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रविवार, 30 नवंबर 2025

क्या हिन्दी भारत की राजभाषा है, आपको क्या लगता है?

संविधान के अनुच्छेद 343(1) - देवनागरी लिपि में हिन्दी भारत संघ की राजभाषा है। लागू हुए 78 वर्ष से भी अधिक समय बीत चुका है, पर सरकारी कामकाज में आज भी राजभाषाकी वास्तविक स्थिति दयनीय है। हिन्दी को 'राजभाषा' का स्थान तो मिल गया, परन्तु वह 'शासन की भाषा' नहीं बन सकी है। सरकारी तंत्र में आज भी अंग्रेजी का एकछत्र राज है।

विधिक प्रपत्रों पर हिन्दी को मान्यता क्यों नहीं?

आपने कभी किसी सरकारी कागज— जैसे विधिक दस्तावेजों, निविदाओं या भर्ती सूचनाओं — को ध्यान से पढ़ा होगा तो पाएँगे कि उस पर प्रायः एक अघोषित चेतावनी लिखी होती है कि:

    “यदि इस प्रपत्र के किसी अंश या पाठ में कोई संदेह हो तो कृपया दस्तावेज़ का अंग्रेजी मूल पाठ देखें।”

    “किसी भी विधिक मामले में मूल अंग्रेजी पाठ ही मान्य होगा।”

    “किसी विवाद की स्थिति में अंग्रेजी पाठ ही मान्य होगा; हिन्दी पाठ केवल सुविधा हेतु दिया गया है।”

यह बात प्रश्न खड़ा करती है कि यदि राजभाषा में छपा कागज विधिक रूप से मान्य नहीं है, तो उसे छापने का क्या लाभ?

  • इसका सीधा अर्थ यह है कि हिन्दी में किया गया अनुवाद केवल औपचारिकता है — उसका कोई कानूनी आधार नहीं।
  • जब आम जनता सरकारी योजनाएँ या नियम-कानून को हिन्दी में पढ़कर भरोसा करती है, तो न्यायालय में उन्हें बताया जाता है कि “असली नियम-कानून अंग्रेजी में है, उसे पढ़कर आइए।”

नियम-कानून बनाने की प्रक्रिया में हिन्दी की उपेक्षा

संसद की प्रक्रिया में भी हिन्दी की उपेक्षा स्पष्ट दिखती है और न्यायालयों (उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय) में हिन्दी में प्रस्तुत दस्तावेज स्वीकार ही नहीं किए जाते हैं, जब तक कि उनका प्रमाणित अंग्रेजी अनुवाद संलग्न न हो। नागरिक उच्च न्यायालय अथवा सर्वोच्च न्यायालय में अपनी बात अपनी भाषा (हिन्दी या किसी अन्य भारतीय भाषा) में नहीं रख सकते।

  • संसद सत्र के समय, संबंधित सचिवालय प्रतिदिन “लोकसभा समाचार” व “राज्यसभा समाचार” प्रकाशित करता है और उसमें हर संसदीय कामकाज के साथ लिखा होता है कि यह प्रतिवेदन, प्रपत्र आदि हिन्दी एवं अंग्रेजी दोनों में सदन के पटल पर रखा गया है; पर वास्तविकता इसके विपरीत है।
  • इसी कारण जब कोई विधेयक विधिवत कानून बनने के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, तो उस विधेयक का मूल पाठ आज भी केवल अंग्रेजी में ही होता है। मैंने जब इस संबंध में विधायी विभाग से पूछा, तो कहा गया कि अंतिम स्वीकृति के लिए केवल अंग्रेजी मूल पाठ ही भेजा जाता है क्योंकि हिन्दी पाठ तैयार ही नहीं किया जाता है; इसलिए अधिनियम के लागू होने की अधिसूचना द्विभाषी (हिन्दी-अंग्रेजी में एकसाथ) रूप में जारी करने का प्रश्न नहीं उठता है।

यदि संसद कानून बनाने के अंतिम चरण में राजभाषा हिन्दी को छोड़ दे, तो यह स्पष्ट है कि राजभाषा का पालन केवल दिखावा है। अधिनियम की धारा 3(3) कहती है कि हर अधिसूचना द्विभाषी (हिन्दी व अंग्रेजी) होनी चाहिए; परन्तु इस प्रावधान का व्यावहारिक पालन नहीं हो रहा। इससे सिद्ध होता है कि भले ही संविधान ने भले ही अंग्रेजी को राजभाषा नहीं कहा हो, पर अंग्रेजी ही भारत सरकार की वास्तविक राजभाषा है — और इसीलिए अंग्रेजी पाठ को 'असली', हिन्दी पाठ को 'नकली' माना जाता है। राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(3) के अंतर्गत आने वाले 14 प्रपत्र, जिन्हें एकसाथ एक ही समय में द्विभाषी रूप में नियम 11 के अनुसार हिन्दी का पाठ ऊपर रखते हुए जारी करना अनिवार्य है: सामान्य आदेश, संकल्प, परिपत्र, नियम, अधिसूचना, प्रशासनिक या अन्य प्रतिवेदन, प्रेस विज्ञप्ति, संविदाएं, करार, अनुज्ञप्तियां (लायसेंस), अनुज्ञापत्र (परमिट), सूचनाएं, निविदा-प्रारूप और संसद में प्रस्तुत किए जाने वाले सभी राजकीय कागज-पत्र।

राजभाषा के लिए आवंटित बजट का क्या परिणाम?

राजभाषा हिन्दी को बढ़ावा देने के नाम पर भारत सरकार हर वर्ष करोड़ों रुपये का बजट देती है। राजभाषा सम्मेलनों, संसदीय राजभाषा समिति की बैठकों, विभागीय निरीक्षणों, पुरस्कारों एवं अन्य व्यवस्थाओं पर व्यय होता है। मंत्रालयों, विभागों व कार्यालयों में हिन्दी सलाहकार समितियाँ, राजभाषा कार्यान्वयन समितियाँ, नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियाँ गठित की जाती हैं, उनकी बैठकों का आयोजन होता है, पर जब आप किसी सरकारी कार्यालय या बैंक में जाएंगे, तो आपको आवेदन-फार्म, जमा पर्ची, सूचना-पट्ट आदि द्विभाषी रूप में भी नहीं मिलेंगे।

आज भी हिन्दी में आरटीआई लगाएँ या ऑनलाइन शिकायत करें — उत्तर अंग्रेजी में मिलेगा। फिर इतना सारा तामझाम, संगठन व अरबों रुपये का बजट किसलिए?

यह पैसा सम्मेलनों, बैठकों, राजभाषा अधिकारियों और अनुवादकों के वेतन, सॉफ्टवेयर खरीद तथा प्रशिक्षण पर व्यय होता है।

यदि प्रशिक्षण के बाद भी अधिकारी तथा कर्मचारी मूल काम अंग्रेजी में ही कर रहे हैं, और हिन्दी अनुवाद को सरकार स्वयं 'मान्य नहीं' कह रही है, तो यह पैसा केवल 'सरकारी खानापूर्ति' पर नष्ट हो रहा है।

लोकतंत्र के लिए हानिकारक

प्रशासनिक तंत्र की अंग्रेजी को प्राथमिकता देने वाली भाषा-नीति केवल भाषा की समस्या नहीं है। यह पारदर्शिता, जन भागीदारी और लोकतंत्र के सिद्धांतों को सीधे प्रभावित करती है क्योंकि देश में आज भी केवल 4-5 प्रतिशत नागरिक ही अंग्रेजी में पारंगत हैं-

  • सूचना में देरी होती है: जब अंग्रेजी मूल दस्तावेजों का हिन्दी अनुवाद बहुत देर से या कभी नहीं जारी किया जाता, या वेबसाइट पर अपलोड नहीं होता, तो आम जनता तक सूचना या तो देर से पहुँचती है या नहीं पहुँचती।
  • जबकि सरकारी रिपोर्टों में दिये गये आंकड़ों के अनुसार 99 प्रतिशत सरकारी कार्यालय दावा करते हैं कि उन्होंने धारा 3(3) का पूरी तरह पालन किया है परंतु इन दावों का वास्तविक सापेक्षता में कोई परिणाम नहीं दिखता।

हिन्दी को उसका उचित स्थान दिलाना आवश्यक

वर्तमान भारत सरकार 'स्वतंत्रता का अमृतकाल' मना रही है और बार-बार यह घोषणा करती है कि पराधीनता के चिह्नों, प्रतीकों व प्रथाओं को समाप्त किया जाएगा। सरकार ने इस दिशा में कुछ सकारात्मक पहलें भी शुरू की हैं — जैसे कि:

  • राजभाषा विभाग के भीतर भारतीय भाषा अनुभाग का गठन,
  • नागरिक केन्द्रित सरकारी वेबसाइटों को विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने हेतु भाषिणी व अनुवादिनी सॉफ्टवेयर का उपयोग,
  • उच्च शिक्षा व परीक्षाओं (जैसे नीट) में भारतीय भाषाओं को शामिल करना,
  • तीन प्रमुख अपराध संहिताओं को भारतीय नामों से अधिसूचित करना आदि।

