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सोमवार, 20 अक्टूबर 2025

वीर निर्वाण संवत् – भारत का सर्वाधिक प्राचीन संवत्

 

वीर निर्वाण संवत् – भारत का सर्वाधिक प्राचीन कालक्रम

जैन परंपरा में “वीर निर्वाण संवत्” भारत का सर्वाधिक प्राचीन और प्रमाणित कालगणना संवत् माना गया है। यह संवत् भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष-गमन (निर्वाण) के वर्ष से आरम्भ होता है, जो ईसा पूर्व 527 वर्ष में कार्तिक कृष्ण अमावस्या (7 अक्तूबर) के दिन पावापुरी (वर्तमान बिहार) में घटित हुआ था । उनके निर्वाण के पश्चात् अगले ही दिन—कार्तिक शुक्ल एकादशी से—इस संवत् का शुभारम्भ हुआ, जिसे “वीर निर्वाण संवत्” कहा गया। भगवान महावीर स्वामी के पाँच नामों वीर, अतिवीर, सन्मति, वर्द्धमान और महावीर में से “वीर” नाम से यह संवत् प्रचलित हुआ।

वीर निर्वाण संवत् की प्राचीनता

इतिहासकारों तथा ग्रंथीय प्रमाणों के अनुसार, यह संवत् विक्रम संवत्, शक संवत्, शालिवाहन संवत्, हिजरी संवत्, ईस्वी संवत्, गुप्त संवत्सभी से अधिक प्राचीन है। इसका प्रारंभिक उल्लेख महान आचार्ययति-वृषभ रचित तिलोय पण्णति (6वीं शताब्दी ईस्वी) में मिलता है, जिसमें भगवान महावीर के निर्वाण वर्ष को आधार बनाकर संवत् की गणना की गई है। आचार्य जिनसेन (8वीं सदी ईस्वी) द्वारा रचित हरिवंश पुराण में भी वीर निर्वाण युग और शक युग के बीच का कालान्तर 605 वर्ष, 5 माह, 10 दिन बताया गया है ।

पुरातात्विक प्रमाण

1912 ईस्वी में सुप्रसिद्ध भारतीय पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने राजस्थान के अजमेर ज़िले की भिनाय तहसील स्थित वडली गाँव (वर्तमान बडली) से एक ब्राह्मी-लिपि में अंकित प्राचीन शिलालेख खोजा।

इस शिलालेख में “84 वीर संवत्” का उल्लेख मिलता है—अर्थात यह शिलालेख भगवान महावीर के निर्वाण के 84वें वर्ष का है, जो लगभग ईसा पूर्व 443 वर्ष का समय दर्शाता है।​ यह अभिलेख आज भी अजमेर के राजपूताना संग्रहालय (आमेर म्यूज़ियम) में सुरक्षित है और भारतीय पुरातत्त्व विभाग द्वारा प्रमाणित किया गया है।

इतिहासकार डॉ. राजबली पाण्डेय ने अपनी प्रसिद्ध कृति इंडियन पैलियोग्राफी (पृष्ठ 180) में लिखा कि—“अशोक काल से पहले जिन शिलालेखों में तिथि-संकेत हैं, उनमें वडली का अभिलेख निर्विवाद रूप से सर्वाधिक प्राचीन है” ।

जैन ग्रंथों में वर्णन

जैन परंपरा के अनेक ग्रंथ—हरिवंश पुराण, तिलोय पण्णत्ति, धवला, पंचाङ्ग सूत्रमें वीर निर्वाण संवत् का क्रमिक प्रयोग मिलता है।

आचार्य वीरसेन ने धवला ग्रंथ में इसकी पुष्टि की है कि शक युग के प्रारंभ से 605 वर्ष 5 माह 10 दिन पहले भगवान महावीर का निर्वाण हुआ।

इसी गणना के अनुसार वर्तमान में (सन् 2025 ईस्वी में) वीर निर्वाण संवत् 2552 प्रारंभ हो रहा है, जो विसं 2082 अथवा शक संवत 1947 के समकक्ष है ।

दीपावली से संबंध

भारतवर्ष में आज जो दीपावली पर्व मनाया जाता है, उसकी ऐतिहासिक जड़ें इसी दिन में हैं—जब भगवान महावीर स्वामी ने निर्वाण प्राप्त किया और उनके शिष्य गणधर गौतम स्वामी को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। उसी अवसर पर समस्त भारत के जनसमुदाय और राज्यों ने ज्योति-प्रज्वलन किया, ताकि “ज्ञान का प्रकाश” सदा अमिट रहे।

इस घटना की स्मृति में ही अगली प्रतिपदा से वीर निर्वाण संवत् आरम्भ किया गया, जो आज भी जैन समाज का नववर्ष है ।

तुलनात्मक क्रम (प्रमुख संवतों के साथ)

संवत का नाम

प्रारंभ वर्ष (ईसा पूर्व/ईस्वी)

प्रारंभ का कारण

वीर निर्वाण से कालांतर

वीर निर्वाण संवत्

527 ईसा पूर्व

भगवान महावीर का निर्वाण

0 वर्ष

विक्रम संवत्

57 ईसा पूर्व

राजा विक्रमादित्य का राज्याभिषेक

लगभग 470 वर्ष बाद

शक संवत्

78 ईस्वी

शक राजाओं का शासन प्रारंभ

लगभग 605 वर्ष बाद

हिजरी संवत्

622 ईस्वी

पैगम्बर मुहम्मद का मदीना गमन

लगभग 1149 वर्ष बाद

ईस्वी संवत्

1 ईस्वी

यीशु मसीह का जन्म

लगभग 527 वर्ष बाद

यह सारणी स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि वीर निर्वाण संवत् समस्त प्रचलित कालगणना प्रणालियों से अधिक प्राचीन और भारतीय मूल का है।


निष्कर्ष

इस प्रकार सभी ऐतिहासिक, ग्रंथीय और अभिलेखीय प्रमाण इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि—

1.   वीर निर्वाण संवत् भारतवर्ष का प्रथम और सर्वाधिक प्राचीन संवत् है।

2.  इसका आरंभ ईसा पूर्व 527 वर्ष में भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण अवसर से हुआ।

3.   इसका वैज्ञानिक, अभिलेखीय और पारंपरिक उपयोग आज भी जैन समाज में निर्विवाद रूप से विद्यमान है।

4.  अजमेर (भिनाय तहसील) के वडली शिलालेख और तिलोय पण्णत्ति  के उल्लेख इसके निर्विवाद प्रमाण हैं।

अतः “वीर निर्वाण संवत्” केवल जैन धर्म का नववर्ष नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतभूमि की सबसे प्राचीन, प्रमाणित और स्वदेशी कालगणना प्रणाली है, जिसने भारतीय इतिहास में समय-गणना की आधार-रेखा स्थापित की।

