अनुवाद

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

हम अपनी भाषाओं के प्रति इतने असंवेदनशील क्यों है?

जर्मन क्यों?

अमृत मेहता, सम्पादक, विदेशी भाषा साहित्य की हिन्दी पत्रिका "सार संसार"

इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैं जर्मन भाषा तथा साहित्य का अदम्य समर्थक हूँ, और अब तक मुझ द्वारा अनूदित 72 साहित्यिक कृतियों में से 66 का अनुवाद जर्मन से किया गया है. हिन्दी  मेरी मातृभाषा है, इसका प्रमाण इसी में है कि 72 में से 70कृतियों मे लक्ष्य भाषा हिन्दी  रही है, और दो में पंजाबी. अब तक मैं 208 जर्मनभाषी लेखकों की कृतियों का जर्मन से हिन्दी  में अनुवाद कर चुका हूँ, और कुल मिला कर 222 जर्मन लेखकों कि कृतियाँ प्रकाशित कर चुका हूँ. काफ़ी हद तक अपना धन लगा कर भी. अपनी पत्रिका “सार संसार” के माध्यम से मैंने 72 ऐसे नए अनुवादकों को जन्म दिया है, जो विदेशी भाषाओँ से सीधे हिन्दी  में अनुवाद करते हैं, जिनमें से 16 जर्मन-हिन्दी  अनुवादक हैं. पूरे विश्व में इन आंकड़ों के बराबर कोई नहीं पहुंचा, और यह वक्तव्य मैं पूरी ज़िम्मेदारी से दे रहा हूँ.

भारत के केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के स्थान पर केवल जर्मन को सुशोभित करना एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण है, और जिस तरह से इस भाषा को भारतीय बच्चों पर लादा गया है, वह न केवल असंवैधानिक है, बल्कि इस से यह भी उजागर होता है कि भारत को स्वयं में इतना ढीला-ढीला देश माना जाता है कि यहाँ पर कोई भी विदेशी शक्ति जो चाहे करवा सकती है, चाहे घूस के बल पर अथवा बहला-फुसला कर. इस प्रकरण में कौन सा तरीका अपनाया गया है, यह तथ्यों की गहराई में जाने से मालूम पड़ सकता है.

यह मामला 2014 में मानव संसाधन मंत्री सुश्री स्मृति ईरानी की सतर्कता से उजागर हुआ है, परन्तु तीन वर्ष में कुछ लोग इस सन्दर्भ में जो करने में सफल हुए हैं, वह हमारी शासन प्रणाली पर एक गंभीर प्रश्न-चिन्ह है. मैं 2009 से जानता हूँ कि कोई संदिग्ध खिचड़ी पक रही थी, परन्तु मेरी जानकारी में केवल इतना ही था कि हिन्दी  तथा अन्य भारतीय भाषाओँ के अस्तित्व पर कुठाराघात करके कुछ जर्मनभाषी सांस्कृतिक दूत अंग्रेज़ी को भारत की मुख्य भाषा सिद्ध करने पर तुले हुए थे. मैंने इसका जम कर विरोध किया है, बहुत कुछ लिखा है, और मुझे इसकी काफ़ी क़ीमत भी चुकानी पड़ी है. जर्मन का वर्चस्व जिस तरह से सरकारी स्कूलों में स्थापित किया जा रहा था, वह जुड़ा इसी सन्दर्भ से था, परन्तु मुझे यही भ्रम रहा कि यह भारत सरकार की इच्छा से हो रहा है, एक नीतिगत निर्णय है, अतः इस का विरोध करना निरर्थक होगा.

2009 में मैं बर्लिन के साहित्य-सम्मेलन की ग्रीष्म-अकादमी में हिस्सा ले रहा था, जहाँ जर्मनी के अनेकों प्रकाशक तथा गोएथे-संस्थान के लोग भी उपस्थित थे. सब मुझ से पूछ रहे थे कि क्या मैं नवीन किशोर को जानता हूँ. किशोर कोलकाता के सीगल्ल-बुक्स-प्रकाशन के मालिक हैं, और तब तक अपना व्यापार लन्दन से चला रहे थे, क्योंकि वह पुस्तकें अंग्रेज़ी की प्रकाशित करते हैं. सब मुझे बता रहे थे कि वे किशोर से मिलने कोलकाता जा रहे थे. कारण पूछने पर मुझे बताया गया कि आगे से वे जर्मन पुस्तकों के अंग्रेज़ी अनुवाद भारत से ही करवा कर वहीँ प्रकाशित करवाया करेंगे. यह एक बहुत ही चौंका देने वाली सूचना थी. मेरे यह कहने पर कि कोई भी भारतीय जर्मन साहित्य का अनुवाद अंग्रेज़ी में कर पाने में समर्थ नहीं होगा, और वैसे भी अज्ञात जर्मन लेखकों की पुस्तकें पढ़ने में भारतीय दिलचस्पी नहीं लेंगे तो मुझ पर यह कह कर हंसा गया कि हर भारतीय अंग्रेज़ी जानता है, और मैं उन्हें भ्रमित कर रहा हूँ. उनके इस विश्वास की पृष्ठभूमि में भारत में कुछ वर्षों से चल रहा एक अंग्रेज़ी-समर्थक अभियान था. इस बारे में मैं वेबज़ीन “सृजनगाथा” में मई 2010 में प्रकाशित अपने एक बहुचर्चित आलेख में विस्तार से लिख चुका हूँ. यह भी कि मैंने जर्मनी के एक प्रमुख प्रकाशन “ज़ूअरकांप फर्लाग” की प्रमुख पेट्रा हार्ट को एक मेल लिख कर अपना कड़ा विरोध जताया था तो उन्होंने मुझे जवाब में लिखा था कि ये पुस्तकें केवल अंग्रेज़ीभाषी देशों, जैसे अमरीका तथा इंगलैंड के लिए हैं, इन्हें छपवाया भारत में जायेगा, बेचा विदेश में जायेगा, और इनका अनुवाद भी अँगरेज़ करेंगे. पेट्रा एक सीधी-सच्ची महिला हैं और उनके कथन में सत्य है. जर्मन से अंग्रेज़ी में अनूदित, भारत में प्रकाशित पुस्तकें भारत में उपलब्ध नहीं हैं, अंग्रेज़ीभाषी देशों में ही बेचीं जा रही हैं. इसका सीधा सा मतलब है: भारत में पुस्तकें सस्ती छपती हैं, तो इस से प्रकाशकों का मुनाफ़ा कई गुणा बढ़ जाता है. परन्तु इसका चिंताजनक पहलू यह रहा कि इसके साथ ही भारत में, विशेषकर गोएथे संस्थान द्वारा एक हिन्दी -विरोधी अभियान भी शुरू हो गया, जिसके अंतर्गत, एक जर्मनभाषी सांस्कृतिक दूत के शब्दों में: “दिल्ली से बाहर कदम रख कर देखो तो कोई भी हिन्दी  नहीं बोलता.” इस अज्ञान को क्षमा करने का कोई कारण नहीं है, लेकिन इसके मंतव्य को समझते हुए यह  निस्सहाय रोष को जन्म देने वाला एक वक्तव्य है. बहरहाल यह समझ में आने वाली बात है कि वैश्वीकरण के इस युग में कोई कम लागत में किसी दूसरे देश के सस्ते कामगारों का लाभ उठा रहा है, जबकि इस  सांस्कृतिक दूत का कथन था कि वे यहाँ पर लोगों को रोज़गार उपलब्ध करवा रहे हैं.

लेकिन अभी तक जो एकदम अबोधगम्य रहा है, वह है भारत के संविधान की अवहेलना करते हुए जर्मन को भारत में बढ़ावा देना. इससे क्या मिलने वाला है जर्मनी को, या किसी अन्य जर्मनभाषी देश, अर्थात आस्ट्रिया अथवा स्विट्ज़रलैंड को? उनके लिए भारतीय बच्चों को जर्मन सिखाना इतना अधिक महत्व रखता है कि उन्होंने चुपचाप मानव संसाधन मंत्रालय को नज़रंदाज़ करते हुए गुप-चुप केन्द्रीय विद्यालय संगठन से इकरारनामा कर डाला और उसके बाद प्रति वर्ष लाखों यूरो जर्मन के प्रचार-प्रसार पर खर्च करते रहे. यह तर्क किसी के गले नहीं उतरने वाला कि जर्मन सरकार चाहती है कि भारत के प्रतिभाशाली छात्र इससे जर्मन विश्वविद्यालयों में शिक्षा पाने को आतुर हो जायेंगे. स्कूल में पढ़ी जर्मन बड़े होने के बाद कहाँ बची रह जाती है? मेरे छोटे बेटे ने स्कूल में तीसरी भाषा के तौर पर फ्रेंच ली थी, और अब वह ‘कोमा ताले वू?’ (कैसे हो?) के अलावा और कोई वाक्य नहीं जानता. मेरे ज्येष्ठ पुत्र ने कॉलेज में पढ़ते हुए गोएथे-संस्थान से दो सत्र में जर्मन सीखी थी, २४ वर्ष की आयु में, अपनी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था उसने, लेकिन अब वह “शुभ प्रातः” या “शुभ संध्या” तक ही सिमट कर रह गया है. एक तर्क और है कि अभी तक जर्मन की शिक्षा केवल निजी स्कूलों के बच्चों तक, अर्थात अमीर बच्चों तक ही सीमित रही है, और केंद्रीय विद्यालयों में इसे लगा कर गरीब बच्चों के लिए जर्मन भाषा की शिक्षा उपलब्ध करवाई जा रही है, जो स्वयं में एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है, 20.11.14 को समाचारपत्रों में निकली एक खबर के अनुसार हमारे सांसद इन विद्यालयों में प्रति वर्ष 15 सीटों का कोटा अपने बच्चों के लिए आरक्षित करवाना चाहते हैं, इसी से मालूम पड़ जाता है कि इन विद्यालयों में पड़ने वाले बच्चे कितने गरीब हैं. न जाने ऐसा कितना अज्ञान इनके आसपास घूमने वाले अंग्रेजीदां हिंदुस्तानियों ने इनके भेजे में भर दिया है कि ये लोग अपनी नाक के आगे ज़्यादा दूर तक नहीं देख पाते.

