अनुवाद

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

केरल विधान सभा में हिन्दी बोलने पर रोक


तिरुवनंतपुरम। देश की राष्ट्र भाषा हिंदी, केरल विधानसभा में आधिकारिक भाषा नहीं है। केरल विधानसभा के उपाध्यक्ष एन. सकथन ने विधायकों को यह बात बताई तो वे अवाक रह गए। सकथन प्रश्नकाल के दौरान सदन के पीठासीन अधिकारी की भूमिका निभा रहे थे।
प्रश्नकाल के दौरान विपक्षी विधायक जमीला प्रकाशम ने राज्य के गृह मंत्री रमेश चेन्नीथला से पूछा कि राज्य पुलिस बल में महिला पुलिसकर्मियों की संख्या पांच प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत करने के उनके वादे का क्या हुआ? अपने जवाब के अंत में चेन्नीथला ने हिंदी में कहा कि वह अपना वादा जल्द पूरा करेंगे।
उपाध्यक्ष सकथन ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए कहा कि सदन में हिंदी भाषा का प्रयोग नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह आधिकारिक भाषा नहीं है। सकथन के मुताबिक, सदन के अंदर प्रयोग की जाने वाली आधिकारिक भाषाएं मलयालम, तमिल, कन्नड़ और अंग्रेजी हैं। ऊर्जा मंत्री अरिदन मोहम्मद ने हालांकि कहा कि सदन में पहले हिंदी का प्रयोग होता रहा है। लेकिन सकथन ने कहा कि नियम 305 के आधार पर हिंदी बोलने की अनुमति नहीं है, क्योंकि यह स्वीकृत भाषाओं में शामिल नहीं है।
मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने कहा कि अगर सकथन की बात सच है तो हमें नियम बदलना होगा। हिंदी को भी आधिकारिक भाषा में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा न होने पर गलत संदेश जाएगा। जलपान गृह में भी विधायकों के बीच इस बात पर चर्चा होती रही। कांग्रेस विधायक बेनी बेहेनन ने बताया कि कन्नड़ भाषा को 1982 में आधिकारिक स्वीकृति मिली थी, उस समय वह सदन में मौजूद थे।
पूर्व विधानसभाध्यक्ष राधाकृष्णन ने कहा है कि अब अगर यह सरकार हिंदी को आधिकारिक भाषा में शामिल करना चाहती है, तो इसके लिए प्रक्रिया समिति आयोजित करके मंजूरी लेने की जरूरत होगी। चर्चा के दौरान सकथन ने बताया है कि मैंने सिर्फ इसलिए ऐसा कहा क्योंकि नियमत: हिंदी का प्रयोग नहीं किया जा सकता, यह सभी को पता चले। कुर्सी पर बैठने का मतलब नियमों का पालन करना है और मैंने वही किया।

सौजन्य: आईबीएन http://khabar.ibnlive.in.com/news/123300/1

3 टिप्‍पणियां:

  1. इससे बड़ा दुर्भाग्‍य और क्‍या हो सकता है। अंग्रेजी आधिकारिक भाषा है और हिंदी नहीं। प्रवीण जी इससे अंदाज लगाओ हमं कितनी मेहनत किसकिस स्‍तर पर करने की जरूरत है।

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  2. केरल वासी विचार करें कि मलयालम को हिंदी से खतरा ज्‍यादा है या अंग्रेजी से और यह भी कि अंग्रेजी से मलयालम को खतरा जयादा है या हिंदी को। नि:संदेह अंग्रेजी से जितना खतरा हिंदी को है उससे कहीं अधिक संकट अन्‍य भारतीय भाषाओं को है क्‍योंकि हिंदी तो अपने बोलने वालों की बड़ी संख्‍या की बदौलत किसी तरह अपने अस्‍तित्‍व की रक्षा कर ही लेगी लेकिन अन्‍य भारतीय भाषाओं को बोलने वाले हैं ही कितने? अंग्रेजी की सुरसा तो सभी भारतीय भाषाओं को निगल रही है। कैसे बचा पाएंगे वे अपनी मातृभाषा। अत: करुणामय गुरुदेव कहते हैं कि प्रत्‍येक भारतीय को सभी देशी भाषाओं के संरक्षण और पुनस्‍र्थापना के लिए एक जुट होकर करना चाहिए?

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