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गुरुवार, 14 मई 2015

प्रधानमंत्री कार्यालय से कुछ सवाल जिनका कोई उत्तर देना नहीं चाहते हैं अधिकारी

दिनांक: 13 मई 2015

सेवा में,
केन्द्रीय सूचना अधिकारी
प्रधानमंत्री कार्यालय,
नयी दिल्ली, भारत  

विषय: सूचना का अधिकार अधिनियम आवेदन

महोदय,
कृपया मेरे पिछले आवेदन क्र. PMOIN/R/2014/60666 का संज्ञान लें जो दिनांक 16/06/2014 को दाखिल किया गया था और उसके सम्बन्ध में प्रधानमंत्री कार्यालय ने पूरे छह माह में भी एक भी संतोषजनक उत्तर प्रदान नहीं किया था, विनम्र प्रार्थना है इस बार सही-२ सूचनाएँ प्रदान करें:

१.     प्रधानमन्त्री जी से संबंधित मोबाइल वेबसाइटों एवं मोबाइल एप में अभी तक राजभाषा हिन्दी का विकल्प उपलब्ध नहीं है, यह राजभाषा सम्बन्धी प्रधानमंत्री जी के 22 जुलाई 1999 के आदेश एवं 2 जुलाई 2008 को जारी राष्ट्रपति जी के आदेश (संख्या 20012 07 2005) का उल्लंघन है जिनमें 100% द्विभाषी वेबसाइट बनाने के लिए कहा गया है. इन आदेशों के उल्लंघन को रोकने हेतु इनमें राजभाषा एवं अन्य भारतीय भाषाओं के विकल्प जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय (“प्रमका”) की समृद्ध ‘आईटी टीम’ क्या क्या कदम उठा रही है?
२.     प्रधानमन्त्री कार्यालय के प्रशासनिक प्रधान (संयुक्त सचिव-प्रशासन) की अध्यक्षता में पिछले तीन साल में हुई बैठकों में कितनी बार राजभाषा हिन्दी के कार्यान्वयन सम्बन्धी विषय पर बार चर्चा हुई है, विवरण दें.
३.     फिलहाल प्रधानमन्त्री जी की मुख्य वेबसाइट 100% द्विभाषी नहीं है, उसमें ‘राष्ट्रीय रक्षा कोष’ एवं प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष’ में ऑनलाइन योगदान के पृष्ठ सिर्फ अंग्रेजी में हैं, अन्य कई टैब और अन्य वेबसाइटों के लिंक अभी भी सिर्फ अंग्रेजी में हैं, जो कि प्रधानमंत्री जी के 22 जुलाई 1999 के आदेश एवं राष्ट्रपति जी के 2 जुलाई 2008 के आदेश का उल्लंघन है, प्रमका ने राष्ट्रपति जी के आदेश के पालन के लिए क्या कार्यवाही की है?
४.     प्रधानमंत्री के चीनी सामाजिक मीडिया साइट वेइबो पर आधिकारिक वार्तालाप खाते पर नाम एवं परिचय सिर्फ चीनी भाषा में लिखा गया, सन्देश भी केवल चीनी भाषा में डाले जाते हैं जबकि प्रधानमंत्री जी के आधिकारिक फेसबुक/यूट्यूब/ट्विटर आदि खातों पर नाम-परिचय में भारत सरकार की राजभाषा हिन्दी को कोई स्थान नहीं दिया गया है, ऐसा करने का निर्णय किसने लिया? वहाँ किस नियम के तहत नाम-परिचय में राजभाषा हिन्दी को प्रयोग नहीं किया गया है, नियम की प्रति प्रदान करें?
५.     किसी न किसी नियम/आदेश/निर्णय के अनुसार ही प्रमका में कामकाज संचालित होता इसलिए बताएँ कि प्रधानमंत्री जी के आधिकारिक फेसबुक/यूट्यूब/ट्विटर आदि खातों पर अंग्रेजी को प्राथमिकता देने का निर्णय/आदेश किस अधिकारी ने लिया है?
६.     प्रधानमंत्री जी के आधिकारिक ट्विटर/फेसबुक/यूट्यूब खातों को संभालने वाली सोशल मीडिया टीम में नियुक्त अधिकारी/अधिकारियों के नाम,पदनाम एवं ईमेल पते सूचित करें? इनमें से कितने अधिकारियों को हिन्दी टंकण का ज्ञान है?
७.     संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार भारत की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी है इसलिए भारत सरकार के हर कार्यालय में हिन्दी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए पर  प्रधानमंत्री जी से संबंधित सभी वेबसाइटें प्राथमिक आधार पर स्वतः (बाई डिफाल्ट) अंग्रेजी में खुलती हैं, ऐसा निर्णय किसने लिया? जब श्री मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तब तक प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट का होमपेज बाई डिफाल्ट द्विभाषी था, जिसमें राजभाषा हिन्दी को प्राथमिकता दी गई थी, अंग्रेजी को प्राथमिकता देने का निर्णय किस अधिकारी ने लिया?

सोमवार, 3 नवंबर 2014

हिन्दी के सर्वनाश के लिए तैयार हिन्दी मीडिया : भाग २

अब इस खबर को देखकर अपना सर धुनिये. हिन्दी सम्बन्धी इस समाचार में पत्रकार ने हिन्दी का ही चीरहरण कर डाला है. अरे भाई ज़रूरत क्या है ऐसी घटिया भाषा की. मत छापो हिंदी के नाम पर अंग्रेजी में लिखो, हमें कोई आपत्ति नहीं है. हमें पढ़ना ही होगा तो अंग्रेजी अखबार पढ़ेंगे, ऐसी अधकचरी भाषा का क्या मतलब?

मैं पहले कई हिन्दी अख़बारों का पाठक रहा हूँ, पर पिछले कुछ समय से बड़ी निराशा हो रही है इसलिए अख़बार पढ़ना मजबूरी में बंद कर दिया है, ट्विटर और फेसबुक पर ही काम चला लेता हूँ. मैंने सोचा था इन अख़बारों के संपादकों से बात करके कुछ लाभ होगा पर ऐसा संभव नहीं हुआ. 

कुछ हिन्दी अख़बार समूह ने हमेशा भाषा का एवं समाचारों का स्तर बना कर रखा है पर अब उनके समाचार-पत्रों एवं वेबस्थलों पर प्रचलित हिन्दी शब्दों के स्थान पर अंग्रेजी शब्दों का एवं रोमन का प्रयोग धीरे-धीरे बढ़ाया जा रहा है जो हिन्दी जैसी समृद्ध भाषा को पंगु ही बनाने वाला है. इन अख़बारों में ऐसा शायद अन्य हिन्दी मीडिया समूह की रणनीति की देखादेखी किया जा रहा है. 