कुल मिला कर यह एक अचरज में डालने वाला विषय है कि क्या जर्मन का भारतीय स्कूलों में पढ़ाया जाना गोएथे संस्थान या जर्मन दूतावास के या जर्मन सरकार के लिए इतना गंभीर विषय है कि उसके लिए संदिग्ध प्रणाली से एक समझौता करना, पानी की तरह पैसा बहाना तथा जर्मन चांसलर मैडम मेर्केल का भारतीय प्रधानमंत्री से एक महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन के दौरान बात करना अनिवार्य हो गया? किसी भी जर्मन या भारतीय नागरिक के लिए यह गोरखधंधा अबोधगम्य ही रहेगा. सुप्रसिद्ध साहित्यकार ई.एम.फोस्टर ने एक बार कहीं लिखा था: If I had to choose between betraying my country and betraying my friend, I hope I should have the guts to betray my country, अर्थात यदि मेरे सामने अगर दुविधा हो कि मैं देश से गद्दारी करूं या दोस्त से, तो उम्मीद रखता हूँ कि मुझमें देश से गद्दारी करने का साहस होगा.

जर्मनों तथा जर्मनभाषियों से मेरा संपर्क तथा मेरे सम्बन्ध गत 41 वर्षों से हैं, और मैं भली-भांति जानता हूँ कि जर्मेनिक नस्ल दोस्ती निभाने के मामले में मिसालें क़ायम कर सकती है, पर देश से गद्दारी?...मैं सोच भी नहीं सकता था, परन्तु इस प्रकरण में कहीं जा कर यह उक्ति इन के सन्दर्भ में सार्थक प्रतीत होती है. यह तो मैं गत 15 वर्षों से जानता हूँ कि ये लोग भारतीय दोस्तों द्वारा बरगलाये जाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं.

गोएथे-संस्थान दशकों से भारत में निरंकुशता से जर्मन-भारतीय भाषा अनुवाद क्षेत्र में निरीह हिन्दी  पाठकों पर जर्मन साहित्य के घटिया अनुवाद थोप रहा है. विष्णु खरे इसके आधिकारिक अनुवादक रहे हैं, जो खुद मानते हैं कि उनका जर्मन-ज्ञान अल्प है. संस्थान हिन्दी  में उत्तम अनुवाद नहीं होने देता, अगर कोई करता है तो उसे प्रताड़ित करता हैं, उससे उसके प्रकाशक छीन लेता है, अपने दोस्त प्रकाशकों पर थोप देता है, कि इनसे अनुवाद करवाओ. जब उनके अनुवाद ऐसे होते हैं कि हिन्दी  पाठक उन्हें पढ़ते हुए अपना माथा पीट ले, तो भी प्रकाशक के साथ ज़बरदस्ती की जाती है कि उसे वही अनुवाद छापने होंगे. यह उनके अपने साहित्य का अपमान नहीं है तो क्या है? इस विषय पर जर्मनी तथा आस्ट्रिया की दो शोध-पत्रिकाओं में मैं जर्मन भाषा में 14-15 पृष्ठों का एक विस्तृत लेख प्रकाशित कर चुका हूँ. खेद का विषय है कि मुझे इस प्रवृत्ति को कड़े शब्दों में लताड़ना पड़ा है; किसी प्रश्न का कोई उत्तर तो इनके पास नहीं है, लेकिन लोगों से निजी वार्तालापों में इसके अधिकारी मेरे प्रति अपनी आक्रोश जताते रहते हैं. इनकी निरंकुशता अब इस हद तक बढ़ चुकी है कि ये अनधिकृत रूप से देश से संस्कृत तथा अन्य भारतीय भाषाएँ मिटा कर जर्मन को स्थापित करने कि लिए दशकों से बने मधुर भारत-जर्मन संबंधों में दरार लाने पर भी उतारू हो गए हैं.

बात जर्मनों के जिगरी दोस्त होने की हो रही थी. 50 वर्ष से अधिक समय से गोएथे-संस्थान का एक जिगरी दोस्त प्रमोद तलगेरी नाम का एक जर्मन प्रोफ़ेसर रहा है. जर्मन भाषा और साहित्य के मामले में यह हमेशा उनका प्रमुख परामर्शदाता रहा है. गत कुछ वर्ष ऐबरहार्ट वेल्लर संस्थान की दक्षिण एशिया-शाखा के भाषा-विभाग के प्रमुख रहे थे. उनके कार्यकाल के दौरान भारतीय विश्वविद्यालयों में जर्मन के वही शिक्षक फले-फूले, जो वेल्लर तथा तलगेरी की युगल-जोड़ी को दंडवत प्रणाम करते रहे. और ये उन्हें बार-बार जर्मनी की सैर करवाते रहे.. लेकिन वेल्लर के ज़माने में भारत में जर्मन भाषा ख़ूब फली-फूली, भले ही इसकी उन्नति के तौर-तरीके संदिग्ध थे. इन्हीं के ज़माने में हिन्दी  के प्रति संस्थान की शत्रुता खुल कर प्रकट हुई. इन्होने देश के कई कोनों में जर्मन सेंटर खुलवाए, अपने पिच्छ्लग्गुओं को वहां नियुक्त कर दिया. एक उदाहरण ही इनकी कार्यविधि को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त होगा. इन्होंने चंडीगढ़ के सेक्टर 34 में एक गोएथे-सेंटर खुलवाया, जिसे पूरे उत्तर भारत में जर्मन भाषा सीखने के लिए एकमात्र सेंटर का दर्ज़ा प्रदान किया गिया, और जिसके बारे में घोषणा की गई कि दिल्ली की इंदिरा गाँधी ओपन यूनिवर्सिटी की भागीदारी इसके साथ होगी. यहाँ उल्लेखनीय है कि इस निजी-सेंटर के कर्ता-धर्ता निदेशक सिर्फ़ एम.ऐ. हैं, तथा किसी कॉलेज या यूनिवेर्सिटी में शिक्षक की नौकरी नहीं पा सके, क्योंकि यू.जी.सी. की नेट परीक्षा पास नहीं कर सके, परन्तु, यदि हम वेल्लर के शब्दों पर विश्वास करें तो इन्हें – वेल्लर तथा तलगेरी की कृपा से - एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर का दर्ज़ा संभवतः मिल चुका है. यह अनिवार्य है कि जांच की जाये: क्या इंदिरा गाँधी ओपन यूनिवर्सिटी से भी गोएथे-संस्थान ने ऐसा कोई अवैध समझौता किया है?   यह स्वतःस्पष्ट है कि भारत में जर्मन का प्रचार-प्रसार बढ़ाने से वेल्लर की प्रतिष्ठा गोएथे-संस्थान के म्यूनिख मुख्यालय में बढ़ी और तलगेरी की जर्मन दूतावास इत्यादि में. और इस प्रतिष्ठा की दरकार तलगेरी को बहुत बुरी तरह से थी.

गोएथे-संस्थान, जर्मन दूतावास तथा अन्य जर्मनभाषी देशों के दूतावासों के घनिष्ठ मित्र प्रमोद तलगेरी भारत सरकार के अपराधी हैं, अतः इन्हें भारतीय यूनिवर्सिटी सिस्टम से बहिष्कृत किया जा चुका है, और मानव संसाधन मंत्रालय ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग के आदेश पर एक यूनिवर्सिटी में इनके भ्रष्टाचार के मामलों को दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार की कड़ी नाराज़गी इनके प्रति प्रकट की है. यह कभी हैदराबाद में एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय के उपकुलपति होते थे, और अब अपने आप को इंडिया इंटरनेशनल मल्टीवेर्सिटी, पुणे, का उपकुलपति बताते हैं. वास्तव में यह “वेर्सिटी” न तो “यूनिवर्सिटी” है, न ही “इंटरनेशनल” है, और न ही यह इसके उपकुलपति हैं. जर्मनों के यह घनिष्ट मित्र दशकों से मक्कारियों और घोटालों के लिए जाने जाते रहे हैं, और स्वयं पर हाल में हुए कुठाराघात से निज़ात पाने के लिए इनके लिए अपने मित्रों के लिए कुछ नया करना अनिवार्य था. यह फ़रवरी 2014 में “अपनी यूनिवर्सिटी” में जर्मन, स्विस तथा आस्ट्रियाई दूतावास के सहयोग से  “भारत में जर्मन के शिक्षण” के सौ वर्ष की जयंती” बड़ी धूमधाम से मनाने वाले थे. मुझे जब यह सूचना स्विस दूतावास की सांस्कृतिक सचिव, ज़ारा बेरनास्कोनी, से मिली कि तीनों दूतावास इंडिया इन्टरनेशनल मल्टीवेर्सिटी में जा कर यह समारोह आयोजित करने जा रहे हैं तो मैंने उन्हें सच्चाई से परिचित करवाया. वह आश्चर्यचकित हुईं और उन्होंने मेरे कथन पर विश्वास नहीं किया. मैनें उन्हें कोरिएर से प्रमाण भेजे तो उन्हें यकीन आया. ये सब प्रमाण इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं. 

