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शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

अंग्रेजी ना जानने वाले हैं दोयम दर्जे के नागरिक

विनम्र निवेदन है कृपया निम्न ईमेल को अपने नाम -पते के साथ निम्न ईमेल पर भेज दें और गुप्त प्रतिलिपि (BCC)  मुझे भेजें :
"Joint Secy, OL" <jsol@nic.in>
RAJINDER PAUL ASSISTANT DIRECTOR <rajinder.paul31@nic.in>
Shefali Dash <dash@nic.in>
Kewal Krishan <kewal.krishan@nic.in>
"sharma.vandana" <sharma.vandana@nic.in>

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सेवा में,
1.     सचिव महोदया
राजभाषा विभाग
गृह मंत्रालय
नई दिल्ली

2.     प्रशासनिक प्रधान,
राष्ट्रीय सूचना-विज्ञान केन्द्र
ए ब्लॉक, सीजीओ कॉम्प्लेक्स, 
लोधी रोड, नई दिल्ली - 110 003 

विषय: राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र (रासूविके) द्वारा राजभाषा अधिनियम का निरंतर उल्लंघन एवं जानबूझकर उपेक्षा करने के सम्बन्ध में  

महोदय/महोदया,

भारत सरकार के संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन कार्यरत राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र (रासूविके) जिसका कार्य भारत सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों  के विभिन्न मंत्रालयों/ विभागों/ आयोगों/कंपनियों/सार्वजनिक बैंकों/निकायों/ शैक्षणिक संस्थानों को सूचना प्रौद्योगिकी उपलब्ध करवाना हैं. यह केंद्र हिन्दी की घोर उपेक्षा कर रहा है.

हिन्दी वेबसाइटों की टैगिंग भी अंग्रेजी में की जा रही है जिसके कारण गूगल आदि पर हिन्दी में खोज करने पर भी  विभिन्न मंत्रालयों /विभागों / आयोगों / कंपनियों/ सार्वजनिक बैंकों/ निकायों/ शैक्षणिक संस्थानों आदि की वेबसाइटें नहीं मिल पाती और अंग्रेजी में नाम लिखकर खोजना पड़ता है.

रासूविके द्विभाषी वेबसाइट बनाने में कोई रूचि नहीं ले रहा, हिन्दी-अंग्रेजी की अलग-२ वेबसाइट बनाई जा रही है. यदि कानून में संशोधन करके अथवा एक राष्ट्रीय वेबसाइट नीति जैसा कुछ बना कर रासूविके के लिए अनिवार्य कर दिया जाये कि वह जो भी सरकारी वेबसाइट बनाएगा, उसे तब तक लोकार्पित नहीं किया जाएगा जब तक कि उसके साथ उसका हिन्दी संस्करण तैयार नहीं कर लिया जाता.

नियम हो कि दोनों भाषाओं में सामग्री एकसाथ प्रदर्शित होगी, इससे लाभ होगा कि अधिकारियों को झक मारकर हिन्दी में भी सामग्री को अद्यतित करना होगा वरना फिलहाल हो कई सालों तक हिन्दी वेबसाइट की कोई अधिकारी सुध नहीं लेता. इस बात को राजभाषा विभाग अच्छी तरह से जानता है. इसी तरह कोई भी ऑनलाइन फॉर्म/सेवा/मोबाइल एप्लीकेशन  तब तक सरकारी वेबसाइट पर नहीं शुरू की जाएगी जबतक कि वह १००% द्विभाषी रूप में तैयार नहीं हो. ऐसा नियम बनने से राजभाषा अधिनियम के उल्लंघन को स्त्रोत पर ही रोक दिया जाएगा और यह राजभाषा विभाग के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी.

मेरी शिकायत के बिंदु:
(क).         रासूविके का प्रतीक (लोगो) भी केवल अंग्रेजी में NIC बनाया गया है.

