अनुवाद

बुधवार, 6 मार्च 2013

हिन्‍दी पर जानी-मानी हस्तियों के विचार


सितंबर 13, 2011 15:00 
 
 हिंदी पर अंग्रेजी का कहीं कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं   
प्रो. नामवर सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार एवं प्रख्यात आलोचक
कोई यह स्वीकार करे या न करे, लेकिन यह हकीकत है कि ङ्क्षहदी हमारे देश की राजभाषा भी है और राष्ट्रभाषा भी. बावजूद इसके, हिंदी का फलक जितना व्यापक होना चाहिए था, वह नहीं हो सका. हालांकि इसके लिए सिर्फ सरकार को ही दोष नहीं दिया जा सकता. लेकिन मेरे कहने का मतलब यही नहीं कि इस मामले में सरकार को क्लीन चिट दे दिया जाना चाहिए.

सरकार इसकी जिम्मेवारी से बच नहीं सकती है. असल में आजादी के बाद संविधान में राजभाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार करते समय यह सोचा गया कि इसकी अनुसांगिक भाषा के रूप में अंग्रेजी को कामकाज की भाषा रखा जाए और जब तक लोग पूरी तरह हिंदी में कामकाज करने में सक्षम नहीं हो जाते, तब तक अंग्रेजी का सहयोग लिया जाएगा और इस दौरान हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए काम किया जाएगा.
लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा. सरकार की अकर्मण्यता और लोगों की उदासीनता ने हिंदी की विकास यात्रा को प्रभावित किया और अपने ही देश में हिंदी मातहत भाषा हो गई. हिंदी दिवस जैसी रस्म अदायगी वाले समारोहों से इतर, सही मायने में तकनीकी और व्यावहारिक रूप में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए काम किया जाना चाहिए, तभी हम हिंदी के सुखद भविष्य की कल्पना कर सकते है. हालांकि यह बात भी उतनी ही सही है कि अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा का वर्चस्व चाहे जितना बढ़ जाए, लेकिन हिंदी की जड़ें इतनी गहरी हैं, कि उस पर कोई बहुत प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडऩे जा रहा है. 

हिंदी को रोजगार से जोडऩे की कोशिश होनी चाहिए

कन्हैया लाल नंदन, कहानीकार *
हिंदी को रोजगार से जोडऩे की कोशिश होनी चाहिए
हिंदी भाषा को हिंदी जगत में ही उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है. हिंदी भाषा भाषी ही इसे दोयम दर्जे की भाषा मानते हैं. मेरी समझ से इसके दो कारण हैं. एक तो इसे रोजी-रोटी से नहीं जोड़ा गया, दूसरे इसे कभी स्वाभिमान से जोडऩे की कोशिश नहीं की गई. ऐसे में लोगों के मन में इस बात को लेकर आशंका ज्यादा रहती है कि हिंदी को अपनाकर उनका आखिर क्या भला होगा. टेक्नोलॉजी के जरिए ही अंग्रेजी फ्रांस सहित पूरी दुनिया में पहुंच गई, जबकि एक समय फ्रांसीसी भाषा को अभिजात्यों की भाषा माना जाता था. इसी तरह टेक्नोलॉजी से जोड़कर हिंदी को भी विश्व भाषा बनाया जा सकता है. बस जरूरत है पूरी प्रतिबद्धता के साथ इसके लिए प्रयास करने की. हिंदी को लेकर भले ही अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होते हों, लेकिन ज्यादातर लोगों को हिंदी में हस्ताक्षर करने में भी शर्म महसूस होती है. बहुत ही निराशाजनक स्थिति है. इसे संभालने का प्रयास होना चाहिए. शास्त्री, नेहरू और इंदिरा गांधी तक तो ठीक था, लेकिन अब हिंदी के पक्ष में बोलने वाले काफी कम लोग हैं. मीडिया से भी जिस तरह की उम्मीद थी, वैसा नहीं हुआ. जनसंचार माध्यमों की उपेक्षा ने भी हिंदी का बड़ा नुकसान किया है. हुआ यह कि हिंदी लोगों तक तो पहुंच गई, लेकिन भाषा के तौर पर उसका कोई भला नहीं हुआ. नौजवान पीढ़ी अंग्रेजी के दबाव में है और सरकार को भी तमाम दूसरी चीजों के आगे हिंदी के लिए फुर्सत नहीं है.