तथ्य ये हैं:

वेर्सिटी का पता कहीं पर कुछ है, कहीं कुछ और है, कुछ पता नहीं कि यह कब स्थापित हुई थी, 2000 से 2012 तक कई तारीखें हैं इसमें, वेर्सिटी में छात्रों की संख्या:0, शिक्षकों की संख्या:0, कमरों की संख्या:0, कम्प्यूटरों की संख्या:0, कुछ भी नहीं वहां पर, कुल मिला कर वेर्सिटी के पास6,36,122 रूपये का बजट है, जो उन्हें किसी ने दान में दिये हैं, जिस में से 5,40,000 रूपये कर्मचारियों में बांटे गए हैं. वेर्सिटी को न तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और न ही तकनीकी शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त है, जो हर सही यूनिवर्सिटी के लिए अनिवार्य होती है. कहीं पर इसे कॉलेज बताया गया है, कहीं एक वाणिज्यिक संस्था, कहीं कल्याणकारी संस्था और कहीं गैर-सरकारी संगठन के रूप में इसका परिचय दिया गया है; विकिपीडिया में इसे एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बताया गया है, जिसे तलगेरी चला रहे हैं. और कि इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी एक ग्रामीण यूनिवर्सिटी है, प्रमोद तलगेरी जिसके “Appily Adhikari” और “Principal” हैं. स्विस राजदूत लीनुस फॉन कास्टेलमूर को भी मैंने आगाह किया कि ऐसे व्यक्तियों से बच कर रहें. यथासंभव जर्मन से जुड़े हर व्यक्ति को देश-विदेश में आगाह किया. समारोह अंततः पुणे यूनिवर्सिटी में संपन्न हुआ, वहां जर्मन राजदूत मिषाएल श्टाइनर ही उपस्थित थे, परन्तु उन्होंने तलगेरी को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद अवश्य दिया. और सबसे अधिक हैरत की बात यह है कि इसी वर्ष अप्रैल में गोएथे-संस्थान ने तलगेरी को भारत तथा जर्मनी के मध्य सांस्कृतिक तथा साहित्यिक संबंधों को असाधारण प्रोत्साहन देने के लिए मेर्क-टैगोर पुरस्कार से सम्मानित किया है. स्पष्ट है कि किस लिए दिया गया है यह सम्मान. कई बार तो पता नहीं चलता कि इनकी निष्ठां भारत के प्रति है या जर्मनी के प्रति. जर्मन दूतावास की 17.11.2009 की एक प्रेस विज्ञप्ति में तलगेरी को जर्मनी के प्रान्त बाडेन व्युर्त्तेमबेर्ग के मुख्यमंत्री ग्युंटर एच. अयोत्तिन्गेर के साथ आये प्रतिनिधिमंडल का सदस्य बताया गया है. यदि जर्मन हमारे देश में अपनी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए दम लगते हैं तो यह एक स्वाभाविक बात है, यह उनका काम है, परन्तु यदि एक भारतीय के षड्यंत्र के कारण वैश्विक स्तर पर एक कूटनीतिक संकट कि स्थिति आन खड़ी हो, जिसमें दो देशों मे सम्बन्ध बिगड़ जाने का खतरा हो तो ऐसे अपराधी को देशद्रोह का दंड मिलना चाहिए.

इससे पहले भी तलगेरी अनगिनत घोटाले कर चुके हैं, जिनका विवरण मैं यहाँ स्थानाभाव के कारण नहीं दूंगा,  परन्तु इनके बारे में मैं बहुत कुछ पहले भी लिख चुका हूँ, इन घोटालों में भारत सरकार तथा अन्य कई संस्थाओं को ठगा गया था. परन्तु यू.पी.ऐ. सरकार के समय में इन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.

संक्षेप में: वेल्लर का काम था भारत में जर्मन सीखने वाले छात्रों में वृद्धि करना, वह उसने किया, तलगेरी का काम था अपने कलंक को सामने न आने देना, वह उसने किया, और म्यूनिख और भारत के गोएथे-संस्थान ने अपनी दोस्ती निभाई, अपनी भाषा तथा साहित्य की क़ीमत पर. मुझे और कोई कारण नज़र नहीं आता इस गौण समस्या को इतना तूल देने का कि जर्मन प्रधानमंत्री को इस में हस्तक्षेप करना पड़े.

वैसे वेल्लर तथा तलगेरी ने मिल कर यदि भारत में जर्मन भाषा सीखने वालों की संख्या में भारी वृद्धि की तो उसमें पैसे का बड़ा हाथ था. शिक्षिका ने अभी पढाना शुरू ही किया और बच्चों ने सीखना तो उन्हें फटाफट जर्मनी की सैर करा दी. स्कूली बच्चों पर इस तरह गैर-क़ानूनी रूप से तीसरी भाषा के रूप में जर्मन थोपना हास्यास्पद तथा अनर्गल है, क्या कोई कल्पना कर सकता है कि भारतीय इस तरह जर्मनी या किसी अन्य यूरोपीय देश में जा कर हिन्दी  या तमिल वहां के स्कूलों पर थोप सकते हैं?

देखा जाये तो केंद्रीय विद्यालय संगठन ने गोएथे-संस्थान से उक्त समझौता कर के अपने देश, अपनी भाषा के प्रति निष्ठा नहीं दिखाई. त्रिभाषी सूत्र का मुख्य उद्देश्य था देश के सभी भाषाई क्षेत्रों को भावनात्मक स्तर पर एक दूसरे से जोड़ना, और यदि छात्र उत्तर में संस्कृत को वरीयता देते हैं तो भी यह उद्देश्य पूरा होता है. आखिरकार जर्मनी और दूसरे यूरोपीय देशों में भी तो बच्चे लातिन सीखते हैं. यह एक कसौटी पर कसा तथ्य है कि लातिन सीखने वाले बच्चे यूरोप की किसी अन्य भारोपीय भाषा में आसानी से महारत प्राप्त कर सकते हैं. वही बात संस्कृत में है, जो न  भारत की हर इन्डो-यूरोपीय भाषा से, बल्कि कन्नड़ और तेलुगु जैसी द्रविड़ भाषाओँ से भी छात्रों को जोड़ती है. संस्कृत प्राचीन ग्रीक की माँ है, जो लातिन की माँ है, और जो भारत-जेर्मैनिक, भारत-आर्य, भारत-रोमांस तथा भारत-स्लाव भाषाओँ की माँ है. इस में विरोध काहे का! हर भारोपीय भाषा में संस्कृत के शब्दों की भरमार है, अतः बेहतर होगा कि दोनों सम्बन्धी देश अपने-अपने देश में अपनी-अपनी भाषा के लिए काम करें तथा भाषा के नाम पर एक दूसरे की भावनाओं से खिलवाड़ न करे.

शौकिया तौर पर जर्मन सिखाए जाने देने का भारत सरकार का निर्णय उचित है. जर्मनी को भी चाहिए कि वह वहां संध्याकालीन-कक्षाओं में हिन्दी  पढाये जाने का इंतजाम करें.

इस सन्दर्भ में मुझे अंग्रेज़ी मीडिया की भूमिका हर तरह से संदिग्ध लगती है. बिना मामले की गहराई में गए जर्मन के पक्ष में सम्पादकीय तक लिख मारने में उनकी नीयत पर शक होना स्वाभाविक है.  