परिवर्तन स्वाभाविक हो तो ठीक होता है पर जबरन किया जाए तो मेरी दृष्टि में अनुचित है. अंग्रेजी शब्द यदि हमारी भाषा के शब्दकोष में वृद्धि करते हों तो उनका स्वागत है पर वे यदि हमारे शब्दों को ही खाने लग जाएं तो फिर बहुत चिंता का विषय है. बाड़ ही खेत हो खाने लगे तो फिर खेत को कोई चाहकर भी नहीं बचा सकता है. 

भारत में आज तक किसी अंग्रेजी मीडिया अथवा अखबार ने अंग्रेजी को सरल और ग्राह्य बनाने के लिए देशी भाषाओं के अतिप्रचलित शब्द अथवा सही उच्चारण को बनाए रखने के लिए उनकी लिपियों का प्रयोग शुरू नहीं किया है और ना ही कभी इसकी कल्पना की जा सकती है पर हिन्दी मीडिया को इसमें क्या नज़र आ रहा है ? वह समझ से परे है.

बहुत से अंग्रेजी मीडिया समूहों ने भाषाई अख़बारों का अधिग्रहण किया है. कुछ बड़े हिन्दी अख़बारों ने भी अंग्रेजी अख़बार शुरू किये हैं. इन सभी ने एक रणनीति के तहत समाचार अथवा ऑनलाइन सामग्री में साठ प्रतिशत अंग्रेजी शब्द और दस से बीस प्रतिशत रोमन लिपि के इस्तेमाल का आदेश अपने पत्रकारों/संवाददाताओं को दिया हुआ है. इस बात का खुलासा एक प्रसिद्ध व्यक्ति ने अपने लेखों में कई बार किया है. उनका खुलासा एकदम सही भी है क्योंकि अब हिन्दी जैसा कुछ बचा नहीं है.

अपनी भाषाओं में नए शब्द गढ़ना अब बिलकुल बंद हो चुका है, प्रचलित शब्द भी प्रचलन  बाहर कर दिए गए हैं और उम्मीद है कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में (शायद पाँच वर्ष बाद) ही लोगों को हिन्दी की ज़रूरत ही नहीं रहेगी, देवनागरी की आवश्यकता ही नहीं होगी? जब अंग्रेजी शब्द ही लिखना है तो, अंग्रेजी को ही पढ़ना है तो कोई अंग्रेजी अखबार ही पढ़ेगा उसे हिंग्रेजी की वेबसाइट अथवा अखबार पढ़ने की क्या आवश्यकता ?
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  • एडवांस का 'हिंदी वर्जन' फुलऑन कन्फ्यूजन
    By: Inextlive | Publish Date: Mon 03-Nov-2014 07:00:31

    एडवांस का 'हिंदी वर्जन' फुलऑन कन्फ्यूजन
    - आईआईटी बॉम्बे ने फ‌र्स्ट टाइम जारी किया हिंदी में ब्रॉशर
    - ब्रॉशर में हिंदी की प्रिंटिंग में कई शब्द हो रहे गायब
    ravi.priya@inext.co.in
    DEHRADUN : जेईई एडवांस एग्जाम की जिम्मेदारी इस बार आईआईटी बॉम्बे को जिम्मे है. स्टूडेंट्स की सहूलियत के लिए इस बार इंफॉर्मेशन ब्रॉशर को इंग्लिश के साथ ही हिंदी में भी जारी किया है. ब्रॉशर का हिंदी वर्जन सीधे तौर पर हिंदी मीडियम में पढ़ रहे स्टूडेंट्स को ध्यान में रखते हुए जारी किया गया, लेकिन यह जेईई एडवांस इंफॉर्मेशन ब्रॉशर का यह हिंदी संस्करण स्टूडेंट्स के किसी काम नहीं आ रहा है. दरअसल, इसकी भाषा और पीडीएफ फॉर्मेट को स्टूडेंट्स पढ़ ही नहीं पा रहे हैं. ऐसे में कुछ पल्ले न पड़ने से यह कैंडिडेट्स भी इंग्लिश वर्जन ही देखने को मजबूर हो रहे हैं.
    एडवांस एग्जाम ख्ब् मई को होगा
    आईआईटी बॉम्बे इस बार जेईई एडवांस की जिम्मेदारी संभाल रही है. एग्जाम के बाद देश भर के क्म् आईआईटी संस्थानों के साथ ही आईएसएम धनबाद की इंजीनियरिंग की सीट्स पर एडमिशन मिलेगा. एडवांस एग्जाम ख्ब् मई को ऑर्गनाइज किया जाएगा. पिछले दिनों एग्जाम को लेकर डिटेल्ड नोटिफिकेशन और इंफॉर्मेशन जेईई एडवांस की वेबसाइट पर अपलोड किया था.
    ब्रॉशर का हिंदी वर्जन भी वेबसाइट पर
    यह इंग्लिश लैंग्वेज में था, लेकिन इसी के साथ ही हिंदी मीडियम कैंडिडेट्स के लिए हिंदी में विवरण दिए जाने की सुविधा भी वेबसाइट पर दी गई थी, जिसके चलते हाल ही में फ्क् अक्टूबर को जेईई एडवांस के इंफॉर्मेशन ब्रॉशर का हिंदी वर्जन भी वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है. खास बात यह कि यह पहली बार हैं कि जब एडवांस एग्जाम की जानकारी के लिए हिंदी भाषा में भी इंफॉर्मेशन ब्रॉशर जारी किया गया.
    कई अक्षर हैं गायब
    ब्रॉशर के पीडीएफ फॉर्मेट में कई अक्षर मिसिंग शो कर रहा है, जिससे छात्रों और टीचर्स दोनों ही परेशान हैं. ब्रॉशर के अधिकतर शब्द टूट रहे हैं. इसके अलावा कहीं ई की मात्रा नहीं हैं तो कहीं शब्द के बीच से अक्षर गायब हैं. ऐसे में स्टूडेंट्स को खासी परेशानी उठानी पड़ रही हैं, लेकिन इसके बाद भी स्टूडेंट्स को जानकारी पूरी तरह से समझ नहीं आ रही तो मजबूर होकर इंग्लिश वर्जन को डाउनलोड कर जरूरी जानकारी जुटा रहे हैं.
    ---
    हिंदी मीडियम से तैयारी कर रही हूं. आसानी से समझने के लिए वेबसाइट से इंग्लिश की जगह हिंदी वर्जन ब्रॉशर डाउनलोड किया था, लेकिन इसे ओपन करने के बाद कुछ समझ ही नहीं आया. कहीं शब्द गायब हैं तो कहीं मात्राएं ही दिखाई नहीं दे रही.
    - मनीषा चौहान, स्टूडेंट, सरस्वती विद्या मंदिर
    हिंदी ब्रॉशर डाउनलोड किया था, लेकिन यह तो समझ ही नहीं आ रहा है. इससे अच्छा तो इंग्लिश ब्रॉशर है. कम से कम शब्दों तो सहीं से प्रिंट हैं. हिंदी ब्रॉशर में तो शब्दों को लेकर बेहद कन्फ्यूजन है.
    - मानस कुकरेती, स्टूडेंट, स्टार लैंड स्कूल
    दरअसल, अभी जो हिंदी इंफॉर्मेशन ब्रॉशर अपलोड किया गया है. उसमें फॉन्ट का प्रॉब्लम आ रहा. जिस वजह से बच्चों को पीडीएफ फाइल में शब्दों गायब नजर आ रहें हैं. कई बच्चों ने इसे लेकर शिकायत की है. मामले में आईआईटी बॉम्बे को लेटर भी लिखकर प्रॉब्लम की जानकारी दी जाएगी. ताकि इस प्रॉब्लम का हल निकाला जा सके.
    - वैभव राय, डायरेक्टर, वीआर क्लासेज