नेहरू-इंदिरा के वारिस हों या संघ परिवार का झंडा उठाने वाले, सभी भाषण ज्यादा देते है, हिंदी की चिंता किसी को नहीं है. अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी के सबसे बड़े पक्षधर हैं. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भी हिंदी में भाषण देकर इतिहास रच गया. लेकिन उसके बाद हिंदी का क्या हाल है, यह किसी से छिपा नहीं है. हिंदी को बढ़ावा देना है तो इसे रोजगार और तकनीक से जोडऩे की कोशिश करनी होगी. इसके बाद ही नई पीढ़ी इस ओर आकर्षित हो पाएगी.  
हीनता के शिकार हैं हिंदीभाषी
उपाध्यक्ष, हिंदी अकादमी एवं हास्य रस के सुविख्यात कवि
हीनता के शिकार हैं हिंदीभाषी
हिंदी के मामले में शंका और सवाल हमेशा रहा है. कुछ के जवाब हैं, कुछ के नहीं और कुछ के जवाब आने वाली पीढ़ी देगी. जो स्वर गूंज रहे हैं, उसमें हिंदी सर्वाधिक मुखर है. बोलने और सुनने के मामले में तो हिंदी विकास कर रही है, पर लिखने-पढऩे में पिछड़ रही है. यह बात शिक्षा में हिंदी की उपस्थिति के आधार पर कही जा सकती है. आज सरकार चलाने वालों में हिंदी की तुलना में अंग्रेजी वाले ज्यादा हैं. वे हिंदी को गरीबों और असहाय लोगों की भाषा मानते हैं. वैसे तो हिंदी-अंग्रेजी दोनों ही संविधान की भाषाएं हैं, इन पर हमें गर्व होना चाहिए. सवाल मानसिकता का है. हिंदी बोलने वाले खुद को कमजोर मानते हैं और हीनभावना के शिकार हैं. यांत्रिक अनुवाद से हिंदी का नुकसान हुआ है. हिंदी में मौलिक लेखन का अभाव रहा है, इससे हिंदी उच्च शिक्षा में अपनी क्षमता सिद्ध नहीं कर पाई. रोजगार अंग्रेजी ने दिया है. दिल की बात हिंदी में और दिमाग की बात अंग्रेजी में की जाती है.

हिंदी मातृभाषा है, राजभाषा है अथवा संपर्क भाषा, इस पर चर्चा हमेशा से होती रही है. वस्तुस्थिति यह है कि हिंदी सबकी है और किसी की भी नहीं है. सबके पास अपनी मातृभाषा है. और मातृभाषा मां के दूध के साथ ही आती है, इसके लिए विद्यालय जाने की जरूरत नहीं होती. आमजन को अंग्रेजी नहीं आती, मुट्ठी भर लोग जानते हैं. हिंदी संपर्क भाषा है, राष्ट्रभाषा है कि नहीं, पता नहीं. राष्ट्रभाषा भावनात्मक शब्द होता है. संपर्क भाषा ही धीरे-धीरे राष्ट्र भाषा बन जाती है. अगर हिंदी को लेकर हमारे संविधान निर्माता संजीदा होते तो हिंदी की यह हालत नहीं होती. वे अंग्रेजीदां लोग थे, उन्होंने राजभाषा के अनुच्छेद में सुराख छोड़ दिए. संविधान सभा में 284 सदस्य थे. इनमें से मात्र 35 लोगों ने हिंदी में और पांच लोगों ने हिंदी और अंग्रेजी दोनों में हस्ताक्षर किए थे. अगर वे लोग हिंदी में ही हस्ताक्षर किए होते तो समझा जाता की उनके मन में कोई खोट नहीं है.
हिंदी को सम्मान देने की शुरुआत करनी होगी
डॉ. परमानंद श्रीवास्तव, जाने-माने आलोचक
हिंदी को राजभाषा भी कहा जाता है और राष्टï्रभाषा भी स्वीकार किया जाता है. पर सच्चाई यह है कि हिंदी न तो संवैधानिक रूप से राष्ट्रभाषा है और न ही पूरी तरह से राजभाषा ही. भले ही अंग्रेजी राष्ट्रभाषा न बने लेकिन जब तक अंग्रेजी का वर्चस्व खत्म नहीं होगा, तब तक हिंदी में कामकाज भी नहीं होने वाला है. इसके लिए न सिर्फ सरकार को, बल्कि हर एक व्यक्ति को प्रयास करना होगा. अपने अपने स्तर से प्रयास करना होगा. मैं किसी भी विदेशी भाषा का विरोधी नहीं हूं, लेकिन अपनी भाषा के पक्ष में अपने समाज को जागृत जरूर देखना चाहता हूं. आज जो पीढ़ी आ रही है, उसका न तो अंग्रेजी भाषा पर अधिकार होता है और न ही अपनी भाषा यानी हिंदी पर. वे इन दोनों के बीच अटके रहते हैं.

