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मंगलवार, 2 सितंबर 2014

भारत में देसी भाषाओं की नहीं कोई इज्ज़त

गणपत तेली
जनसत्ता 1 सितंबर, 2014: भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की उपेक्षा और दोयम दर्जे के व्यवहार का मुद्दा कुछ समय से बराबर उठता रहा है। संघ लोक सेवा आयोग की प्रशासनिक सेवाओं के अतिरिक्त भी अधिकतर प्रतियोगी परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की स्थिति ऐसी ही है। प्रश्नपत्रों पर यह स्पष्ट लिखा रहता है कि प्रश्नों के पाठ में भिन्नता होने पर अंग्रेजी  वाला पाठ मान्य होगा और कई प्रश्नपत्रों में तो यह भी लिखा नहीं होता है, जबकि अक्सर हिन्दी पाठ अबूझ और कई बार गलत तक होता है। यह बात विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा से लेकर सामान्य प्रतियोगी परीक्षाओं तक में देखी जा सकती है। इन आंदोलनकारियों को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने भारतीय भाषाओं की इस उपेक्षा को फिर से बहस में ला दिया।

यह कोई प्रशासनिक सेवाओं का अलग-थलग मसला नहीं है, बल्कि हमारे देश की उस अकादमिक व्यवस्था का एक विस्तार है, जहां भारतीय भाषाओं की इसी तरह की उपेक्षा होती है और जो इन भाषाओं के पठन-पाठन की गतिविधियों और इनके विद्यार्थियों के लिए अकादमिक और पेशेगत अवसरों को सीमित करती है। अगर हम उच्च शिक्षा की स्थिति पर एक नजर डालें तो स्पष्ट हो जाएगा कि सरकारी नीतियां इस असमान व्यवस्था को प्रोत्साहित करती हैं। 

आजादी के बाद हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने महसूस किया कि अन्य विकासमूलक मानकों पर विकसित देशों की बराबरी करने में हमें वक्त लगेगा, तकनीक और विज्ञान का क्षेत्र ऐसा है जिसमें और जिसके जरिए हम तत्काल विकसित देशों की पंक्ति में जा खड़े होंगे। फलत: हमारी सरकारें (चाहे किसी भी पार्टी की हों) तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देती हैं, उसके बाद ही सामाजिक विज्ञान के अनुशासनों का स्थान आता है। और अंत में, भाषा और साहित्य जैसे मानविकी के विषय रह जाते हैं। 

अभी हमारे देश में सोलह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (भाप्रौस -आइआइटी) हैं, जिनमें छह-सात काफी प्रतिष्ठित हैं और अन्य अभी आकार ले रहे हैं। इसके अतिरिक्त तीस राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (राप्रौस -एनआइटी) हैं। विज्ञान-शिक्षा के क्षेत्र में पांच भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (भाविशिअस-आइआइएसइआर) हैं। साथ ही, भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु, भारतीय प्रतिरक्षा संस्थान, नई दिल्ली के अलावा भी विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के लिए कई संस्थान और परिषदें हैं। 
समाज विज्ञान की शिक्षा के क्षेत्र में भी ऐसी कई संस्थाएं हैं- टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (मुंबई और हैदराबाद), गोखले अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान संस्थान (पुणे), कलिंग सामाजिक विज्ञान संस्थान (भुवनेश्वर), मद्रास विकास अध्ययन संस्थान, विकास अध्ययन संस्थान कोलकाता जैसी कई संस्थाएं हैं। लेकिन भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भारतीय भाषा संस्थान मैसूर, केंद्रीय हिन्दी संस्थान, केन्द्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान अथवा सेंट्रल इंस्टीट्यूट आन क्लासिकल तमिल जैसी गिनी-चुनी संस्थाओं के अलावा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय ही हैं। 