मंगलवार, 19 मई 2020

350 वर्षों से जैन समाज की कर्मभूमि है आमची मुंबई और जन्मभूमि भी


23 सितंबर 1668 को आमची मुंबई के वाणिज्यिक राजधानी बनने का बीजारोपण हुआ था। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने द्वीपों के एक समूह पर ब्रिटिश राजघराने से इसे पट्टे पर लेकर अपना पैर रखा। उसके पहले यह द्वीप पुर्तगालियों के हाथों में थे तो इसे वाणिज्यिक शहर बनाने की कल्पना किसी ने नहीं की थी। उन्होंने इसे केवल अपना नाम दिया, बॉम्बे। परंतु फिरंगी ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे आधुनिक शहरी केंद्र में रूप में विकसित करने का सपना देखा, मुंबई के रूप आज एक वास्तविकता के रूप में विद्यमान है।

फिरंगी कंपनी के आने से पूर्व कैथोलिक पुर्तगाली शासन के अंतर्गत् इन द्वीपों में धार्मिक सहिष्णुता बहुत कम थी, इसलिए व्यापारी लोग यहाँ बसने से कतराते थे। अंग्रेजों ने धार्मिक स्वतंत्रता एवं सुरक्षा का आश्वासन दिया तो जैन और पारसी व्यापारियों ने सूरत एवं आसपास से निकल कर मुंबई में स्थायी रूप से बसने का निश्चय किया और किले के आसपास के क्षेत्रों में आकर रहने लग गए।

1668 में बॉम्बे को प्रमुख शहर और भारत की वाणिज्यिक राजधानी के रूप में विकसित करने का सपना पारसी शिपबिल्डर्स और जैन व्यापारियों के सहयोग के बिना सम्भव नहीं था।

जैन अहिंसा में विश्वास रखने वाला सेवाभावी धार्मिक संप्रदाय है। धीरे धीरे गुजरात एवं राजस्थान से बड़ी संख्या में जैन परिवार मुंबई में आकर स्थायी रूप से रहने लगे। मुंबई में 250 वर्ष प्राचीन जैन मंदिर इस बात के प्रमाण हैं कि जैनों ने मुंबई को अपनी कर्मभूमि के साथ अपनी आने वाली पीढ़ियों की जन्मभूमि के रूप में भी स्वीकार कर लिया था।

वैसे तो जैन समाज बहुत छोटा समाज है पर मुंबई के विकास में उनका योगदान अति महत्वपूर्ण है। जैनों ने मुंबई को अपना आशियाना बनाया। अपने पूर्वजों की जन्मभूमि से उनका नाता धीरे-धीरे शिथिल होता गया और मुंबई को मातृभूमि मान कर आमची मुंबई से अपनी घनिष्ठता को सुदृढ़ करते रहे। 350 वर्ष के इतिहास के उपरांत उन्होंने सरकार से मुफ़्त में किसी भी वस्तु को पाने की आशा नहीं की। सरकारी भूमि को हथिया कर उन्होंने अपने खेलकूद एवं आनंद के लिए एक भी जिमखाना नहीं बनाया।

सन् 1918 तक कोलकाता व्यापारिक क्षेत्र में मुंबई से बहुत आगे था। 1918 में महामारी में भारी संख्या में लोग काल कवलित हुए, परंतु वह भयावह महामारी भी जैनों को मुंबई से अलग नहीं कर पायी, क्योंकि जैन मुंबई को आमची मुंबई मान चुके थे। 1918 की महामारी का प्रभाव 1920 तक समाप्त हुआ। कठिन परिस्थिति में भी जैन व्यापारी मुंबई को वाणिज्यिक राजधानी बनाने सपने को पूरा करने के लिए निरंतर कड़ा परिश्रम करते रहे।

जैन व्यापारियों द्वारा किये गये कड़े परिश्रम के फल पकने लगे और अंग्रेज कोलकाता को छोड़कर मुंबई को प्रमुख वाणिज्यिक राजधानी के रूप में देखने के लिए विवश हुए। कोलकाता से बिड़ला, डालमिया जैसे हिंदू व्यापारी मुंबई आकर स्थायी रूप से रहने लगे।

मुंबई एवं उसके आसपास आज लगभग 20 लाख जैन निवास करते हैं। जब भी मुंबई किसी प्राकृतिक आपदा से घिरी है, जैन समाज सदैव सेवा के लिए आगे आया है। जैनों की प्रमुख संस्थाएँ जीतो, भारतीय जैन संघटना, समस्त महाजन एवं महावीर इंटरनेशनल ने बिना किसी भेदभाव एवं राजनीतिक अपेक्षा के मानवसेवा के लिए अपने धन का सदुपयोग किया है।

कोरोना विषाणु रोग- 2019 महामारी के कारण बहुत सारे लोग मुंबई छोड़ कर अपने-2 प्रांत में जा रहे हैं परंतु जैन समाज आमची मुंबई को अपनी मातृभूमि मान कर सेवा के कार्यों के लिए समर्पित होकर मुंबई में डटा हुआ है। कोरोना महामारी के थमते ही फिर से परिश्रम और लगन के साथ आमची मुंबई को वाणिज्यिक राजधानी बनाये रखने के लिए लगा रहेगा। बिना किसी अपेक्षा से अपनी कर्मभूमि एवं जन्मभूमि के उत्थान के लिए निष्ठावान व प्रयत्नशील बना रहेगा। जैन समाज अहिंसा, धार्मिकता एवं सेवाभाव के गुणों से ओतप्रोत होने के कारण सदा प्रसन्नचित्त रहता है परंतु उसे पीड़ा तो तब अनुभव होती है जब कोई 350 वर्षों से मुंबई के निर्माण में जैन समाज के योगदान को भुलाकर पर-प्रांतीय मान कर उन्हें प्रताड़ित करने के प्रयास करता है।

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रविवार, 19 जनवरी 2020

1857 की क्रांति: शहीद लाला हुकमचंद जैन


देश को अंग्रेजों की परतंत्रता से स्वतंत्र करवाने के लिए हुई 1857 की क्रांति के पहले शहीद थे कानपुर के मंगल पांडे, यह तो सभी जानते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि देश के दूसरे शहीद थे हरियाणा में हाँसी के रहने वाले लाला हुकमचंद जैन।                                         

 अंग्रेजों को उत्तर भारत में हरियाणा और पंजाब की सीमा पर रोकने की तैयारी करने के लिए रसद व सहायता के लिए लिखे गए पत्र को आधार बना कर आज से 162 वर्ष पहले 19 जनवरी 1858 को उन्हें उनकी हवेली के सामने ही फांसी दे दी गई थी । उस समय उनकी आयु मात्र 40 वर्ष थी। पत्र लिखने में अपराध में अंग्रेजों ने उनके भतीजे फकीरचंद जैन को भी पकड़ा था, परंतु उनकी 13 वर्ष की आयु को देखते हुए उसे छोड़ दिया गया।

