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गुरुवार, 16 जुलाई 2015

हमारा देश कब मुक्त होगा इण्डिया नाम से


राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार को सत्ता में आए एक वर्ष से अधिक हो चुका है। राष्ट्रवादी सरकार से जैसी उम्मीद थी, उसके विपरीत हर नई योजना का नाम अंग्रेजी में रख रही है और इन नई-नई योजनाओं के प्रतीक-चिह्न बनाने के लिए केवल अंग्रेजी विज्ञापन और अंग्रेजी के महंगे अख़बारों में छपवाए जा रहे हैं। इन योजनाओं के लिए सुझाव भी जनता से अंग्रेजी माध्यम में बनी वेबसाइटों और अंग्रेजी में छपे दिशा निर्देशों और नियमों के द्वारा आमंत्रित किए जा रहे हैं। नई योजनाओं के लोकार्पण के कार्यक्रम अब लांच फंक्शन कहलाते हैं और इनमें सभी बैनर, पोस्टर और अतिथि नामपट आदि केवल अंग्रेजी में छपवाए जाते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि विदेशी सरकारें, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं के दौरान यही सब अपने देश की भाषा एवं हिंदी में तैयार करवाती हैं, ताकि भारत से घनिष्ठता और उसके प्रति सम्मान को सिद्ध कर सकें। 

मेरे हिंदी में लगाए गए आरटीआई आवेदन के अंग्रेजी में भेजे गए उत्तर में एक मंत्रालय ने बताया है कि 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' अभियान के लिए प्रतीक चिह्न प्रतियोगिता का विज्ञापन केवल अंग्रेजी में तैयार किया गया था और जिस पर अख़बारों को लगभग 8 लाख रुपए का भुगतान किया गया। अंग्रेजी अख़बारों पर लगभग 7 लाख रुपये खर्च किए गए। हिंदी समाचार-पत्रों पर लगभग 60 हज़ार एवं प्रांतीय भाषा के अख़बारों में छपे विज्ञापन पर मात्र 15 हज़ार खर्च किए गए। यह मात्र एक उदाहरण है, राजभाषा/भारतीय भाषाओं का हर मंत्रालय में यही हाल है। 


प्रधानमंत्री कार्यालय ने तो बाकायदा प्रधानमंत्री के भाषणों के लिए 'हिंगलिश' को राजभाषा का दर्जा दे दिया, आम आदमी को प्रधानमंत्री के तथाकथित हिंदी भाषणों को पढ़ने के लिए रोमन लिपि और अंग्रेजी भाषा दोनों का ज्ञान अनिवार्य है। प्रमका में प्रमं के भाषण लिखने वाला अधिकारी अंग्रेजी का बहुत बड़ा पैरोकार है, यह बात मैं मनमोहन सिंह के कार्यकाल से अनुभव कर रहा हूं। पिछले पांच साल के भाषण देख लीजिए, सभी हिंगलिश में लिखे जा रहे हैं। पत्र सूचना कार्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध ये भाषण वही पढ़ सकता है, जो हिंदी के साथ अंग्रेजी पढ़ना और समझना जानता हो, सिर्फ हिंदी जानने वाले इन भाषणों को पढ़ नहीं सकते हैं। 

राष्ट्रवादी सरकार शीघ्र ही हमारे देश का नाम इंडिया घोषित कर दे और भारत नाम पर प्रतिबंध लगा दे तो अचरज ना कीजिएगा। जो काम कांग्रेस ना कर सकी वह काम राष्ट्रवादी सरकार करेगी!

मेक इन इंडिया 
डिजिटल इंडिया 
स्किल इंडिया 
नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ़ इंडिया 
माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट एंड रिफाइनैंस एजेंसी 
माई गव वेबसाइट 
टीम इंडिया 
ग्रीन इंडिया 
और ऐसे नामों की सूची लम्बी है... 

सोमवार, 9 जून 2014

हिन्दी में पैनकार्ड का समाचार प्रमुख अख़बारों में

देश के प्रमुख अख़बारों ने इस समाचार को प्रमुखता दी है:

हिन्दी के सबसे पहले और सबसे विश्वसनीय पोर्टल "वेबदुनिया" में छपी खबर: यहाँ पढ़ें 

भड़ास  फॉर मीडिया के पोर्टल पर प्रकाशित विस्तृत समाचार: यहाँ पढ़ें


वैसे हिन्दी में हिंग्रेजी और रोमन की पैरवी करने वाले अख़बार ने भी इसे छापा है:

मंगलवार, 13 मई 2014

हिन्दी चैनल वालो! हिन्दी में 'राजग' होता है, 'एनडीए' अथवा 'NDA' को अंग्रेजी चैनलों के पास ही रहने दो