(ख).         रासूविके की मुख्य वेबसाइट पर ६०-७०% सामग्री अंग्रेजी में है  www.nic.in
(ग).          केवल अंग्रेजी में बनाई गयीं वेबसाइटें:
1)        भारत सरकार की निर्देशिका http://goidirectory.gov.in/index.php
2)        प्रधानमंत्री राहत कोष के लिए ऑनलाइन दान https://pmnrf.gov.in/
3)        राष्ट्रीय रक्षा निधि के लिए ऑनलाइन दान https://ndf.gov.in/payform.php
4)        एनआईसी ईमेल (NIC)  https://mail.nic.in/mail/mauth
5)        ऑनलाइन निविदा वेबसाइट http://tenders.gov.in/
6)        ऑनलाइन परीक्षा परिणामों की वेबसाइट http://results.gov.in/
7)        केन्द्रीय सार्वजनिक सरकारी खरीद वेबसाइट http://eprocure.gov.in/cppp/
8)        रासूविके में भर्ती हेतु वेबसाइट http://recruitment.nic.in/
9)        केंद्र सरकार की वेबसाइटों हेतु दिशानिर्देश का पोर्टल http://web.guidelines.gov.in/ 
10)    भारत सरकार की वेबसाइटो के मूल्यांकन हेतु पोर्टल http://www.webanalytics.gov.in/
(घ).          रासूविके द्वारा आयोजित सभी कार्यक्रमों/संगोष्ठियों/ सम्मेलनों/बैठकों आदि  के बैनर, अतिथियों की मेज नाम -पट्टिकाएँ भी केवल अंग्रेजी में तैयार की जाती हैं,आमंत्रण पत्र, बिल्ले, अन्य आयोजन सम्बन्धी साहित्य भी केवल अंग्रेजी में ही तैयार किया जाता है, ऐसे सभी सम्मलेन आदि में भाग लेने वालों द्वारा भरे जाने वाले भौतिक-पीडीएफ फॉर्म एवं ऑनलाइन फॉर्म भी केवल अंग्रेजी में ही तैयार किये जाते हैं. ऐसे सम्मेलनों के लिए भी वेबसाइट अंग्रेजी में शुरू की जाती है.ताज़ा उदाहरण वेबरत्न पुरस्कार २०१४ के  सभी दस्तावेज एवं ऑनलाइन फॉर्म केवल अंग्रेजी में जरी किए गए हैं.
(ङ).          भारत का राष्ट्रीय पोर्टल पर हिन्दी में कम सामग्री एवं हिन्दी वेबसाइट का अंग्रेजी के बाद खुलना, हिन्दी वेबसाइट पर अन्य वेबसाइट के लिंक केवल अंग्रेजी वेबसाइटों के दिए जाते हैं ना कि हिन्दी वेबसाइटों के.
(च).          रासूविके द्वारा हिन्दी भाषी राज्यों में जो हिन्दी वेबसाइट बनाई जाती है उसमें ज्यादातर विकल्प अंग्रेजी में ही दिए जाते हैं.
(छ).          स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, राष्ट्रपति-प्रम के अभिभाषणों जैसे समारोहों के वेबकास्ट हेतु बनाए गए पोर्टल भी केवल अंग्रेजी में बनाए गए हैं. 
(ज).          रासूविके द्वारा बनायी जा रही वेबसाइटों में से अधिकतर वेबसाइटों पर ऑनलाइन प्ररूप, ऑनलाइन सदस्यता प्ररूप, ऑनलाइन शिकायत प्ररूप, ऑनलाइन दान,  ऑनलाइन प्रतिक्रिया प्ररूप आदि की सुविधा हिन्दी में ना होकर केवल अंग्रेजी में उपलब्ध करवाई जाती है. सभी ऑनलाइन प्रारूप-प्रपत्र हिन्दी-अंग्रेजी में अगल-२ नहीं बनाए जाने चाहिए बल्कि एकसाथ दोनों भाषाओं में बनने चाहिए, इसे आसानी से किया जा सकता है.

आपसे शीघ्र और सकारात्मक तथा कारगर कार्यवाही की अपेक्षा है.