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि पब्लिक स्कूलों में आमतौर पर हिंदी को थोड़ी कम अहमियत दी जाती है. उन्हें अपने यहां हिंदी को सम्मान देने की शुरुआत करनी होगी. हिंदी को जो तक व्यवहार में नहीं लाएंगे तब तक इसका कुछ भी भला नहीं होने वाला. बच्चों को भी शुरू से समझाना होगा कि हिंदी ही हमारी अपनी भाषा है, उसे बोलने, लिखने, पढऩे और कामकाज की भाषा बनाने में किसी तरह की झिझक नहीं होनी चाहिए. हर व्यक्ति का थोड़ा-सा भी प्रयास इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. लेकिन होता यह है कि जब हर साल 14 सितंबर को जब 'हिंदी दिवस' आता है, तब हमें लगता है कि हिंदी को कामकाज की भी भाषा होना चाहिए. रस्म अदायगी वाली चिंता से हिंदी का कुछ भी भला नहीं होगा.
अगर इतना ही हो कि एक ही दिन से यह काम हो जाए तब तो ठीक है, लेकिन इससे कुछ होने वाला नहीं है. इसलिए हमारे सामने यह एक बड़ी चुनौती है कि हर दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाएं और हिंदी व्यवहार में आए, कामकाज की भाषा बने. इसकी शुरुआत व्यक्तिगत स्तर पर करनी होगी. 
 हिंदी की दुर्दशा के दोषी हम भी
मैत्रेयी पुष्पा, उपन्यासकार
हमारे देश में कई भाषाएं बोली जाती हैं. अलग अलग क्षेत्रों की बोलियां और भाषाएं अलग हैं. उन भाषाओं से वहां के लोग खास लगाव महसूस करते हैं और हिंदीभाषी लोगों की तरह ही अपनी भाषाओं को जीवित रखना चाहते हैं. सरकार ने हिंदी को राजभाषा घोषित कर रखा है. घोषणा अलग चीज है और उस पर अमल अलग. जब तक घोषणाओं को व्यवहार में लाने की कोशिश नहीं की जाती, तब तक किसी घोषणा का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता है. देश में अंग्रेजी की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है. गैर हिंदी भाषी हिंदी को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाते हैं. अंग्रेजी को वे ज्यादा सहजता से स्वीकार करते हैं. इसे वे रोजी-रोटी से जोड़कर देखते हैं. अंग्रेजों ने अंग्रेजी का प्रचार-प्रसार किया. अंग्रेजी शिक्षा का माध्यम बनी. अंग्रेजों के जाने के बाद भी हमने अंग्रेजी का साथ नहीं छोड़ा. अब जबकि हम ग्लोबल दौर में जी रहे हैं, अंग्रेजी के प्रति लोगों का मोह और भी मजबूत हुआ है. अखबारों में अंग्रेजी का प्रचलन इसलिए बढ़ा है, क्योंकि आम बोलचाल में इसका प्रचलन बढ़ा है. इसके लिए हम हिंदी वाले भी कम दोषी नहीं हैं. अंग्रेजी के रेल का हिंदी शब्द जब 'लौहपथगामिनी' होगी तो हिंदी कैसे लोकप्रिय होगी? अंग्रेजी शब्दों का हिंदी में सरल विकल्प होना चाहिए. हिंदी का विकास करना है तो हमें उदारता दिखानी होगी. वरना अंग्रेजी के आगे हिंदी कहीं भी नहीं ठहर पाएगी.  
   
 

भाषा की सरकारी नीति अस्पष्ट
मैनेजर पांडेय, साहित्कार


वर्तमान माहौल में लोग भूमंडलीकरण के प्रभाव में हैं और लगातार इस प्रभाव में जकड़ते ही जा रहे हैं. अंग्रेजी को विश्व भाषा के रूप में प्रचारित कर लोगों ने इसे इस रूप में स्थापित कर दिया है कि अंग्रेजी न केवल हिंदी के लिए, बल्कि दूसरी भाषाओं के विकास में भी रोड़ा बन रही है. सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि अंग्रेजी बोलने वाले देश में महज अंगुलियों पर गिने जा सकते है, बावजूद इसके इसे विश्व भाषा के रूप में स्वीकारा जाता है. चीन, जापान, रूस, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कोरिया, ब्राजील, स्पेन, स्विटजरलैंड न जाने कितने देश हैं जहां सारे सरकारी कामकाज, स्कूल कॉलेजों में पढ़ाई लिखाई उनकी अपनी भाषा में होती है, न कि उधार की भाषा अंग्रेजी में.