राजनीतिक दल/गठबंधन/संगठन :
राजग: राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन [एनडीए]संप्रग: संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन [यूपीए]तेदेपा: तेलुगु देशम पार्टी [टीडीपी]अन्ना द्रमुक: अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम[ अन्ना डीएमके]द्रमुक: द्रविड़ मुनेत्र कषगम [डीएमके]भाजपा: भारतीय जनता पार्टी [बीजेपी]रालोद : राष्ट्रीय लोक दल [आरएलडी]बसपा: बहुजन समाज पार्टी [बीएसपी]मनसे: महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना [एमएनएस]माकपा: मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी [सीपीएम]भाकपा: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी [सीपीआई]राजद: राष्ट्रीय जनता दल [आरजेडी]बीजद: बीजू जनता दल [बीजेडी]तेरास: तेलंगाना राष्ट्र समिति [टीआरएस]नेका: नेशनल कॉन्फ्रेन्सराकांपा : राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी [एनसीपी]अस: अहिंसा संघअसे: अहिंसा सेनागोजमुमो:गोरखा जन मुक्ति मोर्चाअभागोली:अखिल भारतीय गोरखा लीगमगोपा:महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी [एमजीपी]पामक : पाटाली मक्कल कच्ची [पीएमके]
गोलिआ:गोरखा लिबरेशन आर्गेनाइजेशन [जीएलओ]

हिंदी संक्षेपाक्षर सदियों से इस्तेमाल होते आ रहे हैं, मराठी में तो आज भी संक्षेपाक्षर का प्रयोग भरपूर किया जाता है और नये-२ संक्षेपाक्षर बनाये जाते हैं पर आज का हिंदी मीडिया इससे परहेज़ कर रहा है, देवनागरी के स्थान पर रोमन लिपि का उपयोग कर रहा है. साथ ही मीडिया हिंदी लिपि एवं हिंदी संक्षेपाक्षरों के प्रयोग को हिंदी के प्रचार में बाधा मानता है, जो पूरी तरह से निराधार और गलत है.“मैं ये मानता हूँ कि बोलचाल की भाषा में हिंदी संक्षेपाक्षरों की सीमा है पर कम से कम लेखन की भाषा में इनके प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए और जब सरल हिंदी संक्षेपाक्षर उपलब्ध हो या बनाया जा सकता हो तो अंग्रेजी संक्षेपाक्षर का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए.”मैं अनुरोध करूँगा कि नए-नए सरल हिंदी संक्षेपाक्षर बनाये जाएँ और उनका भरपूर इस्तेमाल किया जाये, मैं यहाँ कुछ हिंदी संक्षेपाक्षरों की सूची देना चाहता हूँ जो हैं तो पहले से प्रचलन में हैं अथवा इनको कुछ स्थानों पर इस्तेमाल किया जाता है पर उनका प्रचार किया जाना चाहिए, आपको कुछ अटपटे और अजीब भी लग सकते हैं, पर जब हम एक विदेशी भाषा अंग्रेजी के सैकड़ों अटपटे शब्दों/व्याकरण को स्वीकार कर चुके हैं तो अपनी भाषा के थोड़े-बहुत अटपटे संक्षेपाक्षरों को भी पचा सकते हैं बस सोच बदलने की ज़रूरत है.“हिंदी हमारी अपनी भाषा है, इसके विकास की ज़िम्मेदारी हम सब पर है और मीडिया की ज़िम्मेदारी सबसे ऊपर है.”

हमारी खीज और गुस्सा बढ़ गया है, दुःख भी हो रहा है कि हमारी भाषा के पैरोकार की उसे दयनीय और हीन बना रहे हैं, वो भी बेतुके बाज़ारवाद के नाम पर. आप लोग क्यों नहीं समझ रहे कि हिंदी का चैनल अथवा अखबार हिंदी में समाचार देखने/सुननेपढ़ने  के लिए होता है ना कि अंग्रेजी के लिए? उसके लिए अंग्रेजी के ढेरों अखबार और चैनल हमारे पास उपलब्ध हैं.

मैं इस लेख के माध्यम से इन सारे हिंदी के खबरिया चैनलों और अखबारों से विनती करता हूँ कि हिंदी को हीन और दयनीय बनाना बंद कर दीजिये, उसे आगे बढ़ने दीजिये.मेरा विनम्र निवेदन:
१. हिंदी चैनल/अखबार/पत्रिका अथवा आधिकारिक वेबसाइट में अंग्रेजी के अनावश्यक शब्दों का प्रयोग बंद होना चाहिए.२. जहाँ जरूरी हो अंग्रेजी के शब्दों को सिर्फ देवनागरी में लिखा जाए रोमन में नहीं.३. हिंदी चैनल/अखबार/पत्रिका अथवा आधिकारिक वेबसाइट में हिंदी संक्षेपाक्षरों के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.