    मंगलवार, 2 सितंबर 2014

    भारत में देसी भाषाओं की नहीं कोई इज्ज़त

    गणपत तेली
    जनसत्ता 1 सितंबर, 2014: भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की उपेक्षा और दोयम दर्जे के व्यवहार का मुद्दा कुछ समय से बराबर उठता रहा है। संघ लोक सेवा आयोग की प्रशासनिक सेवाओं के अतिरिक्त भी अधिकतर प्रतियोगी परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की स्थिति ऐसी ही है। प्रश्नपत्रों पर यह स्पष्ट लिखा रहता है कि प्रश्नों के पाठ में भिन्नता होने पर अंग्रेजी  वाला पाठ मान्य होगा और कई प्रश्नपत्रों में तो यह भी लिखा नहीं होता है, जबकि अक्सर हिन्दी पाठ अबूझ और कई बार गलत तक होता है। यह बात विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा से लेकर सामान्य प्रतियोगी परीक्षाओं तक में देखी जा सकती है। इन आंदोलनकारियों को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने भारतीय भाषाओं की इस उपेक्षा को फिर से बहस में ला दिया।

    यह कोई प्रशासनिक सेवाओं का अलग-थलग मसला नहीं है, बल्कि हमारे देश की उस अकादमिक व्यवस्था का एक विस्तार है, जहां भारतीय भाषाओं की इसी तरह की उपेक्षा होती है और जो इन भाषाओं के पठन-पाठन की गतिविधियों और इनके विद्यार्थियों के लिए अकादमिक और पेशेगत अवसरों को सीमित करती है। अगर हम उच्च शिक्षा की स्थिति पर एक नजर डालें तो स्पष्ट हो जाएगा कि सरकारी नीतियां इस असमान व्यवस्था को प्रोत्साहित करती हैं। 

    आजादी के बाद हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने महसूस किया कि अन्य विकासमूलक मानकों पर विकसित देशों की बराबरी करने में हमें वक्त लगेगा, तकनीक और विज्ञान का क्षेत्र ऐसा है जिसमें और जिसके जरिए हम तत्काल विकसित देशों की पंक्ति में जा खड़े होंगे। फलत: हमारी सरकारें (चाहे किसी भी पार्टी की हों) तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देती हैं, उसके बाद ही सामाजिक विज्ञान के अनुशासनों का स्थान आता है। और अंत में, भाषा और साहित्य जैसे मानविकी के विषय रह जाते हैं। 

    अभी हमारे देश में सोलह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (भाप्रौस -आइआइटी) हैं, जिनमें छह-सात काफी प्रतिष्ठित हैं और अन्य अभी आकार ले रहे हैं। इसके अतिरिक्त तीस राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (राप्रौस -एनआइटी) हैं। विज्ञान-शिक्षा के क्षेत्र में पांच भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (भाविशिअस-आइआइएसइआर) हैं। साथ ही, भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु, भारतीय प्रतिरक्षा संस्थान, नई दिल्ली के अलावा भी विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के लिए कई संस्थान और परिषदें हैं। 
    समाज विज्ञान की शिक्षा के क्षेत्र में भी ऐसी कई संस्थाएं हैं- टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (मुंबई और हैदराबाद), गोखले अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान संस्थान (पुणे), कलिंग सामाजिक विज्ञान संस्थान (भुवनेश्वर), मद्रास विकास अध्ययन संस्थान, विकास अध्ययन संस्थान कोलकाता जैसी कई संस्थाएं हैं। लेकिन भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भारतीय भाषा संस्थान मैसूर, केंद्रीय हिन्दी संस्थान, केन्द्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान अथवा सेंट्रल इंस्टीट्यूट आन क्लासिकल तमिल जैसी गिनी-चुनी संस्थाओं के अलावा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय ही हैं। 

    इसी तरह उच्च शिक्षा में शोध के लिए वैज्ञानिक एवं औद्योगिक शोध परिषद (वैऔशोप-सीएसआइआर), वैज्ञानिक एवं अभियांत्रिकी शोध परिषद (वैअशोप-एसइआरसी) जैसी संस्थाएं वैज्ञानिक शोध को प्रोत्साहित करती हैं। समाजविज्ञान के क्षेत्र में इंडियन काउंसिल फॉर सोशल साइंस रिसर्च अकादमिक शोध को बढ़ावा देती है। इसके अलावा समाजविज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में भी कई संस्थान हैं। इतिहास के क्षेत्र में ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद और दर्शनशास्त्र के लिए इंडियन काउंसिल फॉर फिलोसोफिकल रिसर्च ऐसी ही परिषदें हैं। इसी तरह नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय आधुनिक भारत के इतिहास से जुड़े विभिन्न प्रसंगों पर शोध को बढ़ावा देता है। 