बुधवार, 5 नवंबर 2014

गूगल भारत में स्मार्टफोनों पर हिन्दी कुंजीपटल स्थापित करेगा

गूगल भारतीय स्मार्टफोन निर्माताओं के साथ भागीदारी की योजना बना रही है ताकि उन लाखों उपयोगकर्त्ताओं के लिए बेचे जाने वाले उपकरणों पर अपना हिन्दी कीबोर्ड स्थापित कर सके जो हिन्दी जानते हैं।  इन साझेदारियों के माध्यम से, मोबाइल फोन उपयोगकर्त्ताओं को मौजूदा स्मार्टफोन पर सॉफ्टवेयर अपडेट के माध्यम से हिन्दी में ईमेल और संदेश टाइप करने की सुविधा मिलेगी। 
"हम मूल उपकरण निर्माताओं (ओरिजिनल इक्विपमेंट मेकर) के साथ गठबंधन करने की सोच रहे हैं ताकि इनके द्वारा बनाए जाने वाले उपकरणों में हिन्दी कीबोर्ड को मानक कीबोर्ड की तरह स्थापित कर सकें। ” यह जानकारी कपिल खोसला, गूगल इंडिया के उत्पाद प्रमुख ने एक अंग्रेजी दैनिक को दी है. उन्होंने आगे कहा कि इस पर गूगल की बातचीत जारी है। 
अधिकांश मौजूदा स्मार्टफोनों में हिन्दी भाषा समर्थन की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन जब कोई उपयोगकर्त्ता ईमेल या एसएमएस की टाइपिंग करना चाहता है तो पूर्वनिर्धारित रूप से अंग्रेजी कीबोर्ड खुल जाता है और वह कुंजीपटल में अंग्रेजी भाषा के साथ सहज नहीं हो पाता है। यह भाषाई उपयोगकर्त्ताओं के लिए एक बहुत बड़ी बाधा है, जो अंग्रेजी के कारण अभी भी बनी हुई है।  भारत के 92.40 करोड़ मोबाइल फोन उपयोगकर्त्ताओं में से लगभग 71 प्रतिशत अभी भी साधारण फोन का उपयोग कर रहे हैं। हिन्दी कीबोर्ड की सुविधा आने से भारत में स्मार्टफोन बाज़ार की पैठ बढ़ने की आशा है। 
भारत में इंटरनेट उपयोगकर्त्ताओं के लिए हिन्दी के साथ-२ क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री उपलब्ध करवानी होगी इसके लिए ३ नवम्बर २०१४ को ही गूगल ने सामग्री रचनाकारों और प्रौद्योगिकी प्रदाताओं के साथ एक साझेदारी के लिए भारतीय भाषा इंटरनेट गठबन्धन (भाभाइंग) की घोषणा की गयी। इसके साथ ही एक हिन्दी कीबोर्ड, हिन्दी में ध्वनि खोज, हिन्दीवेब.कॉम नाम की वेबसाइट की शुरुआत की गई है।  
हिन्दीवेब.कॉम पोर्टल उपयोगकर्त्ताओं को वेबसाइट, ब्लॉग, अनुप्रयोग (ऐप) और वीडियो सम्बन्धी हर तरह की हिन्दी से संबंधित सामग्री खोजने में मदद करेगा।  भाभाइंग के संस्थापक सदस्यों में से एक राकेश देशमुख, फर्स्टटच के सह-संस्थापक और सीईओ ने कहा "अभी भारत में इंटरनेट को अपनाने में सबसे बड़ी बाधा भाषा है। ” 
"बहुत सारे लोग इंटरनेट का उपयोग करना चाहते हैं, पर वे इन उपकरणों पर अंग्रेजी के उपयोग से आशंकित हैं इसलिए स्मार्टफोन पसंद नहीं करते हैं। "
खोसला के अनुसार, गूगल ओएस के आगामी संस्करण एंड्रॉयड एल की सुविधा से सज्ज स्मार्टफोन उपकरणों पर स्वतः स्थापित हिन्दी कीबोर्ड होगा।  गूगल द्वारा समर्थित घरेलू हैंडसेट विक्रेताओं माइक्रोमैक्स, कार्बन और स्पाइस द्वारा बेचे जा रहे एंड्रॉयड वन उपकरण, गूगल नेक्सस और मोटोरोला स्मार्टफोन पर एंड्रॉयड एल ओएस सबसे पहले उपलब्ध होगा ऐसी उम्मीद है. गूगल जल्द ही भारत में इस अपडेट की उपलब्धता की तारीख की घोषणा करेगा ऐसी उम्मीद है। 

गूगल इंडिया के उपाध्यक्ष और प्रबंध निदेशक राजन आनंदन ने कहा "भारत में हर महीने 50 लाख इंटरनेट उपयोगकर्त्ता जुड़ते हैं और वे सभी मोबाइल पर इसका प्रयोग करते हैं।  2017 तक हमारा लक्ष्य  ५० करोड़ उपयोगकर्त्ताओं को ऑनलाइन लाना है। ”

स्त्रोत: टेलिकॉमपेपर 

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

गूगल का भारतीय भाषाओं के लिए एक नया मंच

हिन्दी इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की बढ़ती संख्‍या को देखते हुए गूगल ने वेब पर हिन्दी को बढ़ावा देने का निर्णय किया है. इसके लिए कंपनी ने हिन्दी में ध्वनि खोज जैसे कई नए कदम उठाए हैं. जबकि भारतीय भाषा इंटरनेट गठबंधन (भाभाइंग) की भी घोषणा की गई है, जो वेब पर हिन्दी सामग्री मुहैया कराएगा. “आजतक” वेबसाइट हिन्दी को बढ़ावा देने के अभियान में गूगल की सामग्री भागीदार बनी है.

सोमवार को नई दिल्‍ली में आयोजित एक कार्यक्रम में गूगल ने इस हेतु  घोषणाएँ कीं, जिसमें केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी भाग लिया. केंद्रीय मंत्री ने कहा, 'भारतीय लोग तकनीक को पसंद करते हैं. आज हर किसी के पास फेसबुक खाता है, लेकिन इस ओर और भी बहुत कुछ किया जा सकता है. अगर तकनीक उपयोगकर्त्ता के लिए आसान हो तो लाखों-करोड़ों लोग इंटरनेट से जुड़ना चाहेंगे.'

जावड़ेकर ने कहा कि पहले हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं के लिए ऐसा कोई प्‍लेटफॉर्म नहीं था, लेकिन अब इस गठबन्धन से लोगों को एक नया मंच मिलेगा.

गूगल की नयी पहल में क्‍या है नया?

इस अवसर पर गूगल ने एक नई वेबसाइट www.hindiweb.com को भी लोकार्पित किया, जिस पर हिन्दी में एक ही स्थान पर १५ श्रेणियों में स्तरीय सामग्री उपलब्‍ध होगी. गूगल ने हिन्दी उपयोगकर्ताओं  के लिए अब हिन्दी  में ध्वनि खोज अथवा वॉइस सर्च, एक नए उन्नत हिन्दी कीबोर्ड (गूगल हिन्दी  इनपुट) की घोषणा की है. 
स्रोत: श्री विजय मल्होत्रा (आजतक के माध्यम से)

सोमवार, 3 नवंबर 2014

हिन्दी के सर्वनाश के लिए तैयार हिन्दी मीडिया : भाग २

अब इस खबर को देखकर अपना सर धुनिये. हिन्दी सम्बन्धी इस समाचार में पत्रकार ने हिन्दी का ही चीरहरण कर डाला है. अरे भाई ज़रूरत क्या है ऐसी घटिया भाषा की. मत छापो हिंदी के नाम पर अंग्रेजी में लिखो, हमें कोई आपत्ति नहीं है. हमें पढ़ना ही होगा तो अंग्रेजी अखबार पढ़ेंगे, ऐसी अधकचरी भाषा का क्या मतलब?

मैं पहले कई हिन्दी अख़बारों का पाठक रहा हूँ, पर पिछले कुछ समय से बड़ी निराशा हो रही है इसलिए अख़बार पढ़ना मजबूरी में बंद कर दिया है, ट्विटर और फेसबुक पर ही काम चला लेता हूँ. मैंने सोचा था इन अख़बारों के संपादकों से बात करके कुछ लाभ होगा पर ऐसा संभव नहीं हुआ. 

कुछ हिन्दी अख़बार समूह ने हमेशा भाषा का एवं समाचारों का स्तर बना कर रखा है पर अब उनके समाचार-पत्रों एवं वेबस्थलों पर प्रचलित हिन्दी शब्दों के स्थान पर अंग्रेजी शब्दों का एवं रोमन का प्रयोग धीरे-धीरे बढ़ाया जा रहा है जो हिन्दी जैसी समृद्ध भाषा को पंगु ही बनाने वाला है. इन अख़बारों में ऐसा शायद अन्य हिन्दी मीडिया समूह की रणनीति की देखादेखी किया जा रहा है. 

परिवर्तन स्वाभाविक हो तो ठीक होता है पर जबरन किया जाए तो मेरी दृष्टि में अनुचित है. अंग्रेजी शब्द यदि हमारी भाषा के शब्दकोष में वृद्धि करते हों तो उनका स्वागत है पर वे यदि हमारे शब्दों को ही खाने लग जाएं तो फिर बहुत चिंता का विषय है. बाड़ ही खेत हो खाने लगे तो फिर खेत को कोई चाहकर भी नहीं बचा सकता है. 

भारत में आज तक किसी अंग्रेजी मीडिया अथवा अखबार ने अंग्रेजी को सरल और ग्राह्य बनाने के लिए देशी भाषाओं के अतिप्रचलित शब्द अथवा सही उच्चारण को बनाए रखने के लिए उनकी लिपियों का प्रयोग शुरू नहीं किया है और ना ही कभी इसकी कल्पना की जा सकती है पर हिन्दी मीडिया को इसमें क्या नज़र आ रहा है ? वह समझ से परे है.

बहुत से अंग्रेजी मीडिया समूहों ने भाषाई अख़बारों का अधिग्रहण किया है. कुछ बड़े हिन्दी अख़बारों ने भी अंग्रेजी अख़बार शुरू किये हैं. इन सभी ने एक रणनीति के तहत समाचार अथवा ऑनलाइन सामग्री में साठ प्रतिशत अंग्रेजी शब्द और दस से बीस प्रतिशत रोमन लिपि के इस्तेमाल का आदेश अपने पत्रकारों/संवाददाताओं को दिया हुआ है. इस बात का खुलासा एक प्रसिद्ध व्यक्ति ने अपने लेखों में कई बार किया है. उनका खुलासा एकदम सही भी है क्योंकि अब हिन्दी जैसा कुछ बचा नहीं है.

