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मंगलवार, 19 मई 2015

सीबीएसई महारानी एलिजाबेथ की सेवा में

आजादी के अडसठ वर्ष बीत चुके हैं पर भारत से अंग्रेजीराज समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (केमाशिबो) में भी अंग्रेजीराज कायम है. बोर्ड द्वारा अनेक वेबसाइटों को केवल अंग्रेजी में बनाया गया है और जो एक-दो वेबसाइट हिन्दी में बनाई गई हैं उन पर नवीन और ताज़ा जानकारी नहीं डाली जाती है और हिन्दी वेबसाइटों की कोई सुध लेने वाला नहीं है.

राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा की वेबसाइट http://cbsenet.nic.in/ पूरी तरह से फिरंगी भाषा में है और इस पर कोई भी जानकारी/विवरणिका/अधिसूचना/विषयों के नाम/ऑनलाइन आवेदन प्रपत्र आदि सुविधा हिन्दी में नहीं डाली गई है. केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अधिकारी नहीं चाहते हैं कि कोई भी ऐसा व्यक्ति इस परीक्षा में बैठे जिसने केवल हिन्दी अथवा भारतीय भाषा माध्यम से पढ़ाई की है. केवल अंग्रेजी वेबसाइट बनाकर बोर्ड यह सन्देश देना चाहता है कि इस परीक्षा में हिन्दी अथवा भारतीय भाषा माध्यम से पढाई करने वाले भारतीय नागरिकों के बैठने पर रोक है, अंग्रेजी वेबसाइट को देखकर तो यही लगता है. इस तरह से ये लोग भारत के करोड़ों नागरिकों को केवल अंग्रेजी की लाठी के दम पर इन  परीक्षाओं में बैठने से वंचित कर रहे हैं. यह बहुत गंभीर मामला है. भारत की संसद में इस पर कोई बहस क्यों नहीं होती? भारत जैसे बहुभाषी देश में हर स्तर पर फिरंगी भाषा थोपी जा रही है और देश की सरकार को इस बात से कोई सरोकार नहीं दिखता है. 

के.मा. शि. बोर्ड द्वारा राजभाषा सम्बन्धी किसी भी प्रावधान का पालन नहीं किया जा रहा है. शर्म की बात है कि मातृभाषा दिवस एवं संस्कृत सप्ताह जैसी पहलों के लिए बोर्ड अंग्रेजी में परिपत्र जारी करता है. बोर्ड में राजभाषा के नाम पर केवल ढोंग चल रहा है. ऊपर से बोर्ड की नाम के लिए बनाई हिन्दी वेबसाइटों को जानबूझकर पीछे धकेल रखा है और बाई डिफाल्ट अंग्रेजी वेबसाइट खुल जाती है, ऐसा करके बोर्ड भारत की राजभाषा अपमान भी कर रहा है और चाहता है कि कोई भी हिन्दी वेबसाइटों को खोलकर ना देखे. बाई डिफाल्ट हिन्दी वेबसाइट खुलने से जनता को इनकी सच्चाई पता चलेगी.

अन्य विषय:

1. बोर्ड की मुख्य हिन्दी वेबसाइट http://cbse.nic.in/hindi/hindi.html 2012 के बाद कभी भी अद्यतित नहीं की गई है.
2. बोर्ड की मुख्य हिन्दी वेबसाइट पर हिन्दी में कोई भी जानकारी नहीं है केवल टैब के नाम हिन्दी में लिख दिए गए है.
3. बोर्ड की मुख्य हिन्दी वेबसाइट पर परीक्षा परिणाम केवल अंग्रेजी में जारी किए जाते हैं.
4.बोर्ड की मुख्य हिन्दी वेबसाइट पर कुछ पेजों पर केवल जरुरी संपर्क नाम /केन्द्रीय सूचना अधिकारी के नाम आदि भी वर्ष 2011 
5. राजभाषा विभाग के अगस्त 1999 के निर्देश एवं 2008 में जारी राष्ट्रपति जी के आदेश के अनुसार सभी वेबसाइट एवं ऑनलाइन सेवाओं को द्विभाषी रूप में उपलब्ध करवाना अनिवार्य है पर केमाशिबोर्ड की निम्नलिखित वेबसाइट केवल अंग्रेजी में हैं और सभी ऑनलाइन सेवाएँ केवल अंग्रेजी में हैं ताकि बोर्ड के अधिकारी हिन्दी को पूरी तरह से कामकाज और शिक्षा प्रशासन से बाहर करना चाहते हैं, राष्ट्रपति जी के आदेश की भी इनके लिए कोई कीमत नहीं है इसलिए धड़ल्ले से उल्लंघन कर रहे हैं:

6. राजभाषा अधिनियम की धारा 3 (3) अधीन आने वाले सभी दस्तावेज ( आदेश/परिपत्र/अधिसूचना/मैनुअल आदि) केवल अंग्रेजी में जारी किए जा रहे हैं. उदाहरण : 
7. बोर्ड के मुख्यालय एवं क्षेत्रीय कार्यालयों में केवल अंग्रेजी में रबर मुहरें, लिफ़ाफ़े, पत्र-शीर्ष, सेवा पंजी, प्रवेश पास आदि प्रयोग किए जा रहे हैं.

मेरा कुल मिलाकर इतना ही कहना है कि भारत में के मा शि बोर्ड जैसी संस्थाएँ अंग्रेजी माध्यम को प्रश्रय देकर देश के करोड़ों भाषाई विद्यार्थियों की प्रतिभा का गला घोंट रही हैं. अंग्रेजी माध्यम ने इन सडसठ वर्षों में ना जाने कितने करोड़ भाषाई माध्यम से पढ़े प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को तीसरे दर्जे का नागरिक बना डाला है. यदि सरकार की हिन्दी को ख़त्म करने की मंशा है और सरकार भाषाई माध्यम से शिक्षा समाप्त करना ही चाहती है तो उसे बिना देर किए राजभाषा अधिनियम हटा देना चाहिए और पूरे देश में 'अंग्रेजी माध्यम' लागू कर देना चाहिए. ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी.

सोमवार, 18 मई 2015

क्या हासिल हुआ इन विश्व हिन्दी सम्मेलनों से?

१०वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के आधिकारिक जालस्थल की समीक्षा 
१७ मई २०१५.
भोपाल में १०-१२ को होने जा रहे १० वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के आधिकारिक जालस्थल का शुभारम्भ कल भारत की विदेश एवं प्रवासी भारतीय कार्य मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने किया उन्होंने सम्मेलन के शुभंकर का भी लोकार्पण किया. 

जालस्थल को देखकर मुझे प्रसन्नता हुई कि पहला सरकारी जालस्थल है जिसे पूरी तरह से नियमानुसार द्विभाषी रूप में बनाया गया है और इस पर हिन्दी को प्राथमिकता दी गयी है. वैसे संविधान के अनुसार भारत की राजभाषा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए पर विश्व हिन्दी सम्मेलन को आयोजित करने वाले 'विदेश मंत्रालय' की मुख्य वेबसाइट भी द्विभाषी नहीं है और न ही हिन्दी को प्राथमिकता दी गयी है. विदेश मंत्रालय की मुख्य वेबसाइट पूर्व निर्धारित रूप से अंग्रेजी में ही खुलती है. हम हिन्दी को विश्व भाषा बनाना चाहते हैं  पर अपने देश में ही उसे उसका स्थान दिलाने के लिए तैयार नहीं हैं. अब तक हुए पिछले नौ विश्व हिन्दी सम्मेलनों में क्या-२ प्रस्ताव पारित किए गए और उन पर कितना अमल किया गया, यह शोध का विषय है, चर्चा का विषय है. मेरा सुझाव यही है कि १०वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के कार्यक्रम में एक पूरा सत्र पिछले सम्मेलनों की समीक्षा पर खर्च किया जाना चाहिए ताकि जिन उद्देश्यों के लिए यह विश्व हिन्दी सम्मेलन किए जा रहे हैं, उनकी प्राप्ति की दिशा में कुछ ठोस कार्य शुरू हो सके. 