    ये  परिषदें और संस्थाएं न केवल शोध के लिए विभिन्न शोधवृत्तियां देती हैं, बल्कि फील्ड वर्क को भी प्रोत्साहित करती हैं। यही नहीं, ये संस्थाएं संबंधित क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्राय: देश के अलग-अलग हिस्सों में शोध पद्धति की कार्यशालाओं का आयोजन करती हैं, जिनमें युवा संकाय सदस्य और शोधार्थी भाग लेते हैं। उक्त सरकारी संस्थाओं के अतिरिक्त कई गैर-सरकारी संस्थाएं भी सामाजिक विज्ञान और विज्ञान के क्षेत्रों में कार्यरत हैं। ये सभी अपने-अपने क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने का काम करती हैं। साथ ही साथ, ये अपनी परियोजनाओं और कार्यक्रमों के जरिए रोजगार के अवसर भी मुहैया कराती हैं।
    वहीं अगर हम भाषा और साहित्य की तरफ नजर डालें तो भारतीय भाषाओं की साहित्य अकादमियों के अलावा कुछ खास है नहीं। उक्त साहित्य अकादमियां और अन्य निजी न्यास या संस्थान भी साहित्यिक पुरस्कारों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, नए शोध के लिए शोधवृत्तियां प्राय: नहीं देते और न ही शोध से संबंधित गतिविधियां आयोजित करते हैं। हालांकि इन अकादमियों और निजी न्यासों का दायरा उच्च शिक्षा नहीं है, फिर भी ये पुरस्कारों की स्थापना के साथ कुछ शोधवृत्तियां स्थापित करेंगे तो उस भाषा और साहित्य का शैक्षणिक विस्तार ही होगा। इसलिए ऐसा किया जाना चाहिए। 

    हम इस तरह देखते हैं कि सरकारें भारतीय भाषाओं को कोई विशेष महत्त्व नहीं देती हैं। हां, इन भाषाओं के तकनीकी विकास पर अवश्य ध्यान दिया जा रहा है, जिसके तहत प्रगत संगणन विकास केंद्रों (सीडैक), केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान मैसूर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में बहुत-सी अकादमिक गतिविधियां चल रही हैं। इस पूरी परिघटना की सबसे बड़ी विडंबना है कि भाषा और साहित्य जैसे मानविकी विषयों को रोजगारमूलक शिक्षा के नाम पर नजरअंदाज किया जा रहा है, जबकि बेरोजगारी तो बढ़ ही रही है। सही है कि रोजगार एक आवश्यक तत्त्व है, लेकिन शिक्षा महज रोजगार के लिए नहीं हो सकती। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को अपने समाज, राजनीति और संस्कृति के यथार्थ से रूबरू कराना भी होता है। 

    अपने समाज और परिवेश से विद्यार्थियों को जोड़ने और संपूर्ण शिक्षा देने के इसी उद्देश्य से आइआइटी, एनआइटी जैसी तकनीकी संस्थाओं में सामाजिक विज्ञान और मानविकी विभाग भी स्थापित किए गए। उच्च शिक्षा के लिए बनाई गई यशपाल समिति की रिपोर्ट में भी यह एक महत्त्वपूर्ण सिफारिश थी। लेकिन यह फलीभूत नहीं हुई, क्योंकि शायद ही किसी संस्थान में हिन्दी या किसी अन्य भारतीय भाषा को स्थान मिला हो। इन सभी संस्थानों के मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभागों में सामाजिक विज्ञान के कुछ विषय पढ़ाए जाते हैं, जबकि साहित्य और भाषा के नाम पर अंग्रेजी  पढ़ाई जाती है, हिन्दी या अन्य कोई भारतीय भाषा नहीं। यही स्थिति राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की है। एक-दो अपवाद और हिन्दी दिवस जैसी औपचारिकताओं को छोड़ दें तो भारतीय भाषा संबंधी गतिविधियां प्राय: इन संस्थानों में नहीं होतीं। भारतीय प्रबंधन संस्थान तो इस मामले में और भी पीछे हैं।

    यही हाल उन निजी विश्वविद्यालयों का है, जो पिछले कुछ वर्षों में धूमधाम से खुले हैं। अधिकतर निजी विश्वविद्यालय विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन आदि अध्ययन के लिए ही हैं, जिनमें भाषा-साहित्य के नाम पर बस अंग्रेजी  है। लेकिन जो निजी विश्वविद्यालय सामाजिक विज्ञान और मानविकी को बराबर स्थान देने का दावा करते हैं, वहां भी प्राय: भारतीय भाषाओं को कोई स्थान नहीं मिलता है। उदाहरण के लिए, एमिटी विश्वविद्यालय में जर्मन, स्पेनिश, फ्रांसीसी और अंग्रेजी  में स्नातक की पढ़ाई होती है, लेकिन भारतीय भाषाओं में सिर्फ संस्कृत को यह स्थान देता है। जोधपुर नेशनल यूनिवर्सिटी जैसे कुछ ही विश्वविद्यालय भारतीय भाषाओं के पाठ्यक्रम प्रस्तावित करते हैं। 

    इन अपवादों को छोड़ दें, तो ऐसे निजी विश्वविद्यालयों की फेहरिस्त लंबी है, जहां भारतीय भाषाओं का अस्तित्व ही नहीं है और उनमें साहित्य के नाम पर अंग्रेजी  साहित्य या कहीं-कहीं तुलनात्मक साहित्य पढ़ाया जाता है। कई सरकारी विश्वविद्यालय भी तुलनात्मक साहित्य के अध्यापकों के लिए योग्यता तुलनात्मक साहित्य या अंग्रेजी  (अन्य किसी भाषा में नहीं) में एमए निर्धारित करते हैं। अंग्रेजी  साहित्य पढ़ाए जाने से कोई समस्या नहीं है, लेकिन भारतीय भाषाओं का साहित्य भी इन्हें अवश्य पढ़ाना चाहिए। अगर अंग्रेजी साहित्य पढ़ाया जा सकता है, तो हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, बांग्ला, मराठी, असमी, मलयालम, तमिल, तेलुगू, ओड़िया, गुजराती आदि भाषाओं का साहित्य क्यों नहीं पढ़ाया जा सकता!

