अनुवाद

शनिवार, 9 जून 2012

सआदत हसन मंटो


प्रेमपाल शर्मा 

जनसत्ता 30 मई, 2012: 

मशहूर लेखक सआदत हसन मंटो का यह जन्मशती वर्ष है। पैदाइश ग्यारह मई, 1912 को लुधियाना के पास पड़पौदी गांव में। हाल ही में एक पत्रिका में पढ़ा कि पूरे देश में सिर्फ जलंधर के पास एक कमरे में उनके नाम से एक पुस्तकालय है। वहां नाममात्र को भी लोग नहीं आते, न कोई आसपास उन्हें जानता है। तीस-पैंतीस वर्ष की उम्र तक की नई पीढ़ी के किसी से भी पूछ लीजिए। मंटो ‘कौन मेल या फीमेल? हमने तो कभी नहीं सुना!’ प्रेमचंद का कभी-कभी बता देते हैं- ‘हां, हिंदी की किताब में उनका नाम था।’ और रवींद्रनाथ ठाकुर! इस नाम को ज्यादातर भारतीय जानते हैं, क्योंकि उनकी डेढ़ सौवीं वर्षगांठ धूमधाम से मनाई गई। 

विभाजन की त्रासदी का बेजोड़ लेखक मंटो अंतिम दिनों में बदहाली में रहा। लाहौर में, जहां 1955 में मंटो ने अंतिम सांस ली, अंत तक उनके साहित्य को लेकर फजीहत रही। उनका एक भी नाटक रेडियो पाकिस्तान ने प्रसारित नहीं किया। प्रेमचंद की टक्कर का इतना बड़ा कथाकार-फनकार, और इतना अज्ञात! नई पीढ़ी चौसर, मिल्टन, पाउले कोहेलो से लेकर चेतन भगत तक को जानती है। बीबीसी के प्रसिद्ध पत्रकार मार्क टुली के शब्दों में, ‘दिल्ली के इन लोगों से तो बात करने में भी डरता हूं। ये तो शेक्सपियर और दूसरे अंग्रेजी लेखकों को इंग्लैंड वालों से भी ज्यादा जानते हैं।’
मेरा मन लौट रहा है मंटो और प्रेमचंद के संघर्षों की तरफ। इतनी कम उम्र में प्रेमचंद का इतना विपुल और उत्कृष्ट लेखन। दुनिया की किसी भी भाषा की टक्कर के आठ-दस उपन्यास, तीन सौ कहानियां। कितना मुश्किल होता होगा हाथ से लगातार लिखना, पन्ने-दर-पन्ने! ‘कलम का सिपाही’ में अमृत राय लिखते हैं कि सुबह सात बजे लिखने बैठ जाते थे नियमित रूप से और दिन भर यह चलता रहता। एक और चित्र याद आ रहा है। वे पेचिश से महीनों पीड़ित रहे। कौन-सी बिजली थी उन दिनों? पसीना चुहचुहाते! न हमारे आज के एसी, कूलर, न हवाई जहाज। फुर्र इधर फुर्र उधर। रवींद्रनाथ ठाकुर के बुलावे के बावजूद शांतिनिकेतन तक नहीं जा पाए। यह सब लिखने का कारण सिर्फ आज के चंद लेखकों को मिली सुविधाओं को तराजू में रख कर तोलना है। 

लेकिन इतने संघर्ष के बाद भी प्रेमचंद को क्या मिला? उनकी जन्मभूमि लमही अब भी वीरान है, मंटो के स्मृति-चिह्नों की तरह। दिल्ली में एक सड़क तक नहीं। कई भूतपूर्व राजा-महाराजाओं, महारानियों सहित आज के नए ‘महाराजा’ सांसदों के नाम विश्वविद्यालय, स्मारक, पार्क, अस्पताल, थिएटर मिल जाएंगे, लेकिन प्रेमचंद का कोई नामलेवा नहीं। हिंदी चाहिए, उसकी बोलियां मैथिली, भोजपुरी भी, लेकिन सिर्फ राजनीति के लिए। 

कम से कम बंगाली समाज इतना कृतघ्न नहीं है। दसियों विश्वविद्यालय हैं रवींद्रनाथ ठाकुर के नाम पर। शांतिनिकेतन, रवींद्र भारती, रवींद्र थिएटर, रवींद्र सरणी और देश के सभी शहरों, नगरों में सड़क, भवनों के नाम। कोलकाता रेलवे के किसी भी कार्यालय में जाएं, सीढ़ियों पर कवींद्र रवींद्र की भव्य प्रतिमाएं, उनकी कलाकृतियां आपका स्वागत करती मिलेंगी। कोलकाता से बोलपुर होकर गुजरने वाली हर रेलगाड़ी अंदर से रवींद्रनाथ और उनकी कलाकारी से सुसज्जित। आत्मा में भाषा और संस्कृति ऐसे ही प्रवेश नहीं पाती। उसके लिए व्यक्ति, समाज, व्यवस्था सभी को आगे बढ़ कर कोशिश करनी पड़ती है। बंगाल में माकपा हो या ममता बनर्जी, रवींद्र की मूर्तियां वैसे ही मुस्कराती रहती हैं। यहां तो प्रेमचंद को पंद्रह फीसद सवर्णों का लेखक बताया जाता है, पंचानबे फीसद किसान-मजदूरों का नहीं। यही हाल दूसरे ‘समझदार’ अज्ञेय और त्रिलोचन के साथ करते हैं। नेताओं के घरों में जन्मदिन मनाने, उनकी जीवनी लिखने पर कुछ राजनीति तो खून में भी आएगी ही। 

हिंदी के हर लेखक के साथ हिंदी समाज ने यही किया है। भुवनेश्वर हों, रांघेय राघव या भारतेंदु। हम नादानी में आंबेडकर को पैगंबर और अंग्रेजी को देवी बनाने पर उतारू हैं। वहां दो-तीन सदियों तक अंग्रेजों द्वारा सताए जाने का कोई गिला-शिकवा नहीं। अगर मध्यकाल राजाओं की आपसी लड़ाइयों के चलते अंधेरे में डूबा रहा तो मेरा वक्त नए राजाओं और उनके वैसे ही जातिगत गिरोहों के अहंकार, विद्वेष और संग्राम में। भूमंडलीकरण ने अमीर-गरीब में बांटा तो फांक-फांक, टुकड़े-टुकडे में जातिगत टकरावों ने। ऐसे में मंटो और प्रेमचंद के स्मारक बनाने की तो दूर, इनके धर्म और जाति की शिनाख्त करके कल हुक्मरान किताबों से भी निकाल दें तो कोई आश्चर्य नहीं!

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