हाँ तो मैं बात कर रहा था, १०वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के आधिकारिक जालस्थल की. अब मैंने इसके सभी भाग देख लिए हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि इस जालस्थल की तैयारी बहुत हड़बड़ी में की गयी, क्या हिन्दी के लिए होने वाले एक विश्व स्तरीय सम्मेलन की वेबसाइट ऐसे बनाई जाती है जिसमें गलत हिन्दी (गलत वाक्य और गलत वर्तनी), गूगल से अनुदित हिन्दी, ऑनलाइन सेवाओं में हिन्दी नदारद, स्वागत सन्देश मुखपृष्ठ पर केवल अंग्रेजी में हो? 

अब जिसने यह वेबसाइट बनायी है और जिसने लोकार्पण से पूर्व इस वेबसाइट की सामग्री की जाँच की है उसके हिन्दी ज्ञान पर तरस आता है, ऐसी लापरवाही किसलिए और क्यों?

मुखपृष्ठ की स्पष्ट त्रुटियाँ: 
गलत वाक्य:आओ और 10 वीं विश्व हिंदी सम्मेलन में शामिल हों
सही वाक्य : आएँ और १०वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में सम्मिलित हों 
गलत वाक्यांश 10th विश्व हिन्दी सम्मेलन सही शब्दावली : १०वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन 
  • पूछे जाने वाले प्रश्न: सामान्य प्रश्न अथवा सामान्य प्रश्नोत्तर  
  • हैंडबुक : हस्तपुस्तिका 
  • साथी राज्य: सहयोगी राज्य 
  • फोटो गैलरी : चित्र दीर्घा 
  • एयरपोर्ट: विमानतल अथवा हवाई अड्डा 
  • ऑनलाईन : ऑनलाइन 
  • डिस्क्लेमर: अस्वीकरण 
  • गलत: मुलाकाती, सही : आगंतुक संख्या: 470
= सन्देश पर क्लिक करने पर नया पृष्ठ खुलता और लिखा आता है (इसका क्या आशय है)

श्री नरेन्द्र मोदी जल्द ही आ रहा ( "है" नहीं लगाया है और यहाँ भी वाक्य अधूरा है)

जबकि लिखना चाहिए 'श्री नरेंद्र मोदी जी का सन्देश शीघ्र प्रकाश्य" 

अब 'कमिंग सून' का अनुवाद तो ' जल्द ही आ रहा' की करना पड़ेगा. मौलिक रूप से लिखा जा सकता है तो अनुवाद की आवश्यकता क्यों? हिन्दी सम्मेलन की वेबसाइट भी अनुवाद के द्वारा क्यों बनायी जा रही है? इसी तरह 'रीड मोर' का अनुवाद 'अधिक पढ़ें' लिखा है जबकि सही मौलिक वाक्यांश'आगे पढ़ें' होना चाहिए, अनुवाद के दम हिन्दी ज्यादा दूर कैसे जाएगी? विश्व हिन्दी सम्मेलन की वेबसाइट भी मौलिक रूप से हिन्दी में नहीं बल्कि अंग्रेजी का अनुवाद करके बनेगी तो इसके मायने आप लगा सकते हैं.

= "गोपनीयता नीति' पर क्लिक करने पर "हमारी नीति" पृष्ठ खुल जाता है. वेबसाइटों के सम्बन्ध में गोपनीयता के बजाय 'निजता' शब्द सर्वमान्य है "हाइपर लिंकिंग नीति एवं प्रतिलिप्यधिकार नीति" पृष्ठ खुल जाता है. "मदद" पर क्लिक करने पर पृष्ठ केवल अंग्रेजी में खुलता है.

= गलत वाक्य: विदेशी प्रतिभागियों के लिए वीज़ा यदि आवश्यक हो तो, प्राप्त करने संबंधी कार्रवाई स्वयं करेंगे। 
सही वाक्य: यदि आवश्यक हो तो विदेशी प्रतिभागी वीज़ा प्राप्त करने की कार्यवाही स्वयं करें.

= गलत वाक्य: भारतीय दूतावास/कोंसलावास में वीज़ा आवेदन जमा करते समय सम्मेलन की पुष्टिकृत पंजीकरण कि आवश्यकता होगी।
सही वाक्य : भारतीय दूतावास/कोंसलावास में वीज़ा आवेदन जमा करते समय, प्रतिभागी का सम्मेलन के लिए सुनिश्चित पंजीकरण होना आवश्यक है.

= मुखपृष्ठ पर ही "अन्य कड़ियाँ" में दो कड़ियाँ दी गयी हैं और दोनों ही काम नहीं कर रही हैं. इसी प्रकार 'भारत के राष्ट्रीय पोर्टल' एवं विदेश मंत्रालय के पोर्टल के बैनर केवल अंग्रेजी में प्रदर्शित हैं और उन पर क्लिक करने पर 'अंग्रेजी पोर्टल' ही खुलते हैं अर्थात इन दोनों बैनर पर हिन्दी पोर्टलों को लिंक नहीं किया गया है.   

= गलत: पिछला अद्यतनीकृत, सही वाक्यांश : अंतिम बार अद्यतित : 16/5/2015

= गलत वाक्य: विदेश मंत्रालय, भारत सरकार के स्वामित्व वाली कॉपीराइट 
   सही वाक्य: कॉपीराइट विदेश मंत्रालय, भारत सरकार के स्वामित्व में 

विशेष: वेबसाइट का डोमेन नेम 'देवनागरी' में भी पंजीकृत करवाएँ एवं उसका भी प्रचार करें.

आशा है आप शीघ्र ही इन गलतियों को ठीक करवाने निर्देश जारी करेंगे ताकि इस कार्य में जो मैंने अपने समय और ऊर्जा का निवेश किया है वह व्यर्थ ना जाए. आपके द्वारा शीघ्र कार्यवाही एवं पत्रोत्तर की आशा रखता हूँ.

मुखपृष्ठ के चार चित्र संलग्न हैं जिनमें उपर्युक्त सभी त्रुटियों को लाल रंग से रेखांकित किया गया है. 

सेवा में,
श्री मृदुल कुमार,
संयुक्त सचिव (खाड़ीहिन्दी व संस्कृत)

कमरा सं. 80, साउथ ब्लाकविदेश मंत्रालय,
दूरभाष: 011-2301 3161
फैक्स: 011-23794138

ई-मेल: jshindi@mea.gov.in

गुरुवार, 14 मई 2015

प्रधानमंत्री कार्यालय से कुछ सवाल जिनका कोई उत्तर देना नहीं चाहते हैं अधिकारी

दिनांक: 13 मई 2015

सेवा में,
केन्द्रीय सूचना अधिकारी
प्रधानमंत्री कार्यालय,
नयी दिल्ली, भारत  

विषय: सूचना का अधिकार अधिनियम आवेदन

महोदय,
कृपया मेरे पिछले आवेदन क्र. PMOIN/R/2014/60666 का संज्ञान लें जो दिनांक 16/06/2014 को दाखिल किया गया था और उसके सम्बन्ध में प्रधानमंत्री कार्यालय ने पूरे छह माह में भी एक भी संतोषजनक उत्तर प्रदान नहीं किया था, विनम्र प्रार्थना है इस बार सही-२ सूचनाएँ प्रदान करें:

