अनुवाद

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

कर्नाटका रक्षण वैदिके

आदरणीय श्री टी. ए. नारायण गौड़ा जी,

प्रधान, कर्नाटका रक्षण वैदिके
नमस्कार।

हमारे लिए यह प्रसन्नता का विषय है कि आप कन्नड़ भाषा को लेकर चिन्तित है और उसको बचाने के लिए प्रयत्नशील हैं। हम स्वयं भी भारतीय भाषाओं के प्रचार प्रसार के कार्य में लगे हैं। आजकल हमारा विशेष ध्यान सभी उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय से अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करने और कम से कम एक भारतीय भाषा का विकल्प उपलब्ध करवाने बारे है।

अभी तक देश के 24 उच्च न्यायालयों में से केवल 4 उच्च न्यायालयों (बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उतर प्रदेश) में ही अंग्रेजी के इलावा हिन्दी में कार्यवाही करने का विकल्प उपलब्ध है। हमारी मांग है कि अन्य उच्च न्यायालयों में भी भारतीय भाषाओं, जैसे गुजरात उच्च न्यायालय में गुजराती, कर्नाटक उच्च न्यायालय में कन्नड इत्यादि में विकल्प उपलब्ध हो।

लेकिन हमें ऐसा लग रहा है आपका विरोध हिन्दी से है न कि अंग्रेजी। पिछले 70 सालों से कर्नाटक उच्च न्यायालय में अंग्रेजी के अलावा आप कन्नड भाषा में कार्य नहीं कर सकते। लेकिन आपको अंग्रेजी का थोपना नजर नहीं आता। कर्नाटक उच्च न्यायालय में कन्नड़ में कार्यवाही के लिए क्या प्रयत्न किए।

साहब यह केवल राजनीति है, भाषा प्रेम नहीं। आपको अपनी भाषा दुश्मन नजर आती है और विदेशी भाषा अपनी। कहीं पर यदि अंग्रेजी और कन्नड़ के साथ हिन्दी भी (ध्यान दीजिए केवल हिन्दी नहीं) लिख दी जाती है तो कन्नड़ खतरे में, लेकिन यदि केवल अंग्रेजी का प्रयोग हो रहा हो तो कन्नड़ दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की करती है।
जितना खतरा भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी से है, किसी भारतीय भाषा से नहीं। सभी भारतीय भाषाएं अपनी हैं और सभी में देश की संस्कृति और इतिहास भरा पड़ा है। यदि कोई भी भाषा खतरे में पडती है तो भारतीय संस्कृति का उतना हिस्सा खतरे में आ जाता है।

हमारा उद्देश्य:
1. भारतीय न्यायालयों में भारतीय भाषाओं में कार्यवाही करने की सुविधा उपलब्ध हो।

2. शिक्षा का माध्यम दसवीं कक्षा तक अनिवार्यता (सरकारी और गैरसरकारी स्कूलों में) मातृभाषा में हो।
3. सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म हो।

हमारा किसी भारतीय भाषा से द्वेष या प्रतियोगिता नहीं है, कारण सभी भाषाएँ हमारी हैं। कोई माँ कोई मौसी,  हमें तो सभी बहनें प्यारी हैं।

भवदीय
प्रेम चन्द अग्रवाल

  ई मेल पता -  94.prem.rajat@gmail.com

(प्रेम चन्द अग्रवाल यूको बैंक से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवा निवृत्त हैं, जहाँ ये राजभाषा अधिकारी के रूप में हिंदी कार्यान्वयन से जुड़े रहे। ये अम्बाला शहर व अम्बाला छावनी क्षेत्र के सभा महाविद्यालयों और 30-35 उच्च विद्यालयों में हिन्दी सम्बन्धी कार्य करते रहे हैं। इन्होंने हर विषय के प्रोफेसर को हिन्दी के पक्ष में खड़ा करने में सफलता पाई है। ये जिस भी सामाजिक धार्मिक संस्था के साथ जुड़ते हैं वहां सुनिश्चित करते हैं कि सारी कार्यवाही हिन्दी में ही हो।  उच्च न्यायालयों व उच्चतम न्यायालय में भारतीय भाषाओं के प्रयोग के लिए प्रारंभ आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। भाषाई सौहार्द और समन्वय के लिए  उनके द्वारा  कर्नाटका रक्षण वैदिके को लिखा गया पत्र । )

शनिवार, 22 जुलाई 2017

तो क्या हिंदी वाले आईएएस बनने का सपना अब छोड़ ही दें?