भवदीय
अपना नाम लिखें:
डाक का पता लिखें : 

मंगलवार, 28 मई 2013

अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं का हक केवल अंग्रेजी जानने वालों को

१९ अप्रैल २०१३


प्रति,
माननीय राष्ट्रपति महोदय 
भारतीय गणतंत्र
राष्ट्रपति भवन,
नई दिल्ली 

विषय:स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा राजभाषा की उपेक्षा के सम्बन्ध में शिकायत

माननीय राष्ट्रपति महोदय,

मैं राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय को 12 जनवरी २०१३ (अधोलिखित ईमेल) से लगातार लिख रहा हूँ कि स्वास्थ्य मंत्रालय  द्वारा राजभाषा सम्बन्धी नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है साथ ही शिकायत की प्रतिलिपि  स्वास्थ्य मंत्रालय को भी लगातार भेजी गई है. मैंने अनुरोध किया है कि राजभाषा सम्बन्धी प्रावधानों की उपेक्षा ना की जाए और जहाँ-२ उल्लंघन हो रहा है उसे रोका जाए पर ३-३ अनुस्मारक भेजने के बाद भी राजभाषा विभाग अथवा स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से ना तो कोई उत्तर मिला है और ना ही अब तक कार्यवाही की गई है.

आपसे विनम्र प्रार्थना है कि शीघ्र निर्देश जारी करें एवं राजभाषा की उपेक्षा करने वाले संबंधित अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाए.


प्रति, 
राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय
एनडीसीसी-II (नई दिल्ली सिटी सैंटर) भवन, 'बी' विंग
चौथा तल, जय सिंह रोड़
नई दिल्ली - 110001

विषय:  स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा राजभाषा अधिनियम का उल्लंघन के सम्बन्ध में लोक शिकायत:

महोदय,

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय  द्वारा  भारत की राजभाषा की घोर उपेक्षा की जा रही है तथा राजभाषा सम्बन्धी संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा है. चूँकि यह मंत्रालय देश के आम आदमी से जुड़ा हुआ है इसलिए भी इसके कामकाज में हिन्दी भाषा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. आम लोगों को जब स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी उनकी अपनी भाषा में नहीं दी जाएगी तो उन्हें स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ क्या मिलेगा, यह दूर की कौड़ी है. 

शिकायत के मूल बिंदु:

१. सभी कार्यक्रमों के बैनर हिंदी में ना छापकर केवल अंग्रेजी में छापे जा रहे हैं. 10 जनवरी २०१३ , ११ जनवरी २०१३ एवं 12 जन 2013 को दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स देशों के स्वास्थ्य सचिवों की बैठक /सम्मेलन एवं लाल फीता एक्सप्रेस समापन समारोह के चित्र संलग्न हैं. इनमें सभी बैनर आदि केवल अंग्रेजी में ही बनवाए गए. (अनुलग्नक देखें )
२. लेखन सामग्री (स्टेशनरी),लिफाफा छपाई, पत्र-शीर्ष, रबर की मुहरों आदि के निर्माण में भी अंग्रेजी को प्राथमिकता. 
३. आधिकारिक वेबसाइट भी हिंदी में उपलब्ध नहीं है. हिन्दी वेबसाइट के नाम पर केवल मुखपृष्ठ ही हिन्दी में बनाया गया है जिसमें सभी मदों पर क्लिक करने पर अंग्रेजी वेबसाइट खुल जाती है. अंग्रेजी वेबसाइट पर सभी प्रेस विज्ञप्तियां एवं आंकड़े, पीडीएफ फाइलें केवल अंग्रेजी में ही उपलब्ध हैं।
४. मंत्रालय द्वारा प्रतीक चिन्हों के चयन में भी अंग्रेजी को प्राथमिकता दी गई है राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के प्रतीक चिन्ह nrhm.jpgमें अंग्रेजी ऊपर है जबकि हिन्दी के अक्षर भी छोटे है और हिन्दी को एकदम नीचे रखा गया है. इसमें सुधार करवाया जाए. (अनुलग्नक देखें ) 
५. इसी तरह भारतीय खाद्य संरक्षा और मानक प्राधिकरण का प्रतीक चिन्हfssai.jpg केवल अंग्रेजी में बनाया गया है इसमें भी अविलम्ब हिन्दी को प्राथमिकता देते हुए शामिल करवाया जाए.(अनुलग्नक देखें )
6. इसी तरह राष्ट्रिय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको)  का प्रतीक चिन्ह केवल अंग्रेजी में बनाया गया है इसमें भी अविलम्ब हिन्दी को प्राथमिकता देते हुए शामिल करवाया जाए.(अनुलग्नक देखें )
मंत्रालय से संबद्ध अन्य विभाग/संगठनों में से किसी भी संगठन की हिन्दी में वेबसाइट उपलब्ध नहीं है:
वेबसाइटें इस प्रकार हैं:
·   राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन [एनआरएचएम] http://www.mohfw.nic.in/NRHM.htm
·   केन्द्रीय स्वास्थ्य आसूचना कार्यालय CBHI  http://cbhidghs.nic.in/
·   समेकित रोग निगरानी परियोजना Integrated Disease Surveillance Project  IDSP http://idsp.nic.in/
·   राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केन्द्र एनसीडीसी http://www.nicd.nic.in/