इसी तरह उच्च शिक्षा में शोध के लिए वैज्ञानिक एवं औद्योगिक शोध परिषद (वैऔशोप-सीएसआइआर), वैज्ञानिक एवं अभियांत्रिकी शोध परिषद (वैअशोप-एसइआरसी) जैसी संस्थाएं वैज्ञानिक शोध को प्रोत्साहित करती हैं। समाजविज्ञान के क्षेत्र में इंडियन काउंसिल फॉर सोशल साइंस रिसर्च अकादमिक शोध को बढ़ावा देती है। इसके अलावा समाजविज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में भी कई संस्थान हैं। इतिहास के क्षेत्र में ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद और दर्शनशास्त्र के लिए इंडियन काउंसिल फॉर फिलोसोफिकल रिसर्च ऐसी ही परिषदें हैं। इसी तरह नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय आधुनिक भारत के इतिहास से जुड़े विभिन्न प्रसंगों पर शोध को बढ़ावा देता है। 

ये  परिषदें और संस्थाएं न केवल शोध के लिए विभिन्न शोधवृत्तियां देती हैं, बल्कि फील्ड वर्क को भी प्रोत्साहित करती हैं। यही नहीं, ये संस्थाएं संबंधित क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्राय: देश के अलग-अलग हिस्सों में शोध पद्धति की कार्यशालाओं का आयोजन करती हैं, जिनमें युवा संकाय सदस्य और शोधार्थी भाग लेते हैं। उक्त सरकारी संस्थाओं के अतिरिक्त कई गैर-सरकारी संस्थाएं भी सामाजिक विज्ञान और विज्ञान के क्षेत्रों में कार्यरत हैं। ये सभी अपने-अपने क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने का काम करती हैं। साथ ही साथ, ये अपनी परियोजनाओं और कार्यक्रमों के जरिए रोजगार के अवसर भी मुहैया कराती हैं।
वहीं अगर हम भाषा और साहित्य की तरफ नजर डालें तो भारतीय भाषाओं की साहित्य अकादमियों के अलावा कुछ खास है नहीं। उक्त साहित्य अकादमियां और अन्य निजी न्यास या संस्थान भी साहित्यिक पुरस्कारों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, नए शोध के लिए शोधवृत्तियां प्राय: नहीं देते और न ही शोध से संबंधित गतिविधियां आयोजित करते हैं। हालांकि इन अकादमियों और निजी न्यासों का दायरा उच्च शिक्षा नहीं है, फिर भी ये पुरस्कारों की स्थापना के साथ कुछ शोधवृत्तियां स्थापित करेंगे तो उस भाषा और साहित्य का शैक्षणिक विस्तार ही होगा। इसलिए ऐसा किया जाना चाहिए। 

हम इस तरह देखते हैं कि सरकारें भारतीय भाषाओं को कोई विशेष महत्त्व नहीं देती हैं। हां, इन भाषाओं के तकनीकी विकास पर अवश्य ध्यान दिया जा रहा है, जिसके तहत प्रगत संगणन विकास केंद्रों (सीडैक), केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान मैसूर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में बहुत-सी अकादमिक गतिविधियां चल रही हैं। इस पूरी परिघटना की सबसे बड़ी विडंबना है कि भाषा और साहित्य जैसे मानविकी विषयों को रोजगारमूलक शिक्षा के नाम पर नजरअंदाज किया जा रहा है, जबकि बेरोजगारी तो बढ़ ही रही है। सही है कि रोजगार एक आवश्यक तत्त्व है, लेकिन शिक्षा महज रोजगार के लिए नहीं हो सकती। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को अपने समाज, राजनीति और संस्कृति के यथार्थ से रूबरू कराना भी होता है। 