हमारे यहां सरकार की नीतियां भाषाओं के विकास को लेकर कोई बहुत ज्यादा हितकर नहीं है और बहुत कुछ अस्पष्टï है. हिंदी के विकास के लिए बड़े-बड़े वादे और दावे किए जाते हंै, लेकिन वे खोखले साबित हुए हैं. सरकार ने 14 सिंतबर को हिंदी दिवस के रूप में मान्यता दे रखी है, लेकिन यह तीज त्योहारी रस्म से अधिक कुछ नहीं. इस दिन हिंदी के नाम पर घडिय़ाली आंसू बहाने के सिवाए और कुछ नहीं होता है.
अगर आप सरकारी हिंदी की भाषा देखेंगे तो वह अबूझ पहेली लगेगी. अंग्रेजी शब्दों के सही हिंदी विकल्प नहीं तैयार किए गए हैं. जो पारिभाषिक शब्दावली तैयार की गई है वह जुबान पर चढ़ ही नहीं पाती है. इससे हिंदी का भला नहीं हो सकता. इससे सांस्कृतिक निष्ठा भी प्रभावित होती है. निजी कंपनियों की बात यदि छोड़ दें तो सरकारी दफ्तरों में हिंदी में कामकाज नहीं के बराबर होता है. हालांकि कई बड़ी कंपनियां सिर्फ व्यवसायिक हित को ध्यान में रख कर जरूरत के अनुसार हिंदी में काम करती हैं, लेकिन उनका उद्देश्य बस अपना हित साधना होता है. 

हिंदी है साजिश की शिकार 
सुरेश नीरव, वरिष्ट साहित्यकार एवं भाषाविद्


मेरा मानना है कि स्वाधीनता संग्राम और स्वतंत्रता आंदोलन दोनों में हिंदी भाषा एक ताकत बन कर उभरी, जिसने उपनिवेशवाद की चूलें हिला दीं. अंग्रेजों ने हिंदी की ताकत को भली भांति भांप लिया था. इसलिए जाते-जाते अंग्रेजों को यह महसूस हो गया कि अगर हिंदी मजबूत हुई तो हिंदुस्तान एक मजबूत राष्ट्र के रूप में उभरेगा और दुनिया की मजबूत ताकतों को चुनौती देने की स्थिति में आ जाएगा.

इसलिए उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद सभी नीतियों के तहत हिंदी को दिन-ब-दिन कमजोर करने की एक लंबी साजिश रच डाली. और अब इस साजिश के दुष्परिणाम भी सामने हैं. राज्यों के बीच विवाद, महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों को लेकर विवाद आदि के रूप में हम इसके दुष्परिणामों को देख सकते हैं. कह सकते हैं कि यदि हिंदी मजबूत होती तो न क्षेत्रवाद पनपता और न ही हिंदुस्तान का संघीय ढांचा ही चरमराता. इसलिए अंग्रेजों ने हिंदुस्तान की सांस्कृतिक धमनियों में अंग्रेजों का निद्रालु रसायन धीरे-धीरे प्रविष्ट कराया. पहले सरकारी महकमों के तहत कामकाज की भाषा अंग्रेजी को बरकरार रखा गया, फिर बाजारवादी ताकतों से हिंदी पर चौतरफा हमला किया. टीवी के जरिए और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जरिए आज इन हमलों को अंजाम दिया जा रहा है.बच्चे गिनती, पहाड़े हिंदी में नहीं जानते. 

हिंदी तो मजबूत ही हुई है
काशी नाथ सिंह, प्रसिद्ध साहित्यकार

अंग्रेजी भाषा का संबंध पूंजी से है, धन से है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों से है, अमेरिका और यूरोप से है, जबकि हिंदी का संबंध गांव से है, बेरोजगारी से है, जहालत और गरीबी से है. हिंदी की यही नियति है. हिंदी लाचारों और बेचारों की भाषा बनकर रह गई है, जबकि अंग्रेजी साहबों और हुक्मरानों की भाषा के तौर पर प्रतिष्ठापित है. फिर भी मैं कहता हूं हिंदी का बाल भी बांका नहीं होने वाला है. अंग्रेजी उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगी. हिंदी तो यहां की संस्कृति में, यहां की आवोहवा में पूरी तरह से रची बसी हुई है. इसे यहां की संस्कृति से जुदा कर पाना आसान नहीं है. आसान क्या, ऐसा कर पाना नामुमकिन है.

भारत का इतिहास हजारों साल पुराना है. हम पर बहुत सारे विदेशी आक्रमण हुए, मुगल आए तो साथ में फारसी भाषा लाए. अंग्रेज आए तो अंग्रेजी भाषा का प्रसार हुआ. लेकिन हमारी मातृभाषा की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि यह तब भी खत्म नहीं हुई. हिंदी ने तो इन्हें कई नए शब्द दिए, कई नए मुहावरे दिए, लोकोक्तियां दीं. लेकिन तब यह भी सही है कि इन भाषाओं से हिंदी ने कई शब्द लिए भी. इससे हिंदी का शब्द भंडार समृद्घ हुआ. हिंदी भाषा की विरासत मजबूत हुई. दूसरी भाषाओं के आने से हिंदी समाप्त होने के बजाए और मजबूत ही हुई. इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं है कि मातृभाषा ही राष्ट्रभाषा होने का सम्मान हासिल करेगी और अंग्रेजी हमारी मातृभाषा नहीं है. अंग्रेजी को बढ़ावा मिलने की वजह आर्थिक है. बाजार पर कब्जा जमाने के लिए हम पर सांस्कृतिक हमले किए जा रहे हैं. बावजूद इसके अंग्रेजी कभी भी इस देश की राष्ट्रभाषा नहीं बन सकती है. 