लाला हुकमचंद के परिजन बताते हैं कि फकीरचंद जैन ने खिड़की से खड़े होकर अंग्रेजी शासन की खिलाफत की तो तत्काल उन्हें भी फाँसी पर चढ़ा दिया गया । इस दर्दनाक दृश्य की साक्षी लाला हुकमचंद जैन की पत्नी ने अपने दो छोटे-छोटे बच्चों को लहँगे में छुपाया और वहाँ से निकलकर उनके प्राण बचाए।

वे वर्षों तक भिखारी के वेष में अपना जीवनयापन करती रहीं। उनकी इन यादों और अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ क्रांति का बिगुल बजाने की गाथा को लाला के वंशज आज भी बड़े गर्व से कहते हैं। हाँसी की कचहरी में उनकी यादें सहेजी गई हैं। इंदौर में योजना क्रमांक 54 में रह रहे परिजन अजीत कुमार जैन, अजय कुमार जैन, संजय जैन व वीणा बंसल बताती हैं, 'अंग्रेजों ने लालाजी को फाँसी ही नहीं दी, उनका सब कुछ जब्त कर लिया। सरकारी दस्तावेजों में उनके नाम 9 हजार एकड़ जमीन और सोने-चाँदी के गहने थे। बाद में 80 वर्षों तक अंग्रेज हमारे परिवार के पीछे लगे रहे और हाँसी में घुसने नहीं दिया।'   

उन्होंने बताया, 'लाला हुकम चंद जैन बहादुरशाह जफर के कानूनी सलाहकार थे। उन्होंने हिसार जिले के हाँसी से ही अंग्रेजों को पंजाब व हरियाणा में आने से रोकने का प्रयास किया था। इसके लिए कुछ लोगों को साथ लेकर करनाल के निकट संघर्ष किया। इसी बीच अंग्रेजों ने बहादुरशाह जफर को पकड़ लिया। उनके दस्तावेजों की दिल्ली में जाँच हुई।  उसी मिसिल से लाला हुकमचंद के क्रांतिकारी होने का प्रमाण मिला, उन्हें गिरफ्तार कर ले गए। एक माह तक अदालत की कार्रवाई चलाकर उन्हें फाँसी की सजा सुना दी गई।' 

लाला हुकमचंद के बेटे लाला नियामतसिंह और सुगनचंद जैन ने बाद में परिवार को आगे बढ़ाया।

अजय जैन बताते हैं, 'हमारा परिवार भटकते-भटकते नागदा पहुंचा। यहां से हमारे पिता रणवीरसिंह जैन व चाचा शरणवीरसिंह जैन 1969 में इंदौर आकर बस गए। रणवीरसिंह आज भी मिक्सरवाले जैन साहब के नाम से जाने जाते हैं।'

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

इण्डिया हटाओ भारत लौटाओ : जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी


20 दिसंबर 2015.                                                                                                     
रहली (ज़िला-सागर मध्यप्रदेश) में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतिम दिवस पर गजरथ यात्रा के बाद चारों दिशाओं से भक्तिवश पधारे लगभग एक लाख जैन-अजैन श्रद्धालुओं को उदबोधन देते हुए योगीश्वर कन्नडभाषी संत दिगंबर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने धर्म-देशना की अपेक्षा राष्ट्र और समाज में आए भटकाव  का स्मरण  कराते  हुए कहा कि आज जवान पीढ़ी का  ख़ून सोया हुआ है। कविता ऐसी लिखो कि रक्त में संचार आ जाय। उसका इरादा 'इण्डिया' नहीं 'भारत' के लिये बदल जाय। वह पहले  भारत को याद रखें। भारत  याद   रहेगा, तो धर्म-परम्परा याद रहेगी। पूर्वजों ने भारत के भविष्य के लिये क्या सोचा होगा?

उनकी भावना भावी पीढ़ी को लाभान्वित करने  की  रही थी। वे भारत का गौरव,   धरोहर और परम्परा को अक्षुण्ण चाहते थे। धर्म की परम्परा  बहुत बड़ी  मानी जाती है। इसे  बच्चों  को  समझाना है। आज  ज़िंदगी जा रही है। साधना करो। साधना  अभिशाप को भगवान बना  देती है। जो  हमारी धरोहर है। जिसे हम गिरने  नहीं देंगे।

महाराणा  प्रताप ने अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। उनके और उन जैसों के स्वाभिमान के बल पर हम आज जीवित हैं। भारत  को स्वतन्त्र  हुए सत्तर वर्ष  हो  गए हैं। स्वतन्त्र  का अर्थ होता है-'स्व  और तन्त्र'।  तन्त्र आत्मा का होना  चाहिए। आज हम, हमारा राष्ट्र एक-एक पाई  के लिए परतंत्र हो चुका है। हम हाथ किसी के आगे नहीं पसारें।   महाराणा प्रताप को देखो, उन जैसा स्वाभिमान  चाहिए। उनसे है भारत की गौरवगाथा। आज हमारे भारत की पूछ  नहीं हो  रही है ?  मैं अपना ख़ज़ाना  आप लोगों  के सामने रख  रहा हूं। आप  लोगों में मुस्कान देख रहा हूँ। मैं भी  मुस्करा रहा हूं। हमें बता दो, भारत का नाम 'इण्डिया' किसने रखा? भारत का नाम 'इण्डिया' क्यों रखा गया? भारत 'इण्डियाक्यों बन गया?  क्या भारत का अनुवाद  'इण्डिया' है? इण्डियन का अर्थ क्या है? है कोई व्यक्ति जो इस बारे में बता सके?  हम भारतीय हैं, ऐसा हम स्वाभिमान के साथ कहते नहीं हैं। अपितु गौरव के साथ कहते  हैं, 'व्ही आर इण्डियन'।  कहना चाहिए- 'व्ही आर भारतीय'।  भारत का कोई अनुवाद नहीं होता। प्राचीन समय में 'इण्डियानहीं कहा जाता था।  भारत को भारत के रूप में ही स्वीकार करना चाहिए। युग के आदि में ऋषभनाथ के ज्येष्ठ पुत्र 'भरत'  के नाम पर भारत नाम पड़ा है। उन्होंने भारत की भूमि को संरक्षित किया है। यह ही आर्यावर्त 'भारत' माना गया है। जिसे 'इण्डिया' कहा जा रहा है। आप हैरान हो जावेंगे, पाठ्य-पुस्तकों के कोर्स में 'इण्डियन' का जो अर्थ   लिखा गया है, वह क्यों पढ़ाया जा रहा है?  इसका किसी के पास क्या कोई जवाब है? केवल इतना लिखा गया है कि  अंग्रेज़ों ने ढाई सौ वर्ष तक हम पर अपना राज्य किया, इसलिए हमारे देश 'भारत' के लोगों का नाम 'इण्डियन' का  पड़ गया है।