    निजी विश्वविद्यालय संबंधित राज्य की विधानसभा द्वारा पारित अधिनियम के तहत स्थापित किए जाते हैं और इन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी मान्यता देता है, तो क्यों नहीं इन२के लिए यह आवश्यक किया जाए कि ये कम से कम उस राज्य की भाषा और उसके साहित्य के कुछ पाठ्यक्रम प्रस्तावित करें। यही बात आइआइटी और आइआइएम पर भी लागू होनी चाहिए। कितना अच्छा हो, अगर देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित इन संस्थानों में अलग-अलग भारतीय भाषाएं भी पढ़ाई जाएं। इसके विपरीत वर्तमान व्यवस्था के कारण अधिकतर छात्र-छात्राओं की पढ़ाई की भाषा व्यवहार की भाषा से अलग हो जाती है। जब उनकी ज्ञान की प्रक्रिया से ही इन भाषाओं को काट दिया गया है, तो फिर यह शिकायत कहां से जायज है कि अमुक अनुशासन भारतीय भाषाओं में नहीं पढ़ाए जा सकते! यह एक सर्वविदित तथ्य है कि हमारे देश में प्राय: उच्च शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं नहीं हैं। कुछ राज्यों के विश्वविद्यायलों में अवश्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से पठन-पाठन होता है, लेकिन इसके लिए उन्हें दोयम दर्जे की पाठ्यपुस्तकों पर निर्भर रहना पड़ता है। फलस्वरूप, अक्सर वे उस विषय में पारंगत होने और आगे की पढ़ाई से वंचित हो जाते हैं। इसके अलावा भारतीय भाषाओं के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की विशेष वित्तीय सहायता से संचालित कार्यक्रम या पुस्तकालय भी प्राय: नहीं दिखाई देते। 

    अब जरा उस शिकायत पर भी नजर डालते हैं, जो भारतीय भाषाओं, खासकर हिन्दी के लेखक-प्रकाशक करते हैं कि साहित्य को पाठक नहीं मिल रहे हैं। मिलेंगे कहां से, जब संभावित पाठकों की पूरी पीढ़ी को ही व्यवस्थित तरीके से उसके साहित्य, भाषा और समाज से दूर कर दिया जाता है। यह स्थिति अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में हिन्दी में ज्यादा विकट है।


    यह मुद्दा चाहे सीधे रूप से प्रतियोगी परीक्षाओं से न जुड़ता हो, इससे अलहदा नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक परिदृश्य से संबद्ध है, जहां भारतीय भाषाएं उपेक्षित हैं और जहां यह माना जाता है कि वे अंग्रेजी  से पिछड़ी हुई हैं, ज्ञान का माध्यम नहीं बन सकती हैं और संवाद-कौशल या व्यक्तित्व-विकास का पर्याय तो अंग्रेजी  ही है। एक बार यह मान लेने के बाद अकादमिक संसाधनों का असमान वितरण आम स्वीकृति पा जाता है, जो भारतीय भाषाओं को और हाशिये पर धकेल देता है। इसलिए इन भाषाओं के इस मसले को समग्रता में देखा जाना चाहिए

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    बुधवार, 6 अगस्त 2014

    हिन्दी के प्रति आकर्षित हुए विदेशी कारोबारी

    भारत में कम्पनी जगत और अमीर कारोबारी भले ही हमारी भाषा के प्रति दोयम दर्जे का व्यवहार करते हों पर विदेशियों की दृष्टि में यह भाषा भारतीय लोगों के प्रति अपनत्व दिखाने का प्रमुख माध्यम है।

    अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी नारे 'सबका साथ सबका विकास' का उल्लेख पिछले सप्ताह हुई वॉशिंगटन के एक विचारशील समूह की एक महत्वपूर्ण बैठक में किया था।

    अमेरिकी निजी इक्विटी निवेश संस्था “डब्ल्यूएल रॉस” के निदेशक डेविड वैक्स अपने कारोबारी लेनदेनों के सिलसिले में कई बार भारत आ चुके हैं। पिछले सप्ताह अपनी ताज़ा भारत यात्रा में वैक्स ने अपने आगंतुक-पत्र में एक ओर अपना परिचय हिन्दी में छपवाया परन्तु आप किसी भी भारतीय कंपनी के अधिकारी के आगंतुक-पत्र पर हिन्दी की कल्पना भी नहीं कर सकते, अंग्रेजी उनके रुतबे की प्रतीक बनी हुई है; वैक्स भारत में कठिनाई से गुजर रही कंपनियों में निवेश करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी का यह प्रयोग छोटा, परन्तु महत्वपूर्ण संकेत है। वैक्स ने बताया, 'इसका उद्देश्य भारतीय लोगों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता को प्रकट करना था।'


    इसी प्रकार जर्मन विमानन सेवा “लुफ्थांसा” का टीवी विज्ञापन भारतीय यात्रियों के साथ बेहतर तरीके से जुड़ने का प्रयास करता है। कंपनी ने पहली बार केवल भारत के लिए विज्ञापन तैयार किया है और इस विज्ञापन में उड़ान के दौरान भारतीय भोजन और फिल्मों को दिखाया गया है। लुफ्थांसा की प्रबन्धक (विपणन एवं संचार) संगीता शर्मा ने बताया, 'एक ब्रांड के तौर पर हम काफी समय से भारत में हैं...हालांकि, इस बार हम भावनात्मक जुड़ाव उत्पन्न करना चाहते थे।'

    दिल्ली में कई दूतावासों ने कर्मियों को हिन्दी कक्षाओं में प्रवेश दिलवाया है। ऐसे विद्यार्थियों के अतिरिक्त कंपनियों के शोधकर्ताओं की ओर से भी हिन्दी  भाषा सीखने की मांग दिख रही है। हिन्दी  गुरु लैंग्वेजेस इंस्टीट्यूट के संस्थापक चंद्रभूषण पांडे के अनुसार, नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद पश्चिमी देशों और यहां तक कि चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के लोगों ने भी भारत में हिन्दी के बढ़ते महत्त्व के बारे में बात करना शुरू किया है। पांडे ने बताया, 'चीन के कई लोगों ने हाल में मुझसे संपर्क कर कहा कि वे हिन्दी  में उन्नत पाठ्यक्रम करना चाहते हैं, क्योंकि इससे उन्हें व्यावसायिक और कूटनीतिक रिश्ते बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।' पांडे अभी मित्सुबिशी और मित्सुई जैसी कंपनियों में काम करने वाले लोगों को हिन्दी  सिखा रहे हैं। उन्होंने बताया, 'गर्मी छुट्टी समाप्त होने और लोगों के छुट्टियों से वापस आने के बाद हिन्दी  सीखने से जुड़ी पूछताछ काफी आ रही है।'