1949 में हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार करना हमारे राष्ट्रीय संकल्प का हिस्सा था। उस समय इस पर व्यापक बहस हुई थी, और सभी भाषायी समुदायों ने इस पर सहमति दी थी।

परंतु आज, जब प्रधानमंत्री एवं उनकी सरकार गुलामी के प्रतीकों और मानसिकता को समाप्त करने की बात करते हैं, तब भी अंग्रेजी भाषा — जो 'गुलामी का सबसे बड़ा चिह्न' है — सरकारी तंत्र व न्यायपालिका में वर्चस्व बनाए हुए है। उसका वर्चस्व तोड़ने का कोई ठोस प्रयास नहीं हुआ है।

हमें अधिक आशा भी नहीं करनी चाहिए; फिर भी हमारी मांग यह है कि:

1.   हिन्दी को अंग्रेजी के समान कानूनी मान्यता दी जाए: सरकार सभी कानूनों और सरकारी सूचनाओं के हिन्दी पाठ को अंग्रेजी पाठ के बराबर कानूनी मान्यता प्रदान करे और अंग्रेजी को प्राथमिक बताने वाले सभी अस्वीकृति-वाक्य (डिस्क्लेमर) तुरंत हटाए जाएं।

2.   मूल कामकाज हिन्दी में हो: सरकारी अधिकारियों को बाध्य किया जाए कि वे — विशेषतः कृषि, ग्रामीण विकास, पंचायती राज जैसे नागरिकों से सीधे जुड़े मंत्रालयों व विभागों में — नीतियाँ, योजनाएँ, नियम, अधिनियम आदि मूल रूप से हिन्दी में तैयार करें।

राजभाषा हिन्दी को केवल ‘नाम’ की राजभाषा नहीं, बल्कि ‘कामकाज की’ भाषा बनाया जाए — तभी संविधान का सच्चा पालन होगा और यह सुधार करोड़ों नागरिकों को शासन से सीधे जोड़कर हमारे लोकतंत्र को सुदृढ़ करेगा।

रविवार, 23 नवंबर 2025

'वर्नाक्युलर घोषणा': भारतीय भाषाओं में हस्ताक्षर करने वाले नागरिकों का अपमान

भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है, जहाँ संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएँ दर्ज हैं। इन भाषाओं में हस्ताक्षर करना, बोलना और लिखना प्रत्येक भारतीय नागरिक का मूलभूत अधिकार और उसकी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। परंतु, स्वतंत्रता के 78 वर्षों बाद भी, भारत की आर्थिक व्यवस्था और वित्तीय संस्थाएँ एक ऐसी औपनिवेशिक मानसिकता को ढो रही हैं जो भारतीय भाषाओं को हीन और उनके उपयोगकर्ताओं को 'अनपढ़' मानती है। बैंक और वित्तीय संस्थाओं द्वारा हिन्दी या किसी भी भारतीय भाषा में हस्ताक्षर करने वाले नागरिकों से कराई जाने वाली क्षेत्रीय भाषा की घोषणा’ (वर्नाक्युलर घोषणा) इसी निंदनीय मानसिकता का स्पष्ट प्रमाण है। यह प्रथा न केवल भाषाई भेदभाव है, बल्कि करोड़ों नागरिकों के आत्म-सम्मान पर सीधा आघात है।

*क्या है ‘क्षेत्रीय भाषा की घोषणा’?*

वर्नाक्युलर’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'किसी क्षेत्र की स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा'। वित्तीय संस्थाओं, विशेषकर बैंकों, में यह घोषणा-पत्र उन ग्राहकों से भरवाया जाता है जो अंग्रेज़ी में हस्ताक्षर नहीं करते हैं, बल्कि हिन्दी, मराठी, गुजराती, तमिल, या किसी भी अन्य भारतीय भाषा (जिसे वे 'क्षेत्रीय भाषा' (वर्नाक्युलर लैंग्वेज) कहते हैं) में हस्ताक्षर करते हैं। इस घोषणा पर हस्ताक्षर करके ग्राहक एक तरह से यह स्वीकार करता है कि:

  • वह अंग्रेज़ी नहीं जानता है।
  • उसे बैंकिंग दस्तावेज़ों की सामग्री को समझने के लिए किसी तीसरे व्यक्ति की आवश्यकता है।
  • कुछ मामलों में, इसे सीधे तौर पर 'अनपढ़' या ‘अंगूठा लगाने वाले’ व्यक्ति की श्रेणी में रखा जाता है।

यह प्रावधान मूल रूप से अंग्रेज़ी शासन के दौरान उन ग्रामीण और अनपढ़ नागरिकों के लिए बनाया गया था, जो किसी भी भाषा में पढ़ने या हस्ताक्षर करने में सक्षम नहीं थे, और उन्हें धोखाधड़ी से बचाने के लिए किसी शिक्षित गवाह की आवश्यकता होती थी। यह अत्यंत खेदजनक है कि भारतीय भाषाओं में हस्ताक्षर करने वाले साक्षर नागरिकों को भी आज उसी श्रेणी में रखा जा रहा है।

*साक्षरता और भाषा की भ्रामक पहचान*

इस घोषणा का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि यह साक्षरता को अंग्रेज़ी भाषा से जोड़कर देखता है। भारत में करोड़ों नागरिक उच्च शिक्षित हैं, जिन्होंने अपनी शिक्षा भारतीय भाषाओं के माध्यम से पूरी की है और वे अपनी भाषा में लिखने-पढ़ने में पूर्णतः सक्षम हैं। एक डॉक्टर, इंजीनियर, या सरकारी अधिकारी भी, जो अपनी पहचान और सम्मान के लिए हिन्दी या तमिल में हस्ताक्षर करता है, उसे इस घोषणा के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से 'अशिक्षित' या 'समझ से कम' मान लिया जाता है।

यह न केवल भाषाई रूढ़िवादिता है, बल्कि राष्ट्र के संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है। संविधान की राजभाषा हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में हस्ताक्षर करने पर यदि बैंक किसी नागरिक से यह घोषणा करवाते हैं कि 'मेरे सामने पढ़ा गया और मैंने समझा', तो यह स्पष्ट करता है कि बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली आज भी मानती है कि ज्ञान का एकमात्र पैमाना अंग्रेज़ी भाषा ही है।

*अधिकारों का हनन और गोपनीयता का उल्लंघन*

जब किसी ग्राहक को यह घोषणापत्र भरना पड़ता है, तो उसे बैंकिंग दस्तावेज़ों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए किसी तीसरे व्यक्ति (साक्षी) पर निर्भर रहना पड़ता है। यह ग्राहक की व्यक्तिगत वित्तीय जानकारी और गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन है। यदि ग्राहक अपनी भाषा में दस्तावेज़ पढ़ और समझ सकता है, तो उसे किसी तीसरे व्यक्ति की क्या आवश्यकता है? यह प्रक्रिया अनावश्यक रूप से ग्राहक की वित्तीय प्रक्रिया को जटिल बनाती है और उसे एक हीन भावना से भर देती है।

*भारतीय रिज़र्व बैंक को पत्र और नियामक का हस्तक्षेप*

इस अपमानजनक प्रथा को समाप्त करने के लिए लेखक ने दिनांक 27 जून 2025 को एक विस्तृत पत्र भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर तथा वित्त मंत्रालय को भेजा था, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि "वर्नाक्युलर डिक्लेरेशन" न केवल असंवैधानिक (अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन) है, बल्कि जिस ग्राहक को अंग्रेज़ी नहीं आती, उसी से यह घोषणापत्र अंग्रेज़ी में भरवाना एक "हद दर्जे की धोखेबाजी व जालसाजी" है।

पत्र में यह भी तर्क दिया गया था कि यह प्रावधान आरबीआई की ग्राहक अधिकार संहिता का उल्लंघन है, जिसमें ग्राहक को समझने योग्य भाषा में सूचना प्राप्त करने का अधिकार दिया गया है।

*आरबीआई की प्रतिक्रिया (दिनांक 11 अगस्त 2025):*

आरबीआई ने अपने उत्तर में स्वीकार किया कि उनके द्वारा जारी विभिन्न मास्टर निदेश और परिपत्र यह सुनिश्चित करते हैं कि:

  1. उधारकर्ता के लिए सभी संसूचना स्थानीय भाषा अथवा उधारकर्ता द्वारा समझी जानी वाली भाषा में होनी चाहिए।
  2. ऋणों और अग्रिमों के लिए मुख्य तथ्य विवरण (केएफसी) उधारकर्ता द्वारा समझी जाने वाली भाषा में लिखा जाएगा।
  3. बैंकों को खाता खोलने के फॉर्म, पास-बुक आदि सहित ग्राहकों द्वारा उपयोग में लाई जानेवाली सभी मुद्रित सामग्री को त्रैभाषिक रूप से (संबंधित क्षेत्रीय भाषा, हिन्दी व अंग्रेज़ी) में उपलब्ध कराना चाहिए।