                                                                        निखिलेश सिंह की रिपोर्ट। 


सफलता के हज़ार साथी होते हैं, किन्तु असफलता एकान्त में विलाप करती है। यूँ तो सफलता या असफलता का कोई निश्चित गणितीय सूत्र नहीं होता, किन्तु जब पता चले कि आपकी असफलता कहीं न कहीं पूर्व नियोजित है, तो वह स्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक है। देश की सबसे बड़ी मानी जाने वाली भारतीय प्रशासनिक सेवा (भाप्रसे) अथवा आईएएस की परीक्षा को आयोजित करने वाली संस्था 'संघ लोक सेवा आयोग' (संलोसेआ) आज घोर अपारदर्शिता और विभेदपूर्ण व्यवहार में लिप्त है।

हिंदी माध्यम के सिविल सेवा अभ्यर्थियों का विशेषतः 2011 के बाद से गिरता हुआ चयन अनुपात सारी कहानी बयान करता है। सम्पूर्ण रिक्तियों का लगभग 3 या 4% ही केवल हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के हिस्से में आ पा रहा है। हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के चयन की गिरती दर का कारण क्या उनकी अयोग्यता/अक्षमता को ठहराया जा सकता है? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है, इसके पीछे कोई तार्किक आधार नहीं है।
यह सर्वविदित है इस परीक्षा के लिए तैयारी करने वालों में सबसे अधिक संख्या हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों की ही है, और उनके परिश्रम तथा क्षमताओं को ख़ारिज करने का कोई तार्किक आधार किसी के पास नहीं है। असली समस्या संघ लोक सेवा आयोग के भेदभावपूर्ण रवैये और अपारदर्शिता में निहित है, उस मानसिकता में निहित है जो चाहती है कि ग्रामीण और क़स्बाई पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों के स्थान पर शहरी पृष्ठभूमि के, अंग्रेज़ी माध्यम के इंजिनियर और डॉक्टर अधिक से अधिक चयनित होकर आएँ।
भेदभाव और अपारदर्शिता का यह सिलसिला प्रारम्भिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार, तीनों ही स्तरों तक जारी रहता है। प्रारम्भिक परीक्षा के दोनों प्रश्न पत्रों में व्यावहारिक हिन्दी अनुवाद पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। फलस्वरूप, 'कन्वेंशन' की हिन्दी 'अभिसमय' दे दी जाती है और 'प्रोजेक्टेड' की हिन्दी 'प्रकल्पित'। ऐसे ही हिन्दी अनुवाद के कई उदाहरण हैं। इतने जटिल प्रश्न पत्रों में, जहाँ अभ्यर्थी की एक सेकण्ड भी क़ीमती होती है, वहाँ कई मिनट  इस भाषायी अनुवाद के चलते ख़राब हो जाते हैं; साथ ही, कई बार ऐसे अनुवाद की साम्यता किसी अन्य शब्द से बिठाकर, अभ्यर्थी ग़लत उत्तर का चयन कर लेता है और हज़ारों की संख्या में हर साल ऐसे अभ्यर्थी होते हैं जो एक या दो अंकों से ही प्रारम्भिक परीक्षा में ही उनका पत्ता कट जाता है।
कुल मिला कर ये कहा जा सकता है कि गलत अनुवाद के कारण छात्रों से गलत प्रश्न के सही उत्तर मांगे जाते हैं जो कि असंभव है। प्रारम्भिक परीक्षा की उत्तर कुंजी, अभ्यर्थियों के प्राप्तांक उन्हें इस परीक्षा के लगभग एक साल बाद बताए जाते हैं, जिसका कोई औचित्य नहीं। ओएमआर शीट की कार्बन कॉपी भी अभ्यर्थियों को दिए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है। 
हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों की मुख्य परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं को भी हिन्दी में अदक्ष मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा जाँचा जाता है। ऐसे में पूरी संभावना यह रहती है कि अभ्यर्थी का लिखा हुआ मूल्यांकनकर्ता तक सही से प्रेषित ही न हो। इस वजह से मुख्य परीक्षा में ही हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों का स्कोर, अंग्रेज़ी माध्यम के अभ्यर्थियों की तुलना में काफ़ी कम रह जाता है। 
अपारदर्शिता का आलम ये है कि मुख्य परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाएँ अभ्यर्थियों को दिखाए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि कुछ राज्य लोक सेवा आयोग तक आरटीआई आवेदन के माध्यम से ऐसी सुविधा प्रदान करते हैं। साक्षात्कार में जानबूझकर कई बार हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों को असहज करने वाले प्रश्न अंग्रेज़ी में पूछे जाते हैं, साथ ही, साक्षात्कार के लिए लिये निर्धारित 275 अंक परीक्षा में आत्मनिष्ठ प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं, जो किसी भी तरह से उचित नहीं है।
यह लड़ाई हिंदी बनाम अंग्रेज़ी की लड़ाई नहीं है। अभ्यर्थी किसी भाषायी द्वेष से ग्रस्त नहीं हैं। वैसे भी, अपारदर्शिता से तो अंग्रेज़ी और अन्य भाषायी माध्यम के अभ्यर्थी भी समान रूप से त्रस्त हैं ही। लड़ाई है, भाषाओं के साथ समान व्यवहार करने की। वह हिन्दी जो पूरे देश में सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है, वह हिंदी जो आज़ादी के संघर्ष के दौरान जनसंचार की भाषा बनी थी, वह हिंदी जो लोचशील है, जो 'ट्रेन' और 'शायद' जैसे अन्य भाषायी मूल के शब्दों को भी सहजता के साथ अपने में समाहित कर लेती है, वही हिंदी और हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थी आज इतने उपेक्षित क्यों हैं? 
"India got freedom in 1947", जैसा वाक्य, "भारत ने 1947 में आज़ादी पाई", से कैसे श्रेष्ठ साबित होता है? ये समस्या केवल उस मानसिकता की है जो हिंदी को तुलनात्मक रूप से अधिक वैज्ञानिक भाषा होने के बावजूद कम करके आँकती है। समस्या अंग्रेज़ी से नहीं, बल्कि अंग्रेज़ियत की उस मानसिकता से है जो आज भी देश के शीर्ष संस्थानों में छायी हुई है, जो केवल भाषा विशेष में दक्ष होने के आधार पर किसी व्यक्ति की योग्यता के सम्बंध में पूर्वाग्रह पाल लेती है।
ग्रामीण और क़स्बाई पृष्ठभूमि के लाखों अभ्यर्थी सीमित संसाधनों में, कई बार तो अमानवीय दशाओं में गुज़ारा करके इस परीक्षा के लिए अपना अमूल्य समय और ऊर्जा लगाते हैं, इसके बावजूद उनके लिए परिणाम बेहद निराशाजनक हैं। 
या तो देश के संचालकों/नीति निर्माताओं द्वारा स्पष्ट कह दिया जाए कि हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के लिए इस परीक्षा में कोई जगह नहीं है ताकि वे भ्रम में ना रहें और  समय, संसाधन तथा ऊर्जा को कहीं और लगा सकें या इस संस्था में व्याप्त घोर अपारदर्शिता और भाषायी भेदभाव को यथाशीघ्र समाप्त किया जाए।
यूपीएससी में हिंदी वालों के हक के लिए लड़ रहे निखिलेश सिंह का संपर्क : 9582182362

