अनुवाद

आचार्य श्री विद्यासागर जी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आचार्य श्री विद्यासागर जी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 14 मई 2020

क्या बंडा के जैन समाज ने मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज के बंडा आगमन पर तालाबंदी व शारीरिक दूरी के नियमों का उल्लंघन किया था?

तथ्य जाँच- 
सामाजिक माध्यमों, समाचार पत्रों में जो छपा है और टीवी पर जो दिखाया जा रहा है क्या वो सच है?

परम पूज्य मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज भाग्योदय तीर्थ चिकित्सालय सागर (मप्र) के परिसर में 2 महीने से विराजमान थे। 


परम पूज्य मुनि श्री 108 प्रमाणसागर जी महाराज लगभग 2 माह से अपने बहुचर्चित और लोकप्रिय कार्यक्रम शंका समाधान में पूरे देश के जैन समाज के लोगों को शारीरिक दूरी (सोशल डिसटेंस) अपनाने व कोरोना महामारी की भयावता के प्रति सावधान कर रहे थे।  पिछले 2 महीनों से शासनादेश से पूरे देश के जिनालय बन्द हैं, फिर भी कुछ लोग चोरी छुपे मन्दिर जाने का प्रयास कर रहे थे, तब भी मुनिश्री ने समाज को सरकार के नियमों के पालन की नसीहत दी थी।

7 मई 2020 को भाग्योदय तीर्थ चिकित्सालय में कोरोना पीड़ित मिला जिसे भोपाल संदर्भित किया गया, वहाँ पहुँचकर उसकी मृत्यु हो गई। अस्पताल का एक प्रयोगशाला कर्मी भी चपेट में आ गया और 10-12 चिकित्सकों को भी स्व-एकांतवास (क्वारेंटाइन) में जाना पड़ा। महाराजश्री ने इस पर विचार किया कि यहाँ रुकना संकट का कारण बन सकता है, इसलिए उन्होंने वहाँ से विहार करने का निश्चय किया। समाज के लोगों ने मुनिश्री के पद-विहार के लिए प्रशासन से अनुमति ली, इस अनुमति में उनके साथ कुल 20 लोगों को चलने की अनुमति दी गई और इस प्रकार 9 मई 2020 को प्रातः 6 बजे सागर से विहार आरंभ हुआ। जैन मुनि किसी भी प्रकार के वाहन का प्रयोग नहीं करते हैं और सदैव पैदल चलते हैं। कुछ चैनलों पर एंकर बोल रहे थे कि मुनिश्री धार्मिक पदयात्रा निकाल रहे थे, धार्मिक कार्यक्रम आयोजित कर रहे थे जबकि जैन साधु सदैव ही पैदल चलते हैं, उन्होंने अलग से कोई आयोजन नहीं किया था।

जैन मुनि कठोर तपश्चर्या का पालन करते हैं, 24 घंटे में एक बार ही आहार-जल ग्रहण करते हैं। अस्वस्थ होने पर भी आहार के समय ही शुद्ध आयुर्वेदिक औषधि ही ग्रहण करते हैं, वह भी 24 घंटे में एक बार। वे किसी भी अस्पताल में कभी उपचार नहीं करवाते हैं। चूँकि भाग्योदय तीर्थ चिकित्सालय में कोरोना संक्रमण का खतरा बढ़ने की संभावना थी इसीलिए मुनिश्री ने विहार करना ही उचित समझा।

विहार आरंभ करने से पूर्व मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज द्वारा सभी श्रावकों को निर्देश दिए गए थे और कहा था कि विहार के रास्ते में पड़ने वाले किसी भी गाँव-नगर में उनके आगमन या विहार के दौरान कोई भी श्रावक-श्राविका रस्तों पर इकट्ठा नहीं होंगे एवं अपने घरों के दरवाजे, छतों आदि से ही दर्शन करेंगे। विहार करते हुए मुनिश्री अंकुर कॉलोनी (मकरोनिया), दीनदयाल नगर, कर्रापुर, छापरी आदि नगरों में रुके भी पर सभी स्थानों पर जैन समाज ने नियमों का पालन किया।

