अनुवाद

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

भारत सरकार ने एक नई खोज की है: हिन्दी कठिन है और अंग्रेजी सरल

हिन्दी के सरलीकरण का कुचक्र: अनिल त्रिवेदी, गांधीवादी चिंतक

भारत सरकार ने एक नई खोज की है। हिन्दी कठिन है और अंग्रेजी सरल।
अत: हिन्दी को सरल बनाने के लिए अंग्रेजी शब्दों के उपयोग को राजकाज की भाषा के रूप में मान्यता देते हुए बाकायदा गृह मंत्रालय ने हाल ही में परिपत्र भी जारी कर दिया है।


ऎसा करके शायद भारत दुनिया का पहला देश बन गया है जो स्वयं अपनी राजभाषा को कठिन कहकर अंग्रेजी के प्रचुर प्रयोग के माध्यम से हिन्दी के सरलीकरण की बात कर रहा है। देश के राजकाज की भाषा ही नहीं देश के साथ भी सरकारों की ऎसी ही विचित्र सोच एवं व्यवहार है। उदारवाद एवं खुली आर्थिक नीतियों के नाम पर भूमण्डलीकरण की चकाचौंध से ग्रस्त शासक वर्ग भारत के निर्माण को कठिन तथा इंडिया के डेवलपमेंट को सरल मान रहे हैं। आज के काल की हमारी सरकारें, बड़े-छोटे घरानों के प्रचार-प्रसार माध्यम, अखबार और शिक्षण संस्थाओं को देश बच्चों, नौजवानों, नागरिकों एवं पाठकों के साथ देश की खालिस जबान में बात करना कठिन और भारतीय भाष्ाा तथा अंग्रेजी भाषा के समिश्रण से बनी संकर भाषा में संवाद करना सरल सहज लगता है।

भारत के देश एवं प्रदेशों की सरकारों को आम जनता की दो समय की रोजी-रोटी की समस्या को हल करना बड़ा कठिन कार्य लगता है, पर राजधानियों में बैठे-बैठे इंडिया के डेवलपमेंट को विदेशी सहायता के अंधे भरोसे करने के उपक्रम बिना रूके करना सरल लगता है। साढ़े सात लाख लोग गांवों का देश भारत आज के शासकों को कठिन समस्या लगता है, पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चकाचौंध खड़ी करने के लिए भारत की भाषा, भावना एवं भोजन की कुर्बानी देना बड़ा सरल एवं सहज काम लगता है। यह हमारे देश की जनता का अभागापन है कि हमारे अपने ही शासकों को देश की राज भाष्ाा सहज एवं सरल नहीं लगती। हमारी सरकारें देश की पूंजी, देश के ज्ञान और देश के इनसान से ज्यादा सम्मान विदेशी पूंजी, विदेशी ज्ञान और विदेशी इनसान को देना ही देश को आगे ले जाने का सरल उपाय मानती है। सवा अरब के भारत की लोकशक्ति, इंडिया के शासकों को देश पर बोझ एवं देश की सबसे बड़ी समस्या लगती है। हमारे देसी शासकों को भारत के नवनिर्माण का रास्ता तय करने के लिए भारत के गांवों मे जाकर लोक संवाद कर लोक चेतना लाने के बजाय इंडिया के डेवलपमेंट के लिए रोज-रोज विदेशियों को भारत के विकास हेतु खुला निमंत्रण देना सरल एवं सहज काम लगता है। आजादी के चौसठ वष्ाü बाद हमें हमारे शासक बता रहे हैं कि हम भारत का राजकाज कैसे करें? हमें तो हमारे देश की भाषा बड़ी कठिन लगती है। भारत जब इंडिया बन रहा है तो हम पिछड़े क्यों रहें? हमारे शिक्षण संस्थान कह रहे हैं कि हम भारत की भाषा में शिक्षा दे ही नहीं सकते।


देश का खाता-पीता-कमाता शासक वर्ग इस असमय अपनी तथा कथित आधुनिक मिश्रित भाषा पर आत्ममुग्ध है और मानसिक गुलामी को बड़े गर्व के साथ वैश्विक उदारवाद का नाम दे रहे हैं। सवाल देसी-विदेशी आग्रह-दुराग्रह का नहीं है, बल्कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हम कैसा देश बनाना चाहते हैं? जिस भारत को हम बातचीत में विश्व गुरू का दर्जा देना चाहते हैं, संयुक्त राष्ट्र में हम हिन्दी को प्रतिष्ठित मान्यता दिलवाना चाहते हैं और भारत के राजकाज में उसे ही कठिन कहकर खारिज कर रहे हैं। संविधान का अनुच्छेद 351 भारत की राजभाषा हिन्दी के मूल स्वरूप को कायम रखते हुए राजकाज संचालन करने की संवैधानिक बाध्यता को अनदेखा करने की इजाजत नहीं देता है। क्या सरकार संविधान की बाध्यता को अनदेखा कर देश के स्वाभिमान, स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता की अपने ही असंवैधानिक निर्णय से स्पष्ट एवं खुली अवमानना कर इस आत्महन्ता नई खोज से भारत की भाषा को अपने ही हाथों से खत्म करने का काम नहीं कर रही है?

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