आरबीआई ने स्वयं द्वारा जारी किए गए इन नियमों का उल्लेख करते हुए, इस मामले की गंभीरता को स्वीकार किया और सूचित किया कि इस विषय से संबंधित ईमेल को "निरीक्षण विभाग को उचित कार्यवाही के लिए अग्रेषित किया गया है।"

आरबीआई के अपने नियम स्पष्ट रूप से यह कहते हैं कि ग्राहकों को उनकी भाषा में संसूचना मिलनी चाहिए। ऐसे में, किसी साक्षर नागरिक से उसकी अपनी भाषा में हस्ताक्षर करने पर, उसे अतिरिक्त और अपमानजनक 'वर्नाक्युलर घोषणा' करने के लिए बाध्य करना नियामक के ही निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन है। यह तथ्य कि एक नागरिक की शिकायत पर केंद्रीय बैंक ने मामले को निरीक्षण के लिए भेजा है, यह दर्शाता है कि यह औपनिवेशिक प्रथा अब नियामकीय जाँच के दायरे में आ चुकी है।

*आत्म-सम्मान की बहाली आवश्यक*

'क्षेत्रीय भाषा की घोषणा' केवल एक कागज़ी औपचारिकता नहीं है; यह भारतीय भाषाओं के प्रति एक संस्थागत पूर्वाग्रह है। आरबीआई द्वारा अपने ही नियमों का हवाला देने और मामले को निरीक्षण विभाग को भेजने के बाद, अब वित्तीय संस्थाओं को इस प्रथा को तुरंत समाप्त कर देना चाहिए।

बैंकिंग प्रणाली को यह स्वीकार करना होगा कि साक्षरता का अर्थ अंग्रेज़ी साक्षरता नहीं है। यदि किसी नागरिक का खाताधारक पहचान पत्र (केवाईसी) साक्षरता प्रमाणित करता है, तो उसे अपनी भाषा में हस्ताक्षर करने पर अतिरिक्त और अपमानजनक घोषणा करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।

यह समय है कि भारत की वित्तीय संस्थाएँ भाषाई आत्म-सम्मान को प्राथमिकता दें और अपनी ही भाषाओं में हस्ताक्षर करने वाले देश के करोड़ों साक्षर नागरिकों को 'अनपढ़' की श्रेणी से बाहर निकालें। यह सुनिश्चित करना अब भारतीय रिज़र्व बैंक के निरीक्षण विभाग की ज़िम्मेदारी है, ताकि हमारा बैंकिंग तंत्र समावेशी और वास्तव में भारतीय कहलाए।

 

गुरुवार, 11 जून 2020

ब्रिटिश शासन में भी न्यायालयों में होता था क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग, अब क्यों नहीं हो सकता ?


·          आशीष राय
जिसके लिए यह न्याय प्रणाली काम करती है, उसे ही न्याय न समझ में आए तो यह तो बहुत बड़ा अन्याय है। वर्तमान परिदृश्य में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस देश की न्याय प्रणाली में न्याय की भाषा ऐसी क्यों नहीं होनी चाहिए कि जो आमजन को समझ में आए?
देश के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति शरद अरविंद बोबडे ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि न्यायालय में 80 प्रतिशत पक्षकार अंग्रेजी नहीं जानते हैं। फिर आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी है जो न्याय प्रणाली को मातृभाषा में नहीं होने देना चाहती। सामान्यतः यह बात अंग्रेजी के समर्थकों द्वारा बार-बार उठाई जाती है कि हिंदी के शब्द बहुत ही कठिन हैं और न्यायालयों में इनके प्रयोग में कठिनाई आती है। गौरतलब है कि ब्रिटिश शासन में भी न्यायालयों में क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग होता रहा है, कठिनाई पर आंदोलन भी होते रहे हैं। महामना मालवीय जी के प्रयासों से न्यायालयों में हिंदी के प्रयोग की अनुमति गवर्नर मैकडोनेल ने खुद दी थी।  
जब अंग्रेजी भाषा का प्रयोग न्यायालयों में शुरू हुआ था, तो कितने लोगों को अंग्रेजी आती थी? लोगों ने आवश्यकतानुसार इसे सीखा। कालांतर में अंग्रेजी के बढ़ते प्रभुत्व ने हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं का प्रभाव और प्रवाह रोकने की कोशिश की। कुछ मुट्ठी भर लोगों ने हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं को कमतर करने का प्रयास शुरू कर दिया। आप प्राय: देखते होंगे कि साइकिल, ट्रेन, टाई इत्यादि की हिंदी एक षड्यंत्र के तहत आपको कितनी कठिन शब्दावली में बताई जाती है। उनके षड्यंत्र का शिकार होकर लोग चटखारे लेकर इन सब चीजों को वायरल भी करते रहते हैं।
कठिन न्यायिक शब्दों की आड़ लेकर सदैव यह लोग बताने का प्रयत्न करते हैं कि वर्तमान में ज्यादातर विधि महाविद्यालयों में अंग्रेजी में पढ़ाई होती है और उनको हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में कार्य करने में कठिनाई होगी। लेकिन वह भूल जाते हैं कि क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षित लोग आज उच्चतम न्यायालय में भी अपनी सेवा दे रहे हैं। शोध बताते हैं कि भाषा का ज्ञान बहुत ही अल्प समय में प्राप्त किया जा सकता है लेकिन अपनी मातृभाषा में हुई शिक्षा आपको विद्वान बनाती है।
सर्वविदित है कि हिंदी के कई शब्दों को ऑक्सफोर्ड शब्दकोष ने भी अपनाया है। हम भी उदार मन से कुछ शब्दों को अपनी भाषा में शामिल तो कर ही सकते हैं। न्यायालयों में भी क्षेत्रीय भाषाओं के कठिन शब्दों को हम आसान शब्दों से परिवर्तित भी कर सकते हैं, इसमें कोई कानूनी अड़चन भी नहीं है परंतु षड्यंत्र के अंतर्गत सदैव इसमें उलझाने का प्रयास किया जाता रहा है। आज की आवश्यकता यही है कि सबको मिलकर यह प्रयास करना चाहिए कि सामान्य शब्दों का भी न्यायिक प्रक्रिया में प्रयोग बढ़े। कठिन शब्दों के प्रयोग की कोई आवश्यकता भी नहीं है। 

अंग्रेजी को लूट की भाषा बनाया गया है
न्यायिक प्रक्रिया अधिवक्ता और न्यायाधीशों के लिए नहीं बल्कि आम जनता के लिए है, ये तो निमित्त मात्र हैं। जिसके लिए यह न्याय प्रणाली काम करती है, उसे ही न्याय न समझ में आए तो यह तो बहुत बड़ा अन्याय है। वर्तमान परिदृश्य में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस देश की न्याय प्रणाली में न्याय की भाषा ऐसी क्यों नहीं होनी चाहिए कि जो आमजन को समझ में आए? कुछ अधिवक्ता साथियों और आमजन का यह भी मानना है कि न्यायिक व्यवस्था में अंग्रेजी को लूट के माध्यम रूप में भी प्रयोग किया जाता है। हिंदी या मातृभाषा का प्रयोग इसलिए भी नहीं किया जा रहा है कि पक्षकार को यह समझ में आ सकता है कि न्यायिक अधिकारी और अधिवक्ता आपस में क्या बातचीत कर रहे हैं। उनको अपनी साख गिरने का भी डर लगा रहता है। डॉक्टर जब दवा लिखता है तो उसकी पर्ची पर लिखी हुई दवा केवल मेडिकल वाला ही क्यों पढ़ पाता है? सामान्य जन क्यों नहीं पढ़ पाता क्योंकि डॉक्टर को डर लगा रहता है कि अगर पढ़ लिया तो अगली बार स्वयं न आकर खुद से दवाई उपयोग करने लगे। इस प्रकार के डर ने भी अंग्रेजी को लूट की भाषा बना रखा है। 
आज सामान्य उपभोग की वस्तुओं पर भी क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग बहुत ही कम हो रहा है। आखिर क्यों? कौन-सी ऐसी मजबूरी है जो ऐसा करने से रोकती है! जबकि उपभोक्ता कानून में स्पष्ट है कि उपभोक्ता को जानने का अधिकार है कि वह जिन चीजों का उपभोग कर रहा है, उसे पता चल सके कि वह चीज है क्या? फिर न्याय के पक्षकारों, जिन्होंने न्यायालय और अधिवक्ता को फीस दी है, उन्हें यह जानने का कानूनी अधिकार क्यों नहीं है कि उसके मुकदमे में चरणबद्ध क्या-क्या हुआ? आज समय की मांग है कि वर्तमान न्याय प्रणाली में न्याय होता दिखना भी चाहिए। न्यायालय में क्या हो रहा है, निर्णय किस आधार पर हो रहा है, उसके मुकदमे किस आधार पर जीते गए, किस आधार पर वह हारा, पक्षकार को यह जानने का पूरा अधिकार है। यह मौलिक अधिकार भी है।
जब देश स्वतंत्र हो गया, अपना तथाकथित तंत्र स्थापित हो गया, फिर स्व के तंत्र में भी फिरंगी भाषा का प्रयोग बढ़ता रहेगा तो निश्चित रूप से इसको परतंत्रता की ही श्रेणी में ही रखेंगे। अगर देश स्वतंत्र है, स्व-तंत्र अपना है तो स्व-भाषा भी अपनी होनी ही चाहिए। भारतीय भाषा अभियान को कोटिश: साधुवाद कि उसने इस विषय की गंभीरता को समझा और देश के समक्ष इस विषय को लेकर गया। आज भारतीय भाषा अभियान के प्रयासों से हाल ही में हरियाणा राज्य ने अपने राज्य के सभी जिला न्यायालयों में हिंदी के प्रयोग की अनिवार्यता की है। वर्तमान न्याय व्यवस्था को देखते हुए यह भी आवश्यक प्रतीत होता है कि नए भारत की परिकल्पना में न्याय सुधार एक महत्वपूर्ण विषय होना चाहिए। स्वतंत्रता पश्चात तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए न्याय व्यवस्था की उच्चतम इकाई, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी में कार्य शुरू किया गया था लेकिन आज आवश्यकता है कि इसमें बदलाव किया जाए। यथार्थ यही है कि जब देश के उच्च न्यायालयों में और उच्चतम न्यायालय में भारतीय भाषाओं में कार्य होना शुरू होंगे तो विधि महाविद्यालय भी क्षेत्रीय भाषाओं में अध्यापन कार्य को बढ़ाएंगे। अब भाषा को रोजगार से भी जोड़ने की आवश्यकता है और देश की सरकार को इस दिशा में पहल कर निर्णय लेने की आवश्यकता है।
-आशीष राय
(लेखक उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता हैं)