अपनी भाषाओं में नए शब्द गढ़ना अब बिलकुल बंद हो चुका है, प्रचलित शब्द भी प्रचलन  बाहर कर दिए गए हैं और उम्मीद है कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में (शायद पाँच वर्ष बाद) ही लोगों को हिन्दी की ज़रूरत ही नहीं रहेगी, देवनागरी की आवश्यकता ही नहीं होगी? जब अंग्रेजी शब्द ही लिखना है तो, अंग्रेजी को ही पढ़ना है तो कोई अंग्रेजी अखबार ही पढ़ेगा उसे हिंग्रेजी की वेबसाइट अथवा अखबार पढ़ने की क्या आवश्यकता ?
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  • एडवांस का 'हिंदी वर्जन' फुलऑन कन्फ्यूजन
    By: Inextlive | Publish Date: Mon 03-Nov-2014 07:00:31

    एडवांस का 'हिंदी वर्जन' फुलऑन कन्फ्यूजन
    - आईआईटी बॉम्बे ने फ‌र्स्ट टाइम जारी किया हिंदी में ब्रॉशर
    - ब्रॉशर में हिंदी की प्रिंटिंग में कई शब्द हो रहे गायब
    ravi.priya@inext.co.in
    DEHRADUN : जेईई एडवांस एग्जाम की जिम्मेदारी इस बार आईआईटी बॉम्बे को जिम्मे है. स्टूडेंट्स की सहूलियत के लिए इस बार इंफॉर्मेशन ब्रॉशर को इंग्लिश के साथ ही हिंदी में भी जारी किया है. ब्रॉशर का हिंदी वर्जन सीधे तौर पर हिंदी मीडियम में पढ़ रहे स्टूडेंट्स को ध्यान में रखते हुए जारी किया गया, लेकिन यह जेईई एडवांस इंफॉर्मेशन ब्रॉशर का यह हिंदी संस्करण स्टूडेंट्स के किसी काम नहीं आ रहा है. दरअसल, इसकी भाषा और पीडीएफ फॉर्मेट को स्टूडेंट्स पढ़ ही नहीं पा रहे हैं. ऐसे में कुछ पल्ले न पड़ने से यह कैंडिडेट्स भी इंग्लिश वर्जन ही देखने को मजबूर हो रहे हैं.
    एडवांस एग्जाम ख्ब् मई को होगा
    आईआईटी बॉम्बे इस बार जेईई एडवांस की जिम्मेदारी संभाल रही है. एग्जाम के बाद देश भर के क्म् आईआईटी संस्थानों के साथ ही आईएसएम धनबाद की इंजीनियरिंग की सीट्स पर एडमिशन मिलेगा. एडवांस एग्जाम ख्ब् मई को ऑर्गनाइज किया जाएगा. पिछले दिनों एग्जाम को लेकर डिटेल्ड नोटिफिकेशन और इंफॉर्मेशन जेईई एडवांस की वेबसाइट पर अपलोड किया था.
    ब्रॉशर का हिंदी वर्जन भी वेबसाइट पर
    यह इंग्लिश लैंग्वेज में था, लेकिन इसी के साथ ही हिंदी मीडियम कैंडिडेट्स के लिए हिंदी में विवरण दिए जाने की सुविधा भी वेबसाइट पर दी गई थी, जिसके चलते हाल ही में फ्क् अक्टूबर को जेईई एडवांस के इंफॉर्मेशन ब्रॉशर का हिंदी वर्जन भी वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है. खास बात यह कि यह पहली बार हैं कि जब एडवांस एग्जाम की जानकारी के लिए हिंदी भाषा में भी इंफॉर्मेशन ब्रॉशर जारी किया गया.
    कई अक्षर हैं गायब
    ब्रॉशर के पीडीएफ फॉर्मेट में कई अक्षर मिसिंग शो कर रहा है, जिससे छात्रों और टीचर्स दोनों ही परेशान हैं. ब्रॉशर के अधिकतर शब्द टूट रहे हैं. इसके अलावा कहीं ई की मात्रा नहीं हैं तो कहीं शब्द के बीच से अक्षर गायब हैं. ऐसे में स्टूडेंट्स को खासी परेशानी उठानी पड़ रही हैं, लेकिन इसके बाद भी स्टूडेंट्स को जानकारी पूरी तरह से समझ नहीं आ रही तो मजबूर होकर इंग्लिश वर्जन को डाउनलोड कर जरूरी जानकारी जुटा रहे हैं.
    ---
    हिंदी मीडियम से तैयारी कर रही हूं. आसानी से समझने के लिए वेबसाइट से इंग्लिश की जगह हिंदी वर्जन ब्रॉशर डाउनलोड किया था, लेकिन इसे ओपन करने के बाद कुछ समझ ही नहीं आया. कहीं शब्द गायब हैं तो कहीं मात्राएं ही दिखाई नहीं दे रही.
    - मनीषा चौहान, स्टूडेंट, सरस्वती विद्या मंदिर
    हिंदी ब्रॉशर डाउनलोड किया था, लेकिन यह तो समझ ही नहीं आ रहा है. इससे अच्छा तो इंग्लिश ब्रॉशर है. कम से कम शब्दों तो सहीं से प्रिंट हैं. हिंदी ब्रॉशर में तो शब्दों को लेकर बेहद कन्फ्यूजन है.
    - मानस कुकरेती, स्टूडेंट, स्टार लैंड स्कूल
    दरअसल, अभी जो हिंदी इंफॉर्मेशन ब्रॉशर अपलोड किया गया है. उसमें फॉन्ट का प्रॉब्लम आ रहा. जिस वजह से बच्चों को पीडीएफ फाइल में शब्दों गायब नजर आ रहें हैं. कई बच्चों ने इसे लेकर शिकायत की है. मामले में आईआईटी बॉम्बे को लेटर भी लिखकर प्रॉब्लम की जानकारी दी जाएगी. ताकि इस प्रॉब्लम का हल निकाला जा सके.
    - वैभव राय, डायरेक्टर, वीआर क्लासेज

    शनिवार, 1 नवंबर 2014

    देश का भाषाई मीडिया ही है हमारी भाषाओं का सबसे बड़ा दुश्मन

    आपको यह शीर्षक पढ़कर आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि पिछले दस बारह वर्षों में भारत में भारत की अपनी भाषाओं को समाप्त करने का षड्यंत्र जितनी तेज़ी से रचा और क्रियान्वित किया गया, उतना कदाचित पहले कभी नहीं हुआ. इस षड्यंत्र को रचने वालों ने अपने इस अभियान में शत-प्रतिशत सफलता भी प्राप्त कर ली है और सबसे बड़े दुःख की बात है कि भारत की आम जनता को इसका भान भी नहीं हुआ और उसने भी इस षड्यंत्र को सफल बनाने में भरपूर सहयोग भी दिया जाने अनजाने.

    भाषाई माध्यम के विद्यालय लगभग मरणासन्न हो चुके हैं और हर गली मुहल्ले में अंग्रेजी माध्यम के अति प्रतिष्ठित विद्यालय खोल दिए गए हैं. गाँव गाँव में इन प्रतिष्ठित विद्यालयों का बोलबाला है. भाषाई माध्यम की सरकारी शालाओं में अध्यापक और चपरासी के अलावा कोई दिखाई भी नहीं देता. अंग्रेजी में पढ़ाई का हर स्थान पर बोलबाला है. अंग्रेजी शालाओं ने निर्धन और धनवान का भेद मिटा डाला है और सभी के बच्चे इन अंग्रेजी स्कूलों में "गुणवत्तापूर्ण" एवं "उत्कृष्ट" शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं.

    मनमोहन सिंह की संप्रग सरकार ने अपने कुशासन में हर क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दरवाजे खोल दिए. वास्तव में यह सरकार अंग्रेजी शासन से भी बदतर सरकार थी जिसने भारत और भारत की संस्कृति से जुड़ी हर पहचान पर वज्रपात करवाया. इस देश की पहचान को नष्ट करने के सारे कदम इन्होंने उठाए. 

    "किसी देश की पहचान को इतिहास बनाना हो तो उसकी भाषा की जड़ें खोद डालो" पर अमल करते हुए सरकार सरलता के नाम पर देश की भाषाओं को पंगु बना दिया गया, हर स्तर पर प्रचारित किया गया कि यदि देशी भाषाओं के टीवी चैनलों और समाचार-पत्र /पत्रिकाओं में अंग्रेजी की मिलावट नहीं करोगे तो ये भाषाएँ कठिन बनी रहेंगी और नष्ट हो जाएँगी. नयी पीढ़ी को संस्कृतनिष्ठ हिन्दी अथवा अन्य देशी भाषा नहीं आती हैं क्योंकि यह बहुत कठिन होती है, दुरूह होती है, इससे ब्राह्मणवाद को बढ़ावा मिलता है, यह ब्राह्मणों की साजिश है वे हिन्दी को फैलने नहीं देना चाहते हैं इसलिए संस्कृतनिष्ठ हिन्दी की पैरवी करते हैं. 