इससे भी अधिक विचार यह करना है कि है कि चीन हमसे  भी ज़्यादा परतन्त्र  रहा है। उसे हमसे दो या तीन साल बाद स्वतन्त्रता मिली है। उससे पहले स्वतन्त्रता हमें मिली है। चीन को जिस दिन स्वतन्त्रता मिली थी, तब उनके सर्वेसर्वा नेता ने कहा था कि हमें स्वतन्त्रता की प्रतीक्षा थी। अब हम स्वतन्त्र हो गए हैं। अब हमें सर्वप्रथम अपनी भाषा चीनी को सम्हालना है।परतन्त्र अवस्था में हम अपनी भाषा चीनी को क़ायम रख नहीं सके थे। साथियों ने सलाह दी थी कि चार-पाँच  साल बाद अपनी भाषा को अपना लेंगे। किन्तु मुखिया ने किसी की सलाह को नहीं मानते हुए चीना भाषा को देश की भाषा घोषित किया। नेता ने कहा चीन स्वतन्त्र हो गया है और अपनी भाषा चीनी को छोड़ नहीं सकते हैं। आज की रात से  चीन में की भाषा चीनी प्रारम्भ होगी और उसी रात से वहाँ  चीन की भाषा चीनी प्रारंभ हो गयी। भारत में कोई ऐसा व्यक्ति है जो चीन के समान हमारे देश की भाषा तत्काल प्रारम्भ कर दे

कोई भी कठिनाई आ जाय देश के गौरव और स्वाभिमान को छोड़ नहीं सकते हैं। सत्तर वर्ष अपने देश को स्वतन्त्र  हुए हो गए हैं। हमारी भाषाऐं बहुत पीछे हो गयी हैं। अंग्रेजी भाषा को  शिक्षा  का माध्यम  बनाने की ग़लती  की गयी। मैं भाषा सीखने के लिए अंग्रेजी या किसी भी अन्य भाषा  को सीखने का विरोध नहीं करता हूँ। किंतु देश  की   भाषा के ऊपर कोई अन्य भाषा नहीं हो सकती है। अंग्रेजी भारत की भाषा कभी नहीं थी और न कभी होनी चाहिए। अंग्रेजी अन्य विदेशी भाषाओं के समान ज्ञान प्राप्त करने का साधन मात्र है। विदेशी भाषा अंग्रेजी में हम अपना सब कुछ काम करने लग गए, यह ग़लत है। हमें दादी के साथ दादी की भाषा जो यहाँ बुन्देलखण्डी है, उसी में बात करना चाहिए। जो यहाँ सभी को समझ में आ जाती है। मैं कहता हूँ ऐसा ही अनुष्ठान करें। 

लीक से हट कर प्रवचन:
प्रस्तुति: 
निर्मलकुमार पाटोदी
विद्या-निलय, ४५, शांति निकेतन
इन्दौर- ४५२०१०
मो. ०७८६९९-१७०७० मेल: nirmal.patodi@gmail.com

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

हमारा देश कब मुक्त होगा इण्डिया नाम से


राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार को सत्ता में आए एक वर्ष से अधिक हो चुका है। राष्ट्रवादी सरकार से जैसी उम्मीद थी, उसके विपरीत हर नई योजना का नाम अंग्रेजी में रख रही है और इन नई-नई योजनाओं के प्रतीक-चिह्न बनाने के लिए केवल अंग्रेजी विज्ञापन और अंग्रेजी के महंगे अख़बारों में छपवाए जा रहे हैं। इन योजनाओं के लिए सुझाव भी जनता से अंग्रेजी माध्यम में बनी वेबसाइटों और अंग्रेजी में छपे दिशा निर्देशों और नियमों के द्वारा आमंत्रित किए जा रहे हैं। नई योजनाओं के लोकार्पण के कार्यक्रम अब लांच फंक्शन कहलाते हैं और इनमें सभी बैनर, पोस्टर और अतिथि नामपट आदि केवल अंग्रेजी में छपवाए जाते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि विदेशी सरकारें, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं के दौरान यही सब अपने देश की भाषा एवं हिंदी में तैयार करवाती हैं, ताकि भारत से घनिष्ठता और उसके प्रति सम्मान को सिद्ध कर सकें। 

मेरे हिंदी में लगाए गए आरटीआई आवेदन के अंग्रेजी में भेजे गए उत्तर में एक मंत्रालय ने बताया है कि 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' अभियान के लिए प्रतीक चिह्न प्रतियोगिता का विज्ञापन केवल अंग्रेजी में तैयार किया गया था और जिस पर अख़बारों को लगभग 8 लाख रुपए का भुगतान किया गया। अंग्रेजी अख़बारों पर लगभग 7 लाख रुपये खर्च किए गए। हिंदी समाचार-पत्रों पर लगभग 60 हज़ार एवं प्रांतीय भाषा के अख़बारों में छपे विज्ञापन पर मात्र 15 हज़ार खर्च किए गए। यह मात्र एक उदाहरण है, राजभाषा/भारतीय भाषाओं का हर मंत्रालय में यही हाल है। 


प्रधानमंत्री कार्यालय ने तो बाकायदा प्रधानमंत्री के भाषणों के लिए 'हिंगलिश' को राजभाषा का दर्जा दे दिया, आम आदमी को प्रधानमंत्री के तथाकथित हिंदी भाषणों को पढ़ने के लिए रोमन लिपि और अंग्रेजी भाषा दोनों का ज्ञान अनिवार्य है। प्रमका में प्रमं के भाषण लिखने वाला अधिकारी अंग्रेजी का बहुत बड़ा पैरोकार है, यह बात मैं मनमोहन सिंह के कार्यकाल से अनुभव कर रहा हूं। पिछले पांच साल के भाषण देख लीजिए, सभी हिंगलिश में लिखे जा रहे हैं। पत्र सूचना कार्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध ये भाषण वही पढ़ सकता है, जो हिंदी के साथ अंग्रेजी पढ़ना और समझना जानता हो, सिर्फ हिंदी जानने वाले इन भाषणों को पढ़ नहीं सकते हैं। 

राष्ट्रवादी सरकार शीघ्र ही हमारे देश का नाम इंडिया घोषित कर दे और भारत नाम पर प्रतिबंध लगा दे तो अचरज ना कीजिएगा। जो काम कांग्रेस ना कर सकी वह काम राष्ट्रवादी सरकार करेगी!

मेक इन इंडिया 
डिजिटल इंडिया 
स्किल इंडिया 
नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ़ इंडिया 
माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट एंड रिफाइनैंस एजेंसी 
माई गव वेबसाइट 
टीम इंडिया 
ग्रीन इंडिया 
और ऐसे नामों की सूची लम्बी है... 