गुरुवार, 14 मई 2015

प्रधानमंत्री कार्यालय से कुछ सवाल जिनका कोई उत्तर देना नहीं चाहते हैं अधिकारी

दिनांक: 13 मई 2015

सेवा में,
केन्द्रीय सूचना अधिकारी
प्रधानमंत्री कार्यालय,
नयी दिल्ली, भारत  

विषय: सूचना का अधिकार अधिनियम आवेदन

महोदय,
कृपया मेरे पिछले आवेदन क्र. PMOIN/R/2014/60666 का संज्ञान लें जो दिनांक 16/06/2014 को दाखिल किया गया था और उसके सम्बन्ध में प्रधानमंत्री कार्यालय ने पूरे छह माह में भी एक भी संतोषजनक उत्तर प्रदान नहीं किया था, विनम्र प्रार्थना है इस बार सही-२ सूचनाएँ प्रदान करें:

१.     प्रधानमन्त्री जी से संबंधित मोबाइल वेबसाइटों एवं मोबाइल एप में अभी तक राजभाषा हिन्दी का विकल्प उपलब्ध नहीं है, यह राजभाषा सम्बन्धी प्रधानमंत्री जी के 22 जुलाई 1999 के आदेश एवं 2 जुलाई 2008 को जारी राष्ट्रपति जी के आदेश (संख्या 20012 07 2005) का उल्लंघन है जिनमें 100% द्विभाषी वेबसाइट बनाने के लिए कहा गया है. इन आदेशों के उल्लंघन को रोकने हेतु इनमें राजभाषा एवं अन्य भारतीय भाषाओं के विकल्प जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय (“प्रमका”) की समृद्ध ‘आईटी टीम’ क्या क्या कदम उठा रही है?
२.     प्रधानमन्त्री कार्यालय के प्रशासनिक प्रधान (संयुक्त सचिव-प्रशासन) की अध्यक्षता में पिछले तीन साल में हुई बैठकों में कितनी बार राजभाषा हिन्दी के कार्यान्वयन सम्बन्धी विषय पर बार चर्चा हुई है, विवरण दें.
३.     फिलहाल प्रधानमन्त्री जी की मुख्य वेबसाइट 100% द्विभाषी नहीं है, उसमें ‘राष्ट्रीय रक्षा कोष’ एवं प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष’ में ऑनलाइन योगदान के पृष्ठ सिर्फ अंग्रेजी में हैं, अन्य कई टैब और अन्य वेबसाइटों के लिंक अभी भी सिर्फ अंग्रेजी में हैं, जो कि प्रधानमंत्री जी के 22 जुलाई 1999 के आदेश एवं राष्ट्रपति जी के 2 जुलाई 2008 के आदेश का उल्लंघन है, प्रमका ने राष्ट्रपति जी के आदेश के पालन के लिए क्या कार्यवाही की है?
४.     प्रधानमंत्री के चीनी सामाजिक मीडिया साइट वेइबो पर आधिकारिक वार्तालाप खाते पर नाम एवं परिचय सिर्फ चीनी भाषा में लिखा गया, सन्देश भी केवल चीनी भाषा में डाले जाते हैं जबकि प्रधानमंत्री जी के आधिकारिक फेसबुक/यूट्यूब/ट्विटर आदि खातों पर नाम-परिचय में भारत सरकार की राजभाषा हिन्दी को कोई स्थान नहीं दिया गया है, ऐसा करने का निर्णय किसने लिया? वहाँ किस नियम के तहत नाम-परिचय में राजभाषा हिन्दी को प्रयोग नहीं किया गया है, नियम की प्रति प्रदान करें?
५.     किसी न किसी नियम/आदेश/निर्णय के अनुसार ही प्रमका में कामकाज संचालित होता इसलिए बताएँ कि प्रधानमंत्री जी के आधिकारिक फेसबुक/यूट्यूब/ट्विटर आदि खातों पर अंग्रेजी को प्राथमिकता देने का निर्णय/आदेश किस अधिकारी ने लिया है?
६.     प्रधानमंत्री जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों को संभालने वाली सोशल मीडिया टीम में नियुक्त अधिकारी/अधिकारियों के नाम,पदनाम एवं ईमेल पते सूचित करें? इनमें से कितने अधिकारियों को हिन्दी टंकण का ज्ञान है?
७.     संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार भारत की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी है इसलिए भारत सरकार के हर कार्यालय में हिन्दी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए पर  प्रधानमंत्री जी से संबंधित सभी वेबसाइटें प्राथमिक आधार पर स्वतः (बाई डिफाल्ट) अंग्रेजी में खुलती हैं, ऐसा निर्णय किसने लिया? जब श्री मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तब तक प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट का होमपेज बाई डिफाल्ट द्विभाषी था, जिसमें राजभाषा हिन्दी को प्राथमिकता दी गई थी, अंग्रेजी को प्राथमिकता देने का निर्णय किस अधिकारी ने लिया?