11 मई 2020 को सुबह 7 बजे मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज बंडा के बरा चौराहे पर पहुँचे। बरा चौराहा बंडा का व्यस्ततम चौराहा है। तालाबंदी में छूट के बाद यहां पर सुबह 7:00 बजे से दोपहर 3:00 बजे तक पूरा बाजार खुला रहता है, चौराहे पर देशी एवं विदेशी शराब की 2 दुकानें हैं जो वीडियो में देखी जा सकती है जहां पर शराब लेने वालों की भीड़ थी, उसी के बाजू में सब्जी की दुकानें लगती हैं। इन दुकानों पर सब्जी खरीदने एवं बेचने वालों की भीड़ थी। बंडा से होकर ट्रकों, टैक्सियों में भरकर प्रतिदिन हजारों प्रवासी मजदूर गुजरते हैं, चौराहे पर समाजसेवियों द्वारा पूड़ी-सब्जी के पैकेट बाहर से आए मजदूरों को वितरित किए जा रहे थे, उनकी भी भीड़ थी।

जब मुनि श्री बंडा के इस चौराहे पर पहुँचे तो यह सारी भीड़ इकत्र होकर मुनि श्री को देखने उमड़ पड़ी, सामाजिक माध्यमों पर प्रसारित वीडियो इसी समय बनाया गया है, जिसे देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि बंडा जैन समाज ने मुनिश्री की भव्य अगवानी की हो और सारे नियमों को तोड़ा गया हो । 

जबकि सच्चाई यह है कि जैन समाज के लोगों ने अपनी छतों पर एवं घरों पर खड़े होकर ताली एवं थाली बजाकर मुनिश्री का स्वागत किया था।  वीडियो में अधिकांश जैनेत्तर बंधु हैं जो महाराज श्री के आगमन की बात सुनकर एकत्र हो गए और इस तरह चौराहे पर भीड़ लग गई।

इस वीडियों में आप देख सकते हैं कि चौराहे पर मुनिश्री केवल कुछ सेकंड ही रुके, बंडा में पहले से विद्यमान अन्य जैन साधुओं ने उनका अभिनंदन किया और अगवानी करने आए कुछ व्यवस्थापकों के साथ मुनिश्री जैन मंदिर की ओर चले गए।  इसमें जैन समाज की एवं महाराज श्री की कोई गलती नहीं है। समाज के लोगों को पहले से समझा दिया गया था और सभी ने उसका अक्षरशः पालन भी किया।

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

इण्डिया हटाओ भारत लौटाओ : जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी


20 दिसंबर 2015.                                                                                                     
रहली (ज़िला-सागर मध्यप्रदेश) में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतिम दिवस पर गजरथ यात्रा के बाद चारों दिशाओं से भक्तिवश पधारे लगभग एक लाख जैन-अजैन श्रद्धालुओं को उदबोधन देते हुए योगीश्वर कन्नडभाषी संत दिगंबर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने धर्म-देशना की अपेक्षा राष्ट्र और समाज में आए भटकाव  का स्मरण  कराते  हुए कहा कि आज जवान पीढ़ी का  ख़ून सोया हुआ है। कविता ऐसी लिखो कि रक्त में संचार आ जाय। उसका इरादा 'इण्डिया' नहीं 'भारत' के लिये बदल जाय। वह पहले  भारत को याद रखें। भारत  याद   रहेगा, तो धर्म-परम्परा याद रहेगी। पूर्वजों ने भारत के भविष्य के लिये क्या सोचा होगा?

उनकी भावना भावी पीढ़ी को लाभान्वित करने  की  रही थी। वे भारत का गौरव,   धरोहर और परम्परा को अक्षुण्ण चाहते थे। धर्म की परम्परा  बहुत बड़ी  मानी जाती है। इसे  बच्चों  को  समझाना है। आज  ज़िंदगी जा रही है। साधना करो। साधना  अभिशाप को भगवान बना  देती है। जो  हमारी धरोहर है। जिसे हम गिरने  नहीं देंगे।