बुधवार, 13 मई 2015

राष्ट्रपति सचिवालय से कुछ चुभते प्रश्न

१.     राष्ट्रपति भवन की जो ऑनलाइन सेवाएँ केवल अंग्रेजी में हैं उनका इस्तेमाल करने के लिए भारत के अंग्रेजी ना जानने वाले लगभग 110 करोड़ नागरिकों के लिए राष्ट्रपति सचिवालय ने क्या व्यवस्था की है? भारतीय भाषाभाषी नागरिकों को इन सेवाओं का इस्तेमाल करने के लिए राष्ट्रपति सचिवालय में किस व्यक्ति से संपर्क करना चाहिए?
२.     राष्ट्रपति भवन का भ्रमण करने के लिए ऑनलाइन आरक्षण की ऑनलाइन व्यवस्था राजभाषा हिन्दी में उपलब्ध नहीं है जबकि 2 जुलाई 2008 को राष्ट्रपति जी ने स्वयं आदेश जारी किया था कि भारत सरकार की समस्त वेबसाइटें 100% द्विभाषी होनी चाहिए ?
३.     राष्ट्रपति जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों पर समस्त जानकारी केवल अंग्रेजी में डाली जाती है जिसे देश के 90% नागरिक पढ़ भी नहीं सकते हैं तो क्या राष्ट्रपति जी केवल अंग्रेजी जानने वाली जनता से ही संवाद करना चाहते हैं, हम जैसी अंग्रेजी ना जानने वाली जनता को उनके सचिवालय की गतिविधियों को जानने का कोई अधिकार नहीं है?
४.     क्या राष्ट्रपति जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों पर राजभाषा हिन्दी में जानकारी डालने के लिए संबंधित अधिकारी को कोई निर्देश नहीं दिया गया है?
५.     राष्ट्रपति जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों पर केवल अंग्रेजी में जानकारी डालने के लिए नियुक्त अधिकारी/अधिकारियों के नाम /पदनाम/ईमेल पते प्रदान करें ताकि मैं उनसे प्रार्थना कर सकूँ कि महोदय, अंग्रेजी भारत की भाषा नहीं है और इस देश 95% जनता इस इस विदेशी भाषा को नहीं जानती है इसलिए राष्ट्रपति जी के ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब पर नवीनतम जानकारी हिन्दी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं में भी डालते रहें ताकि मुझ जैसे अंग्रेजी ना जानने वाले देश के करोड़ों लोग भी राष्ट्रपति जी के बारे में नवीनतम सूचनाएँ प्राप्त करे सकें? (इज़रायल सरकार, फ़्रांस सरकार, जर्मन सरकार, अमरीकी दूतावास (दिल्ली) ने भी अपने फेसबुक/ट्विटर के आधिकारिक पेजों पर नियमित जानकारी हिन्दी में डालना शुरू किया है, जब विदेशी लोग इस बात को समझ रहे हैं कि भारत की जनता से संवाद के लिए जनभाषा से बेहतर कुछ नहीं है तो राष्ट्रपति सचिवालय अपनी राजभाषा की अनदेखी कैसे कर सकता है)
६.     राष्ट्रपति जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों पर फिलहाल नाम/परिचय विदेशी भाषा अंग्रेजी में लिखा गया है, क्या उसमें राजभाषा हिन्दी को शामिल करने में कोई नियम आड़े आता है इसलिए राजभाषा को स्थान नहीं दिया गया है? (द्विभाषी अनुलग्नक देखें)
७.     संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार भारत की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी है पर राष्ट्रपति जी से संबंधित सभी वेबसाइट स्वतः (डिफाल्ट) अंग्रेजी में खुलती हैं इस तरह राष्ट्रपति सचिवालय ने राजभाषा हिन्दी को अंग्रेजी से कमतर आँका है, हिंदी को अंग्रेजी से ओछा समझा है वर्ना क्या कारण है कि हिन्दी वेबसाइट को प्राथमिकता नहीं दी जा रही? अंतिम अनुलग्नक “द्विभाषी होमपेज” देखें (बड़े दुःख की बात है कि भारत के संविधान में लिखा है कि हिन्दी राजभाषा है पर राष्ट्रपति सचिवालय अपनी वेबसाइटों के होमपेज द्विभाषी बनाने के लिए राजी नहीं है और ना ऐसी व्यवस्था करने के लिए तैयार है जिसमें राष्ट्रपति जी की वेबसाइटें द्विभाषी रूप में खुलें.)
८.     क्या राष्ट्रपति भवन के नियमों में लिखा है कि राष्ट्रपति जी से संबंधित कोई भी वेबसाइट बाई डिफाल्ट हिन्दी में नहीं खुलनी चाहिए? भले ही आप कहें कि पहले हिंदी वेबसाइट खुलने का कोई नियम नहीं है तो क्या अंग्रेजी वेबसाइट पहले खुले उसका नियम/आदेश है, यदि ऐसा नियम/आदेश है तो वह नियम/आदेश उपलब्ध करवाएँ?
९.     भारत सरकार ने अक्तूबर 2014 में भारत की प्रमुख भाषाओं की लिपियों में वेबसाइट डोमेन नाम पंजीयन की व्यवस्था शुरू की है. चूँकि भारत की आधिकारिक लिपि “देवनागरी लिपि” है इसलिए राष्ट्रपति.भारत, राष्ट्रपतिसचिवालय.भारत, राष्ट्रपतिभवन.भारत जैसे डोमेन नाम पंजीकृत करवाए जाने चाहिए कृपया सूचित करें कि क्या राष्ट्रपति सचिवालय ने इस विषय में कोई कदम उठाया है?

राष्ट्रपति सचिवालय ने एक भी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया और आवेदन लौटा दिया है, हिन्दी की उपेक्षा के लिए लगाये इस आवेदन को लौटने का कारण लिखने के लिए भी #अंग्रेजी प्रयोग की गई:

रविवार, 11 जनवरी 2015

भारत का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय अभी भी अंग्रेजों के अधीन है!

शीर्षक पढ़कर आपको आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि देखा जाए तो भारत आज भी स्वतंत्र नहीं हुआ है, जबकि पूरी भारत सरकार ही अंग्रेजी दासता से ग्रस्त है जिसका नाम है गवर्नमेंट ऑफ़ इण्डिया. जिस शासन का नाम भी ६८ वर्षों बाद अंग्रेजी में हो वहाँ आप कैसी स्वतंत्रता की कल्पना करेंगे? १५ अगस्त १९४७ के बाद बस बदलाव इतना आया है कि पहले ब्रिटेन से आए हुए शासक हम पर शासन करते थे और अब भारत में जन्मे अंग्रेज हम पर शासन कर रहे हैं.

पिछले तीन वर्षों से मैं और देश के अनेक भाषा-प्रेमी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में राजभाषा का प्रयोग ना किए जाने और जनता से  जुड़ी सभी ऑनलाइन सुविधाएँ सिर्फ अंग्रेजी में थोपने की कई बार शिकायतें कर चुके हैं, कई बार आर टी आई आवेदन भी लगा चुके हैं पर क्या करें हम लोगों के सारे प्रयास व्यर्थ जा रहे हैं, हिन्दी के लिए आवाज उठाने वालों की सुनता भी कौन है? 