१.     प्रधानमन्त्री जी से संबंधित मोबाइल वेबसाइटों एवं मोबाइल एप में अभी तक राजभाषा हिन्दी का विकल्प उपलब्ध नहीं है, यह राजभाषा सम्बन्धी प्रधानमंत्री जी के 22 जुलाई 1999 के आदेश एवं 2 जुलाई 2008 को जारी राष्ट्रपति जी के आदेश (संख्या 20012 07 2005) का उल्लंघन है जिनमें 100% द्विभाषी वेबसाइट बनाने के लिए कहा गया है. इन आदेशों के उल्लंघन को रोकने हेतु इनमें राजभाषा एवं अन्य भारतीय भाषाओं के विकल्प जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय (“प्रमका”) की समृद्ध ‘आईटी टीम’ क्या क्या कदम उठा रही है?
२.     प्रधानमन्त्री कार्यालय के प्रशासनिक प्रधान (संयुक्त सचिव-प्रशासन) की अध्यक्षता में पिछले तीन साल में हुई बैठकों में कितनी बार राजभाषा हिन्दी के कार्यान्वयन सम्बन्धी विषय पर बार चर्चा हुई है, विवरण दें.
३.     फिलहाल प्रधानमन्त्री जी की मुख्य वेबसाइट 100% द्विभाषी नहीं है, उसमें ‘राष्ट्रीय रक्षा कोष’ एवं प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष’ में ऑनलाइन योगदान के पृष्ठ सिर्फ अंग्रेजी में हैं, अन्य कई टैब और अन्य वेबसाइटों के लिंक अभी भी सिर्फ अंग्रेजी में हैं, जो कि प्रधानमंत्री जी के 22 जुलाई 1999 के आदेश एवं राष्ट्रपति जी के 2 जुलाई 2008 के आदेश का उल्लंघन है, प्रमका ने राष्ट्रपति जी के आदेश के पालन के लिए क्या कार्यवाही की है?
४.     प्रधानमंत्री के चीनी सामाजिक मीडिया साइट वेइबो पर आधिकारिक वार्तालाप खाते पर नाम एवं परिचय सिर्फ चीनी भाषा में लिखा गया, सन्देश भी केवल चीनी भाषा में डाले जाते हैं जबकि प्रधानमंत्री जी के आधिकारिक फेसबुक/यूट्यूब/ट्विटर आदि खातों पर नाम-परिचय में भारत सरकार की राजभाषा हिन्दी को कोई स्थान नहीं दिया गया है, ऐसा करने का निर्णय किसने लिया? वहाँ किस नियम के तहत नाम-परिचय में राजभाषा हिन्दी को प्रयोग नहीं किया गया है, नियम की प्रति प्रदान करें?
५.     किसी न किसी नियम/आदेश/निर्णय के अनुसार ही प्रमका में कामकाज संचालित होता इसलिए बताएँ कि प्रधानमंत्री जी के आधिकारिक फेसबुक/यूट्यूब/ट्विटर आदि खातों पर अंग्रेजी को प्राथमिकता देने का निर्णय/आदेश किस अधिकारी ने लिया है?
६.     प्रधानमंत्री जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों को संभालने वाली सोशल मीडिया टीम में नियुक्त अधिकारी/अधिकारियों के नाम,पदनाम एवं ईमेल पते सूचित करें? इनमें से कितने अधिकारियों को हिन्दी टंकण का ज्ञान है?
७.     संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार भारत की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी है इसलिए भारत सरकार के हर कार्यालय में हिन्दी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए पर  प्रधानमंत्री जी से संबंधित सभी वेबसाइटें प्राथमिक आधार पर स्वतः (बाई डिफाल्ट) अंग्रेजी में खुलती हैं, ऐसा निर्णय किसने लिया? जब श्री मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तब तक प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट का होमपेज बाई डिफाल्ट द्विभाषी था, जिसमें राजभाषा हिन्दी को प्राथमिकता दी गई थी, अंग्रेजी को प्राथमिकता देने का निर्णय किस अधिकारी ने लिया?

बुधवार, 13 मई 2015

राष्ट्रपति सचिवालय से कुछ चुभते प्रश्न

१.     राष्ट्रपति भवन की जो ऑनलाइन सेवाएँ केवल अंग्रेजी में हैं उनका इस्तेमाल करने के लिए भारत के अंग्रेजी ना जानने वाले लगभग 110 करोड़ नागरिकों के लिए राष्ट्रपति सचिवालय ने क्या व्यवस्था की है? भारतीय भाषाभाषी नागरिकों को इन सेवाओं का इस्तेमाल करने के लिए राष्ट्रपति सचिवालय में किस व्यक्ति से संपर्क करना चाहिए?
२.     राष्ट्रपति भवन का भ्रमण करने के लिए ऑनलाइन आरक्षण की ऑनलाइन व्यवस्था राजभाषा हिन्दी में उपलब्ध नहीं है जबकि 2 जुलाई 2008 को राष्ट्रपति जी ने स्वयं आदेश जारी किया था कि भारत सरकार की समस्त वेबसाइटें 100% द्विभाषी होनी चाहिए ?
३.     राष्ट्रपति जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों पर समस्त जानकारी केवल अंग्रेजी में डाली जाती है जिसे देश के 90% नागरिक पढ़ भी नहीं सकते हैं तो क्या राष्ट्रपति जी केवल अंग्रेजी जानने वाली जनता से ही संवाद करना चाहते हैं, हम जैसी अंग्रेजी ना जानने वाली जनता को उनके सचिवालय की गतिविधियों को जानने का कोई अधिकार नहीं है?
४.     क्या राष्ट्रपति जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों पर राजभाषा हिन्दी में जानकारी डालने के लिए संबंधित अधिकारी को कोई निर्देश नहीं दिया गया है?
५.     राष्ट्रपति जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों पर केवल अंग्रेजी में जानकारी डालने के लिए नियुक्त अधिकारी/अधिकारियों के नाम /पदनाम/ईमेल पते प्रदान करें ताकि मैं उनसे प्रार्थना कर सकूँ कि महोदय, अंग्रेजी भारत की भाषा नहीं है और इस देश 95% जनता इस इस विदेशी भाषा को नहीं जानती है इसलिए राष्ट्रपति जी के ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब पर नवीनतम जानकारी हिन्दी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं में भी डालते रहें ताकि मुझ जैसे अंग्रेजी ना जानने वाले देश के करोड़ों लोग भी राष्ट्रपति जी के बारे में नवीनतम सूचनाएँ प्राप्त करे सकें? (इज़रायल सरकार, फ़्रांस सरकार, जर्मन सरकार, अमरीकी दूतावास (दिल्ली) ने भी अपने फेसबुक/ट्विटर के आधिकारिक पेजों पर नियमित जानकारी हिन्दी में डालना शुरू किया है, जब विदेशी लोग इस बात को समझ रहे हैं कि भारत की जनता से संवाद के लिए जनभाषा से बेहतर कुछ नहीं है तो राष्ट्रपति सचिवालय अपनी राजभाषा की अनदेखी कैसे कर सकता है)
६.     राष्ट्रपति जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों पर फिलहाल नाम/परिचय विदेशी भाषा अंग्रेजी में लिखा गया है, क्या उसमें राजभाषा हिन्दी को शामिल करने में कोई नियम आड़े आता है इसलिए राजभाषा को स्थान नहीं दिया गया है? (द्विभाषी अनुलग्नक देखें)
७.     संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार भारत की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी है पर राष्ट्रपति जी से संबंधित सभी वेबसाइट स्वतः (डिफाल्ट) अंग्रेजी में खुलती हैं इस तरह राष्ट्रपति सचिवालय ने राजभाषा हिन्दी को अंग्रेजी से कमतर आँका है, हिंदी को अंग्रेजी से ओछा समझा है वर्ना क्या कारण है कि हिन्दी वेबसाइट को प्राथमिकता नहीं दी जा रही? अंतिम अनुलग्नक “द्विभाषी होमपेज” देखें (बड़े दुःख की बात है कि भारत के संविधान में लिखा है कि हिन्दी राजभाषा है पर राष्ट्रपति सचिवालय अपनी वेबसाइटों के होमपेज द्विभाषी बनाने के लिए राजी नहीं है और ना ऐसी व्यवस्था करने के लिए तैयार है जिसमें राष्ट्रपति जी की वेबसाइटें द्विभाषी रूप में खुलें.)
८.     क्या राष्ट्रपति भवन के नियमों में लिखा है कि राष्ट्रपति जी से संबंधित कोई भी वेबसाइट बाई डिफाल्ट हिन्दी में नहीं खुलनी चाहिए? भले ही आप कहें कि पहले हिंदी वेबसाइट खुलने का कोई नियम नहीं है तो क्या अंग्रेजी वेबसाइट पहले खुले उसका नियम/आदेश है, यदि ऐसा नियम/आदेश है तो वह नियम/आदेश उपलब्ध करवाएँ?
९.     भारत सरकार ने अक्तूबर 2014 में भारत की प्रमुख भाषाओं की लिपियों में वेबसाइट डोमेन नाम पंजीयन की व्यवस्था शुरू की है. चूँकि भारत की आधिकारिक लिपि “देवनागरी लिपि” है इसलिए राष्ट्रपति.भारत, राष्ट्रपतिसचिवालय.भारत, राष्ट्रपतिभवन.भारत जैसे डोमेन नाम पंजीकृत करवाए जाने चाहिए कृपया सूचित करें कि क्या राष्ट्रपति सचिवालय ने इस विषय में कोई कदम उठाया है?