    इस अघोषित अव्यक्त षड्यंत्र के अंतर्गत बार-२ मंत्रियों एवं सरकारी अधिकारियों ने यह कहा कि हिन्दी को बचाने और सरल बनाने के लिए अन्य भाषा की शब्दावली अपनाना अनिवार्य है पर इन लोगों ने खुलकर यह नहीं बताया कि किस भाषा की शब्दावली से हिन्दी को सरल बनाया जा सकता है? २०११ में तो राजभाषा विभाग की सचिव महोदया ने हिन्दी को सरल बनाने के लिए बाकायदा परिपत्र निकाल डाला और उसे अंग्रेजी अखबारों के "एडिटोरियल्स" में काफी प्रशंसा मिली क्योंकि ये लोग तो बाज की तरह झपट्टा मारने को ही बैठे थे.

    हिन्दी के तथाकथित समाचार-पत्रों में हिन्दी ख़त्म हो चुकी है और केवल "हिन्डी" बची है. उसका एक नमूना यहाँ देखें :

    क्रमश:...अगला भाग देखें http://hamaribhasha2050.blogspot.com/2014/11/blog-post_3.html

    शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

    फेसबुक: भारत में स्थानीय भाषाओं में ऐप्स विकसित करने के लिए 10 लाख डॉलर की प्रतियोगिता

    भारत पहुंचे मार्क जुकरबर्ग, कल मोदी से मिलेंगे
    नई दिल्ली। फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग दो दिन के भारत दौरे पर आए हैं ताकि विश्व के सभी लोगों को आपस में संपर्क करने के लिए भारत का सहयोग मिल सके। कनेक्टिविटी की राह में आने वाली अलग-अलग बाधाओं का जिक्र करते हुए नई दिल्ली में आयोजित इंटरनेट डॉट ओआरजी सम्मेलन में जुकरबर्ग ने कहा कि नेटवर्क को लेकर आर्थिक बाधाओं से भी बड़ी बाधाएं सामाजिक हैं।
    जुकरबर्ग ने कहा कि लोग जब आपस में जुड़ते हैं तो वे चमत्कारिक काम कर सकते हैं। एक-दूसरे से जुड़ाव मानव का अधिकार है लेकिन इसमें कई तरह की समस्याएं हैं। विकसित देशों में पुरुषों की तुलना में 25%द स्त्रियां सोशल नेटवर्क के साथ कम जुड़ीं हैं। भारत में 69 % नागरिक दुनिया के साथ सोशल नेटवर्क के माध्यम से अभी भी जुड़े  नहीं हैं। इसका कारण यह है कि उन्हें नहीं पता है कि इंटरनेट के माध्यम से विश्व से जुड़ने के फायदे क्या हैं?
    अमेरिका जैसे देश में यदि आपने कोई इंटरनेट सेवा या डाटा प्लान नहीं खरीदा है तो भी आप स्वास्थ्य, चिकित्सा या आपात सेवा के लिए मुफ्त में सेवाएँ प्राप्त करते हैं। यदि आपने कोई भुगतान नहीं भी किया है तो अपनी बुनियादी समस्याओं को दूर करने के लिए निःशुल्क 911 सेवा के माध्यम से इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते हैं।
    हमने बुनियादी सेवाओं के लिए तंजानिया, फिलीपींस जैसे देशों में कुछ लोगों को सहायता दी है। जुलाई में हमने जाम्बिया में एयरटेल के साथ लोगों को स्वास्थ्य, शिक्षा व नौकरी के लिए निशुल्क बुनियादी सेवाएँ दीं, जिसके अच्छे नतीजे मिले हैं। कनेक्टिविटी से जुड़ी सामाजिक बाधाओं को ध्यान में रखते हुए हमने फेसबुक की साज-सज्जा पर  भी काफी काम किया है।
    फेसबुक एंड्रॉयड ऐप को हमने कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी को ध्यान में रखते हुए पुनर्सज्जित किया है और यह अब 50 % ज्यादा तेज हो गई है। इस से हमें दूरस्थ क्षेत्रों और ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचने व कनेक्टिविटी में मदद मिली है।
    कनेक्टिविटी में सामाजिक बाधाओं को विस्तार देते हुए जुकरबर्ग ने कहा कि स्थानीय भाषाओं में इंटरनेट नहीं होना एक अन्य बड़ी चुनौती है। इंटरनेट पर दुनिया की 80% पाठ्य-सामग्री मात्र दस भाषाओं में है। भारत में भी कई लोग अपनी भाषा में कनेक्टिविटी की सुविधा नहीं मिलने की वजह से दुनिया के साथ नहीं जुड़ पा रहे हैं। यहां 22 आधिकारिक भाषाएं, 11 लिपियाँ और सौ से ज्यादा स्थानीय बोलियां हैं। दुनिया के साथ जुड़ने और अच्छी पाठ्य सामग्री का अनुभव लेने के लिए स्थानीय भाषाओं को संवाद की भाषा बनाए जाने की जरूरत है। 2007 से हम लोगों को स्थानीय भाषाओं में जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं और हमारे 65% उपयोगकर्त्ता अब अपनी भाषा में जुड़े हुए हैं। भारत में हम 10 लाख डॉलर की स्थानीय भाषाओं में ऐप्स विकसित करने के लिए प्रतियोगिता आयोजित करेंगे । साथ ही हम चालीस हजार डॉलर के निशुल्क ऑनलाइन उपकरण भी देंगे।
    दुनिया को कनेक्ट करने का काम केवल एक कंपनी नहीं कर सकती है। इंटरनेट के माध्यम से दुनिया की युवा पीढ़ियों को एक-दूसरे के साथ जोड़ने के लिए सबके सहयोग की जरूरत होगी क्योंकि यह काम आसान नहीं है। कनेक्टिविटी के लिए हमें मिलकर काम करना होगा और उम्मीद है कि मुझे इसके लिए भारत से सहायता मिलेगी।

    शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

    हिन्दी को एकता की भाषा बनाएँ

    श्रीमती लीना मेहेंदले
    (पूर्व भाप्रसे अधिकारी, सम्प्रति गोवा राज्य की मुख्य सूचना आयुक्त)