शायद मंत्रालय में एक भी ऐसा अधिकारी नहीं है जो आम जनता की सुविधा/उनके दुःख-कष्ट समझने को लेकर गंभीर हो, अन्यथा इस मंत्रालय का कामकाज राजभाषा/जनभाषा #हिन्दी में हो रहा होता, ऑनलाइन सेवाएँ हिन्दी/अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं में होतीं, मंत्रालय की वेबसाइटों पर हिन्दी में जानकारी, नियम, नीतियाँ, आदेश, अधिनियम आदि उपलब्ध होते, हिन्दी में ऑनलाइन शिकायतें दर्ज करवाने के विकल्प उपलब्ध होते. पर  ऐसा नहीं हुआ. ये अधिकारी अपने अंग्रेजी कामकाज के पीछे एक ही तर्क लेते हैं कि संविधान ने अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा दिया है और भारत की जनता पर विशेष रूप से दक्षिण की जनता पर हिन्दी लागू करने से देश के टुकड़े हो जाएँगे, राजनीतिक अराजकता फ़ैल जाएगी पर वे भूल जाते हैं कि वे देश सत्तानवे प्रतिशत नागरिकों  पर बलात अंग्रेजी थोप रहे हैं! उनके हिसाब से अंग्रेजी में काम करना बहुत आसान है और अंग्रेजी में कामकाज होने से देश के सत्तानवे प्रतिशत लोग कभी समझ ही नहीं पाते कि हो क्या रहा है इसलिए वे इन अधिकारियों के कामकाज पर ऊँगली नहीं उठा पाते हैं, सरकारी अधिकारी ऐसा करके स्वयं का भला करे हैं, यदि यही काम हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में किया गया तो उनको अप्रिय प्रश्नों का सामना करना होगा. दूसरी बात, इन अधिकारियों को आम नागरिकों की सुविधा की तनिक भी चिंता नहीं है इसलिए सारे नियम, अधिनियम, दिशा-निर्देश, नीतियाँ केवल अंग्रेजी में ही तैयार किए जाते हैं और उन्हें अंग्रेजी में ही जनता के सुझावों के लिए जारी कर दिया जाता है. अब जब नीतियाँ-नियम अंग्रेजी में जारी होंगे तो उन पर सुझाव कौन दे सकेगा? अरे भई, वही आदमी दे सकेगा जो अंग्रेजी पढ़ सकता हो, उसे समझ सकता हो और पढ़-समझने के बाद अपना सुझाव अंग्रेजी में लिख सकने की योग्यता रखता हो. मेरे विचार में भारत में अंग्रेजी के ऐसे निष्णात विद्वानों की संख्या २-३ प्रतिशत से अधिक नहीं है. ऐसा सरकारी अधिकारी इसलिए करते हैं ताकि देश की आम जनता किसी भी प्रकार से नीति-नियम के निर्माण में भाग ना ले सके, इस देश में जो अंग्रेजी ना समझ सकता हो वह तीसरे दर्जे का आदमी है, उसकी क्या हैसियत कि वो आईएएस अधिकारियों को अपनी मातृभाषाओं में सुझाव देने की जुर्रत करे?

तो देश में २-३ प्रतिशत लोगों की सुविधा के अनुसार नीतियाँ और कानून बनाए जाते हैं और उन्हें देश के 100% लोगों पर लागू कर दिया जाता है. अभी २-३ दिन पहले स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति' का प्रारूपण अपनी वेबसाइट पर अंग्रेजी में डाला है और इस पर ऑनलाइन सुझाव देने की व्यवस्था भी अंग्रेजी में शुरू की है. (लिंक: http://www.mohfw.nic.in/index1.php?lang=1&level=1&sublinkid=4883&lid=3013 ) क्या यही लोकतंत्र है जहाँ राजभाषा का प्रयोग ना किया जाए, जहाँ  नीति निर्माण से  देश की सत्तानवे प्रतिशत जनता हो सिर्फ इसलिए अलग रखा जाए क्योंकि वह जनता अंग्रेजी नहीं जानती है? भारत सरकार का आम जनता से जुड़ा हर कामकाज एक ऐसी भाषा में किया जा रहा है जिसे देश की सत्तानवे प्रतिशत जनता समझ भी नहीं सकती है. 

पिछले तीन वर्षों से मैंने निम्न बिंदु उठाए:
  1. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की मुख्य वेबसाइट पूर्ण रूप से हिन्दी में बनाई जाए.
  2. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की अधीनस्थ सभी वेबसाइटों को हिन्दी में बनाया जाए.
  3. आयुष विभाग की हिन्दी वेबसाइट पर हिन्दी में जानकारी डाली जाए.
  4. 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति' का प्रारूपण अविलम्ब हिन्दी में उपलब्ध हो, ऑनलाइन सुझाव की सुविधा हिंदी में शुरू की जाए. आगे हमेशा जनता के सुझाव चाहने वाले सभी मसौदों को हिन्दी में जारी किया जाए.
  5. मंत्रालय की सभी ऑनलाइन सेवाएँ अनिवार्य रूप से द्विभाषी हों.
  6. मंत्रालय द्वारा सभी प्रारूप/मुहरें/पत्रशीर्ष/लिफ़ाफ़े अनिवार्य रूप से द्विभाषी छपाए जाएँ.
  7. मंत्रालय की अधीनस्थ कंपनियों के उत्पादों पर जानकारी हिन्दी में भी छापी जाए.
  8. मंत्रालय द्वारा विज्ञप्तियाँ हिंदी में जारी की जाएँ/आमंत्रण/कार्यक्रमों के बैनर/पोस्टर/नामपट/बैज आदि द्विभाषी छपवाए जाएं. (एक-दो अपवाद छोड़ हमेशा अंग्रेजी में होते हैं)
  9. मंत्रालय एवं अधीनस्थ कार्यालयों के द्वारा जारी होने वाले लाइसेंस/प्रमाण-पत्र/पंजीयन -पत्र आदि अनिवार्य रूप से द्विभाषी जारी किए जाएँ.
  10. भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की वेबसाइट एवं ऑनलाइन लाइसेंस/पंजीयन सुविधा हिन्दी में शुरू करवाई जाए.

आप देखेंगे कि उक्त दस बिन्दुओं में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा राजभाषा अधिनियम, राजभाषा नियमावली, निर्देश अथवा संसदीय राजभाषा समिति की अनुशंसाओं पर जारी हुए राष्ट्रपति जी के अनेक आदेशों का निरंतर उल्लंघन किया जा रहा है. 