बुधवार, 13 मई 2015

राष्ट्रपति सचिवालय से कुछ चुभते प्रश्न

१.     राष्ट्रपति भवन की जो ऑनलाइन सेवाएँ केवल अंग्रेजी में हैं उनका इस्तेमाल करने के लिए भारत के अंग्रेजी ना जानने वाले लगभग 110 करोड़ नागरिकों के लिए राष्ट्रपति सचिवालय ने क्या व्यवस्था की है? भारतीय भाषाभाषी नागरिकों को इन सेवाओं का इस्तेमाल करने के लिए राष्ट्रपति सचिवालय में किस व्यक्ति से संपर्क करना चाहिए?
२.     राष्ट्रपति भवन का भ्रमण करने के लिए ऑनलाइन आरक्षण की ऑनलाइन व्यवस्था राजभाषा हिन्दी में उपलब्ध नहीं है जबकि 2 जुलाई 2008 को राष्ट्रपति जी ने स्वयं आदेश जारी किया था कि भारत सरकार की समस्त वेबसाइटें 100% द्विभाषी होनी चाहिए ?
३.     राष्ट्रपति जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों पर समस्त जानकारी केवल अंग्रेजी में डाली जाती है जिसे देश के 90% नागरिक पढ़ भी नहीं सकते हैं तो क्या राष्ट्रपति जी केवल अंग्रेजी जानने वाली जनता से ही संवाद करना चाहते हैं, हम जैसी अंग्रेजी ना जानने वाली जनता को उनके सचिवालय की गतिविधियों को जानने का कोई अधिकार नहीं है?
४.     क्या राष्ट्रपति जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों पर राजभाषा हिन्दी में जानकारी डालने के लिए संबंधित अधिकारी को कोई निर्देश नहीं दिया गया है?
५.     राष्ट्रपति जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों पर केवल अंग्रेजी में जानकारी डालने के लिए नियुक्त अधिकारी/अधिकारियों के नाम /पदनाम/ईमेल पते प्रदान करें ताकि मैं उनसे प्रार्थना कर सकूँ कि महोदय, अंग्रेजी भारत की भाषा नहीं है और इस देश 95% जनता इस इस विदेशी भाषा को नहीं जानती है इसलिए राष्ट्रपति जी के ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब पर नवीनतम जानकारी हिन्दी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं में भी डालते रहें ताकि मुझ जैसे अंग्रेजी ना जानने वाले देश के करोड़ों लोग भी राष्ट्रपति जी के बारे में नवीनतम सूचनाएँ प्राप्त करे सकें? (इज़रायल सरकार, फ़्रांस सरकार, जर्मन सरकार, अमरीकी दूतावास (दिल्ली) ने भी अपने फेसबुक/ट्विटर के आधिकारिक पेजों पर नियमित जानकारी हिन्दी में डालना शुरू किया है, जब विदेशी लोग इस बात को समझ रहे हैं कि भारत की जनता से संवाद के लिए जनभाषा से बेहतर कुछ नहीं है तो राष्ट्रपति सचिवालय अपनी राजभाषा की अनदेखी कैसे कर सकता है)
६.     राष्ट्रपति जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों पर फिलहाल नाम/परिचय विदेशी भाषा अंग्रेजी में लिखा गया है, क्या उसमें राजभाषा हिन्दी को शामिल करने में कोई नियम आड़े आता है इसलिए राजभाषा को स्थान नहीं दिया गया है? (द्विभाषी अनुलग्नक देखें)
७.     संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार भारत की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी है पर राष्ट्रपति जी से संबंधित सभी वेबसाइट स्वतः (डिफाल्ट) अंग्रेजी में खुलती हैं इस तरह राष्ट्रपति सचिवालय ने राजभाषा हिन्दी को अंग्रेजी से कमतर आँका है, हिंदी को अंग्रेजी से ओछा समझा है वर्ना क्या कारण है कि हिन्दी वेबसाइट को प्राथमिकता नहीं दी जा रही? अंतिम अनुलग्नक “द्विभाषी होमपेज” देखें (बड़े दुःख की बात है कि भारत के संविधान में लिखा है कि हिन्दी राजभाषा है पर राष्ट्रपति सचिवालय अपनी वेबसाइटों के होमपेज द्विभाषी बनाने के लिए राजी नहीं है और ना ऐसी व्यवस्था करने के लिए तैयार है जिसमें राष्ट्रपति जी की वेबसाइटें द्विभाषी रूप में खुलें.)
८.     क्या राष्ट्रपति भवन के नियमों में लिखा है कि राष्ट्रपति जी से संबंधित कोई भी वेबसाइट बाई डिफाल्ट हिन्दी में नहीं खुलनी चाहिए? भले ही आप कहें कि पहले हिंदी वेबसाइट खुलने का कोई नियम नहीं है तो क्या अंग्रेजी वेबसाइट पहले खुले उसका नियम/आदेश है, यदि ऐसा नियम/आदेश है तो वह नियम/आदेश उपलब्ध करवाएँ?
९.     भारत सरकार ने अक्तूबर 2014 में भारत की प्रमुख भाषाओं की लिपियों में वेबसाइट डोमेन नाम पंजीयन की व्यवस्था शुरू की है. चूँकि भारत की आधिकारिक लिपि “देवनागरी लिपि” है इसलिए राष्ट्रपति.भारत, राष्ट्रपतिसचिवालय.भारत, राष्ट्रपतिभवन.भारत जैसे डोमेन नाम पंजीकृत करवाए जाने चाहिए कृपया सूचित करें कि क्या राष्ट्रपति सचिवालय ने इस विषय में कोई कदम उठाया है?

राष्ट्रपति सचिवालय ने एक भी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया और आवेदन लौटा दिया है, हिन्दी की उपेक्षा के लिए लगाये इस आवेदन को लौटने का कारण लिखने के लिए भी #अंग्रेजी प्रयोग की गई:

शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

योजना आयोग का नया नाम: राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान या फिर राष्ट्रीय भारत रूपान्तरण संस्थान

कल १ जनवरी २०१५ को भारत सरकार ने योजना आयोग के स्थान पर एक नए संस्थान का गठन किया है जिसका नाम 'नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रान्सफॉर्मिंग इण्डिया' [National Institution for Transforming India]' रखा गया है।  जिसे नीति आयोग भी कहा जा सकेगा ऐसा समाचार -पत्रों से ज्ञात हुआ। इसी मूल अंग्रेजी नाम में प्रयुक्त अंग्रेजी शब्दों के प्रथमाक्षरों से NITI शब्द लिया गया है, जैसा कि भारत में सर्वव्यापी परंपरा है कि राष्ट्रीय/निजी संस्थानों /व्यापारिक घरानों के नाम मूल रूप से अंग्रेजी में ही रखे जाते हैं सो इस संस्थान के नामकरण में भी उसी परतंत्र मानसिकतावादी अवधारणा को आगे बढ़ाया गया है, नया कुछ भी नहीं है। अब तक इस देश में मैकाले के संकल्प को डिगाने वाला व्यक्ति शासक नहीं बन सका है इसलिए हमारे संस्कारों में, विचारों में मैकाले की छाप बहुत अमिट हो चुकी है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी और गहराती जा रही है। हम आज भी विश्व को अपने देश का नाम 'भारत' नहीं बता सकते हैं जो कि इस देश का मूल और सार्वभौमिक नाम था। विश्व हमें इण्डिया के नाम से ही जानता है जो अंग्रेजों ने दिया था. पर मैं ये सब बातें क्यों कर रहा हूँ यह सभी बातें तो स्वतंत्रता के ६७ वर्षों से चल रही हैं और आशा है आगे भी चलती रहेंगी। मैकाले का संकल्प इतना सुदृढ़ था कि उसे भारत कभी भी हिला नहीं सकेगा, भाषाओं और संस्कृति के नाम पर रोना-गाना भले ही निरंतर चलता रहे। 

हाँ तो हम बात कर रहे थे 'नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रान्सफॉर्मिंग इण्डिया'। भारत सरकार की राजभाषा #हिन्दी केवल अनुवाद की भाषा बन कर रह गई है। विश्व में #हिन्दी ही एक ऐसी राजभाषा है जिसका प्रयोग सरकार के अंग्रेजी में किए गए मूल कामकाज के अनुवाद के लिए किया जाता है अर्थात देश की अघोषित राजभाषा तो अंग्रेजी है पर जब कुछ लोग हो-हल्ला करें तो अंग्रेजी में किए गए कामकाज का अनुवाद हिन्दी में कर दिया जाता है।

'नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रान्सफॉर्मिंग इण्डिया' का भी अनुवाद किया गया है और पत्र-सूचना कार्यालय की वेबसाइट पर 'राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान' बताया गया है। कुछ हिन्दी (हिंग्लिश?) समाचार पत्रों ने इसका संस्थान का नाम "भारत परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय संस्था" लिखा है, कुछ अति-आधुनिक हिंदी अख़बारों ने तो National Institution for Transforming India ही लिखा है अर्थात सरकार ने अपनी विज्ञप्ति में हिन्दी नाम का खुलासा नहीं किया होगा (यह मेरा अनुमान है) और इसलिए सभी स्वतंत्र हैं इस संस्थान के नाम का अनुवाद अपने तरीके से करने के लिए। 

अब आप ही बताएँ कि क्या यह अनुवाद सही है? क्या सचमुच उस बैठक में इस संस्थान के अनूदित #हिन्दी नाम पर चर्चा हुई होगी? मेरे विचार में वहाँ इस तरह की कोई चर्चा नहीं हुई होगी। वैसे भी सरकारी अधिकारी हिन्दी में बैठकें करने लगे तो उनकी शिक्षा का अपमान ना हो जाएगा। भारत यदि हुई होती तो एक दिन में ही इतने नाम प्रकट ना होते। तो एक बात तो निश्चित हुई कि हिन्दी भारत की आधिकारिक अनुवाद भाषा तो है पर किसी शब्द का आधिकारिक अनुवाद क्या हो, इसका निर्णय ६७ वर्षों बाद भी नहीं हो पाया है। 

एक संस्थान के नाम के लिए 'ट्रान्सफॉर्मिंग' शब्द का अनुवाद 'परिवर्तन' हो सकता है यह बात मुझ से अभी भी नहीं पच रही है। चूँकि भारत सरकार ने कोई आधिकारिक अनूदित #हिन्दी नाम जारी नहीं किया है इसलिए मेरे अनुसार इसका अनूदित नाम 'राष्ट्रीय भारत रूपान्तरण संस्थान' होना चाहिए। एक ऐसा संस्थान जो पूरे देश का रूपांतरण कर दे, मूल भावना  शायद यही रही होगी। मैं भी भारत का नागरिक हूँ और भारत की आधिकारिक अनुवाद भाषा का प्रयोग करने लिए स्वतंत्र हूँ जैसा कि भारत सरकार के कार्यालयों में बैठे अनुवादकगण अपने हिसाब से अनुवाद करने के लिए स्वतंत्र हैं। 

- प्रवीण जैन 

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

हम अपनी भाषाओं के प्रति इतने असंवेदनशील क्यों है?