    इस देवभूमि भारत की करीब 50 भाषाएँ हैं, जिनकी प्रत्येक की बोलने वालों की लोकसंख्या 10 लाख से कहीं अधिक है और करीब 7000 बोली भाषाएँ  जिनमें से प्रत्येक को बोलनेवाले कम से  कम पाँच सौ लोग हैं, ये सारी भाषाएँ  मिलकर हमारी अनेकता में एकता का अनूठा और अद्भुत चित्र प्रस्तुत करती है । इन सबकी वर्णमाला एक ही है, व्याकरण एक ही है और सबके पीछे सांस्कृतिक धरोहर भी एक ही  है । यदि गंगोत्री से काँवड भरकर रामेश्वर ले जानेकी घटना किसी आसामी लोककथा को जन्म देती है, तो वही घटना उतनी ही क्षमता से एक भिन्न परिवेश की मलयाली कथा को भी जन्म देती है । इनमे से हरेक भाषा ने अपने शब्द-भंडार से और अपनी भाव अभिव्यक्ति से  किसी न किसी अन्य भाषा को भी समृद्ध किया है । इसी कारण हमारी भाषा संबंधी नीति में इस अनेकता और एकता को एक साथ टिकाने और उससे लाभान्वित होने की सोच हो यह सर्वोपरि है, यही सोच हमारी पथदर्शी प्रेरणा होनी चाहिये। लेकिन क्या यह संभव है ?
     पिछले दिनों और पिछले कई वर्षों तक हिन्दी-दिवसके कार्यक्रमों की जो भरमार देखने को मिली उसमें इस सोच का मैंने अभाव ही पाया । यह बारबार दुहाई दी जाती रही  है कि हमें मातृभाषा को नहीं त्यजना चाहिये, यही बात एक मराठी, बंगाली, तमिल, भोजपुरी या राजस्थानी भाषा बोलने वाला भी कहता है और मुझे मेरी भाषाई एकात्मता के सपने चूर-चर होते दिखाई पड़ते हैं । यह अलगाव हम कब छोड़ने वाले हैं ? हिन्दी दिवस पर हम अन्य सहेली-भाषाओं की चिंता कब करनेवाले है
    हिन्दी मातृभाषा का एक व्यक्ति हिन्दी की तुलना में केवल अंग्रेजी की बाबत सोचता है और शूरवीर योद्धा की तरह अंग्रेजी से जूझने की बातें करता है। हमें यह भान कब आयेगा कि एक बंगाली, मराठी, तमिल या भोजपुरी मातृभाषा का व्यक्ति उन उन भाषाओं की तुलना में अंग्रेजी के साथ हिन्दी  की बात भी सोचता है और अक्सर अपने को अंग्रेजी के निकट औऱ हिन्दी से मिलों दूर पाता है। अब यदि हिन्दी  मातृभाषी व्यक्ति अंग्रेजी के साथ साथ किसी एक अन्य भाषा को भी सोचे तो वह भी अपने को अंग्रेजी के निकट और उस दूसरी भाषा से कोसों दूर पाता है। अंग्रेजी से जूझने की बात खत्म भले ही न होती हो, लेकिन उस दूसरी भाषा के प्रति अपनापन भी नहीं पनपता  और उत्तरदायित्व की भावना तो बिलकुल नहीं । फिर कैसे हो सकती है कोई भाषाई एकात्मता?
    कोई कह सकता है कि हम तो हिन्दी -दिवस मना रहे थे,- जब मराठी या बंगाली दिवस आयेगा तब वे लोग अपनी अपनी सोच लेंगे. लेकिन यही तो है अलगाव का खतरा। जोर-शोर से हिन्दी दिवस मनानेवाले हिन्दीभाषी जब तक उतने ही उत्साह से अन्य भाषाओं के समारोह में शामिल होते नहीं दिखाई देंगे, तब तक यह खतरा बढ़ता ही चलेगा।
                एक दूसरा उदाहरण देखते हैं- हमारे देश में केन्द्र-राज्य के संबंध संविधान के दायरे में तय होते हैं। केन्द्र सरकार का कृषि-विभाग हो या शिक्षा-विभागउद्योग-विभाग हो या गृह विभाग, हर विभाग के नीतिगत विषय एकसाथ बैठकर तय होते हैं।  परन्तु राजभाषा की नीति पर केन्द्र में राजभाषा-विभाग किसी अन्य भाषा के प्रति अपना उत्तरदायित्व ही नहीं मानता तो बाकी राजभाषाएँ बोलने वालों को भी हिन्दी के प्रति उत्तरदायित्व रखने की कोई इच्छा नहीं जागती । बल्कि सच कहा जाए तो घोर अनास्था, प्रतिस्पर्धा, यहाँ तक कि वैर-भाव का प्रकटीकरण भी हम कई बार सुनते हैं। उनमें से कुछ को राजकीय महत्वाकांक्षा बताकर अनुल्लेखित रखा जा सकता हैपर सभी अभिव्यक्तियों को नहीं । किसी को  तो ध्यान से भी सुनना पडेगा, अन्यथा कोई हल नहीं  निकलेगा।
    इस विषय पर सुधारों का प्रारंभ तत्काल होना आवश्यक है। हमारी भाषाई अनेकता में एकता का विश्वपटल पर लाभ लेने हेतु ऐसा चित्र संवर्द्धित करना होगा जिसमें सारी भाषाओं की एकजुटता स्पष्ट हो और विश्वपटल पर लाभ उठाने की अन्य क्षमताएँ भी विकसित करनी होंगी। आज का चित्र तो यही है कि हर भाषा की हिन्दी के साथ और हिन्दी की अन्य सभी भाषाओं के साथ प्रतिस्पर्धा है जबकि उस तुलना में  सारी भाषाएँ बोलने वाले अंग्रेजी के साथ दोस्ताना ही बनाकर चलते हैं। इसे बदलना हो तो पहले  जनगणना में  पूछा जाने वाला अलगाववादी प्रश्न हटाया जाये कि आपकी मातृभाषा कौन-सी है? उसके बदले यह एकात्मतावादी प्रश्न पूछा जाये कि आपको कितनी भारतीय भाषाएँ आती हैं? आज विश्वपटल पर जहाँ-जहाँ जनसंख्या गिनती का लाभ उठाया जाता है वहाँ-वहाँ हिन्दी  को पीछे खींचने की चाल चली जा रही है क्योंकि संख्या-बल में हिन्दी की टक्कर में केवल अंग्रेजी और मंडारिन (चीनी भाषा) है- बाकी तो कोसों पीछे हैं। संख्या बल का लाभ सबसे पहले मिलता है रोजगारके स्तर पर । अलग अलग युनिवर्सिटियों में भारतीय भाषाएँ सिखाने की बात चलती है, संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) में अपनी भाषाएँ आती हैं, तो रोजगार के नये द्वार खुलते हैं।
    भारतीय भाषाओं को विश्वपटल पर चमकते हुए सितारों की तरह उभारना हम सबका कर्तव्य है । यदि मेरी मातृभाषा मराठी है और मुझे हिन्दी व मराठी दोनों ही प्रिय हों तो मेरा मराठी-मातृभाषिक होना हिन्दी के संख्याबल को कम करें यह मैं कैसे सहन कर सकती हूँ और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के संख्या बलके कारण भारतीयों को जो लाभ मिल सकता है उसे क्यों गवाऊँ? क्या केवल इसलिए कि मेरी सरकार मुझे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की महत्ता का लाभ नहीं उठाने देतीऔर मेरे मराठी ज्ञान के कारण मराठी का संख्याबल बढ़े यह भी उतना ही आवश्यक है। अतएव सर्वप्रथम हमारी अपनी राष्ट्रनीति सुधरे और मेरे भाषा-ज्ञान का लाभ मेरी दोनों माताओं को मिले ऐसी कार्य-प्रणाली भी बनायें यह अत्यावश्यक है।
    और बात केवल मराठी या हिन्दी की नहीं है। विश्वस्तरपर जहाँ  मैथिली, कन्नड या बंगाली लोक-संस्कृति की महत्ता उस उस भाषा को बोलने वालों के संख्याबल के आधार पर निश्चित की जाती है, वहाँ वहाँ मेरी उस भाषा की प्रवीणता का लाभ अवश्य मिले- तभी मेरे भाषाज्ञान की सार्थकता होगी। आज हमारे लिये गर्व का विषय होना चाहिये कि संसार की सर्वाधिक संख्याबल वाली पहली बीस भाषाओं में तेलगू भी है, मराठी भी है, बंगाली भी है और तमिल भी। तो क्यों न हमारी राष्ट्रभाषा नीति ऐसी हो जिसमें मेरे भाषाज्ञानका अंतर्राष्ट्रीय लाभ उन सारी भाषाओंको मिले और उनके संख्याबल का लाभ सभी भारतीयों को मिले। यदि ऐसा हो, तो मेरी भी भारतीय भाषाएँ सीखने की प्रेरणा अधिक दृढ़ होगी।

    आज विश्व के 700 करोड़ लोगों में से करीब 100 करोड़ हिन्दी को समझ लेते हैं, और भारत के सवा सौ करोड़  में करीब 90 करोड़; फिर भी हिन्दी  राष्ट्रभाषा नहीं  बन पाई। इसका एक हल  यह भी है कि हिन्दी-भोजपुरी-मैथिली-राजस्थानी-मारवाडी बोलने वाले करीब 50 करोड़ लोग देश की कम से कम एक अन्य भाषा को अभिमान और अपनेपन के साथ सीखने-बोलने लगें तो संपर्कभाषा के रूपमें अंग्रेजी ने जो विकराल  सामर्थ्य पाया है उससे बचाव हो सके।
    देश में 6000 से अधिक और हिन्दी की 2000 से अधिक बोली भाषाएँ हैं। सोचिये कि यदि हिन्दी की सारी बोली भाषाएँ हिन्दी से अलग अपने अस्तित्व की माँग करेंगी तो हिन्दी के संख्याबल का क्या होगा, क्या वह बचेगा ? और यदि नहीं करेंगी तो हम क्या नीतियाँ बनाने वाले हैं ताकि हिन्दी के साथ साथ उनका अस्तित्व भी समृद्ध हो और उन्हें विश्वस्तर पर पहुँचाया जाये। यही समस्या मराठी को कोकणी, अहिराणी या भिल-पावरी भाषा के साथ हो सकती है और कन्नड-तेलगू को तुलू के साथ। इन सबका एकत्रित हल यही है कि हम अपनी भाषाओं की भिन्नता को नहीं बल्कि उनके मूल-स्वरूपकी एकता को रेखित करें। यह तभी होगा जब हम उन्हें सीखें, समझें और उनके साथ अपनापा बढायें। यदि हम हिन्दी –दिवस पर भी रुककर इस सोच की ओर नहीं देखेंगे तो फिर कब देखेंगे
    जब भी सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी को हटाकर हिन्दी लाने की बात चलती है, तो वे  सारे विरोध करते हैं जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं  है। फिर वहाँ अंग्रेजी का वर्चस्व बना रहता है। उसी दलील को आगे बढाते हुए कई उच्च न्यायालयों में उस उस प्रान्त की भाषा नहीं लागू हो पाई है। उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश भारत के किसी भी कोनेसे नियुक्त किये जा सकते हैं, उनके भाषाई अज्ञान का हवाला देकर अंग्रेजी का वर्चस्व और मजबूत बनता रहता है। यही कारण है कि हमें ऐसा वातावरण फैलाना होगा जिससे अन्य भारतीय भाषाएँ सीखने में लोग अभिमान का भी अनुभव करें और सुगमता का भी।
    हमारे सुधारों में सबसे पहले तो सर्वोच्च न्यायालय,  राज्यों के उच्च न्यायालयगृह व वित्त मंत्रालय, केंद्रीय लोकराज्य संघ की परीक्षाएँ, इंजीनियरिंग, मेडिकल तथा विज्ञान एवं समाजशास्त्रीय विषयों की स्नातकस्तरीय पढाई में भारतीय भाषाओं को महत्व दिया जाये। सुधारोंका दूसरा छोर हो प्रथमिक और माध्यमिक स्तर की पढाई में भाषाई एकात्मता लाने की बात जो गीत, नाटक, खेल आदि द्वारा हो सकती है। आधुनिक मल्टिमीडिया संसाधनों का प्रभावी उपयोग हिन्दी और खासकर बालसाहित्यके लिये तथा भाषाई बालसाहित्योंको एकत्र करने के लिये किया जाना चाहिये। भाषाई अनुवाद भी एकात्मता के लिये एक सशक्त संग्रह बन सकता है लेकिन देश की सभी सरकारी संस्थाओं में अनुवादकी दुर्दशा देखिये कि अनुवादकों का मानधन उनके भाषाई कौशल्य से नहीं बल्कि शब्दसंख्या गिनकर तय किया जाता है जैसे किसी ईंट ढोने वाले से कहा जाये कि हजार ईंट ढोने के इतने पैसे। 