इन सब बातों को देखते हुए सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में हिंदी की क्या स्थिति होगी? स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय एवं उसके अधीनस्थ सभी कार्यालयों/विभागों को कहा जाए कि  सभी वेबसाइट भारत की राजभाषा में उपलब्ध करवाएं एवं प्रतीक-चिन्हों के चयन में हिंदी को प्राथमिकता दी जाए जो प्रतीक चिन्ह अभी केवल अंग्रेजी में हैं उनमें अविलम्ब हिंदी को शामिल किया जाए।

राजभाषा विभाग के वर्ष 2013-14 के वार्षिक कार्यक्रम में राष्ट्रपति सचिवालय, प्रधान मंत्री कार्यालय एवं केंद्र सरकार  के सभी मंत्रालय, तीनों सेनाओं, सभी सरकारी कंपनियों, सभी सरकारी शिक्षण संस्थाओं एवं संगठनों को निर्देशित किया जाए कि उनके द्वारा बनाए जाने वाले सभी प्रतीक-चिन्ह (लोगो) केवल हिंदी/संस्कृत  में बनाये जाएं और यदि प्रतीक-चिन्ह में अंग्रेजी को शामिल करना है तो उसमें हिंदी को प्राथमिकता दी जाए, प्रतीक-चिन्ह में हिंदी के अक्षर बड़े, ऊपर हों अथवा अंग्रेजी अक्षरों से पहले अथवा आगे  होने चाहिए। केंद्र सरकार  के जिन मंत्रालय,  सेनाओं, सरकारी कंपनियों, सरकारी शिक्षण संस्थाओं एवं संगठनों में अभी केवल अंग्रेजी वाले अथवा हिंदी-अंग्रेजी के अलग-2  प्रतीक चिन्ह प्रयोग में लाये जा रहे हैं उनको आवश्यक सुधार करने के लिए कहा जाए। 

विनम्र निवेदन: बेहतर  तो होगा कि  राजभाषा विभाग इस साल केंद्र सरकार के प्रतीक-चिन्ह एवं वेबसाइट दिशा - निर्देश/नीति लागू  की जाए इससे समस्या का हमेशा के लिए हल काफी हद तक हो जाएगा।

आशा करता हूँ आप शीघ्र निर्देश जारी करेंगे।


बुधवार, 6 मार्च 2013

सुषमा स्वराज को पत्र: राष्ट्रभाषा हिंदी की घोर उपेक्षा जारी है


---------- अग्रेषित संदेश ----------
प्रेषक: प्रवीण जैन <cs.praveenjain@gmail.com>
दिनांक: 23 जनवरी 2013 11:37 am
विषय: Re: आप जैसे लोगों के होते हुए हिंदी की उपेक्षा क्यों ?
प्रति: sushmaswaraj@hotmail.com


आदरणीय महोदया,
 
मैं आपके लोकसभा क्षेत्र 'विदिशा' के रायसेन जिले के छोटे से ग्राम सुल्तानगंज का निवासी हूँ. मेरे परिवार के भाजपा के प्रति लगाव के कारण मुझे भी भाजपा में हमेशा से रूचि रही. अटलजी जब विदिशा से चुनाव लड़े थे उस समय मैं ८-९ वर्ष का था पर मैं उस छोटी आयु में भी  अन्य गांवों में जाकर बहुत प्रचार करता था. 
 