महाराणा  प्रताप ने अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। उनके और उन जैसों के स्वाभिमान के बल पर हम आज जीवित हैं। भारत  को स्वतन्त्र  हुए सत्तर वर्ष  हो  गए हैं। स्वतन्त्र  का अर्थ होता है-'स्व  और तन्त्र'।  तन्त्र आत्मा का होना  चाहिए। आज हम, हमारा राष्ट्र एक-एक पाई  के लिए परतंत्र हो चुका है। हम हाथ किसी के आगे नहीं पसारें।   महाराणा प्रताप को देखो, उन जैसा स्वाभिमान  चाहिए। उनसे है भारत की गौरवगाथा। आज हमारे भारत की पूछ  नहीं हो  रही है ?  मैं अपना ख़ज़ाना  आप लोगों  के सामने रख  रहा हूं। आप  लोगों में मुस्कान देख रहा हूँ। मैं भी  मुस्करा रहा हूं। हमें बता दो, भारत का नाम 'इण्डिया' किसने रखा? भारत का नाम 'इण्डिया' क्यों रखा गया? भारत 'इण्डियाक्यों बन गया?  क्या भारत का अनुवाद  'इण्डिया' है? इण्डियन का अर्थ क्या है? है कोई व्यक्ति जो इस बारे में बता सके?  हम भारतीय हैं, ऐसा हम स्वाभिमान के साथ कहते नहीं हैं। अपितु गौरव के साथ कहते  हैं, 'व्ही आर इण्डियन'।  कहना चाहिए- 'व्ही आर भारतीय'।  भारत का कोई अनुवाद नहीं होता। प्राचीन समय में 'इण्डियानहीं कहा जाता था।  भारत को भारत के रूप में ही स्वीकार करना चाहिए। युग के आदि में ऋषभनाथ के ज्येष्ठ पुत्र 'भरत'  के नाम पर भारत नाम पड़ा है। उन्होंने भारत की भूमि को संरक्षित किया है। यह ही आर्यावर्त 'भारत' माना गया है। जिसे 'इण्डिया' कहा जा रहा है। आप हैरान हो जावेंगे, पाठ्य-पुस्तकों के कोर्स में 'इण्डियन' का जो अर्थ   लिखा गया है, वह क्यों पढ़ाया जा रहा है?  इसका किसी के पास क्या कोई जवाब है? केवल इतना लिखा गया है कि  अंग्रेज़ों ने ढाई सौ वर्ष तक हम पर अपना राज्य किया, इसलिए हमारे देश 'भारत' के लोगों का नाम 'इण्डियन' का  पड़ गया है।

इससे भी अधिक विचार यह करना है कि है कि चीन हमसे  भी ज़्यादा परतन्त्र  रहा है। उसे हमसे दो या तीन साल बाद स्वतन्त्रता मिली है। उससे पहले स्वतन्त्रता हमें मिली है। चीन को जिस दिन स्वतन्त्रता मिली थी, तब उनके सर्वेसर्वा नेता ने कहा था कि हमें स्वतन्त्रता की प्रतीक्षा थी। अब हम स्वतन्त्र हो गए हैं। अब हमें सर्वप्रथम अपनी भाषा चीनी को सम्हालना है।परतन्त्र अवस्था में हम अपनी भाषा चीनी को क़ायम रख नहीं सके थे। साथियों ने सलाह दी थी कि चार-पाँच  साल बाद अपनी भाषा को अपना लेंगे। किन्तु मुखिया ने किसी की सलाह को नहीं मानते हुए चीना भाषा को देश की भाषा घोषित किया। नेता ने कहा चीन स्वतन्त्र हो गया है और अपनी भाषा चीनी को छोड़ नहीं सकते हैं। आज की रात से  चीन में की भाषा चीनी प्रारम्भ होगी और उसी रात से वहाँ  चीन की भाषा चीनी प्रारंभ हो गयी। भारत में कोई ऐसा व्यक्ति है जो चीन के समान हमारे देश की भाषा तत्काल प्रारम्भ कर दे

कोई भी कठिनाई आ जाय देश के गौरव और स्वाभिमान को छोड़ नहीं सकते हैं। सत्तर वर्ष अपने देश को स्वतन्त्र  हुए हो गए हैं। हमारी भाषाऐं बहुत पीछे हो गयी हैं। अंग्रेजी भाषा को  शिक्षा  का माध्यम  बनाने की ग़लती  की गयी। मैं भाषा सीखने के लिए अंग्रेजी या किसी भी अन्य भाषा  को सीखने का विरोध नहीं करता हूँ। किंतु देश  की   भाषा के ऊपर कोई अन्य भाषा नहीं हो सकती है। अंग्रेजी भारत की भाषा कभी नहीं थी और न कभी होनी चाहिए। अंग्रेजी अन्य विदेशी भाषाओं के समान ज्ञान प्राप्त करने का साधन मात्र है। विदेशी भाषा अंग्रेजी में हम अपना सब कुछ काम करने लग गए, यह ग़लत है। हमें दादी के साथ दादी की भाषा जो यहाँ बुन्देलखण्डी है, उसी में बात करना चाहिए। जो यहाँ सभी को समझ में आ जाती है। मैं कहता हूँ ऐसा ही अनुष्ठान करें। 

लीक से हट कर प्रवचन:
प्रस्तुति: 
निर्मलकुमार पाटोदी
विद्या-निलय, ४५, शांति निकेतन
इन्दौर- ४५२०१०
मो. ०७८६९९-१७०७० मेल: nirmal.patodi@gmail.com