    अनेकता में एकताको बनाये रखने के लिये दो अच्छे साधन हैं - संगणक एवं संस्कृत। उनके उपयोग हेतु विस्तृत चर्चा हो। मान लो मुझे कन्नड लिपि पढ़नी नहीं आती परन्तु भाषा समझ में आती है। अब यदि संगणक पर कन्नड में लिखे आलेख का लिप्यन्तर करने की सुविधा होती तो मैं धडल्लेसे कन्नड साहित्यके सैकड़ों पन्ने पढ़ना पसंद करती। इसी प्रकार कोई कन्नड व्यक्ति भी देवनागरी में लिखे तुलसी-रामायण को कन्नड लिपि में पाकर उसका आनंद ले पाता। लेकिन क्या हम कभी रुककर दूसरे  भाषाइयों के आनंद की बात सोचेंगे? क्या हम माँग करेंगे कि मोटी तनखा लेने वाले और कुशाग्र वैज्ञानिक बुद्धि रखने वाले हमारे देश के संगणक-विशेषज्ञ हमें यह सुविधा मुहैया करवायें। सरकार को भी चाहिये कि जितनी हद तक यह सुविधा किसी-किसी ने विकसित की है उसकी जानकारी लोगों तक पहुँचाये।
    लेकिन सरकार तो यह भी नहीं जानती कि उसके कौन कौन अधिकारी हिन्दी व अन्य राजभाषाओं के प्रति समर्पण भाव से काम करनेका माद्दा और तकनीकी क्षमता रखते हैं। सरकार समझती है कि एक कुआँ खोद दिया है जिसका नाम है राजभाषा विभाग । वहाँ के अधिकारी उसी कुएँ में उछल-कूदकर जो भी राजभाषा(ओं) का काम करना चाहे कर लें (हमारी बला से) ।
     सरकार के कितने विभाग अपने अधिकारियों के हिन्दी-समर्पण  का लेखा-जोखा रखते हैं और उनकी क्षमता से लाभ उठानेकी सोच रख पाते हैं ?हाल में जनसूचना अधिकार के अंतर्गत गृह-विभागसे यह सवाल पूछा गया  कि आपके विभागके निदेशक स्तर से उँचे अधिकारियों में से कितनों को मौके-बेमौके की जरूरतभर हिन्दी  टाइपिंग आती है। उत्तर मिला कि ऐसी कोई जानकारी हम संकलित नहीं  करते। तो जो सरकार अपने अधिकारियों की क्षमताकी सूची भी नहीं  बना सकती वह उसका लाभ लोगों तक कैसे पहुँचा सकती है ?

    मेरे विचार से हिन्दी के सम्मुख आये मुख्य सवालों को इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है:
    वर्ग 1:आधुनिक उपकरणोंमें हिन्दी
    1.  हिन्दी लिपि को सर्वाधिक खतरा और  अगले 10 वर्षों में मृतप्राय होने का डर क्योंकि आज हमें ट्रान्सलिटरेशन की सुविधाका लालच देकर सिखाया जाता है कि राम शब्द  लिखने के लिये हमारे विचारों में भारतीय वर्णमाला का फिर फिर नहीं  लाना है बल्कि हमारे विचारों में रोमन वर्णमाला का  आर आना चाहिये, फिर ए आये, फिर एम आये। तो दिमागी सोच से तो हमारी वर्णमाला निकल ही जायेगी। आज जब मैं अपनी अल्पशिक्षित सहायक से मोबाइल नंबर पूछती हूँ तो वह नौ, सात, दो, चार इस प्रकार हिन्दी अंक ना तो बता पाती है औऱ न समझती है, वह नाइनसेवन, टू..... इस प्रकार कह सकती है।
    2.  प्रकाशन के लिये हमें ऐसी वर्णाकृतियाँ (फॉण्टसेट्स) आवश्यक हैं, जो दिखनेमें सुंदर हों, एक दूसरे से अलग-थलग हों और साथ ही इंटरनेट कम्पॅटिबल हों। सी-डॅक सहित ऐसी कोई भी व्यापारी संस्था जो 1991 में भारतीय मानक-संस्था द्वारा और 1996 में यूनिकोड द्वारा मान्य कोडिंग स्टैण्डर्ड को नहीं अपनाती हो, उसे प्रतिबंधित करना होगा। विदित हो कि यह मानक स्वयं भारत सरकार की चलाई संस्था सी-डॅक ने तैयार कर भारतीय मानक-संस्थासे मनवाया था पर स्वयं ही उसे छोडकर कमर्शियल होनेके चक्करमें नया अप्रमाणित कोडिंग लगाकर वर्णाकृतियाँ बनाती है जिस कारण दूसरी संस्थाएँ भी शह पाती हैं और प्रकाशन-संस्थाओं का काम वह गति नहीं   ले पाता जो आज के तेज युगमें भारतीय भाषाओंको चाहिये।
    3.  विकिपीडिया जो धीरे धीरे विश्वज्ञानकोष का रूप ले रहा है, उस पर कहाँ है हिन्दी?  कहाँ है संस्कृत और कहाँ हैं अन्य भारतीय भाषाएँ ?

    वर्ग2: जनमानस में हिन्दी
    4.  कैसे बने राष्ट्रभाषा – लोकभाषाएँ सहेलियाँ बनें या दुर्बल करें यह गंभीरता से सोचना होगा ।
    5.  अंग्रेजीकी तुलनामें तेजीसे घटता लोकविश्वास और लुप्त होते शब्द-भण्डार ।
    6.  एक समीकरण बन गया है कि अंग्रेजी है संपत्ति, वैभव, ग्लॅंमर, करियर, विकास और अभिमान जबकि हिन्दी या मातृभाषा है गरीबी, वंचित रहना, बेरोजगारी, अभाव और पिछडापन। इसे कैसे गलत सिद्ध करेंगे ?
    वर्ग 3: सरकार में हिन्दी
    7.  हिन्दी के प्रति सरकारी विजन (दृष्टिकोण) क्या है ? क्या किसी भी सरकार ने इस मुद्दे पर विजन-डॉक्यूमेंट बनाया है ?
    8.  सरकार में कौन-कौन विभाग हैं जिम्मेदार, उनमें क्या है समन्वय, वे कैसे तय करते हैं उद्देश्य और कैसे नापते हैं सफलताको ? उनमें से कितने विभाग अपने अधिकारियों के हिन्दी-समर्पण का लेखा-जोखा रखते हैं और उनकी क्षमता से लाभ उठाने की सोच रख पाते हैं ?
    9.  विभिन्न सरकारी समितियोंकी  सिफारिशों का आगे क्या होता हैउनका अनुपालन कौन और कैसे करवाता है?
    वर्ग :साहित्य जगतमें हिन्दी
    10.      ललित साहित्य के अलावा बाकी कहाँ है हिन्दी साहित्य- विज्ञान, भूगोल, वाणिज्य, कानून/विधि, बैंक और व्यापार का व्यवहार, डॉक्टर और इंजीनियरों की पढ़ाई का स्कोप क्या है  ?
    11.      ललित साहित्यमें भी वह सर्वस्पर्शी लेखन कहाँ है जो एक्सोडस जैसे नॉवेल या रिचर्ड बाख के लेखन में है।
    12.      भाषा बचाने से ही संस्कृति बचती है, क्या हमें अपनी संस्कृति चाहियेहमारी संस्कृति अभ्युदय को तो मानती है पर रॅट-रेस और भोग-विलास को नहीं। आर्थिक विषमता और पर्यावरण के ह्रास से बढ़ने वाले जीडीपी को हमारी संस्कृति विकास नहीं मानती,तो हमें विकास को फिर से परिभाषित करना होगा या फिर विकास एवं संस्कृति में से एक को चुनना होगा ।
    13.      दूसरी ओर क्या हमारी आज की भाषा हमारी संस्कृति को व्यक्त कर रही है ?
    14.      अनुवाद, पढ़ाकू-संस्कृति, सभाएँ को प्रोत्साहन देने की योजना हो।
    15.      हमारे बाल-साहित्य, किशोर-साहित्य और दृश्य-श्रव्य माध्यमोंमें, टीवी एवं रेडियो चॅनेलों पर  हिन्दी व अन्य भारतीय भाषा ओं को कैसे आगे लाया जाय ?
    16.      युवा पीढ़ी क्या कहती है भाषा के मुद्दे पर, कौन सुन रहा है युवा पीढ़ी को? कौन कर रहा है उनकी भाषा समृद्धि का प्रयास ?

                इन मुद्दों पर जब तक हम में से हर व्यक्ति ठोस कदम नहीं बढ़ाएगा, तब तक हिन्दी दिवस-पखवाड़े –माह केवल बेमन से पार लगाये जाने वाले उत्सव ही बने रहेंगे।