हिन्‍दी के साथ अन्याय हुआ है
आचार्य निशांत केतु साहित्यकार
पहली बात यह कि राष्ट्रभाषा और राजभाषा की अवधारणा  अलग-अलग है. राष्ट्रभाषाएं कई हो सकती है. अभी देश में 22 भाषाएं हैं. जब संविधान इन्हें मान्यता देगा, तभी ये राष्ट्रभाषाएं होंगी और राजभाषा, उन 22 भाषाओं में से कोई एक जो कामकाज की भाषा होगी-तो वह हिंदी है. राजभाषा उसे कहते हैं, जो प्रशासनिक भाषा हो, केंद्र और राज्यों के बीच संपर्क भाषा हो. राजभाषा एक ही है और वह है हिंदी. वह सूचीबद्ध, संविधान स्वीकृत है.

यह अभी तक सहचरी राजभाषा है. कमाल पाशा जब तुर्की के राष्ट्रपति हुए तो वहां की भाषा विदेशी थी. पदग्रहण के बाद दूसरे दिन से ही वहां तुर्की का इस्तेमाल शुरू करा दिया और तुर्की लगातार बढ़ रही है. हिंदी क्रांति की भाषा है, शांति की भाषा है, वर्तमान की भाषा है, भविष्य की भाषा है. इसे कोई नहीं रोक सकेगा. हिंदी को जितना भी सताइए, कितना भी दबाइए, उससे फर्क नहीं पडऩे वाला. दुनिया में अभी 6,141 भाषाएं हैं, जिनमें सर्वाधिक हिंदी बोली जाती है. 

हिंदी जन्मभूमि पर ही तिरस्कृत
मधु चतुर्वेदी, साहित्यकार

'कहो री मोम गुड्डी कैसी बनी, रानी थी सो दासी हुई, दासी थी सो रानी बनी'

उपरोक्त पंक्तियां एक लोक कथा से उद्धृत हैं, जो प्राय: समूचे भारतवर्ष में करवा चौथ रखने वाली सुहागिन महिलाएं कहती, सुनती हैं. कथा में इन पंक्तियों का संदर्भ चाहे जो रहा हो, किंतु उपरोक्त पंक्तियां हमारी राष्ट्रभाषा पर सटीक बैठती हैं. विश्व की प्राचीनतम एवं एक मात्र वैज्ञानिक भाषा संस्कृत के सरलीकृत स्वरूप हिंदी का उसी की जन्मभूमि पर तिरस्कार क्यों?
इसके बीज हम भारतवासियों की मनोवृति में ही कहीं छिपे हैं. भौतिकतावाद की अंधी दौड़ में आत्म-गौरव इस तरह विलीन हो चुका है कि संस्कृति की (जिसका एक सशक्त घटक अपनी मातृ-भाषा भी है) ठोस जमीन हमारे पैरों तले से खिसकती जा रही है, और हम एक अनाम व अचीन्ही संस्कृति को अपनाने की दौड़ में त्रिशंकु बने हुए हैं, हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि यह सब सोची समझी साजिश के तहत हो रहा है. जब हमसे पूछा जाता है कि आपकी मातृ-भाषा क्या है? तो बिना सोचे समझे हम अपनी आंचलिक भाषा को अपनी मातृ-भाषा घोषित कर देते हैं, इस बात से अनभिज्ञ रहते हुए कि वस्तुत: मातृ-भाषा वह नहीं जो मां के मुख से हमने सुनी है, वरन् मातृ-भाषा वह है जो 'राष्ट्र-माता' के भावों को स्वर देती है. 

हिंदी का कुछ नहीं बिगड़ेगा
प्रो. गया सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार

बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अंग्रेजी का वर्चस्व स्थापित करना चाहती हैं. इसके पीछे असली उनका मकसद है उपभोक्तावाद को बढ़ावा देना. दरअसल बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अंग्रेजियत के जरिए भारतीय संस्कृति को खत्म कर पश्चिम की उपभोक्तावादी संस्कृति स्थापना करना चाहती हैं ताकि उनका माल बिक सके, उनके व्यापार का भारत में विस्तार हो सके और वे अधिक से अधिक धनोपार्जन कर सकें.