अपने समाज और परिवेश से विद्यार्थियों को जोड़ने और संपूर्ण शिक्षा देने के इसी उद्देश्य से आइआइटी, एनआइटी जैसी तकनीकी संस्थाओं में सामाजिक विज्ञान और मानविकी विभाग भी स्थापित किए गए। उच्च शिक्षा के लिए बनाई गई यशपाल समिति की रिपोर्ट में भी यह एक महत्त्वपूर्ण सिफारिश थी। लेकिन यह फलीभूत नहीं हुई, क्योंकि शायद ही किसी संस्थान में हिन्दी या किसी अन्य भारतीय भाषा को स्थान मिला हो। इन सभी संस्थानों के मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभागों में सामाजिक विज्ञान के कुछ विषय पढ़ाए जाते हैं, जबकि साहित्य और भाषा के नाम पर अंग्रेजी  पढ़ाई जाती है, हिन्दी या अन्य कोई भारतीय भाषा नहीं। यही स्थिति राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की है। एक-दो अपवाद और हिन्दी दिवस जैसी औपचारिकताओं को छोड़ दें तो भारतीय भाषा संबंधी गतिविधियां प्राय: इन संस्थानों में नहीं होतीं। भारतीय प्रबंधन संस्थान तो इस मामले में और भी पीछे हैं।

यही हाल उन निजी विश्वविद्यालयों का है, जो पिछले कुछ वर्षों में धूमधाम से खुले हैं। अधिकतर निजी विश्वविद्यालय विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन आदि अध्ययन के लिए ही हैं, जिनमें भाषा-साहित्य के नाम पर बस अंग्रेजी  है। लेकिन जो निजी विश्वविद्यालय सामाजिक विज्ञान और मानविकी को बराबर स्थान देने का दावा करते हैं, वहां भी प्राय: भारतीय भाषाओं को कोई स्थान नहीं मिलता है। उदाहरण के लिए, एमिटी विश्वविद्यालय में जर्मन, स्पेनिश, फ्रांसीसी और अंग्रेजी  में स्नातक की पढ़ाई होती है, लेकिन भारतीय भाषाओं में सिर्फ संस्कृत को यह स्थान देता है। जोधपुर नेशनल यूनिवर्सिटी जैसे कुछ ही विश्वविद्यालय भारतीय भाषाओं के पाठ्यक्रम प्रस्तावित करते हैं। 

इन अपवादों को छोड़ दें, तो ऐसे निजी विश्वविद्यालयों की फेहरिस्त लंबी है, जहां भारतीय भाषाओं का अस्तित्व ही नहीं है और उनमें साहित्य के नाम पर अंग्रेजी  साहित्य या कहीं-कहीं तुलनात्मक साहित्य पढ़ाया जाता है। कई सरकारी विश्वविद्यालय भी तुलनात्मक साहित्य के अध्यापकों के लिए योग्यता तुलनात्मक साहित्य या अंग्रेजी  (अन्य किसी भाषा में नहीं) में एमए निर्धारित करते हैं। अंग्रेजी  साहित्य पढ़ाए जाने से कोई समस्या नहीं है, लेकिन भारतीय भाषाओं का साहित्य भी इन्हें अवश्य पढ़ाना चाहिए। अगर अंग्रेजी साहित्य पढ़ाया जा सकता है, तो हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, बांग्ला, मराठी, असमी, मलयालम, तमिल, तेलुगू, ओड़िया, गुजराती आदि भाषाओं का साहित्य क्यों नहीं पढ़ाया जा सकता!

निजी विश्वविद्यालय संबंधित राज्य की विधानसभा द्वारा पारित अधिनियम के तहत स्थापित किए जाते हैं और इन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी मान्यता देता है, तो क्यों नहीं इन२के लिए यह आवश्यक किया जाए कि ये कम से कम उस राज्य की भाषा और उसके साहित्य के कुछ पाठ्यक्रम प्रस्तावित करें। यही बात आइआइटी और आइआइएम पर भी लागू होनी चाहिए। कितना अच्छा हो, अगर देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित इन संस्थानों में अलग-अलग भारतीय भाषाएं भी पढ़ाई जाएं। इसके विपरीत वर्तमान व्यवस्था के कारण अधिकतर छात्र-छात्राओं की पढ़ाई की भाषा व्यवहार की भाषा से अलग हो जाती है। जब उनकी ज्ञान की प्रक्रिया से ही इन भाषाओं को काट दिया गया है, तो फिर यह शिकायत कहां से जायज है कि अमुक अनुशासन भारतीय भाषाओं में नहीं पढ़ाए जा सकते! यह एक सर्वविदित तथ्य है कि हमारे देश में प्राय: उच्च शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं नहीं हैं। कुछ राज्यों के विश्वविद्यायलों में अवश्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से पठन-पाठन होता है, लेकिन इसके लिए उन्हें दोयम दर्जे की पाठ्यपुस्तकों पर निर्भर रहना पड़ता है। फलस्वरूप, अक्सर वे उस विषय में पारंगत होने और आगे की पढ़ाई से वंचित हो जाते हैं। इसके अलावा भारतीय भाषाओं के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की विशेष वित्तीय सहायता से संचालित कार्यक्रम या पुस्तकालय भी प्राय: नहीं दिखाई देते। 