बुधवार, 12 जुलाई 2017

वस्तु एवं सेवा कर- आम व्यापारी पर अंग्रेजी और इंस्पेक्टर राज की काली छाया

आज देश में आर्थिक एकीकरण के लिए वस्तु एवं सेवा कर ("वसेक") लागू कर दिया गया है पर इस कर की पूरी व्यवस्था केवल अंग्रेजी में शुरू की गई है ताकि सीए की सेवा लिए बिना कोई भी व्यापारी इस कानून का पालन न कर सके और वह पूरी तरह सीए पर निर्भर रहे और राजभाषा एवं भारतीय भाषाओं एवं आम व्यापारी की सुविधा की पूर्णतः अनदेखी की गई है.
मुख्य बिंदु: 
1.वस्तु एवं सेवा कर से संबंधित पोर्टल तथा वेबसाइटें, www.gst.gov.in;  https://gstawareness.cbec.gov.in/ एवं http://www.cbec.gov.in/htdocs-cbec/gst/index केवल अंग्रेजी में बनाई गई हैं.
2. वसेक के अधिनियम केवल अंग्रेजी में ही अधिसूचित किए गए हैं.
3. वेबसाइट प्रयोग के सभी मैनुअल और प्ररूप(फॉर्म) अंग्रेजी में तैयार करके जारी किए गए हैं और वेबसाइट पर अपलोड किए गए हैं.
4.वस्तु एवं सेवा कर से संबंधित सभी प्रकार के ऑनलाइन रिटर्न केवल अंग्रेजी में तैयार किए गए हैं और उन्हें अंग्रेजी में भरना अनिवार्य है.
5. वसेक में पंजीयन की ऑनलाइन सुविधा केवल अंग्रेजी में प्रदान की गई है और उसमें नाम पता इत्यादि केवल अंग्रेजी में भरना ही अनिवार्य है कोई भी व्यक्ति उसमें हिंदी में विवरण नहीं भर सकता है, जबकि सभी फॉर्म द्विभाषी(डिगलॉट) रूप में बनाना अनिवार्य है.
6. वसेक से संबंधित पंजीयन के प्रमाण पत्र केवल अंग्रेजी में जारी किए जा रहे हैं, उनमें जानबूझकर राजभाषा की अनदेखी की गई है. 
7. वसेक से संबंधित एसएमएस, ईमेल केवल अंग्रेजी में ही भेजे जा रहे हैं जिन्हें आम व्यापारी न तो पढ़ सकते हैं न समझ सकते हैं.
8. वसेक परिषद की बैठकों में सारी कार्यवाही केवल अंग्रेजी में की गई और इन बैठकों में प्रयोग किए गए बैनर एवं मेज नामपट्ट केवल अंग्रेजी में तैयार किए गए. 
9. केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड की हिंदी वेबसाइट पर वसेक से संबंधित कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है, अंग्रेजी वेबसाइट पर सभी प्रकार की जानकारी अंग्रेजी में डाली गई है, एक दो दस्तावेज हिंदी में हैं पर उनका नाम आदि केवल अंग्रेजी में लिखा होने से उन लोगों के किसी काम के नहीं हैं जो अंग्रेजी पढ़ना भी नहीं जानते हैं.
10. केन्द्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड अब तक हिंदी में इस कर का नाम भी तय नहीं कर पाया है, पूरा देश वस्तु एवं सेवा कर लिख रहा है लेकिन बोर्ड कभी अपने विज्ञापनों में माल एवं सेवा कर लिखता है तो कभी वस्तु एवं सेवा कर. हाँ अंग्रेजी में एक ही नाम है गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) 

वस्तु एवं सेवा कर का हिंदी में संक्षेप वसेक होता है पर चूँकि हिंदी हेय, त्याज्य है इसलिए बोर्ड विज्ञापनों में रोमन में ही GST अथवा देवनागरी में जीएसटी लिख रहा है. 

वसेक छोटे बड़े सभी व्यापारियों, सभी विनिर्माताओं अर्थात लगभग सभी नागरिकों पर लागू है फिर भी इस व्यवस्था में जानबूझकर भारतीय भाषाओं की अनदेखी की गई है और आम जनता एवं आम व्यापारी पर अंग्रेजी थोपी गई हैं इससे एक बड़ी आशंका बनी हुई है कि कर अधिकारी अंग्रेजी में नोटिस जारी कर व्यापारियों को डर दिखा सकते हैं. अंग्रेजी भाषा आम जनता एवं आम व्यापारी को डराने धमकाने का पुराना हथियार है.

चूंकि पूरी व्यवस्था अंग्रेजी में है इसलिए आम व्यापारियों और आम जनता में वसेक के प्रति बहुत ही अधिक डर का माहौल है. वसेक की पूरी व्यवस्था में राजभाषा अधिनियम, नियम, राजभाषा के संबंध में राष्ट्रपति जी के आदेश एवं राजभाषा विभाग द्वारा समय-समय पर जारी किए गए निर्देशों का खुला उल्लंघन किया गया है.

प्रमं को चाहिए कि वे केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड के उच्चाधिकारियों की बैठक तुरंत आयोजित करें और वसेक संबंधित सभी प्रकार के आवेदन, प्रमाण-पत्र, ईमेल,फॉर्म, रिटर्न, वेबसाइट, ऑनलाइन सेवाएं एवं प्रेस विज्ञप्तियां इत्यादि राजभाषा अधिनियम के अनुसार बनवाने के निर्देश जारी करें. साथ ही ये सुविधाएँ सभी भारतीय भाषाओं में भी शुरू करवाई जाएं.