जर्मन क्यों?

अमृत मेहता, सम्पादक, विदेशी भाषा साहित्य की हिन्दी पत्रिका "सार संसार"

इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैं जर्मन भाषा तथा साहित्य का अदम्य समर्थक हूँ, और अब तक मुझ द्वारा अनूदित 72 साहित्यिक कृतियों में से 66 का अनुवाद जर्मन से किया गया है. हिन्दी  मेरी मातृभाषा है, इसका प्रमाण इसी में है कि 72 में से 70कृतियों मे लक्ष्य भाषा हिन्दी  रही है, और दो में पंजाबी. अब तक मैं 208 जर्मनभाषी लेखकों की कृतियों का जर्मन से हिन्दी  में अनुवाद कर चुका हूँ, और कुल मिला कर 222 जर्मन लेखकों कि कृतियाँ प्रकाशित कर चुका हूँ. काफ़ी हद तक अपना धन लगा कर भी. अपनी पत्रिका “सार संसार” के माध्यम से मैंने 72 ऐसे नए अनुवादकों को जन्म दिया है, जो विदेशी भाषाओँ से सीधे हिन्दी  में अनुवाद करते हैं, जिनमें से 16 जर्मन-हिन्दी  अनुवादक हैं. पूरे विश्व में इन आंकड़ों के बराबर कोई नहीं पहुंचा, और यह वक्तव्य मैं पूरी ज़िम्मेदारी से दे रहा हूँ.

भारत के केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के स्थान पर केवल जर्मन को सुशोभित करना एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण है, और जिस तरह से इस भाषा को भारतीय बच्चों पर लादा गया है, वह न केवल असंवैधानिक है, बल्कि इस से यह भी उजागर होता है कि भारत को स्वयं में इतना ढीला-ढीला देश माना जाता है कि यहाँ पर कोई भी विदेशी शक्ति जो चाहे करवा सकती है, चाहे घूस के बल पर अथवा बहला-फुसला कर. इस प्रकरण में कौन सा तरीका अपनाया गया है, यह तथ्यों की गहराई में जाने से मालूम पड़ सकता है.

यह मामला 2014 में मानव संसाधन मंत्री सुश्री स्मृति ईरानी की सतर्कता से उजागर हुआ है, परन्तु तीन वर्ष में कुछ लोग इस सन्दर्भ में जो करने में सफल हुए हैं, वह हमारी शासन प्रणाली पर एक गंभीर प्रश्न-चिन्ह है. मैं 2009 से जानता हूँ कि कोई संदिग्ध खिचड़ी पक रही थी, परन्तु मेरी जानकारी में केवल इतना ही था कि हिन्दी  तथा अन्य भारतीय भाषाओँ के अस्तित्व पर कुठाराघात करके कुछ जर्मनभाषी सांस्कृतिक दूत अंग्रेज़ी को भारत की मुख्य भाषा सिद्ध करने पर तुले हुए थे. मैंने इसका जम कर विरोध किया है, बहुत कुछ लिखा है, और मुझे इसकी काफ़ी क़ीमत भी चुकानी पड़ी है. जर्मन का वर्चस्व जिस तरह से सरकारी स्कूलों में स्थापित किया जा रहा था, वह जुड़ा इसी सन्दर्भ से था, परन्तु मुझे यही भ्रम रहा कि यह भारत सरकार की इच्छा से हो रहा है, एक नीतिगत निर्णय है, अतः इस का विरोध करना निरर्थक होगा.

2009 में मैं बर्लिन के साहित्य-सम्मेलन की ग्रीष्म-अकादमी में हिस्सा ले रहा था, जहाँ जर्मनी के अनेकों प्रकाशक तथा गोएथे-संस्थान के लोग भी उपस्थित थे. सब मुझ से पूछ रहे थे कि क्या मैं नवीन किशोर को जानता हूँ. किशोर कोलकाता के सीगल्ल-बुक्स-प्रकाशन के मालिक हैं, और तब तक अपना व्यापार लन्दन से चला रहे थे, क्योंकि वह पुस्तकें अंग्रेज़ी की प्रकाशित करते हैं. सब मुझे बता रहे थे कि वे किशोर से मिलने कोलकाता जा रहे थे. कारण पूछने पर मुझे बताया गया कि आगे से वे जर्मन पुस्तकों के अंग्रेज़ी अनुवाद भारत से ही करवा कर वहीँ प्रकाशित करवाया करेंगे. यह एक बहुत ही चौंका देने वाली सूचना थी. मेरे यह कहने पर कि कोई भी भारतीय जर्मन साहित्य का अनुवाद अंग्रेज़ी में कर पाने में समर्थ नहीं होगा, और वैसे भी अज्ञात जर्मन लेखकों की पुस्तकें पढ़ने में भारतीय दिलचस्पी नहीं लेंगे तो मुझ पर यह कह कर हंसा गया कि हर भारतीय अंग्रेज़ी जानता है, और मैं उन्हें भ्रमित कर रहा हूँ. उनके इस विश्वास की पृष्ठभूमि में भारत में कुछ वर्षों से चल रहा एक अंग्रेज़ी-समर्थक अभियान था. इस बारे में मैं वेबज़ीन “सृजनगाथा” में मई 2010 में प्रकाशित अपने एक बहुचर्चित आलेख में विस्तार से लिख चुका हूँ. यह भी कि मैंने जर्मनी के एक प्रमुख प्रकाशन “ज़ूअरकांप फर्लाग” की प्रमुख पेट्रा हार्ट को एक मेल लिख कर अपना कड़ा विरोध जताया था तो उन्होंने मुझे जवाब में लिखा था कि ये पुस्तकें केवल अंग्रेज़ीभाषी देशों, जैसे अमरीका तथा इंगलैंड के लिए हैं, इन्हें छपवाया भारत में जायेगा, बेचा विदेश में जायेगा, और इनका अनुवाद भी अँगरेज़ करेंगे. पेट्रा एक सीधी-सच्ची महिला हैं और उनके कथन में सत्य है. जर्मन से अंग्रेज़ी में अनूदित, भारत में प्रकाशित पुस्तकें भारत में उपलब्ध नहीं हैं, अंग्रेज़ीभाषी देशों में ही बेचीं जा रही हैं. इसका सीधा सा मतलब है: भारत में पुस्तकें सस्ती छपती हैं, तो इस से प्रकाशकों का मुनाफ़ा कई गुणा बढ़ जाता है. परन्तु इसका चिंताजनक पहलू यह रहा कि इसके साथ ही भारत में, विशेषकर गोएथे संस्थान द्वारा एक हिन्दी -विरोधी अभियान भी शुरू हो गया, जिसके अंतर्गत, एक जर्मनभाषी सांस्कृतिक दूत के शब्दों में: “दिल्ली से बाहर कदम रख कर देखो तो कोई भी हिन्दी  नहीं बोलता.” इस अज्ञान को क्षमा करने का कोई कारण नहीं है, लेकिन इसके मंतव्य को समझते हुए यह  निस्सहाय रोष को जन्म देने वाला एक वक्तव्य है. बहरहाल यह समझ में आने वाली बात है कि वैश्वीकरण के इस युग में कोई कम लागत में किसी दूसरे देश के सस्ते कामगारों का लाभ उठा रहा है, जबकि इस  सांस्कृतिक दूत का कथन था कि वे यहाँ पर लोगों को रोज़गार उपलब्ध करवा रहे हैं.