अब जरा उस शिकायत पर भी नजर डालते हैं, जो भारतीय भाषाओं, खासकर हिन्दी के लेखक-प्रकाशक करते हैं कि साहित्य को पाठक नहीं मिल रहे हैं। मिलेंगे कहां से, जब संभावित पाठकों की पूरी पीढ़ी को ही व्यवस्थित तरीके से उसके साहित्य, भाषा और समाज से दूर कर दिया जाता है। यह स्थिति अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में हिन्दी में ज्यादा विकट है।


यह मुद्दा चाहे सीधे रूप से प्रतियोगी परीक्षाओं से न जुड़ता हो, इससे अलहदा नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक परिदृश्य से संबद्ध है, जहां भारतीय भाषाएं उपेक्षित हैं और जहां यह माना जाता है कि वे अंग्रेजी  से पिछड़ी हुई हैं, ज्ञान का माध्यम नहीं बन सकती हैं और संवाद-कौशल या व्यक्तित्व-विकास का पर्याय तो अंग्रेजी  ही है। एक बार यह मान लेने के बाद अकादमिक संसाधनों का असमान वितरण आम स्वीकृति पा जाता है, जो भारतीय भाषाओं को और हाशिये पर धकेल देता है। इसलिए इन भाषाओं के इस मसले को समग्रता में देखा जाना चाहिए

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भारत में सभी भर्ती परीक्षाएँ भारतीय भाषाओं में करवाई जाएँ

नौकरी की भर्ती परीक्षाओं से अंग्रेजी का वर्चस्व मिटाने के जुनून के साथ काम कर रहे मुकेश जैन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (भाप्रौस) अथवा आईआईटी रूड़की से धातु कर्म अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग) में स्नातक हैं। बचपन में तीसरी कक्षा में अंग्रेजी के प्रति प्रेम उमड़ने के बाद जैन को सातवीं कक्षा तक आते-आते स्वत: ही हिन्दी के प्रति अगाध लगाव हो गया। 

और लगाव भी ऎसा हुआ कि उन्होंने राष्ट्रभाषा हिन्दी को उसकी गरिमा वापस लौटाने के लिए कमरकस प्रयास शुरू कर दिए। मुकेश जैन देश के ऎसे पहले विद्यार्थी हैं जिन्होंने अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग)  स्नातक की परीक्षा हिन्दी में पास की। आज वे राष्ट्रीय स्तर पर अखिल भारतीय अंग्रेजी अनिवार्यता विरोधी मंच बनाकर भारतीय भाषाओं के पक्ष में आवाज बुलन्द कर रहे हैं। 


1962 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर (शामली) में जन्मे जैन को विश्वास है कि भर्ती परीक्षाओं से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कर दी जाए तो राष्ट्रभाषा और सभी भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं का गौरव स्वत: लौट आएगा। 


हाल ही में #संलोसेआ की सी-सैट परीक्षा के विरूद्ध आन्दोलन खड़ा करने के जनक के रूप में जैन की पहचान बनी है। प्रस्तुत है, जैन से राष्ट्रभाषा #हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं के सम्मान के लिए उनके प्रयासों को लेकर पत्रिका की विशेष बातचीत –


आप में राष्ट्रभाषा #हिन्दी को आगे बढ़ाने का जुनून कब और कैसे आया ?

