अनुवाद

रविवार, 11 जनवरी 2015

भारत का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय अभी भी अंग्रेजों के अधीन है!

शीर्षक पढ़कर आपको आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि देखा जाए तो भारत आज भी स्वतंत्र नहीं हुआ है, जबकि पूरी भारत सरकार ही अंग्रेजी दासता से ग्रस्त है जिसका नाम है गवर्नमेंट ऑफ़ इण्डिया. जिस शासन का नाम भी ६८ वर्षों बाद अंग्रेजी में हो वहाँ आप कैसी स्वतंत्रता की कल्पना करेंगे? १५ अगस्त १९४७ के बाद बस बदलाव इतना आया है कि पहले ब्रिटेन से आए हुए शासक हम पर शासन करते थे और अब भारत में जन्मे अंग्रेज हम पर शासन कर रहे हैं.

पिछले तीन वर्षों से मैं और देश के अनेक भाषा-प्रेमी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में राजभाषा का प्रयोग ना किए जाने और जनता से  जुड़ी सभी ऑनलाइन सुविधाएँ सिर्फ अंग्रेजी में थोपने की कई बार शिकायतें कर चुके हैं, कई बार आर टी आई आवेदन भी लगा चुके हैं पर क्या करें हम लोगों के सारे प्रयास व्यर्थ जा रहे हैं, हिन्दी के लिए आवाज उठाने वालों की सुनता भी कौन है? 

शायद मंत्रालय में एक भी ऐसा अधिकारी नहीं है जो आम जनता की सुविधा/उनके दुःख-कष्ट समझने को लेकर गंभीर हो, अन्यथा इस मंत्रालय का कामकाज राजभाषा/जनभाषा #हिन्दी में हो रहा होता, ऑनलाइन सेवाएँ हिन्दी/अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं में होतीं, मंत्रालय की वेबसाइटों पर हिन्दी में जानकारी, नियम, नीतियाँ, आदेश, अधिनियम आदि उपलब्ध होते, हिन्दी में ऑनलाइन शिकायतें दर्ज करवाने के विकल्प उपलब्ध होते. पर  ऐसा नहीं हुआ. ये अधिकारी अपने अंग्रेजी कामकाज के पीछे एक ही तर्क लेते हैं कि संविधान ने अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा दिया है और भारत की जनता पर विशेष रूप से दक्षिण की जनता पर हिन्दी लागू करने से देश के टुकड़े हो जाएँगे, राजनीतिक अराजकता फ़ैल जाएगी पर वे भूल जाते हैं कि वे देश सत्तानवे प्रतिशत नागरिकों  पर बलात अंग्रेजी थोप रहे हैं! उनके हिसाब से अंग्रेजी में काम करना बहुत आसान है और अंग्रेजी में कामकाज होने से देश के सत्तानवे प्रतिशत लोग कभी समझ ही नहीं पाते कि हो क्या रहा है इसलिए वे इन अधिकारियों के कामकाज पर ऊँगली नहीं उठा पाते हैं, सरकारी अधिकारी ऐसा करके स्वयं का भला करे हैं, यदि यही काम हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में किया गया तो उनको अप्रिय प्रश्नों का सामना करना होगा. दूसरी बात, इन अधिकारियों को आम नागरिकों की सुविधा की तनिक भी चिंता नहीं है इसलिए सारे नियम, अधिनियम, दिशा-निर्देश, नीतियाँ केवल अंग्रेजी में ही तैयार किए जाते हैं और उन्हें अंग्रेजी में ही जनता के सुझावों के लिए जारी कर दिया जाता है. अब जब नीतियाँ-नियम अंग्रेजी में जारी होंगे तो उन पर सुझाव कौन दे सकेगा? अरे भई, वही आदमी दे सकेगा जो अंग्रेजी पढ़ सकता हो, उसे समझ सकता हो और पढ़-समझने के बाद अपना सुझाव अंग्रेजी में लिख सकने की योग्यता रखता हो. मेरे विचार में भारत में अंग्रेजी के ऐसे निष्णात विद्वानों की संख्या २-३ प्रतिशत से अधिक नहीं है. ऐसा सरकारी अधिकारी इसलिए करते हैं ताकि देश की आम जनता किसी भी प्रकार से नीति-नियम के निर्माण में भाग ना ले सके, इस देश में जो अंग्रेजी ना समझ सकता हो वह तीसरे दर्जे का आदमी है, उसकी क्या हैसियत कि वो आईएएस अधिकारियों को अपनी मातृभाषाओं में सुझाव देने की जुर्रत करे?