    जानकारों का कहना है कि ‘देश की भाषा में बात करना और उसकी संस्कृति का सम्मान’, न केवल दोस्ती दिखाने का तरीका है, बल्कि इसका उद्देश्य सामाजिक, राजनीतिक और व्यावसायिक मोर्चों पर संबंधित देश से सक्रिय जुड़ाव है । भारतीय प्रबन्ध संस्थान (भाप्रस- आईआईएम) अहमदाबाद के प्राध्यापक अब्राहम के कहते हैं, 'अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने के बजाय स्थानीय लोगों से जुड़ना अधिक महत्वपूर्ण है।' इसलिए, जब जर्मन पर्यटन संस्थान  अपनी पेशेवर सामग्री लगभग 10 भारतीय भाषाओं में जारी करता है, तो इसमें बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


    सौजन्य: श्री विजय कुमार मल्होत्रा


    शनिवार, 12 जुलाई 2014

    संघ लोक सेवा आयोग: राजनाथ सिंह के दरवाजे पर पहुंची भारतीय भाषाओं की लड़ाई

    संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा में अंग्रेजी की तुलना में भारतीय भाषाओं की उपेक्षा किए जाने से जुड़ा मामला अब गृह मंत्री राजनाथ सिंह के घर तक पहुंच गया है। शनिवार सुबह जब गृह मंत्री अपने आवास से निकल रहे थे तभी यूपीएससी के प्रतियोगियों ने आवास के बाहर प्रदर्शन शुरू कर दिया। इस दौरान छात्र-छात्राओं ने जमकर नारेबाजी भी। छात्र-छात्राओं ने कहा कि यूपीएससी परीक्षा में भारतीय भाषाओं के प्रतियोगियों की अनदेखी की जा रही है, जबकि अंग्रेजी को बढ़ावा दिया जा रहा है।

    राजनाथ सिंह ने कहा, प्रधानमंत्री से चर्चा करेंगे
    आवास के बाहर प्रदर्शन कर रहे छात्र-छात्राओं से मिलने पहुंचे गृह मंत्री राजना‌थ सिंह ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री से चर्चा करने की बात कही। उन्होंने कहा कि वह इस मुद्दे को प्रधानमंत्री के समक्ष रखेंगे। यही नहीं, उन्होंने इस मामले में छात्रों का समर्थन करते हुए प्रधानमंत्री से इस मुद्दे पर निर्णय कराने की मांग करने का भी आश्वासन दिया। उनके इस आश्वासन के बाद प्रदर्शनकारी छात्र-छात्राएं गृह मंत्री के घर से लौट गए। गौरतलब है कि इस बार यूपीएससी परीक्षा में अग्रेंजी को महत्व दिया गया, जिससे भारतीय भाषाओं के छात्रों को खासा नुकसान हुआ था।

    शनिवार, 12 जुलाई 2014: अमर उजाला, नई दिल्ली

    गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

    मुंबई मोनोरेल के संचालन में यात्रियों की भाषा को प्राथमिकता मिले

    प्रति,
    मुख्यमंत्री महोदय 
    महाराष्ट्र शासन 
    मंत्रालय, मुंबई 

    विषय: मुंबई मोनोरेल एवं मुंबई मेट्रो में राष्ट्रभाषा 'हिन्दी' का प्रयोग किए जाने हेतु अनुरोध 

    महोदय,


    भारत की राजभाषा हिन्दी है तथा महाराष्ट्र की राजभाषा मराठी है दोनों भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैभारत में लगभग तीन प्रतिशत लोग अंग्रेजी जानते हैं और सत्तानवे प्रतिशत लोग अंग्रेजी नहीं जानते हैं. मुंबई एवं महाराष्ट्र के निवासियों के लिए हिन्दी मौसी जैसी है और यहाँ के अधिकांश लोग हिन्दी का अच्छा कार्यसाधक ज्ञान रखते हैं.

    इन तथ्यों से पता चलता है कि अंग्रेजी थोपने की बजाए उन्हें उनकी भाषा में  एवं हिन्दी भाषा में जानकारी दी जानी चाहिए. महाराष्ट्र में बसों में और अन्य सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजी को वरीयता के साथ प्रयोग किया जा रहा है, राष्ट्रभाषा की उपेक्षा करके देश की आर्थिक राजधानी में अंग्रेजी का प्रयोग उचित नहीं है, कई मामलों में मराठी का प्रयोग भी नहीं किया जाता है और नागरिकों पर अंग्रेजी थोपी जा रही है.  राज्य में अंग्रेजी का प्रयोग निरंतर बढ़ाया जा रहा है.


    सरकार को आम जनता एवं भारत की मुंबई आने वाली जनता की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इन सड़कों और मार्गों के नाम-पटों में हिन्दी को अंग्रेजी से पहले स्थान देना चाहिए क्योंकि मुंबई केवल महाराष्ट्र की राजधानी ही नहीं भारत की आर्थिक राजधानी है और यहाँ सम्पूर्ण भारत के लोग आते हैं. मुंबई में हिंदी के साथ सौतेला व्यवहार अनुचित है.

    अनुरोध:

    1. सड़कों पर लगे ये मार्ग निर्देश पट्ट (रोड साइन बोर्ड) भारत के अन्य राज्यों के वाहन चालकों के लिए मराठी देवनागरी में लिखे होने से पढ़ने में तो एकदम आसान होते हैं पर वे इन्हें समझ नहीं पाते हैं इसलिए इनमें मराठी के ठीक बाद हिन्दी का प्रयोग सुनिश्चित किया जाए. इससे देश के अन्य भागों से आने वाले लोगों को बहुत आसानी होगी.
    2. उपनगरीय (लोकल) की तरह मुंबई मोनोरेल एवं मुंबई मेट्रो में सभी दिशा-निर्देश, स्टेशनों के नाम एवं नाम-पट आदि राष्ट्रभाषा हिन्दी में लगवाए जाएँ. इससे देश के अन्य भागों से आने वाले लोगों को बहुत आसानी होगी.
    3. मुंबई मोनोरेल  की गाड़ियों में बाहरी तरफ अंग्रेजी में लिखे Mumbai Mono Rail के स्थान पर देवनागरी लिपि में लिखा जाए. देवनागरी हमारी पहचान है. इसी तरह जब मेट्रो चालू हो उसपर भी देवनागरी का प्रयोग सुनिश्चित किया जाए.
    4. महाराष्ट्र, विशेषकर मुंबई में लगे सरकारी कार्यालयों के नाम पट्ट मराठी में लगाए गए हैं जो बहुत अच्छी बात है पर उनमें राष्ट्रभाषा की अनदेखी करके अंग्रेजी को स्थान दिया गया है जो अनुचित है, सरकार यदि हिंदी का प्रयोग नहीं कर सकती है तो उसे अंग्रेजी का प्रयोग भी नहीं करना चाहिए.