राष्ट्रपति सचिवालय ने एक भी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया और आवेदन लौटा दिया है, हिन्दी की उपेक्षा के लिए लगाये इस आवेदन को लौटने का कारण लिखने के लिए भी #अंग्रेजी प्रयोग की गई:

रविवार, 11 जनवरी 2015

भारत का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय अभी भी अंग्रेजों के अधीन है!

शीर्षक पढ़कर आपको आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि देखा जाए तो भारत आज भी स्वतंत्र नहीं हुआ है, जबकि पूरी भारत सरकार ही अंग्रेजी दासता से ग्रस्त है जिसका नाम है गवर्नमेंट ऑफ़ इण्डिया. जिस शासन का नाम भी ६८ वर्षों बाद अंग्रेजी में हो वहाँ आप कैसी स्वतंत्रता की कल्पना करेंगे? १५ अगस्त १९४७ के बाद बस बदलाव इतना आया है कि पहले ब्रिटेन से आए हुए शासक हम पर शासन करते थे और अब भारत में जन्मे अंग्रेज हम पर शासन कर रहे हैं.

पिछले तीन वर्षों से मैं और देश के अनेक भाषा-प्रेमी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में राजभाषा का प्रयोग ना किए जाने और जनता से  जुड़ी सभी ऑनलाइन सुविधाएँ सिर्फ अंग्रेजी में थोपने की कई बार शिकायतें कर चुके हैं, कई बार आर टी आई आवेदन भी लगा चुके हैं पर क्या करें हम लोगों के सारे प्रयास व्यर्थ जा रहे हैं, हिन्दी के लिए आवाज उठाने वालों की सुनता भी कौन है? 

शायद मंत्रालय में एक भी ऐसा अधिकारी नहीं है जो आम जनता की सुविधा/उनके दुःख-कष्ट समझने को लेकर गंभीर हो, अन्यथा इस मंत्रालय का कामकाज राजभाषा/जनभाषा #हिन्दी में हो रहा होता, ऑनलाइन सेवाएँ हिन्दी/अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं में होतीं, मंत्रालय की वेबसाइटों पर हिन्दी में जानकारी, नियम, नीतियाँ, आदेश, अधिनियम आदि उपलब्ध होते, हिन्दी में ऑनलाइन शिकायतें दर्ज करवाने के विकल्प उपलब्ध होते. पर  ऐसा नहीं हुआ. ये अधिकारी अपने अंग्रेजी कामकाज के पीछे एक ही तर्क लेते हैं कि संविधान ने अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा दिया है और भारत की जनता पर विशेष रूप से दक्षिण की जनता पर हिन्दी लागू करने से देश के टुकड़े हो जाएँगे, राजनीतिक अराजकता फ़ैल जाएगी पर वे भूल जाते हैं कि वे देश सत्तानवे प्रतिशत नागरिकों  पर बलात अंग्रेजी थोप रहे हैं! उनके हिसाब से अंग्रेजी में काम करना बहुत आसान है और अंग्रेजी में कामकाज होने से देश के सत्तानवे प्रतिशत लोग कभी समझ ही नहीं पाते कि हो क्या रहा है इसलिए वे इन अधिकारियों के कामकाज पर ऊँगली नहीं उठा पाते हैं, सरकारी अधिकारी ऐसा करके स्वयं का भला करे हैं, यदि यही काम हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में किया गया तो उनको अप्रिय प्रश्नों का सामना करना होगा. दूसरी बात, इन अधिकारियों को आम नागरिकों की सुविधा की तनिक भी चिंता नहीं है इसलिए सारे नियम, अधिनियम, दिशा-निर्देश, नीतियाँ केवल अंग्रेजी में ही तैयार किए जाते हैं और उन्हें अंग्रेजी में ही जनता के सुझावों के लिए जारी कर दिया जाता है. अब जब नीतियाँ-नियम अंग्रेजी में जारी होंगे तो उन पर सुझाव कौन दे सकेगा? अरे भई, वही आदमी दे सकेगा जो अंग्रेजी पढ़ सकता हो, उसे समझ सकता हो और पढ़-समझने के बाद अपना सुझाव अंग्रेजी में लिख सकने की योग्यता रखता हो. मेरे विचार में भारत में अंग्रेजी के ऐसे निष्णात विद्वानों की संख्या २-३ प्रतिशत से अधिक नहीं है. ऐसा सरकारी अधिकारी इसलिए करते हैं ताकि देश की आम जनता किसी भी प्रकार से नीति-नियम के निर्माण में भाग ना ले सके, इस देश में जो अंग्रेजी ना समझ सकता हो वह तीसरे दर्जे का आदमी है, उसकी क्या हैसियत कि वो आईएएस अधिकारियों को अपनी मातृभाषाओं में सुझाव देने की जुर्रत करे?

तो देश में २-३ प्रतिशत लोगों की सुविधा के अनुसार नीतियाँ और कानून बनाए जाते हैं और उन्हें देश के 100% लोगों पर लागू कर दिया जाता है. अभी २-३ दिन पहले स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति' का प्रारूपण अपनी वेबसाइट पर अंग्रेजी में डाला है और इस पर ऑनलाइन सुझाव देने की व्यवस्था भी अंग्रेजी में शुरू की है. (लिंक: http://www.mohfw.nic.in/index1.php?lang=1&level=1&sublinkid=4883&lid=3013 ) क्या यही लोकतंत्र है जहाँ राजभाषा का प्रयोग ना किया जाए, जहाँ  नीति निर्माण से  देश की सत्तानवे प्रतिशत जनता हो सिर्फ इसलिए अलग रखा जाए क्योंकि वह जनता अंग्रेजी नहीं जानती है? भारत सरकार का आम जनता से जुड़ा हर कामकाज एक ऐसी भाषा में किया जा रहा है जिसे देश की सत्तानवे प्रतिशत जनता समझ भी नहीं सकती है. 