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

भारत में देसी भाषाओं की नहीं कोई इज्ज़त

गणपत तेली
जनसत्ता 1 सितंबर, 2014: भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की उपेक्षा और दोयम दर्जे के व्यवहार का मुद्दा कुछ समय से बराबर उठता रहा है। संघ लोक सेवा आयोग की प्रशासनिक सेवाओं के अतिरिक्त भी अधिकतर प्रतियोगी परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की स्थिति ऐसी ही है। प्रश्नपत्रों पर यह स्पष्ट लिखा रहता है कि प्रश्नों के पाठ में भिन्नता होने पर अंग्रेजी  वाला पाठ मान्य होगा और कई प्रश्नपत्रों में तो यह भी लिखा नहीं होता है, जबकि अक्सर हिन्दी पाठ अबूझ और कई बार गलत तक होता है। यह बात विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा से लेकर सामान्य प्रतियोगी परीक्षाओं तक में देखी जा सकती है। इन आंदोलनकारियों को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने भारतीय भाषाओं की इस उपेक्षा को फिर से बहस में ला दिया।

यह कोई प्रशासनिक सेवाओं का अलग-थलग मसला नहीं है, बल्कि हमारे देश की उस अकादमिक व्यवस्था का एक विस्तार है, जहां भारतीय भाषाओं की इसी तरह की उपेक्षा होती है और जो इन भाषाओं के पठन-पाठन की गतिविधियों और इनके विद्यार्थियों के लिए अकादमिक और पेशेगत अवसरों को सीमित करती है। अगर हम उच्च शिक्षा की स्थिति पर एक नजर डालें तो स्पष्ट हो जाएगा कि सरकारी नीतियां इस असमान व्यवस्था को प्रोत्साहित करती हैं। 

आजादी के बाद हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने महसूस किया कि अन्य विकासमूलक मानकों पर विकसित देशों की बराबरी करने में हमें वक्त लगेगा, तकनीक और विज्ञान का क्षेत्र ऐसा है जिसमें और जिसके जरिए हम तत्काल विकसित देशों की पंक्ति में जा खड़े होंगे। फलत: हमारी सरकारें (चाहे किसी भी पार्टी की हों) तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देती हैं, उसके बाद ही सामाजिक विज्ञान के अनुशासनों का स्थान आता है। और अंत में, भाषा और साहित्य जैसे मानविकी के विषय रह जाते हैं। 

अभी हमारे देश में सोलह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (भाप्रौस -आइआइटी) हैं, जिनमें छह-सात काफी प्रतिष्ठित हैं और अन्य अभी आकार ले रहे हैं। इसके अतिरिक्त तीस राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (राप्रौस -एनआइटी) हैं। विज्ञान-शिक्षा के क्षेत्र में पांच भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (भाविशिअस-आइआइएसइआर) हैं। साथ ही, भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु, भारतीय प्रतिरक्षा संस्थान, नई दिल्ली के अलावा भी विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के लिए कई संस्थान और परिषदें हैं। 
समाज विज्ञान की शिक्षा के क्षेत्र में भी ऐसी कई संस्थाएं हैं- टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (मुंबई और हैदराबाद), गोखले अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान संस्थान (पुणे), कलिंग सामाजिक विज्ञान संस्थान (भुवनेश्वर), मद्रास विकास अध्ययन संस्थान, विकास अध्ययन संस्थान कोलकाता जैसी कई संस्थाएं हैं। लेकिन भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भारतीय भाषा संस्थान मैसूर, केंद्रीय हिन्दी संस्थान, केन्द्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान अथवा सेंट्रल इंस्टीट्यूट आन क्लासिकल तमिल जैसी गिनी-चुनी संस्थाओं के अलावा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय ही हैं। 

इसी तरह उच्च शिक्षा में शोध के लिए वैज्ञानिक एवं औद्योगिक शोध परिषद (वैऔशोप-सीएसआइआर), वैज्ञानिक एवं अभियांत्रिकी शोध परिषद (वैअशोप-एसइआरसी) जैसी संस्थाएं वैज्ञानिक शोध को प्रोत्साहित करती हैं। समाजविज्ञान के क्षेत्र में इंडियन काउंसिल फॉर सोशल साइंस रिसर्च अकादमिक शोध को बढ़ावा देती है। इसके अलावा समाजविज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में भी कई संस्थान हैं। इतिहास के क्षेत्र में ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद और दर्शनशास्त्र के लिए इंडियन काउंसिल फॉर फिलोसोफिकल रिसर्च ऐसी ही परिषदें हैं। इसी तरह नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय आधुनिक भारत के इतिहास से जुड़े विभिन्न प्रसंगों पर शोध को बढ़ावा देता है। 

ये  परिषदें और संस्थाएं न केवल शोध के लिए विभिन्न शोधवृत्तियां देती हैं, बल्कि फील्ड वर्क को भी प्रोत्साहित करती हैं। यही नहीं, ये संस्थाएं संबंधित क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्राय: देश के अलग-अलग हिस्सों में शोध पद्धति की कार्यशालाओं का आयोजन करती हैं, जिनमें युवा संकाय सदस्य और शोधार्थी भाग लेते हैं। उक्त सरकारी संस्थाओं के अतिरिक्त कई गैर-सरकारी संस्थाएं भी सामाजिक विज्ञान और विज्ञान के क्षेत्रों में कार्यरत हैं। ये सभी अपने-अपने क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने का काम करती हैं। साथ ही साथ, ये अपनी परियोजनाओं और कार्यक्रमों के जरिए रोजगार के अवसर भी मुहैया कराती हैं।
वहीं अगर हम भाषा और साहित्य की तरफ नजर डालें तो भारतीय भाषाओं की साहित्य अकादमियों के अलावा कुछ खास है नहीं। उक्त साहित्य अकादमियां और अन्य निजी न्यास या संस्थान भी साहित्यिक पुरस्कारों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, नए शोध के लिए शोधवृत्तियां प्राय: नहीं देते और न ही शोध से संबंधित गतिविधियां आयोजित करते हैं। हालांकि इन अकादमियों और निजी न्यासों का दायरा उच्च शिक्षा नहीं है, फिर भी ये पुरस्कारों की स्थापना के साथ कुछ शोधवृत्तियां स्थापित करेंगे तो उस भाषा और साहित्य का शैक्षणिक विस्तार ही होगा। इसलिए ऐसा किया जाना चाहिए। 

हम इस तरह देखते हैं कि सरकारें भारतीय भाषाओं को कोई विशेष महत्त्व नहीं देती हैं। हां, इन भाषाओं के तकनीकी विकास पर अवश्य ध्यान दिया जा रहा है, जिसके तहत प्रगत संगणन विकास केंद्रों (सीडैक), केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान मैसूर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में बहुत-सी अकादमिक गतिविधियां चल रही हैं। इस पूरी परिघटना की सबसे बड़ी विडंबना है कि भाषा और साहित्य जैसे मानविकी विषयों को रोजगारमूलक शिक्षा के नाम पर नजरअंदाज किया जा रहा है, जबकि बेरोजगारी तो बढ़ ही रही है। सही है कि रोजगार एक आवश्यक तत्त्व है, लेकिन शिक्षा महज रोजगार के लिए नहीं हो सकती। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को अपने समाज, राजनीति और संस्कृति के यथार्थ से रूबरू कराना भी होता है। 