    इस सम्बन्ध में की गई कार्यवाही से मुझे अवगत करवाया जाएऐसी मेरी प्रार्थना है.

    शनिवार, 14 दिसंबर 2013

    तो क्या हिंग्लिश हिन्दी को समाप्त कर देगी?

    रोमन में हिन्दी बनाम
    हिन्दी पर अंतिम हमला /फायनल असाल्ट ऑन हिन्दी
    -प्रभु जोशी
    सातवें दाक के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित ल्विन टाॅफलर की पुस्तक तीसरी लहर के अध्याय बड़े राष्ट्रों के विघटन को पढ़ते हुए किसी को भी कोई कल्पना तक नहीं थी कि एक दिन रूस में गोर्बाचोव नामक एक करिमाई नेता प्रकट होगा और पेरोस्त्रोइका तथा ग्लासनोस्त जैसी अवधारणा के नाम से अधिरचना के बजाय आधार में परिवर्तन की नीतियां लागू करेगा और सत्तर वर्षों से महाशक्ति के रूप में खड़े देश के सोलह टुकड़े हो जायेंगे। अलबत्ता राजनीतिक टिप्पणीकारों द्वारा उस अध्याय की व्याख्या बौद्धिक अतिरेक से उपजी भय की स्वैर-कल्पना की तरह की गयी थी। लेकिन लगभग स्वैर-कल्पना सी जान पड़ने वाली वह भविष्योक्ति मात्र दस वर्षों के भीतर ही सत्य सिद्ध हो गयी। बताया जाता है कि उन क्रांतिकारी अवधारणाओं के जनक अब एक बहुराष्ट्रीय निगम से सम्बद्ध हैं।

    हमारे यहां भी नब्बे के दशक में आधार में परिवर्तन को उदारीकरण जैसे पद के अन्तर्गत अर्थव्यवस्था में उलटफेर करते हुए बहुराष्ट्रीय निगमों तथा उनकी अपार पूंजी के प्रवाह के लिए जगह बनाना शुरू कर दी गयी। कहने की जरूरत नहीं कि ऐसी निगमें और उनकी पूंजी विकसित राष्ट्रों के नव-उपनिवेशवादी मंसूबों को पूरा करने के अपराजेय और अचूक शक्ति केन्द्र हैं जिसका सर्वाधिक कारगर हथियार है कल्चरल इकोनाॅमी और जिसके अन्तर्गत वे सूचना संचार फिल्म-संगीत और साहित्य के जरिये अधोरचना में सेंध लगाते हैं। और फिर धीरे-धीरे उसे पूरी तरह ध्वस्त कर देते हैं। नव उपनिवेश के शिल्पकार कहते हैं नाऊ वी डोण्ट एण्टर अ कण्ट्री विथ गनबोट्स रादर विथ लैंग्विज एण्ड कल्चर। 

    पहले वे अफ्रीकी राष्ट्रों में उनको सभ्य बनाने के उद्घोष के साथ गये और उनकी तमाम भाषाएँ नष्ट कर दीं। वी आर द नेशन विथ लैंग्विज व्हेयरज दे आर ट्राइब्स विथ डायलेक्ट्स। लेकिन भारत में वे इस बार उदारीकरण के बहाने उसे सम्पन्न बनाने के प्रस्ताव के साथ आये हैं। उनको पता था कि हजारों वर्षों के व्याकरण-सम्मत आधार पर खड़ी भारतीय भाषाओं को नष्ट करना थोड़ा कठिन है। पिछली बार वे अपनी भाषा को भाषा की तरह प्रचारित करके तथा भाषा को शिक्षा-समस्या के आवरण में रखकर भी भारतीय भाषाओं के नष्ट नहीं कर पाये थे। उल्टे उनका अनुभव रहा कि भारतीयों ने व्याकरण के ज़रिये एक किताबी भाषा अंग्रेजी) सीखी। 

    ज्ञान अर्जित किया लेकिन उसे अपने जीवन से बाहर ही रख छोड़ा। उन्होंने देखा चिकित्सा-शिक्षा का छात्र स्वर्ण-पदक से उत्तीर्ण होकर श्रेष्ठ शल्य-चिकित्सक बन जाता है लेकिन उनकी भद्र-भाषा उसके जीवन के भीतर नहीं उतर पाती है। तब यह तय किया गया कि अंग्रेजी भारत में तभी अपना भाषिक साम्राज्य खड़ा कर पायेगी जब वह कल्चर के साथ जायेगी। नतीज़तन अब प्रथमतः सारा जोर केवल भाषा नहीं बल्कि सम्पूर्ण कल्चरल-इकोनामी पर एकाग्र कर दिया गया। इस तरह उन्होंने भाषा के प्रचार को इस बार लिंग्विसिज्म कहा जिसका सबसे पहला और अंतिम शिकार भारतीय युवा को बनाया जाना कूटनीतिक रूप से सुनिचित किया गया।

    बहरहाल भारत में अफ्रीकी राष्ट्रों की तर्ज पर सबसे पहले एफ.एम. रेडियो के जरिये यूथ-कल्चर का एक आकर्षक राष्ट्रव्यापी मिथ खड़ा किया गया जिसका अभीष्ट युवा पीढ़ी में अंग्रेजी के प्रति अदम्य उन्माद तथा पश्चिम के सांस्कृतिक उद्योग की फूहड़ता से निकली यूरो-ट्रैा किस्म की रूचि के अमेरिकाना मिक्स से बनने वाली लाइफ स्टाइल‘ (जीवनशैली) को यूथ-कल्चर की तरह ऐसा प्रतिमानीकरण करना कि वह अपनी देशज भाषा और सामाजिक-परम्परा को निर्ममता से खारिज करने लगे। यहां पुरानी राॅयल चार्टर वाली सावधानी नहीं थी दे शुड नाॅट रिजेक्ट ब्रिटिश कल्चर इन फेवर आॅफ देअर ट्रेडिशनल वेल्यूज।

    खात्मा जरूरी है लेकिन विथ सिम्पैथेटिक प्रिसिशन आॅव देयर कल्चर।इट मस्ट बी लाइक अ डिवाइन इन्टरवेशन। नतीजतन अब सिद्धान्तिकी डायरेक्ट इनवेजन की है। देयर स्ट्रांग डहरेंस टू मदरटंग्स हेज टु बी रप्चर्ड थ्रू दि प्रोसेस आॅव क्रियोलाइजेशन‘ (जिसे वे रि-लिंग्विफिकेशन आॅव नेटिव लैंग्विजेसेस कहते हैं)।