लेकिन अभी तक जो एकदम अबोधगम्य रहा है, वह है भारत के संविधान की अवहेलना करते हुए जर्मन को भारत में बढ़ावा देना. इससे क्या मिलने वाला है जर्मनी को, या किसी अन्य जर्मनभाषी देश, अर्थात आस्ट्रिया अथवा स्विट्ज़रलैंड को? उनके लिए भारतीय बच्चों को जर्मन सिखाना इतना अधिक महत्व रखता है कि उन्होंने चुपचाप मानव संसाधन मंत्रालय को नज़रंदाज़ करते हुए गुप-चुप केन्द्रीय विद्यालय संगठन से इकरारनामा कर डाला और उसके बाद प्रति वर्ष लाखों यूरो जर्मन के प्रचार-प्रसार पर खर्च करते रहे. यह तर्क किसी के गले नहीं उतरने वाला कि जर्मन सरकार चाहती है कि भारत के प्रतिभाशाली छात्र इससे जर्मन विश्वविद्यालयों में शिक्षा पाने को आतुर हो जायेंगे. स्कूल में पढ़ी जर्मन बड़े होने के बाद कहाँ बची रह जाती है? मेरे छोटे बेटे ने स्कूल में तीसरी भाषा के तौर पर फ्रेंच ली थी, और अब वह ‘कोमा ताले वू?’ (कैसे हो?) के अलावा और कोई वाक्य नहीं जानता. मेरे ज्येष्ठ पुत्र ने कॉलेज में पढ़ते हुए गोएथे-संस्थान से दो सत्र में जर्मन सीखी थी, २४ वर्ष की आयु में, अपनी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था उसने, लेकिन अब वह “शुभ प्रातः” या “शुभ संध्या” तक ही सिमट कर रह गया है. एक तर्क और है कि अभी तक जर्मन की शिक्षा केवल निजी स्कूलों के बच्चों तक, अर्थात अमीर बच्चों तक ही सीमित रही है, और केंद्रीय विद्यालयों में इसे लगा कर गरीब बच्चों के लिए जर्मन भाषा की शिक्षा उपलब्ध करवाई जा रही है, जो स्वयं में एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है, 20.11.14 को समाचारपत्रों में निकली एक खबर के अनुसार हमारे सांसद इन विद्यालयों में प्रति वर्ष 15 सीटों का कोटा अपने बच्चों के लिए आरक्षित करवाना चाहते हैं, इसी से मालूम पड़ जाता है कि इन विद्यालयों में पड़ने वाले बच्चे कितने गरीब हैं. न जाने ऐसा कितना अज्ञान इनके आसपास घूमने वाले अंग्रेजीदां हिंदुस्तानियों ने इनके भेजे में भर दिया है कि ये लोग अपनी नाक के आगे ज़्यादा दूर तक नहीं देख पाते.

कुल मिला कर यह एक अचरज में डालने वाला विषय है कि क्या जर्मन का भारतीय स्कूलों में पढ़ाया जाना गोएथे संस्थान या जर्मन दूतावास के या जर्मन सरकार के लिए इतना गंभीर विषय है कि उसके लिए संदिग्ध प्रणाली से एक समझौता करना, पानी की तरह पैसा बहाना तथा जर्मन चांसलर मैडम मेर्केल का भारतीय प्रधानमंत्री से एक महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन के दौरान बात करना अनिवार्य हो गया? किसी भी जर्मन या भारतीय नागरिक के लिए यह गोरखधंधा अबोधगम्य ही रहेगा. सुप्रसिद्ध साहित्यकार ई.एम.फोस्टर ने एक बार कहीं लिखा था: If I had to choose between betraying my country and betraying my friend, I hope I should have the guts to betray my country, अर्थात यदि मेरे सामने अगर दुविधा हो कि मैं देश से गद्दारी करूं या दोस्त से, तो उम्मीद रखता हूँ कि मुझमें देश से गद्दारी करने का साहस होगा.

जर्मनों तथा जर्मनभाषियों से मेरा संपर्क तथा मेरे सम्बन्ध गत 41 वर्षों से हैं, और मैं भली-भांति जानता हूँ कि जर्मेनिक नस्ल दोस्ती निभाने के मामले में मिसालें क़ायम कर सकती है, पर देश से गद्दारी?...मैं सोच भी नहीं सकता था, परन्तु इस प्रकरण में कहीं जा कर यह उक्ति इन के सन्दर्भ में सार्थक प्रतीत होती है. यह तो मैं गत 15 वर्षों से जानता हूँ कि ये लोग भारतीय दोस्तों द्वारा बरगलाये जाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं.

गोएथे-संस्थान दशकों से भारत में निरंकुशता से जर्मन-भारतीय भाषा अनुवाद क्षेत्र में निरीह हिन्दी  पाठकों पर जर्मन साहित्य के घटिया अनुवाद थोप रहा है. विष्णु खरे इसके आधिकारिक अनुवादक रहे हैं, जो खुद मानते हैं कि उनका जर्मन-ज्ञान अल्प है. संस्थान हिन्दी  में उत्तम अनुवाद नहीं होने देता, अगर कोई करता है तो उसे प्रताड़ित करता हैं, उससे उसके प्रकाशक छीन लेता है, अपने दोस्त प्रकाशकों पर थोप देता है, कि इनसे अनुवाद करवाओ. जब उनके अनुवाद ऐसे होते हैं कि हिन्दी  पाठक उन्हें पढ़ते हुए अपना माथा पीट ले, तो भी प्रकाशक के साथ ज़बरदस्ती की जाती है कि उसे वही अनुवाद छापने होंगे. यह उनके अपने साहित्य का अपमान नहीं है तो क्या है? इस विषय पर जर्मनी तथा आस्ट्रिया की दो शोध-पत्रिकाओं में मैं जर्मन भाषा में 14-15 पृष्ठों का एक विस्तृत लेख प्रकाशित कर चुका हूँ. खेद का विषय है कि मुझे इस प्रवृत्ति को कड़े शब्दों में लताड़ना पड़ा है; किसी प्रश्न का कोई उत्तर तो इनके पास नहीं है, लेकिन लोगों से निजी वार्तालापों में इसके अधिकारी मेरे प्रति अपनी आक्रोश जताते रहते हैं. इनकी निरंकुशता अब इस हद तक बढ़ चुकी है कि ये अनधिकृत रूप से देश से संस्कृत तथा अन्य भारतीय भाषाएँ मिटा कर जर्मन को स्थापित करने कि लिए दशकों से बने मधुर भारत-जर्मन संबंधों में दरार लाने पर भी उतारू हो गए हैं.

बात जर्मनों के जिगरी दोस्त होने की हो रही थी. 50 वर्ष से अधिक समय से गोएथे-संस्थान का एक जिगरी दोस्त प्रमोद तलगेरी नाम का एक जर्मन प्रोफ़ेसर रहा है. जर्मन भाषा और साहित्य के मामले में यह हमेशा उनका प्रमुख परामर्शदाता रहा है. गत कुछ वर्ष ऐबरहार्ट वेल्लर संस्थान की दक्षिण एशिया-शाखा के भाषा-विभाग के प्रमुख रहे थे. उनके कार्यकाल के दौरान भारतीय विश्वविद्यालयों में जर्मन के वही शिक्षक फले-फूले, जो वेल्लर तथा तलगेरी की युगल-जोड़ी को दंडवत प्रणाम करते रहे. और ये उन्हें बार-बार जर्मनी की सैर करवाते रहे.. लेकिन वेल्लर के ज़माने में भारत में जर्मन भाषा ख़ूब फली-फूली, भले ही इसकी उन्नति के तौर-तरीके संदिग्ध थे. इन्हीं के ज़माने में हिन्दी  के प्रति संस्थान की शत्रुता खुल कर प्रकट हुई. इन्होने देश के कई कोनों में जर्मन सेंटर खुलवाए, अपने पिच्छ्लग्गुओं को वहां नियुक्त कर दिया. एक उदाहरण ही इनकी कार्यविधि को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त होगा. इन्होंने चंडीगढ़ के सेक्टर 34 में एक गोएथे-सेंटर खुलवाया, जिसे पूरे उत्तर भारत में जर्मन भाषा सीखने के लिए एकमात्र सेंटर का दर्ज़ा प्रदान किया गिया, और जिसके बारे में घोषणा की गई कि दिल्ली की इंदिरा गाँधी ओपन यूनिवर्सिटी की भागीदारी इसके साथ होगी. यहाँ उल्लेखनीय है कि इस निजी-सेंटर के कर्ता-धर्ता निदेशक सिर्फ़ एम.ऐ. हैं, तथा किसी कॉलेज या यूनिवेर्सिटी में शिक्षक की नौकरी नहीं पा सके, क्योंकि यू.जी.सी. की नेट परीक्षा पास नहीं कर सके, परन्तु, यदि हम वेल्लर के शब्दों पर विश्वास करें तो इन्हें – वेल्लर तथा तलगेरी की कृपा से - एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर का दर्ज़ा संभवतः मिल चुका है. यह अनिवार्य है कि जांच की जाये: क्या इंदिरा गाँधी ओपन यूनिवर्सिटी से भी गोएथे-संस्थान ने ऐसा कोई अवैध समझौता किया है?   यह स्वतःस्पष्ट है कि भारत में जर्मन का प्रचार-प्रसार बढ़ाने से वेल्लर की प्रतिष्ठा गोएथे-संस्थान के म्यूनिख मुख्यालय में बढ़ी और तलगेरी की जर्मन दूतावास इत्यादि में. और इस प्रतिष्ठा की दरकार तलगेरी को बहुत बुरी तरह से थी.

