रामीण और क़स्बाई पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों के स्थान पर शहरी पृष्ठभूमि के, अंग्रेज़ी माध्यम के इंजिनियर और डॉक्टर अधिक से अधिक चयनित होकर आएँ।
भेदभाव और अपारदर्शिता का यह सिलसिला प्रारम्भिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार, तीनों ही स्तरों तक जारी रहता है। प्रारम्भिक परीक्षा के दोनों प्रश्न पत्रों में व्यावहारिक हिन्दी अनुवाद पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। फलस्वरूप, 'कन्वेंशन' की हिन्दी 'अभिसमय' दे दी जाती है और 'प्रोजेक्टेड' की हिन्दी 'प्रकल्पित'। ऐसे ही हिन्दी अनुवाद के कई उदाहरण हैं। इतने जटिल प्रश्न पत्रों में, जहाँ अभ्यर्थी की एक सेकण्ड भी क़ीमती होती है, वहाँ कई मिनट  इस भाषायी अनुवाद के चलते ख़राब हो जाते हैं; साथ ही, कई बार ऐसे अनुवाद की साम्यता किसी अन्य शब्द से बिठाकर, अभ्यर्थी ग़लत उत्तर का चयन कर लेता है और हज़ारों की संख्या में हर साल ऐसे अभ्यर्थी होते हैं जो एक या दो अंकों से ही प्रारम्भिक परीक्षा में ही उनका पत्ता कट जाता है।
कुल मिला कर ये कहा जा सकता है कि गलत अनुवाद के कारण छात्रों से गलत प्रश्न के सही उत्तर मांगे जाते हैं जो कि असंभव है। प्रारम्भिक परीक्षा की उत्तर कुंजी, अभ्यर्थियों के प्राप्तांक उन्हें इस परीक्षा के लगभग एक साल बाद बताए जाते हैं, जिसका कोई औचित्य नहीं। ओएमआर शीट की कार्बन कॉपी भी अभ्यर्थियों को दिए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है। 
हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों की मुख्य परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं को भी हिन्दी में अदक्ष मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा जाँचा जाता है। ऐसे में पूरी संभावना यह रहती है कि अभ्यर्थी का लिखा हुआ मूल्यांकनकर्ता तक सही से प्रेषित ही न हो। इस वजह से मुख्य परीक्षा में ही हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों का स्कोर, अंग्रेज़ी माध्यम के अभ्यर्थियों की तुलना में काफ़ी कम रह जाता है। 
अपारदर्शिता का आलम ये है कि मुख्य परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाएँ अभ्यर्थियों को दिखाए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि कुछ राज्य लोक सेवा आयोग तक आरटीआई आवेदन के माध्यम से ऐसी सुविधा प्रदान करते हैं। साक्षात्कार में जानबूझकर कई बार हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों को असहज करने वाले प्रश्न अंग्रेज़ी में पूछे जाते हैं, साथ ही, साक्षात्कार के लिए लिये निर्धारित 275 अंक परीक्षा में आत्मनिष्ठ प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं, जो किसी भी तरह से उचित नहीं है।
यह लड़ाई हिंदी बनाम अंग्रेज़ी की लड़ाई नहीं है। अभ्यर्थी किसी भाषायी द्वेष से ग्रस्त नहीं हैं। वैसे भी, अपारदर्शिता से तो अंग्रेज़ी और अन्य भाषायी माध्यम के अभ्यर्थी भी समान रूप से त्रस्त हैं ही। लड़ाई है, भाषाओं के साथ समान व्यवहार करने की। वह हिन्दी जो पूरे देश में सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है, वह हिंदी जो आज़ादी के संघर्ष के दौरान जनसंचार की भाषा बनी थी, वह हिंदी जो लोचशील है, जो 'ट्रेन' और 'शायद' जैसे अन्य भाषायी मूल के शब्दों को भी सहजता के साथ अपने में समाहित कर लेती है, वही हिंदी और हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थी आज इतने उपेक्षित क्यों हैं? 
"India got freedom in 1947", जैसा वाक्य, "भारत ने 1947 में आज़ादी पाई", से कैसे श्रेष्ठ साबित होता है? ये समस्या केवल उस मानसिकता की है जो हिंदी को तुलनात्मक रूप से अधिक वैज्ञानिक भाषा होने के बावजूद कम करके आँकती है। समस्या अंग्रेज़ी से नहीं, बल्कि अंग्रेज़ियत की उस मानसिकता से है जो आज भी देश के शीर्ष संस्थानों में छायी हुई है, जो केवल भाषा विशेष में दक्ष होने के आधार पर किसी व्यक्ति की योग्यता के सम्बंध में पूर्वाग्रह पाल लेती है।
ग्रामीण और क़स्बाई पृष्ठभूमि के लाखों अभ्यर्थी सीमित संसाधनों में, कई बार तो अमानवीय दशाओं में गुज़ारा करके इस परीक्षा के लिए अपना अमूल्य समय और ऊर्जा लगाते हैं, इसके बावजूद उनके लिए परिणाम बेहद निराशाजनक हैं। 
या तो देश के संचालकों/नीति निर्माताओं द्वारा स्पष्ट कह दिया जाए कि हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के लिए इस परीक्षा में कोई जगह नहीं है ताकि वे भ्रम में ना रहें और  समय, संसाधन तथा ऊर्जा को कहीं और लगा सकें या इस संस्था में व्याप्त घोर अपारदर्शिता और भाषायी भेदभाव को यथाशीघ्र समाप्त किया जाए।
यूपीएससी में हिंदी वालों के हक के लिए लड़ रहे निखिलेश सिंह का संपर्क : 9582182362