पिछले तीन वर्षों से मैंने निम्न बिंदु उठाए:
  1. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की मुख्य वेबसाइट पूर्ण रूप से हिन्दी में बनाई जाए.
  2. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की अधीनस्थ सभी वेबसाइटों को हिन्दी में बनाया जाए.
  3. आयुष विभाग की हिन्दी वेबसाइट पर हिन्दी में जानकारी डाली जाए.
  4. 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति' का प्रारूपण अविलम्ब हिन्दी में उपलब्ध हो, ऑनलाइन सुझाव की सुविधा हिंदी में शुरू की जाए. आगे हमेशा जनता के सुझाव चाहने वाले सभी मसौदों को हिन्दी में जारी किया जाए.
  5. मंत्रालय की सभी ऑनलाइन सेवाएँ अनिवार्य रूप से द्विभाषी हों.
  6. मंत्रालय द्वारा सभी प्रारूप/मुहरें/पत्रशीर्ष/लिफ़ाफ़े अनिवार्य रूप से द्विभाषी छपाए जाएँ.
  7. मंत्रालय की अधीनस्थ कंपनियों के उत्पादों पर जानकारी हिन्दी में भी छापी जाए.
  8. मंत्रालय द्वारा विज्ञप्तियाँ हिंदी में जारी की जाएँ/आमंत्रण/कार्यक्रमों के बैनर/पोस्टर/नामपट/बैज आदि द्विभाषी छपवाए जाएं. (एक-दो अपवाद छोड़ हमेशा अंग्रेजी में होते हैं)
  9. मंत्रालय एवं अधीनस्थ कार्यालयों के द्वारा जारी होने वाले लाइसेंस/प्रमाण-पत्र/पंजीयन -पत्र आदि अनिवार्य रूप से द्विभाषी जारी किए जाएँ.
  10. भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की वेबसाइट एवं ऑनलाइन लाइसेंस/पंजीयन सुविधा हिन्दी में शुरू करवाई जाए.

आप देखेंगे कि उक्त दस बिन्दुओं में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा राजभाषा अधिनियम, राजभाषा नियमावली, निर्देश अथवा संसदीय राजभाषा समिति की अनुशंसाओं पर जारी हुए राष्ट्रपति जी के अनेक आदेशों का निरंतर उल्लंघन किया जा रहा है. 

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

हम अपनी भाषाओं के प्रति इतने असंवेदनशील क्यों है?

जर्मन क्यों?

अमृत मेहता, सम्पादक, विदेशी भाषा साहित्य की हिन्दी पत्रिका "सार संसार"

इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैं जर्मन भाषा तथा साहित्य का अदम्य समर्थक हूँ, और अब तक मुझ द्वारा अनूदित 72 साहित्यिक कृतियों में से 66 का अनुवाद जर्मन से किया गया है. हिन्दी  मेरी मातृभाषा है, इसका प्रमाण इसी में है कि 72 में से 70कृतियों मे लक्ष्य भाषा हिन्दी  रही है, और दो में पंजाबी. अब तक मैं 208 जर्मनभाषी लेखकों की कृतियों का जर्मन से हिन्दी  में अनुवाद कर चुका हूँ, और कुल मिला कर 222 जर्मन लेखकों कि कृतियाँ प्रकाशित कर चुका हूँ. काफ़ी हद तक अपना धन लगा कर भी. अपनी पत्रिका “सार संसार” के माध्यम से मैंने 72 ऐसे नए अनुवादकों को जन्म दिया है, जो विदेशी भाषाओँ से सीधे हिन्दी  में अनुवाद करते हैं, जिनमें से 16 जर्मन-हिन्दी  अनुवादक हैं. पूरे विश्व में इन आंकड़ों के बराबर कोई नहीं पहुंचा, और यह वक्तव्य मैं पूरी ज़िम्मेदारी से दे रहा हूँ.

भारत के केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के स्थान पर केवल जर्मन को सुशोभित करना एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण है, और जिस तरह से इस भाषा को भारतीय बच्चों पर लादा गया है, वह न केवल असंवैधानिक है, बल्कि इस से यह भी उजागर होता है कि भारत को स्वयं में इतना ढीला-ढीला देश माना जाता है कि यहाँ पर कोई भी विदेशी शक्ति जो चाहे करवा सकती है, चाहे घूस के बल पर अथवा बहला-फुसला कर. इस प्रकरण में कौन सा तरीका अपनाया गया है, यह तथ्यों की गहराई में जाने से मालूम पड़ सकता है.

यह मामला 2014 में मानव संसाधन मंत्री सुश्री स्मृति ईरानी की सतर्कता से उजागर हुआ है, परन्तु तीन वर्ष में कुछ लोग इस सन्दर्भ में जो करने में सफल हुए हैं, वह हमारी शासन प्रणाली पर एक गंभीर प्रश्न-चिन्ह है. मैं 2009 से जानता हूँ कि कोई संदिग्ध खिचड़ी पक रही थी, परन्तु मेरी जानकारी में केवल इतना ही था कि हिन्दी  तथा अन्य भारतीय भाषाओँ के अस्तित्व पर कुठाराघात करके कुछ जर्मनभाषी सांस्कृतिक दूत अंग्रेज़ी को भारत की मुख्य भाषा सिद्ध करने पर तुले हुए थे. मैंने इसका जम कर विरोध किया है, बहुत कुछ लिखा है, और मुझे इसकी काफ़ी क़ीमत भी चुकानी पड़ी है. जर्मन का वर्चस्व जिस तरह से सरकारी स्कूलों में स्थापित किया जा रहा था, वह जुड़ा इसी सन्दर्भ से था, परन्तु मुझे यही भ्रम रहा कि यह भारत सरकार की इच्छा से हो रहा है, एक नीतिगत निर्णय है, अतः इस का विरोध करना निरर्थक होगा.

2009 में मैं बर्लिन के साहित्य-सम्मेलन की ग्रीष्म-अकादमी में हिस्सा ले रहा था, जहाँ जर्मनी के अनेकों प्रकाशक तथा गोएथे-संस्थान के लोग भी उपस्थित थे. सब मुझ से पूछ रहे थे कि क्या मैं नवीन किशोर को जानता हूँ. किशोर कोलकाता के सीगल्ल-बुक्स-प्रकाशन के मालिक हैं, और तब तक अपना व्यापार लन्दन से चला रहे थे, क्योंकि वह पुस्तकें अंग्रेज़ी की प्रकाशित करते हैं. सब मुझे बता रहे थे कि वे किशोर से मिलने कोलकाता जा रहे थे. कारण पूछने पर मुझे बताया गया कि आगे से वे जर्मन पुस्तकों के अंग्रेज़ी अनुवाद भारत से ही करवा कर वहीँ प्रकाशित करवाया करेंगे. यह एक बहुत ही चौंका देने वाली सूचना थी. मेरे यह कहने पर कि कोई भी भारतीय जर्मन साहित्य का अनुवाद अंग्रेज़ी में कर पाने में समर्थ नहीं होगा, और वैसे भी अज्ञात जर्मन लेखकों की पुस्तकें पढ़ने में भारतीय दिलचस्पी नहीं लेंगे तो मुझ पर यह कह कर हंसा गया कि हर भारतीय अंग्रेज़ी जानता है, और मैं उन्हें भ्रमित कर रहा हूँ. उनके इस विश्वास की पृष्ठभूमि में भारत में कुछ वर्षों से चल रहा एक अंग्रेज़ी-समर्थक अभियान था. इस बारे में मैं वेबज़ीन “सृजनगाथा” में मई 2010 में प्रकाशित अपने एक बहुचर्चित आलेख में विस्तार से लिख चुका हूँ. यह भी कि मैंने जर्मनी के एक प्रमुख प्रकाशन “ज़ूअरकांप फर्लाग” की प्रमुख पेट्रा हार्ट को एक मेल लिख कर अपना कड़ा विरोध जताया था तो उन्होंने मुझे जवाब में लिखा था कि ये पुस्तकें केवल अंग्रेज़ीभाषी देशों, जैसे अमरीका तथा इंगलैंड के लिए हैं, इन्हें छपवाया भारत में जायेगा, बेचा विदेश में जायेगा, और इनका अनुवाद भी अँगरेज़ करेंगे. पेट्रा एक सीधी-सच्ची महिला हैं और उनके कथन में सत्य है. जर्मन से अंग्रेज़ी में अनूदित, भारत में प्रकाशित पुस्तकें भारत में उपलब्ध नहीं हैं, अंग्रेज़ीभाषी देशों में ही बेचीं जा रही हैं. इसका सीधा सा मतलब है: भारत में पुस्तकें सस्ती छपती हैं, तो इस से प्रकाशकों का मुनाफ़ा कई गुणा बढ़ जाता है. परन्तु इसका चिंताजनक पहलू यह रहा कि इसके साथ ही भारत में, विशेषकर गोएथे संस्थान द्वारा एक हिन्दी -विरोधी अभियान भी शुरू हो गया, जिसके अंतर्गत, एक जर्मनभाषी सांस्कृतिक दूत के शब्दों में: “दिल्ली से बाहर कदम रख कर देखो तो कोई भी हिन्दी  नहीं बोलता.” इस अज्ञान को क्षमा करने का कोई कारण नहीं है, लेकिन इसके मंतव्य को समझते हुए यह  निस्सहाय रोष को जन्म देने वाला एक वक्तव्य है. बहरहाल यह समझ में आने वाली बात है कि वैश्वीकरण के इस युग में कोई कम लागत में किसी दूसरे देश के सस्ते कामगारों का लाभ उठा रहा है, जबकि इस  सांस्कृतिक दूत का कथन था कि वे यहाँ पर लोगों को रोज़गार उपलब्ध करवा रहे हैं.