उत्तर- यह मेरे स्कूल समय की बात है, जब छठी कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाई जाती थी। सातवीं कक्षा में आते ही मेरे मन में राष्ट्रभाषा हिन्दी के सम्मान को लेकर भाव पैदा हुआ जिससे मेरे जीवन में बदलाव आया और अंग्रेजी  भाषा के खिलाफ प्रेरणा जगी। मेरा मानना है कि अंग्रेजी एक विदेशी भाषा है। हमें इसका तिरस्कार करना है। यह भाषा देश की उन्नति में सबसे बड़ी बाधक है।  इस कटु सत्य को सिर्फ मैं ही नहीं कह रहा हूं बल्कि भारतेन्दु हरिश्चंद्र सरीखे महापुरूषों ने यह बात कही है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कहा था कि निज भाषा की उन्नति ही सर्व उन्नति की मूल है। वेद वाक्य भी यही कहते हैं। वेद के अनुसार राष्ट्र ऎश्वर्य की प्राप्ति अपनी भाषा के द्वारा ही करता है। 

आपके मंच का उद्देश्य क्या है?

उत्तर- हमारे अखिल भारतीय अंग्रेजी अनिवार्यता विरोधी मंच का उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रभाषा हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं को सम्मान दिलाना है। हमारा मानना है कि भर्ती परीक्षाओं में अंग्रेजी का विकल्प समाप्त किया जाना चाहिए। जब नौकरी के अवसरों में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त हो जाएगी और अपनी भाषाओं का प्रचलन बढ़ेगा तो लोग खुद ही राष्ट्रभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को अपनाएंगे। भर्ती परीक्षाओं से अंग्रेजी  की समाप्ति के बाद ही भारतीय भाषाओं का प्रसार सम्भव है इसीलिए हमारा जोर भर्ती परीक्षाओ से अंग्रेजी को समाप्त करने का है।

देश में आखिर अंग्रेजी  का इतना प्रचलन क्यों है और इसका प्रसार-प्रसार क्यों है? या यूं कहें कि हमारी हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाएं क्यों पिछड़ रही हैं?
उत्तर- देखिए, अंग्रेजी का प्रचलन बढ़ने के पीछे सबसे बड़ी वजह रोजगार भर्ती परीक्षाओं में अंग्रेजी का बोलबाला होना है। लोग चिकित्सा और अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग) सरीखे क्षेत्रों में अंग्रेजी को प्राथमिकता देते हैं। 

यदि भर्ती परीक्षाओं से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कर दी जाए तो इसका बोलबाला भी खत्म हो जाएगा। यदि राष्ट्रीय स्तर की नौकरियों की परीक्षा सिर्फ हिन्दी और क्षेत्रीय स्तर की परीक्षा सिर्फ क्षेत्रीय भाषाओं में होने लगे तो अंग्रेजी  का प्रचलन स्वत: कमजोर पड़ जाएगा।


आपको नहीं लगता कि कहीं न कहीं अंग्रेजी के आगे बढ़ने में शासन और सत्ता की भी मजबूरी या कमजोरी है?
उत्तर- हां, यह बात सही है कि भारतीय भाषाओं के पिछड़ने के लिए हमारी शासन व्यवस्था और सरकारें भी जिम्मेदार हैं। लेकिन भारतीय भाषाओं के विकास में सबसे बड़े बाधक सरकारी नौकरशाह हैं। भारतीय भाषाओं के प्रसार और संरक्षण के लिए नियम और कानून बने हुए हैं लेकिन उन पर अमल नहीं हो रहा है जिसके लिए नौकरशाही ज्यादा जिम्मेदार है। अब यह सब केंद्र सरकार की नाक के नीचे राजधानी दिल्ली मे भी चल रहा है।