अब बात मुद्दे की: राष्ट्रभाषा हिंदी की घोर उपेक्षा जारी है 
 
१. भाजपा का आधिकारिक जालस्थल (वेबसाइट) का हिंदी संस्करण भी नहीं उपलब्ध है- यह एक गंभीर मामला है, स्वयं को बदलाव की वाहक कहने वाली भाजपा ने भी हिंदी का दामन छुड़ा लिया लगता है, बैनरों/झंडों में भी अब भाजपा के स्थान पर BJP लिखा दिखाई देने लगा है. उम्मीद करता हूँ आप स्थिति पर ध्यान देंगी. वरिष्ठ नेता आडवाणीजी संसद में हिंदी में नहीं अंग्रेजी बोलते हैं तो निराशा होती है, अपने ब्लॉग भी वे हिंदी में नहीं लिखते. जब आप लोग ऐसा करेंगे तो किस्से आशा रखें हिंदी की वकालत की. कांग्रेस का जालस्थल हिंदी में उपलब्ध है.
 
२. भारत के महामहिम राष्ट्रपति का जालस्थल http://presidentofindia.nic.in/ सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी में ही है. जब देश के राष्ट्रपति ही अपनी भाषा के प्रति उदासीन हों तो आप  उस देश में उस भाषा की वास्तविक स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं. राष्ट्रपति भवन से सारी प्रेस विज्ञप्तियां केवल अंग्रेजी में ही जारी होती हैं. बड़ी सोचनीय दशा है जबकि दुनिया के लगभग सभी देशों में सभी सरकारी/सांविधिक वेबसाइटें उनकी अपनी भाषा में होती हैं. चाहे जापान, चीन, सिंगापूर, जर्मनी हो या फिर फ़्रांस, बल्गारिया या अरब देश.
 
मैं पिछले १ वर्ष से लगातार  राष्ट्रपति भवन से गुहार लगा रहा हूँ कि हिंदी वेबसाइट उपलब्ध करवाएं पर राष्ट्रपति  सचिवालय  ने कोई कदम आज तक नहीं उठाया गया.
३. राजनीतिक दलों ने हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओँ के मुद्दे को अपने संविधान से ही निकाल फेंका है. भाजपा भी हिंदी को भूल चुकी है.
४. पैनकार्ड हो या फिर पारपत्र (पासपोर्ट) हर राष्ट्रीय पहचान से हिंदी को धीरे-२ विलीन किया रहा है. 
५. चीन ने  चीनी भाषा के अख़बारों/चैनलों में अंग्रेजी शब्दों के  इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध लगा दिया है  पर भारत में हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओँ के चैनलों /अखबारों में अंग्रेजी शब्द तो ठीक अब रोमन लिपि की घुसपैठ तेज हो गई है, भारत सरकार की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता पर विपक्ष तो इन मुद्दों को उठा सकता है. हिंदी के समाचार चैनल तो खुलेआम हिंदी की अर्थी सजा रहे हैं और कोई नहीं बोल रहा. http://hindi-draft.blogspot.in/2012/06/blog-post.html
६. स्वतंत्रता के ६५ वर्ष बाद केंद्र सरकार और संसद के कामकाज में हिंदी का विलोप सा हो गया है और कोई इस बात को लेकर चिंतित नहीं है.
 
आपसे एक सकारात्मक उत्तर की आशा रखता हूँ कि हिंदी के प्रति भाजपा अपने पुराने संकल्पों को पुनः पारित करेगी और सरकार से राजभाषा अधिनियम का  सख्ती से  पालन करवाएगी .
 
आपके उत्तर की प्रतीक्षा में,
 
प्रवीण कुमार जैन