लेकिन अभी तक जो एकदम अबोधगम्य रहा है, वह है भारत के संविधान की अवहेलना करते हुए जर्मन को भारत में बढ़ावा देना. इससे क्या मिलने वाला है जर्मनी को, या किसी अन्य जर्मनभाषी देश, अर्थात आस्ट्रिया अथवा स्विट्ज़रलैंड को? उनके लिए भारतीय बच्चों को जर्मन सिखाना इतना अधिक महत्व रखता है कि उन्होंने चुपचाप मानव संसाधन मंत्रालय को नज़रंदाज़ करते हुए गुप-चुप केन्द्रीय विद्यालय संगठन से इकरारनामा कर डाला और उसके बाद प्रति वर्ष लाखों यूरो जर्मन के प्रचार-प्रसार पर खर्च करते रहे. यह तर्क किसी के गले नहीं उतरने वाला कि जर्मन सरकार चाहती है कि भारत के प्रतिभाशाली छात्र इससे जर्मन विश्वविद्यालयों में शिक्षा पाने को आतुर हो जायेंगे. स्कूल में पढ़ी जर्मन बड़े होने के बाद कहाँ बची रह जाती है? मेरे छोटे बेटे ने स्कूल में तीसरी भाषा के तौर पर फ्रेंच ली थी, और अब वह ‘कोमा ताले वू?’ (कैसे हो?) के अलावा और कोई वाक्य नहीं जानता. मेरे ज्येष्ठ पुत्र ने कॉलेज में पढ़ते हुए गोएथे-संस्थान से दो सत्र में जर्मन सीखी थी, २४ वर्ष की आयु में, अपनी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था उसने, लेकिन अब वह “शुभ प्रातः” या “शुभ संध्या” तक ही सिमट कर रह गया है. एक तर्क और है कि अभी तक जर्मन की शिक्षा केवल निजी स्कूलों के बच्चों तक, अर्थात अमीर बच्चों तक ही सीमित रही है, और केंद्रीय विद्यालयों में इसे लगा कर गरीब बच्चों के लिए जर्मन भाषा की शिक्षा उपलब्ध करवाई जा रही है, जो स्वयं में एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है, 20.11.14 को समाचारपत्रों में निकली एक खबर के अनुसार हमारे सांसद इन विद्यालयों में प्रति वर्ष 15 सीटों का कोटा अपने बच्चों के लिए आरक्षित करवाना चाहते हैं, इसी से मालूम पड़ जाता है कि इन विद्यालयों में पड़ने वाले बच्चे कितने गरीब हैं. न जाने ऐसा कितना अज्ञान इनके आसपास घूमने वाले अंग्रेजीदां हिंदुस्तानियों ने इनके भेजे में भर दिया है कि ये लोग अपनी नाक के आगे ज़्यादा दूर तक नहीं देख पाते.

कुल मिला कर यह एक अचरज में डालने वाला विषय है कि क्या जर्मन का भारतीय स्कूलों में पढ़ाया जाना गोएथे संस्थान या जर्मन दूतावास के या जर्मन सरकार के लिए इतना गंभीर विषय है कि उसके लिए संदिग्ध प्रणाली से एक समझौता करना, पानी की तरह पैसा बहाना तथा जर्मन चांसलर मैडम मेर्केल का भारतीय प्रधानमंत्री से एक महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन के दौरान बात करना अनिवार्य हो गया? किसी भी जर्मन या भारतीय नागरिक के लिए यह गोरखधंधा अबोधगम्य ही रहेगा. सुप्रसिद्ध साहित्यकार ई.एम.फोस्टर ने एक बार कहीं लिखा था: If I had to choose between betraying my country and betraying my friend, I hope I should have the guts to betray my country, अर्थात यदि मेरे सामने अगर दुविधा हो कि मैं देश से गद्दारी करूं या दोस्त से, तो उम्मीद रखता हूँ कि मुझमें देश से गद्दारी करने का साहस होगा.

जर्मनों तथा जर्मनभाषियों से मेरा संपर्क तथा मेरे सम्बन्ध गत 41 वर्षों से हैं, और मैं भली-भांति जानता हूँ कि जर्मेनिक नस्ल दोस्ती निभाने के मामले में मिसालें क़ायम कर सकती है, पर देश से गद्दारी?...मैं सोच भी नहीं सकता था, परन्तु इस प्रकरण में कहीं जा कर यह उक्ति इन के सन्दर्भ में सार्थक प्रतीत होती है. यह तो मैं गत 15 वर्षों से जानता हूँ कि ये लोग भारतीय दोस्तों द्वारा बरगलाये जाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं.

गोएथे-संस्थान दशकों से भारत में निरंकुशता से जर्मन-भारतीय भाषा अनुवाद क्षेत्र में निरीह हिन्दी  पाठकों पर जर्मन साहित्य के घटिया अनुवाद थोप रहा है. विष्णु खरे इसके आधिकारिक अनुवादक रहे हैं, जो खुद मानते हैं कि उनका जर्मन-ज्ञान अल्प है. संस्थान हिन्दी  में उत्तम अनुवाद नहीं होने देता, अगर कोई करता है तो उसे प्रताड़ित करता हैं, उससे उसके प्रकाशक छीन लेता है, अपने दोस्त प्रकाशकों पर थोप देता है, कि इनसे अनुवाद करवाओ. जब उनके अनुवाद ऐसे होते हैं कि हिन्दी  पाठक उन्हें पढ़ते हुए अपना माथा पीट ले, तो भी प्रकाशक के साथ ज़बरदस्ती की जाती है कि उसे वही अनुवाद छापने होंगे. यह उनके अपने साहित्य का अपमान नहीं है तो क्या है? इस विषय पर जर्मनी तथा आस्ट्रिया की दो शोध-पत्रिकाओं में मैं जर्मन भाषा में 14-15 पृष्ठों का एक विस्तृत लेख प्रकाशित कर चुका हूँ. खेद का विषय है कि मुझे इस प्रवृत्ति को कड़े शब्दों में लताड़ना पड़ा है; किसी प्रश्न का कोई उत्तर तो इनके पास नहीं है, लेकिन लोगों से निजी वार्तालापों में इसके अधिकारी मेरे प्रति अपनी आक्रोश जताते रहते हैं. इनकी निरंकुशता अब इस हद तक बढ़ चुकी है कि ये अनधिकृत रूप से देश से संस्कृत तथा अन्य भारतीय भाषाएँ मिटा कर जर्मन को स्थापित करने कि लिए दशकों से बने मधुर भारत-जर्मन संबंधों में दरार लाने पर भी उतारू हो गए हैं.