इसमें मीडिया भी इन कंपनियों का साथ दे रहा है. बनारस में पहले एक प्रतिष्ठित अखबार का चार पेज का परिशिष्ट आता था, उसका नाम था 'सुबहे बनारस'. अब उसका नाम बदल कर 'रीमिक्स' कर दिया गया है. नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि बदले अखबार की विषयवस्तु कैसी होगी. यह हमारी भाषा की हत्या का सुनियोजित षडयंत्र है. अगर किसी देश को पराजित करना है तो वहां की संस्कृति और भाषा को खत्म कर दो, वह देश बिना युद्ध लड़े ही हार जाएगा. इतिहास इस बात का गवाह है. हमारी नई पीढ़ी को संस्कृतिविहीन करने का प्रयास किया जा रहा है. लेकिन इन सब के बावजूद मैं यही कहूंगा कि हमारी संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी हैं. इसलिए अंग्रेजी कभी भी हिंदी को मार नहीं पाएगी. हां थोड़ा नुकसान भले ही कर दे. हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है और हमेशा रहेगी. इसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता. 
अंग्रेजी रोजगार की भाषा है
लीलाधर मंडलोई, जाने-माने साहित्यकार

जिस तरह से देश में अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा है, उससे  यह चर्चा जरूर होने लगी है कि अब अग्रेंजी ही राष्ट्रभाषा बनेगी. लेकिन यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि इसके लिए राजनीतिक निर्णय लेना होगा. अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व की वजह है इस भाषा से रोजी-रोटी का जुड़ाव. दरअसल अंग्रेजी रोजगार की भाषा बन गई है. अच्छी नौकरी हिंदी नहीं, अंग्रेजी जानने से मिलती है. संचार क्रांति भले ही देश के लिए लाभदायी हो, लेकिन इसने हिंदी का नुकसान किया है. वैश्वीकरण और आईटी के विस्तार ने अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ाया है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कॉरपोरेट जगत में सारा कामकाज अंग्रेजी में ही होता है. जैसे-जैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कॉरपोरेट जगत का विस्तार होगा, अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ता जाएगा.

पहले यूपीएससी में अंग्रेजी का बोलबाला था. बाद में हिंदी और भारतीय भाषाओं को महत्व दिया गया. यह स्वाभाविक है कि जिस भाषा में
राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है. हिंदी भाषा का प्रश्न, स्वराज का प्रश्न है.            
 राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी 
अंग्रेजी सर पर ढोना डूब मरने के बराबर है. -  डॉ. संपूर्णानंद
संस्कृत मां, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है. - डॉ. फादर कामिल बुल्के
मैं दुनिया की सभी भाषाओं की इज्जत करता हूं, परंतु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह हरगिज नहीं सह सकता. - आचार्य विनोवा भावे
मेरे लिए हिंदी का प्रश्न स्वराज का प्रश्न है.- राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन
अंग्रेजी ने हमारी परंपराएं छिन्न भिन्न करके, हमें जंगली बनाने का भरसक प्रयत्न किया. - अमृतलाल नागर
हिंदी जिस दिन राजभाषा स्वीकृत हो गई उसी दिन से सारा राजकाज हिंदी में चल सकता था. - सेठ गोविंद दास
जबसे हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा, तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी. राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह
रोजगार मिलने की संभावना ज्यादा है, परिवार के लोग चाहते हैं कि उनका बच्चा उसी भाषा को पढ़े. यही वजह है कि नि न मध्यवर्ग और मध्य वर्ग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाना चाहता है. गरीब परिवारों की भी यही कोशिश होती है कि उनका बच्चा भी अंग्रेजी सीखे और बोले, ताकि उन्हें बेहतर रोजगार मिल सके. अंग्रेजी के वर्चस्व की एक और बड़ी वजह है कि भारत में एक बड़ी आबादी गरीब है और उसके पास खेती की जमीन नहीं है. लिहाजा वे पूरी तरह से नौकरी पर ही आश्रित हैं. ऐसे परिवारों के लोग चाहते हैं कि उनकी अगली पीढ़ी अंग्रेजी भाषा से लैस हो, ताकि उन्हें बेहतर नौकरी मिल सके.
अंग्रेजी के विस्तार ने भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया की भाषाओं के सामने संकट खड़ा कर दिया है. 20वीं सदी के आखिर में भाषा को लेकर एक रिपोर्ट खासी चर्चा में थी. इस रिपोर्ट के अनुसार 20वीं सदी के अंत तक दुनियाभर की करीब दस हजार भाषाएं और बोलियां खत्म हो गई थीं. यह चिंता की बात है.
भारत में भी अगर हिंदी को बचाना है तो इसे न केवल शासकीय कामकाज में महत्व दिया जाए बल्कि इसे रोजी-रोटी से भी जोडऩा जाए. मुझे लगता है यह इतना आसान नहीं है, इसके लिए तो जनजागरण अभियान चलाना होगा. ठीक वैसे जैसे कि आजादी की लड़ाई के लिए चलाया गया था. 
हिंदी अब बाजार की मजबूरी है
जितेंद्र श्रीवास्तव, कवि-आलोचक

अंग्रेजी भारत की राजभाषा हरगिज नहीं होगी. भारत जैसे बहुभाषा भाषी देश में यह संभव ही नहीं है. हां, संपर्क भाषा के रूप में उसका महत्व है और यह महत्व आगे भी बना रहेगा. गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों के जो पढ़े-लिखे लोग हैं, वे अंग्रेजी में अपनी बातों को ज्यादा बेहतर तरीके से रख पाते हैं. लेकिन इससे हिंदी को कोई नुकसान नहीं है.