गोएथे-संस्थान, जर्मन दूतावास तथा अन्य जर्मनभाषी देशों के दूतावासों के घनिष्ठ मित्र प्रमोद तलगेरी भारत सरकार के अपराधी हैं, अतः इन्हें भारतीय यूनिवर्सिटी सिस्टम से बहिष्कृत किया जा चुका है, और मानव संसाधन मंत्रालय ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग के आदेश पर एक यूनिवर्सिटी में इनके भ्रष्टाचार के मामलों को दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार की कड़ी नाराज़गी इनके प्रति प्रकट की है. यह कभी हैदराबाद में एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय के उपकुलपति होते थे, और अब अपने आप को इंडिया इंटरनेशनल मल्टीवेर्सिटी, पुणे, का उपकुलपति बताते हैं. वास्तव में यह “वेर्सिटी” न तो “यूनिवर्सिटी” है, न ही “इंटरनेशनल” है, और न ही यह इसके उपकुलपति हैं. जर्मनों के यह घनिष्ट मित्र दशकों से मक्कारियों और घोटालों के लिए जाने जाते रहे हैं, और स्वयं पर हाल में हुए कुठाराघात से निज़ात पाने के लिए इनके लिए अपने मित्रों के लिए कुछ नया करना अनिवार्य था. यह फ़रवरी 2014 में “अपनी यूनिवर्सिटी” में जर्मन, स्विस तथा आस्ट्रियाई दूतावास के सहयोग से  “भारत में जर्मन के शिक्षण” के सौ वर्ष की जयंती” बड़ी धूमधाम से मनाने वाले थे. मुझे जब यह सूचना स्विस दूतावास की सांस्कृतिक सचिव, ज़ारा बेरनास्कोनी, से मिली कि तीनों दूतावास इंडिया इन्टरनेशनल मल्टीवेर्सिटी में जा कर यह समारोह आयोजित करने जा रहे हैं तो मैंने उन्हें सच्चाई से परिचित करवाया. वह आश्चर्यचकित हुईं और उन्होंने मेरे कथन पर विश्वास नहीं किया. मैनें उन्हें कोरिएर से प्रमाण भेजे तो उन्हें यकीन आया. ये सब प्रमाण इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं. 

तथ्य ये हैं:

वेर्सिटी का पता कहीं पर कुछ है, कहीं कुछ और है, कुछ पता नहीं कि यह कब स्थापित हुई थी, 2000 से 2012 तक कई तारीखें हैं इसमें, वेर्सिटी में छात्रों की संख्या:0, शिक्षकों की संख्या:0, कमरों की संख्या:0, कम्प्यूटरों की संख्या:0, कुछ भी नहीं वहां पर, कुल मिला कर वेर्सिटी के पास6,36,122 रूपये का बजट है, जो उन्हें किसी ने दान में दिये हैं, जिस में से 5,40,000 रूपये कर्मचारियों में बांटे गए हैं. वेर्सिटी को न तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और न ही तकनीकी शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त है, जो हर सही यूनिवर्सिटी के लिए अनिवार्य होती है. कहीं पर इसे कॉलेज बताया गया है, कहीं एक वाणिज्यिक संस्था, कहीं कल्याणकारी संस्था और कहीं गैर-सरकारी संगठन के रूप में इसका परिचय दिया गया है; विकिपीडिया में इसे एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बताया गया है, जिसे तलगेरी चला रहे हैं. और कि इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी एक ग्रामीण यूनिवर्सिटी है, प्रमोद तलगेरी जिसके “Appily Adhikari” और “Principal” हैं. स्विस राजदूत लीनुस फॉन कास्टेलमूर को भी मैंने आगाह किया कि ऐसे व्यक्तियों से बच कर रहें. यथासंभव जर्मन से जुड़े हर व्यक्ति को देश-विदेश में आगाह किया. समारोह अंततः पुणे यूनिवर्सिटी में संपन्न हुआ, वहां जर्मन राजदूत मिषाएल श्टाइनर ही उपस्थित थे, परन्तु उन्होंने तलगेरी को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद अवश्य दिया. और सबसे अधिक हैरत की बात यह है कि इसी वर्ष अप्रैल में गोएथे-संस्थान ने तलगेरी को भारत तथा जर्मनी के मध्य सांस्कृतिक तथा साहित्यिक संबंधों को असाधारण प्रोत्साहन देने के लिए मेर्क-टैगोर पुरस्कार से सम्मानित किया है. स्पष्ट है कि किस लिए दिया गया है यह सम्मान. कई बार तो पता नहीं चलता कि इनकी निष्ठां भारत के प्रति है या जर्मनी के प्रति. जर्मन दूतावास की 17.11.2009 की एक प्रेस विज्ञप्ति में तलगेरी को जर्मनी के प्रान्त बाडेन व्युर्त्तेमबेर्ग के मुख्यमंत्री ग्युंटर एच. अयोत्तिन्गेर के साथ आये प्रतिनिधिमंडल का सदस्य बताया गया है. यदि जर्मन हमारे देश में अपनी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए दम लगते हैं तो यह एक स्वाभाविक बात है, यह उनका काम है, परन्तु यदि एक भारतीय के षड्यंत्र के कारण वैश्विक स्तर पर एक कूटनीतिक संकट कि स्थिति आन खड़ी हो, जिसमें दो देशों मे सम्बन्ध बिगड़ जाने का खतरा हो तो ऐसे अपराधी को देशद्रोह का दंड मिलना चाहिए.

इससे पहले भी तलगेरी अनगिनत घोटाले कर चुके हैं, जिनका विवरण मैं यहाँ स्थानाभाव के कारण नहीं दूंगा,  परन्तु इनके बारे में मैं बहुत कुछ पहले भी लिख चुका हूँ, इन घोटालों में भारत सरकार तथा अन्य कई संस्थाओं को ठगा गया था. परन्तु यू.पी.ऐ. सरकार के समय में इन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.

संक्षेप में: वेल्लर का काम था भारत में जर्मन सीखने वाले छात्रों में वृद्धि करना, वह उसने किया, तलगेरी का काम था अपने कलंक को सामने न आने देना, वह उसने किया, और म्यूनिख और भारत के गोएथे-संस्थान ने अपनी दोस्ती निभाई, अपनी भाषा तथा साहित्य की क़ीमत पर. मुझे और कोई कारण नज़र नहीं आता इस गौण समस्या को इतना तूल देने का कि जर्मन प्रधानमंत्री को इस में हस्तक्षेप करना पड़े.

वैसे वेल्लर तथा तलगेरी ने मिल कर यदि भारत में जर्मन भाषा सीखने वालों की संख्या में भारी वृद्धि की तो उसमें पैसे का बड़ा हाथ था. शिक्षिका ने अभी पढाना शुरू ही किया और बच्चों ने सीखना तो उन्हें फटाफट जर्मनी की सैर करा दी. स्कूली बच्चों पर इस तरह गैर-क़ानूनी रूप से तीसरी भाषा के रूप में जर्मन थोपना हास्यास्पद तथा अनर्गल है, क्या कोई कल्पना कर सकता है कि भारतीय इस तरह जर्मनी या किसी अन्य यूरोपीय देश में जा कर हिन्दी  या तमिल वहां के स्कूलों पर थोप सकते हैं?

देखा जाये तो केंद्रीय विद्यालय संगठन ने गोएथे-संस्थान से उक्त समझौता कर के अपने देश, अपनी भाषा के प्रति निष्ठा नहीं दिखाई. त्रिभाषी सूत्र का मुख्य उद्देश्य था देश के सभी भाषाई क्षेत्रों को भावनात्मक स्तर पर एक दूसरे से जोड़ना, और यदि छात्र उत्तर में संस्कृत को वरीयता देते हैं तो भी यह उद्देश्य पूरा होता है. आखिरकार जर्मनी और दूसरे यूरोपीय देशों में भी तो बच्चे लातिन सीखते हैं. यह एक कसौटी पर कसा तथ्य है कि लातिन सीखने वाले बच्चे यूरोप की किसी अन्य भारोपीय भाषा में आसानी से महारत प्राप्त कर सकते हैं. वही बात संस्कृत में है, जो न  भारत की हर इन्डो-यूरोपीय भाषा से, बल्कि कन्नड़ और तेलुगु जैसी द्रविड़ भाषाओँ से भी छात्रों को जोड़ती है. संस्कृत प्राचीन ग्रीक की माँ है, जो लातिन की माँ है, और जो भारत-जेर्मैनिक, भारत-आर्य, भारत-रोमांस तथा भारत-स्लाव भाषाओँ की माँ है. इस में विरोध काहे का! हर भारोपीय भाषा में संस्कृत के शब्दों की भरमार है, अतः बेहतर होगा कि दोनों सम्बन्धी देश अपने-अपने देश में अपनी-अपनी भाषा के लिए काम करें तथा भाषा के नाम पर एक दूसरे की भावनाओं से खिलवाड़ न करे.

शौकिया तौर पर जर्मन सिखाए जाने देने का भारत सरकार का निर्णय उचित है. जर्मनी को भी चाहिए कि वह वहां संध्याकालीन-कक्षाओं में हिन्दी  पढाये जाने का इंतजाम करें.

इस सन्दर्भ में मुझे अंग्रेज़ी मीडिया की भूमिका हर तरह से संदिग्ध लगती है. बिना मामले की गहराई में गए जर्मन के पक्ष में सम्पादकीय तक लिख मारने में उनकी नीयत पर शक होना स्वाभाविक है.