बात जर्मनों के जिगरी दोस्त होने की हो रही थी. 50 वर्ष से अधिक समय से गोएथे-संस्थान का एक जिगरी दोस्त प्रमोद तलगेरी नाम का एक जर्मन प्रोफ़ेसर रहा है. जर्मन भाषा और साहित्य के मामले में यह हमेशा उनका प्रमुख परामर्शदाता रहा है. गत कुछ वर्ष ऐबरहार्ट वेल्लर संस्थान की दक्षिण एशिया-शाखा के भाषा-विभाग के प्रमुख रहे थे. उनके कार्यकाल के दौरान भारतीय विश्वविद्यालयों में जर्मन के वही शिक्षक फले-फूले, जो वेल्लर तथा तलगेरी की युगल-जोड़ी को दंडवत प्रणाम करते रहे. और ये उन्हें बार-बार जर्मनी की सैर करवाते रहे.. लेकिन वेल्लर के ज़माने में भारत में जर्मन भाषा ख़ूब फली-फूली, भले ही इसकी उन्नति के तौर-तरीके संदिग्ध थे. इन्हीं के ज़माने में हिन्दी  के प्रति संस्थान की शत्रुता खुल कर प्रकट हुई. इन्होने देश के कई कोनों में जर्मन सेंटर खुलवाए, अपने पिच्छ्लग्गुओं को वहां नियुक्त कर दिया. एक उदाहरण ही इनकी कार्यविधि को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त होगा. इन्होंने चंडीगढ़ के सेक्टर 34 में एक गोएथे-सेंटर खुलवाया, जिसे पूरे उत्तर भारत में जर्मन भाषा सीखने के लिए एकमात्र सेंटर का दर्ज़ा प्रदान किया गिया, और जिसके बारे में घोषणा की गई कि दिल्ली की इंदिरा गाँधी ओपन यूनिवर्सिटी की भागीदारी इसके साथ होगी. यहाँ उल्लेखनीय है कि इस निजी-सेंटर के कर्ता-धर्ता निदेशक सिर्फ़ एम.ऐ. हैं, तथा किसी कॉलेज या यूनिवेर्सिटी में शिक्षक की नौकरी नहीं पा सके, क्योंकि यू.जी.सी. की नेट परीक्षा पास नहीं कर सके, परन्तु, यदि हम वेल्लर के शब्दों पर विश्वास करें तो इन्हें – वेल्लर तथा तलगेरी की कृपा से - एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर का दर्ज़ा संभवतः मिल चुका है. यह अनिवार्य है कि जांच की जाये: क्या इंदिरा गाँधी ओपन यूनिवर्सिटी से भी गोएथे-संस्थान ने ऐसा कोई अवैध समझौता किया है?   यह स्वतःस्पष्ट है कि भारत में जर्मन का प्रचार-प्रसार बढ़ाने से वेल्लर की प्रतिष्ठा गोएथे-संस्थान के म्यूनिख मुख्यालय में बढ़ी और तलगेरी की जर्मन दूतावास इत्यादि में. और इस प्रतिष्ठा की दरकार तलगेरी को बहुत बुरी तरह से थी.

गोएथे-संस्थान, जर्मन दूतावास तथा अन्य जर्मनभाषी देशों के दूतावासों के घनिष्ठ मित्र प्रमोद तलगेरी भारत सरकार के अपराधी हैं, अतः इन्हें भारतीय यूनिवर्सिटी सिस्टम से बहिष्कृत किया जा चुका है, और मानव संसाधन मंत्रालय ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग के आदेश पर एक यूनिवर्सिटी में इनके भ्रष्टाचार के मामलों को दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार की कड़ी नाराज़गी इनके प्रति प्रकट की है. यह कभी हैदराबाद में एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय के उपकुलपति होते थे, और अब अपने आप को इंडिया इंटरनेशनल मल्टीवेर्सिटी, पुणे, का उपकुलपति बताते हैं. वास्तव में यह “वेर्सिटी” न तो “यूनिवर्सिटी” है, न ही “इंटरनेशनल” है, और न ही यह इसके उपकुलपति हैं. जर्मनों के यह घनिष्ट मित्र दशकों से मक्कारियों और घोटालों के लिए जाने जाते रहे हैं, और स्वयं पर हाल में हुए कुठाराघात से निज़ात पाने के लिए इनके लिए अपने मित्रों के लिए कुछ नया करना अनिवार्य था. यह फ़रवरी 2014 में “अपनी यूनिवर्सिटी” में जर्मन, स्विस तथा आस्ट्रियाई दूतावास के सहयोग से  “भारत में जर्मन के शिक्षण” के सौ वर्ष की जयंती” बड़ी धूमधाम से मनाने वाले थे. मुझे जब यह सूचना स्विस दूतावास की सांस्कृतिक सचिव, ज़ारा बेरनास्कोनी, से मिली कि तीनों दूतावास इंडिया इन्टरनेशनल मल्टीवेर्सिटी में जा कर यह समारोह आयोजित करने जा रहे हैं तो मैंने उन्हें सच्चाई से परिचित करवाया. वह आश्चर्यचकित हुईं और उन्होंने मेरे कथन पर विश्वास नहीं किया. मैनें उन्हें कोरिएर से प्रमाण भेजे तो उन्हें यकीन आया. ये सब प्रमाण इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं. 

तथ्य ये हैं:

वेर्सिटी का पता कहीं पर कुछ है, कहीं कुछ और है, कुछ पता नहीं कि यह कब स्थापित हुई थी, 2000 से 2012 तक कई तारीखें हैं इसमें, वेर्सिटी में छात्रों की संख्या:0, शिक्षकों की संख्या:0, कमरों की संख्या:0, कम्प्यूटरों की संख्या:0, कुछ भी नहीं वहां पर, कुल मिला कर वेर्सिटी के पास6,36,122 रूपये का बजट है, जो उन्हें किसी ने दान में दिये हैं, जिस में से 5,40,000 रूपये कर्मचारियों में बांटे गए हैं. वेर्सिटी को न तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और न ही तकनीकी शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त है, जो हर सही यूनिवर्सिटी के लिए अनिवार्य होती है. कहीं पर इसे कॉलेज बताया गया है, कहीं एक वाणिज्यिक संस्था, कहीं कल्याणकारी संस्था और कहीं गैर-सरकारी संगठन के रूप में इसका परिचय दिया गया है; विकिपीडिया में इसे एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बताया गया है, जिसे तलगेरी चला रहे हैं. और कि इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी एक ग्रामीण यूनिवर्सिटी है, प्रमोद तलगेरी जिसके “Appily Adhikari” और “Principal” हैं. स्विस राजदूत लीनुस फॉन कास्टेलमूर को भी मैंने आगाह किया कि ऐसे व्यक्तियों से बच कर रहें. यथासंभव जर्मन से जुड़े हर व्यक्ति को देश-विदेश में आगाह किया. समारोह अंततः पुणे यूनिवर्सिटी में संपन्न हुआ, वहां जर्मन राजदूत मिषाएल श्टाइनर ही उपस्थित थे, परन्तु उन्होंने तलगेरी को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद अवश्य दिया. और सबसे अधिक हैरत की बात यह है कि इसी वर्ष अप्रैल में गोएथे-संस्थान ने तलगेरी को भारत तथा जर्मनी के मध्य सांस्कृतिक तथा साहित्यिक संबंधों को असाधारण प्रोत्साहन देने के लिए मेर्क-टैगोर पुरस्कार से सम्मानित किया है. स्पष्ट है कि किस लिए दिया गया है यह सम्मान. कई बार तो पता नहीं चलता कि इनकी निष्ठां भारत के प्रति है या जर्मनी के प्रति. जर्मन दूतावास की 17.11.2009 की एक प्रेस विज्ञप्ति में तलगेरी को जर्मनी के प्रान्त बाडेन व्युर्त्तेमबेर्ग के मुख्यमंत्री ग्युंटर एच. अयोत्तिन्गेर के साथ आये प्रतिनिधिमंडल का सदस्य बताया गया है. यदि जर्मन हमारे देश में अपनी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए दम लगते हैं तो यह एक स्वाभाविक बात है, यह उनका काम है, परन्तु यदि एक भारतीय के षड्यंत्र के कारण वैश्विक स्तर पर एक कूटनीतिक संकट कि स्थिति आन खड़ी हो, जिसमें दो देशों मे सम्बन्ध बिगड़ जाने का खतरा हो तो ऐसे अपराधी को देशद्रोह का दंड मिलना चाहिए.