संविधान के अनुच्छेद 351 के अनुसार हिन्दी का प्रचार-प्रसार करना संघ का कर्तव्य होगा और अनुच्छेद 344 के अनुसार अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी को प्रतिस्थापित करने और अंग्रेजी के प्रयोग पर बंधन लगाने का भी खुला विरोध किया गया है। राष्ट्रभाषा हिन्दी के सम्बंध में 18 जनवरी 1968 को एक संसदीय संकल्प पारित किया गया जिसका पालन करना अनिवार्य है। सरकार की नाक के नीचे ही इस कानून की धज्जियाँ उड़ रही हैं। संसदीय संकल्प का पालन कड़ाई से होना चाहिए। कानूनों का पालन न करना राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है जिसके लिए कठोर सजा हो सकती है। शासन को इस बात का अहसास कराने की जरूरत है।


हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं के लिए आप सरकार से क्या चाहते हैं?
उत्तर- देखिए, जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने योजना आयोग को खत्म करने की बात की है, उसी तरह से हमारी मांग है कि वर्तमान संलोसेआ को खत्म किया जाए। भर्ती परीक्षा हिन्दी, क्षेत्रीय भाषाओं में हो। ऎसा अनिवार्य किया जाए। 

अंग्रेजी का विकल्प समाप्त होना चाहिए। केंद्र की सरकार हो या राज्यों की सरकारें। सबको 18 जनवरी 1968 के संसदीय संकल्प का पालन करना चाहिए जो हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देता है। संलोसेआ  की सी-सैट परीक्षा का हमारा विरोध इसी के तहत था हालांकि अभी अल्प सफलता हासिल हुई है। 

पूरा परिणाम आने में समय लगेगा। राज्य सरकारों को भी निर्णय लेना होगा कि वे अंग्रेजी को हतोत्साहित करें और क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग पर जोर दें। उच्चतम न्यायालय से भी हमारी मांग है कि वे अपने यहां हिन्दी में कामकाज को बढ़ावा दें। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने बीते दिनों सरकार को नोटिस भेजा है कि वो अनुच्छेद 348 में बदलाव कर न्यायालय में अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त करे। हमारी केंद्र और कई राज्य सरकारों से बातचीत लगातार जारी है।

हम चाहते हैं कि भर्तियों में हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं के 98 प्रतिशत छात्र आएं। राष्ट्रभाषा और राजभाषा की अनदेखी देश के लिए शर्मनाक है। और जो सरकार इसे सहन कर रही है तो मानिए कि वह राजद्रोह को सहन कर रही है।


क्या हिन्दी को फलने-फूलने से रोकने में बाहरी ताकतों का भी हाथ है?
उत्तर- नि:संदेह। कई विदेशी ताकतें भारत में अंग्रेजी को बढ़ावा देने में सक्रिय हैं। इसे रोकने के लिए समाज और सरकार दोनों को ही मिलकर व्यापक रणनीति बनानी होगी।

आपका आन्दोलन सी-सैट के मामले में थोड़ा उग्र हो गया था क्या आपके आंदोलन की यही तासीर है?
उत्तर- नहीं, हम चाहते हैं कि बातचीत से आगे बढ़ें और आन्दोलन का हमारा स्वरूप भी ऎसा ही है। मैंने 1979 में अंग्रेजी  विरोधी संस्था बनाई। 1980 में आईआईटी रूड़की में दाखिला लेने के बाद 1982 मे उसका नाम बदलकर अंग्रेजी अनिवार्यता विरोधी मंच बनाया जिसकी व्यापकता को पूरे राष्ट्र मे पहुंचाया। 


यदि हमारा सिद्धान्त उग्र होता तो इतने लम्बे समय तक हम बड़े- बड़े अभियान नहीं चला सकते थे। हमारा लक्ष्य सिर्फ नौकरी की भर्ती परीक्षा से अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त करना है और हम अपने अभियान को शांति से चला रहे हैं। 


सी-सैट आन्दोलन के समय जरूर मानता हूं कि कुछ असामाजिक तत्व, जो किसी खास राजनीतिक दल से ताल्लुक रखते थे, हमारे आन्दोलन में घुस आए थे।


प्रस्तुति- संजय मिश्र