हकीकत यह है कि हिंदी बाजार की मजबूरी बन चुकी है. हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ी है. नई-नई जगहों से हिंदी अखबारों का प्रकाशन आरंभ हो रहा है. नए हिंदी चैनलों की शुरुआत हो रही है. जाहिर है, हिंदी बोलने, समझने, पढऩे और लिखने वालों की संख्या में वृद्घि हुई है. ऐसे भी हिंदी को अंग्रेजी अपदस्थ कर पाए, इसकी कोई आशंका नजर नहीं आती. ङ्क्षहदी भी अंग्रेजी को कोई नुकासान नहीं कर पाएगी. हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है और राजभाषाओं में हिंदी शीर्ष पर है. कई राज्यों में तमाम सरकारी कामकाज पूरी तरह से हिंदी में होते हैं. इन राज्यों में हिंदी सिर्फ  कागज पर राजभाषा नहीं है, व्यवहार में भी है.
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे बड़े राज्य इनमें शामिल हैं जो वास्तव में आकार में कई यूरोपीय देशों से भी बड़े हैं. हां राजभाषा के रूप में हिंदी के अखिल भारतीय स्वरूप की जो परिकल्पना की गई थी, वह जरूर पूरी नहीं हो पाई. भाषा के लेकर देश में राजनीति भी होती रही है, खासतौर पर दक्षिण भारतीय राज्यों में. बावजूद इसके दक्षिणी राज्यों में हिंदी का पठन पाठन हो रहा है. लोग हिंदी सीखने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. उन्हें मालूम है कि पढ़ाई के लिए, रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाने पर हिंदी की जानकारी उनके लिए फायदेमंद रहेगी. ठीक उसी तरह जैसे उत्तर भारतीय राज्यों से अगर कोई केरल जाता है तो मलयालम की जानकारी उनके लिए मददगार साबित होगी. ऐसे में हिंदी के ऊपर किसी संकट की बात सोचना मुझे नहीं लगता कि सही है. हां यह जरूर है कि हिंदी वैज्ञानिक विषयों की भाषा अब तक नहीं बन पाई है. अकादमिक स्तर पर जितना काम होना चाहिए था, वह नहीं हो पाया. इसलिए इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए. 
ब्लॉग से बजा क्रांति का बिगुल
अविनाश वाचस्‍पति, हिंदी ब्लॉगर  

राष्‍ट्रभाषा नाम के लिए नहीं और राजभाषा काम के लिए नहीं. सच्‍चाई यही है. हिं‍दी भाषा का राज आम जन के मन पर है. और मन पर राज है, तो भला अंग्रेजी किस बूते हिं‍दी का मुकाबला कर पाएगी. कुछ प्रतिशत अंग्रेजी को मानने वाले इस मुगालते में चाहे जीते रहें कि अंग्रेजी राष्‍ट्रभाषा के रूप में मान ली जाएगी, परं‍तु ऐसा है नहीं. सच तो यह है कि यह मन पर राज कर रही है और मन देशवासियों का है. अब तक हिं‍दी के विकास और दिलों को जोडऩे का जो काम हिं‍दी फिल्‍में और उनके लोकप्रिय गीत विदेशों तक भी धुंआधार तरीके से कर रहे थे, वही काम अपने जोरदार रूप में अब इंटरनेट कर रहा है. और आप देख रहे हैं कि इंटरनेट पर हिं‍दी के आने के बाद से बाजार की भाषा भी हिं‍दी होती जा रही है. कंप्‍यूटर में अब तो हिंदी में प्रोग्रामिंग का काम भी शुरू हो गया है. इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि अभी वह प्रारंभिक चरण में ही है, शुरूआत ही सही, लेकिन मार्ग तेजी से प्रशस्‍त हो रहा है.