    क्रियोलीकरण का अर्थ सबसे पहले उस देशज भाषा से उसका व्याकरण छीनो फिर उसमें डिस्लोकेशन आॅव वक्युब्लरि के जरिए उसके मूल शब्दों का वर्चस्ववादी भाषा के शब्दों से विस्थापन इस सीमा तक करो कि वाक्य में केवल फंकनल वर्डस् (कारक) भर रह जायें। तब भाषा का ये रूप बनेगा। यूनिवर्सिटी द्वारा अभी तक स्टूडेण्ट्स को मार्कशीट इश्यू न किये जाने को लेकर कैम्पस में वी.सी. के अगेंस्ट जो प्रोटेस्ट हुआ उससे ला एण्ड आर्डर की क्रिटिकल सिचुएशन बन गई (इसे वे फ्रेश-लिंग्विस्टिक लाइफ कहते हैं)।

    उनका कहना है कि भाषा के इस रूप तक पहुंचा देने का अर्थ यह है कि नाऊ द लैंग्विज इज रेडी फार स्मूथ ट्रांजिशन। बाद इसके अंतिम पायदान है-फायनल असाल्ट आॅन लैंग्विज। अर्थात् इस क्रियोल बन चुकी स्थानीय भाषा को रोमन में लिखने की शुरूआत कर दी जाये। यह भाषा के खात्मे की अंतिम घोषणा होगी और मात्र एक ही पीढ़ी के भीतर।

    बहरहाल हिन्दी का क्रियोलाइजेशन' (हिंग्लिाशीकरण) हमारे यहां सर्वप्रथम एफ.एम. ब्राॅडकास्ट के जरिये शुरू हुआ और यह फार्मूला तुरन्त देश भर के तमाम हिन्दी के अखबारों में (जनसत्ता को छोड़कर) सम्पादकों नहीं युवा मालिकों के कठोर निर्देशों पर लागू कर दिया गया। सन् 1998 में मैंने इसके विरूद्ध लिखा भारत में हिन्दी के विकास की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका जिस प्रेस ने निभायी थी आज वही प्रेस उसके विनाश के अभियान में कमरकस के भिड़ गयी है। जैसे उसने हिन्दी की हत्या की सुपारी ले रखी हो। और इसकी अंतिम परिणति में देवनागरी से रोमन करने का मुद्दा उठाया जायेगा। क्योंकि यह फार्मूला भाषिक उपनिवेावाद (लिंग्विस्टिक इम्पीयरिलिज्म) वाली ताकतें अफ्रीकी राष्ट्रों की भाषाओं के खात्मे में सफलता से आजमा चुकी हैं। आज रोमन लिपि को बहस में लाया जा रहा है। अब बारी भारतीय भाषाओं की आमतौर पर लेकिन हिन्दी की खासतौर पर है। हिन्दी के क्रियोलीकरण की निःशुल्क सलाह देने वाले लोगों की तर्कों के तीरों से लैस एक पूरी फौज भारत के भीतर अलग-अलग मुखौटे लगाये काम कर रही है जो वल्र्ड बैंक आई.एम.एफ. ब्रिटिश कौंसिल, बी.बी.सी. डब्ल्यू.टी.ओ., फोर्ड फाउण्डेान जैसी संस्थाओं के हितों के लिए निरापद राजमार्ग बना रही हैं।

    नव उपनिवेावादी ताकतें चाहती हैं रोल आॅव गव्हमेण्ट आर्गेनाइजेशस शुड बी इन्क्रीज्ड इन प्रमोटिंग डाॅमिनेण्ट लैंग्विज। हमारा ज्ञान आयोग पूरी निर्लज्जता के साथ उनकी इच्छापूर्ति के लि पूरे देा के प्राथमिक विद्यालयों से ही अंग्रेजी की पढ़ाई अनिवार्य करना चाहता है। यह भाषा का विखण्डन नहीं बल्कि नहीं संभल सके तो निचय ही यह क दूरगामी विराट विखण्डन की पूर्व पीठिका होगी। इसे केवल भाषा भर का मामला मान लेने या कहने वाला कोई निपट मूर्ख व्यक्ति हो सकता है ेतिहासिक-समझ वाला व्यक्ति तो कतई नहीं।

    अंत में मुझे नेहरू की याद आती है जिन्होंने जान ग्रालबे्रथ के समक्ष अपने भीतर की पीड़ा और पश्चाताप को प्रकट करते हुए गहरी ग्लानि के साथ कहा था आयम द लास्ट इंग्लिश प्राइममिनिस्टर आॅव इंडिया। निचय ही आने वाला समय उनकी ग्लानि के विसर्जन का समय होगा। क्योंकि आने वाले समय में पूरा देश इंगलिश और अमेरिकन होगा। पता नहीं हर जगह सिर्फ अंग्रेजी में उद्बोधन देने वाले प्रधानमंत्री के लिए यह प्रसन्नता का कारण होगा या कि नहीं लेकिन निश्चय ही वे दरवाजों को धड़ाधड़ खोलने के उत्साह से भरे पगड़ी में गोर्बाचोव तो नहीं ही होंगे। अंग्रेजी उनका मोह है या विवशता यह वे खुद ही बता सकते हैं।

    यहां संसार भर की तमाम भाषाओं की लिपियों की तुलना में देवनागरी लिपि की स्वयंसिद्ध श्रेष्ठता के बखान की जरूरत नहीं है। और हिन्दी की लिपि के संदर्भ में फैसला आजादी के समय हो चुका है। रोमन की तो बात करना ही देश और समाज के साथ धोखा होगा। अब तो बात रोमन लिपि की वकालत के षड्यंत्र के विरूद्ध घरों से बाहर आकर एकजुट होने की है- वर्ना हम इस लांछन के साथ इस संसार से विदा होंगे कि हमारी भाषा का गला हमारे सामने ही निर्ममता से घोंटा जा रहा था और हम अपनी अश्लील चुप्पी के आवरण में मुंह छुपाये वह जघन्य घटना बगैर उत्तेजित हुए चुपचाप देखते रहे।

    (सीमित शब्द संख्या के बंधन के कारण अंग्रेजी शब्दों और वाक्यांशों का हिन्दी रूपांतर नहीं दिया जा रहा है।)

                                        प्रभु जोशी
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