तो देश में २-३ प्रतिशत लोगों की सुविधा के अनुसार नीतियाँ और कानून बनाए जाते हैं और उन्हें देश के 100% लोगों पर लागू कर दिया जाता है. अभी २-३ दिन पहले स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति' का प्रारूपण अपनी वेबसाइट पर अंग्रेजी में डाला है और इस पर ऑनलाइन सुझाव देने की व्यवस्था भी अंग्रेजी में शुरू की है. (लिंक: http://www.mohfw.nic.in/index1.php?lang=1&level=1&sublinkid=4883&lid=3013 ) क्या यही लोकतंत्र है जहाँ राजभाषा का प्रयोग ना किया जाए, जहाँ  नीति निर्माण से  देश की सत्तानवे प्रतिशत जनता हो सिर्फ इसलिए अलग रखा जाए क्योंकि वह जनता अंग्रेजी नहीं जानती है? भारत सरकार का आम जनता से जुड़ा हर कामकाज एक ऐसी भाषा में किया जा रहा है जिसे देश की सत्तानवे प्रतिशत जनता समझ भी नहीं सकती है. 

पिछले तीन वर्षों से मैंने निम्न बिंदु उठाए:
  1. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की मुख्य वेबसाइट पूर्ण रूप से हिन्दी में बनाई जाए.
  2. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की अधीनस्थ सभी वेबसाइटों को हिन्दी में बनाया जाए.
  3. आयुष विभाग की हिन्दी वेबसाइट पर हिन्दी में जानकारी डाली जाए.
  4. 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति' का प्रारूपण अविलम्ब हिन्दी में उपलब्ध हो, ऑनलाइन सुझाव की सुविधा हिंदी में शुरू की जाए. आगे हमेशा जनता के सुझाव चाहने वाले सभी मसौदों को हिन्दी में जारी किया जाए.
  5. मंत्रालय की सभी ऑनलाइन सेवाएँ अनिवार्य रूप से द्विभाषी हों.
  6. मंत्रालय द्वारा सभी प्रारूप/मुहरें/पत्रशीर्ष/लिफ़ाफ़े अनिवार्य रूप से द्विभाषी छपाए जाएँ.
  7. मंत्रालय की अधीनस्थ कंपनियों के उत्पादों पर जानकारी हिन्दी में भी छापी जाए.
  8. मंत्रालय द्वारा विज्ञप्तियाँ हिंदी में जारी की जाएँ/आमंत्रण/कार्यक्रमों के बैनर/पोस्टर/नामपट/बैज आदि द्विभाषी छपवाए जाएं. (एक-दो अपवाद छोड़ हमेशा अंग्रेजी में होते हैं)
  9. मंत्रालय एवं अधीनस्थ कार्यालयों के द्वारा जारी होने वाले लाइसेंस/प्रमाण-पत्र/पंजीयन -पत्र आदि अनिवार्य रूप से द्विभाषी जारी किए जाएँ.
  10. भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की वेबसाइट एवं ऑनलाइन लाइसेंस/पंजीयन सुविधा हिन्दी में शुरू करवाई जाए.

आप देखेंगे कि उक्त दस बिन्दुओं में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा राजभाषा अधिनियम, राजभाषा नियमावली, निर्देश अथवा संसदीय राजभाषा समिति की अनुशंसाओं पर जारी हुए राष्ट्रपति जी के अनेक आदेशों का निरंतर उल्लंघन किया जा रहा है. 

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