अपने समाज और परिवेश से विद्यार्थियों को जोड़ने और संपूर्ण शिक्षा देने के इसी उद्देश्य से आइआइटी, एनआइटी जैसी तकनीकी संस्थाओं में सामाजिक विज्ञान और मानविकी विभाग भी स्थापित किए गए। उच्च शिक्षा के लिए बनाई गई यशपाल समिति की रिपोर्ट में भी यह एक महत्त्वपूर्ण सिफारिश थी। लेकिन यह फलीभूत नहीं हुई, क्योंकि शायद ही किसी संस्थान में हिन्दी या किसी अन्य भारतीय भाषा को स्थान मिला हो। इन सभी संस्थानों के मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभागों में सामाजिक विज्ञान के कुछ विषय पढ़ाए जाते हैं, जबकि साहित्य और भाषा के नाम पर अंग्रेजी  पढ़ाई जाती है, हिन्दी या अन्य कोई भारतीय भाषा नहीं। यही स्थिति राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की है। एक-दो अपवाद और हिन्दी दिवस जैसी औपचारिकताओं को छोड़ दें तो भारतीय भाषा संबंधी गतिविधियां प्राय: इन संस्थानों में नहीं होतीं। भारतीय प्रबंधन संस्थान तो इस मामले में और भी पीछे हैं।

यही हाल उन निजी विश्वविद्यालयों का है, जो पिछले कुछ वर्षों में धूमधाम से खुले हैं। अधिकतर निजी विश्वविद्यालय विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन आदि अध्ययन के लिए ही हैं, जिनमें भाषा-साहित्य के नाम पर बस अंग्रेजी  है। लेकिन जो निजी विश्वविद्यालय सामाजिक विज्ञान और मानविकी को बराबर स्थान देने का दावा करते हैं, वहां भी प्राय: भारतीय भाषाओं को कोई स्थान नहीं मिलता है। उदाहरण के लिए, एमिटी विश्वविद्यालय में जर्मन, स्पेनिश, फ्रांसीसी और अंग्रेजी  में स्नातक की पढ़ाई होती है, लेकिन भारतीय भाषाओं में सिर्फ संस्कृत को यह स्थान देता है। जोधपुर नेशनल यूनिवर्सिटी जैसे कुछ ही विश्वविद्यालय भारतीय भाषाओं के पाठ्यक्रम प्रस्तावित करते हैं। 

इन अपवादों को छोड़ दें, तो ऐसे निजी विश्वविद्यालयों की फेहरिस्त लंबी है, जहां भारतीय भाषाओं का अस्तित्व ही नहीं है और उनमें साहित्य के नाम पर अंग्रेजी  साहित्य या कहीं-कहीं तुलनात्मक साहित्य पढ़ाया जाता है। कई सरकारी विश्वविद्यालय भी तुलनात्मक साहित्य के अध्यापकों के लिए योग्यता तुलनात्मक साहित्य या अंग्रेजी  (अन्य किसी भाषा में नहीं) में एमए निर्धारित करते हैं। अंग्रेजी  साहित्य पढ़ाए जाने से कोई समस्या नहीं है, लेकिन भारतीय भाषाओं का साहित्य भी इन्हें अवश्य पढ़ाना चाहिए। अगर अंग्रेजी साहित्य पढ़ाया जा सकता है, तो हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, बांग्ला, मराठी, असमी, मलयालम, तमिल, तेलुगू, ओड़िया, गुजराती आदि भाषाओं का साहित्य क्यों नहीं पढ़ाया जा सकता!

निजी विश्वविद्यालय संबंधित राज्य की विधानसभा द्वारा पारित अधिनियम के तहत स्थापित किए जाते हैं और इन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी मान्यता देता है, तो क्यों नहीं इन२के लिए यह आवश्यक किया जाए कि ये कम से कम उस राज्य की भाषा और उसके साहित्य के कुछ पाठ्यक्रम प्रस्तावित करें। यही बात आइआइटी और आइआइएम पर भी लागू होनी चाहिए। कितना अच्छा हो, अगर देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित इन संस्थानों में अलग-अलग भारतीय भाषाएं भी पढ़ाई जाएं। इसके विपरीत वर्तमान व्यवस्था के कारण अधिकतर छात्र-छात्राओं की पढ़ाई की भाषा व्यवहार की भाषा से अलग हो जाती है। जब उनकी ज्ञान की प्रक्रिया से ही इन भाषाओं को काट दिया गया है, तो फिर यह शिकायत कहां से जायज है कि अमुक अनुशासन भारतीय भाषाओं में नहीं पढ़ाए जा सकते! यह एक सर्वविदित तथ्य है कि हमारे देश में प्राय: उच्च शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं नहीं हैं। कुछ राज्यों के विश्वविद्यायलों में अवश्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से पठन-पाठन होता है, लेकिन इसके लिए उन्हें दोयम दर्जे की पाठ्यपुस्तकों पर निर्भर रहना पड़ता है। फलस्वरूप, अक्सर वे उस विषय में पारंगत होने और आगे की पढ़ाई से वंचित हो जाते हैं। इसके अलावा भारतीय भाषाओं के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की विशेष वित्तीय सहायता से संचालित कार्यक्रम या पुस्तकालय भी प्राय: नहीं दिखाई देते। 

अब जरा उस शिकायत पर भी नजर डालते हैं, जो भारतीय भाषाओं, खासकर हिन्दी के लेखक-प्रकाशक करते हैं कि साहित्य को पाठक नहीं मिल रहे हैं। मिलेंगे कहां से, जब संभावित पाठकों की पूरी पीढ़ी को ही व्यवस्थित तरीके से उसके साहित्य, भाषा और समाज से दूर कर दिया जाता है। यह स्थिति अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में हिन्दी में ज्यादा विकट है।


यह मुद्दा चाहे सीधे रूप से प्रतियोगी परीक्षाओं से न जुड़ता हो, इससे अलहदा नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक परिदृश्य से संबद्ध है, जहां भारतीय भाषाएं उपेक्षित हैं और जहां यह माना जाता है कि वे अंग्रेजी  से पिछड़ी हुई हैं, ज्ञान का माध्यम नहीं बन सकती हैं और संवाद-कौशल या व्यक्तित्व-विकास का पर्याय तो अंग्रेजी  ही है। एक बार यह मान लेने के बाद अकादमिक संसाधनों का असमान वितरण आम स्वीकृति पा जाता है, जो भारतीय भाषाओं को और हाशिये पर धकेल देता है। इसलिए इन भाषाओं के इस मसले को समग्रता में देखा जाना चाहिए

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