इससे पहले भी तलगेरी अनगिनत घोटाले कर चुके हैं, जिनका विवरण मैं यहाँ स्थानाभाव के कारण नहीं दूंगा,  परन्तु इनके बारे में मैं बहुत कुछ पहले भी लिख चुका हूँ, इन घोटालों में भारत सरकार तथा अन्य कई संस्थाओं को ठगा गया था. परन्तु यू.पी.ऐ. सरकार के समय में इन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.

संक्षेप में: वेल्लर का काम था भारत में जर्मन सीखने वाले छात्रों में वृद्धि करना, वह उसने किया, तलगेरी का काम था अपने कलंक को सामने न आने देना, वह उसने किया, और म्यूनिख और भारत के गोएथे-संस्थान ने अपनी दोस्ती निभाई, अपनी भाषा तथा साहित्य की क़ीमत पर. मुझे और कोई कारण नज़र नहीं आता इस गौण समस्या को इतना तूल देने का कि जर्मन प्रधानमंत्री को इस में हस्तक्षेप करना पड़े.

वैसे वेल्लर तथा तलगेरी ने मिल कर यदि भारत में जर्मन भाषा सीखने वालों की संख्या में भारी वृद्धि की तो उसमें पैसे का बड़ा हाथ था. शिक्षिका ने अभी पढाना शुरू ही किया और बच्चों ने सीखना तो उन्हें फटाफट जर्मनी की सैर करा दी. स्कूली बच्चों पर इस तरह गैर-क़ानूनी रूप से तीसरी भाषा के रूप में जर्मन थोपना हास्यास्पद तथा अनर्गल है, क्या कोई कल्पना कर सकता है कि भारतीय इस तरह जर्मनी या किसी अन्य यूरोपीय देश में जा कर हिन्दी  या तमिल वहां के स्कूलों पर थोप सकते हैं?

देखा जाये तो केंद्रीय विद्यालय संगठन ने गोएथे-संस्थान से उक्त समझौता कर के अपने देश, अपनी भाषा के प्रति निष्ठा नहीं दिखाई. त्रिभाषी सूत्र का मुख्य उद्देश्य था देश के सभी भाषाई क्षेत्रों को भावनात्मक स्तर पर एक दूसरे से जोड़ना, और यदि छात्र उत्तर में संस्कृत को वरीयता देते हैं तो भी यह उद्देश्य पूरा होता है. आखिरकार जर्मनी और दूसरे यूरोपीय देशों में भी तो बच्चे लातिन सीखते हैं. यह एक कसौटी पर कसा तथ्य है कि लातिन सीखने वाले बच्चे यूरोप की किसी अन्य भारोपीय भाषा में आसानी से महारत प्राप्त कर सकते हैं. वही बात संस्कृत में है, जो न  भारत की हर इन्डो-यूरोपीय भाषा से, बल्कि कन्नड़ और तेलुगु जैसी द्रविड़ भाषाओँ से भी छात्रों को जोड़ती है. संस्कृत प्राचीन ग्रीक की माँ है, जो लातिन की माँ है, और जो भारत-जेर्मैनिक, भारत-आर्य, भारत-रोमांस तथा भारत-स्लाव भाषाओँ की माँ है. इस में विरोध काहे का! हर भारोपीय भाषा में संस्कृत के शब्दों की भरमार है, अतः बेहतर होगा कि दोनों सम्बन्धी देश अपने-अपने देश में अपनी-अपनी भाषा के लिए काम करें तथा भाषा के नाम पर एक दूसरे की भावनाओं से खिलवाड़ न करे.

शौकिया तौर पर जर्मन सिखाए जाने देने का भारत सरकार का निर्णय उचित है. जर्मनी को भी चाहिए कि वह वहां संध्याकालीन-कक्षाओं में हिन्दी  पढाये जाने का इंतजाम करें.

इस सन्दर्भ में मुझे अंग्रेज़ी मीडिया की भूमिका हर तरह से संदिग्ध लगती है. बिना मामले की गहराई में गए जर्मन के पक्ष में सम्पादकीय तक लिख मारने में उनकी नीयत पर शक होना स्वाभाविक है.  

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

गूगल का भारतीय भाषाओं के लिए एक नया मंच

हिन्दी इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की बढ़ती संख्‍या को देखते हुए गूगल ने वेब पर हिन्दी को बढ़ावा देने का निर्णय किया है. इसके लिए कंपनी ने हिन्दी में ध्वनि खोज जैसे कई नए कदम उठाए हैं. जबकि भारतीय भाषा इंटरनेट गठबंधन (भाभाइंग) की भी घोषणा की गई है, जो वेब पर हिन्दी सामग्री मुहैया कराएगा. “आजतक” वेबसाइट हिन्दी को बढ़ावा देने के अभियान में गूगल की सामग्री भागीदार बनी है.

सोमवार को नई दिल्‍ली में आयोजित एक कार्यक्रम में गूगल ने इस हेतु  घोषणाएँ कीं, जिसमें केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी भाग लिया. केंद्रीय मंत्री ने कहा, 'भारतीय लोग तकनीक को पसंद करते हैं. आज हर किसी के पास फेसबुक खाता है, लेकिन इस ओर और भी बहुत कुछ किया जा सकता है. अगर तकनीक उपयोगकर्त्ता के लिए आसान हो तो लाखों-करोड़ों लोग इंटरनेट से जुड़ना चाहेंगे.'

जावड़ेकर ने कहा कि पहले हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं के लिए ऐसा कोई प्‍लेटफॉर्म नहीं था, लेकिन अब इस गठबन्धन से लोगों को एक नया मंच मिलेगा.

गूगल की नयी पहल में क्‍या है नया?

इस अवसर पर गूगल ने एक नई वेबसाइट www.hindiweb.com को भी लोकार्पित किया, जिस पर हिन्दी में एक ही स्थान पर १५ श्रेणियों में स्तरीय सामग्री उपलब्‍ध होगी. गूगल ने हिन्दी उपयोगकर्ताओं  के लिए अब हिन्दी  में ध्वनि खोज अथवा वॉइस सर्च, एक नए उन्नत हिन्दी कीबोर्ड (गूगल हिन्दी  इनपुट) की घोषणा की है. 
स्रोत: श्री विजय मल्होत्रा (आजतक के माध्यम से)