केंद्र सरकार और न्‍यायालय तो वही कहेंगे, जो वहां बैठे अंग्रेजीदां कहना चाहते हैं. वे आंखें मूंदे भ्रम पाले बैठे हैं. उनका भ्रम में घिरे रहना हिं‍दी और अन्‍य क्षेत्रीय भाषाओं के लिए लाभप्रद है. जहां तक फैशन की बात है तो फैशन कभी टिकाऊ नहीं रहा है, चाहे वह भाषा का ही क्‍यों न हो? जो टिक न सके, वह फैशन है, जो पल-पल बदलता रहे, वह फैशन है. फैशन कभी स्‍थायी नहीं होता. फैशन तो बाजार के साथ चलकर अधिक कमाने के प्रयास का नाम है. वैसे यह बात सही है कि हिं‍दी के समाचारों को पेश करते समय कतिपय चैनल और समाचार पत्र अंग्रेजी में हेडिंग लगा रहे हैं. इस जयचंदी मानसिकता ने पहले भी कई मोर्चों पर राष्‍ट्र का काफी नुकसान किया है और कर रही है. किंतु जिस तरह से इंटरनेट और अब हिं‍दी ब्‍लॉगिंग के माध्‍यम से यह विदेशों तक में संपर्क का माध्‍यम बनती जा रही है, वह काबिले गौर है. हिं‍दी और क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में एक मोहित कर देने वाली क्रांति का बिगुल बज उठा है. मात्र 15 साल में आप इसका तेज असर महसूस कर सकेंगे. यह बात मैं पूरे विश्‍वास से कह रहा हूं. 

हां, अंग्रेजी तो 'राजभाषा' है ही 

क्षमा कौल, साहित्यकार
आप कहते हैं कि क्या अंग्रेजी भारत की राजभाषा होगी? होगी क्या, वह तो है. हिंदी को तो राजभाषा कहना हिंदी के साथ मजाक है. एक रणनीति के साथ इसके लिए कुछ किया जाना चाहिए. देश के जो सर्वहारा हैं, और जिनसे भारत बनता है, उनतक आप नीतियों को पहुंचने ही नहीं देते हैं. आप तो सारा कुछ अंग्रेजी में ही निपटा लेते हैं. शासन से लेकर प्रशासन तक सारी चीजें अंग्रेजी में होती है. इसका कारण यह है कि राजनीतिक दलों ने गिरोह तंत्र लागू कर रखा है. किसी से भी हिंदी में बात करना इस गिरोह तंत्र के खिलाफ जाता है. ऐसे में तो भारत की भाषा भी डूबेगी और संस्कृति भी, क्योंकि संस्कृति की वाहक तो भाषा ही है.

अंग्रेजी के हावी होने से पूरे हिंदी प्रदेश में हीन भावना का विस्तार हो रहा है. इस देश में अंग्रेजी न जानने वाला कुंठित है और अंग्रेजी जानने वाला सीधा सत्ता से जुड़ा है. सूचनाओं से जुड़ा है. आजादी के बाद पिछले 62 सालों में कम से कम चार पीढिय़ां तो ऐसी जरूर आईं, जिन्होंने अपनी सारी ऊर्जा अंग्रेजी सीखने में लगा दी ताकि अपने आपको प्रासंगिक रखा जा सके. सच पूछें तो यह हमारी गुलामी है. और अफसोस इस बात का है कि यह गुलामी फैशन का रूप लेती जा रही है. अब तो राहुल गांधी भी कहते हैं कि वह झुग्गी झोपडिय़ों में अंग्रेजी पहुंचाएंगे. तो यह वह देश और शासन है, जहां गरीबों के घरों में रोटी नहीं, रोजगार नहीं, अलवत्ता अंग्रेजी जरूर पहुंचाई जा रही है. ऐसे में हिंदी का भला कैसे होगा? हम तो सांस्कृतिक गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं.

मुकाबले में अंग्रेजी कहीं भी नहीं
रामबहादुर राय, वरिष्ठ पत्रकार
जब अंगे्रजी के मुकाबले हिंदी की बात की जाती है, तो इसके पीछे एक मानसिकता काम कर रही होती है. हम आयातित चीजों को ज्यादा महत्व देते हैं. हिंदी और अंग्रेजी पर हम आजादी के बाद के समय को तीन चरणों में बांट कर बात कर सकते हैं. 60 के दशक में अंग्रेजी हटाओ आंदोलन ने हिंदी का बहुत नुकसान किया. इससे हिंदी का फैलाव रुक गया. इस नकारात्मक आंदोलन के कारण अंगे्रजी से नई पीढ़ी दूर हो गई. प्रगति के दौर में वे इलाके पिछड़ गए. हिंदी अभी उबर भी नहीं पाई थी कि 1991 से एक नया दौर शुरू हो गया, जिसे मैं 'अंग्रेजी को जमाओ और उसका विस्तार करो' का दौर मानता हूं . 2001 की जनगणना के अनुसार अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा घोषित करने वाले 10,000 में मात्र दो लोग थे अर्थात .02 फीसदी. दूसरी ओर एक हालिया सर्वे में यह बताया गया कि भारतीय भाषाओं में पढऩे वाले छात्रों की संख्या में 24 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जबकि इसकी तुलना में अंग्रेजी माध्यम से पढऩे वालों की संख्या में 74 फीसदी की. यानी अगर स्कूली शिक्षा भविष्य का दर्पण है तो अंग्रेजी बढ़ रही है. वहीं अखबारों का जो सर्वे आया है, उसमें कुल 22.5 करोड़ पाठकों में से दो करोड़ अंग्रेजी के हैं. देश के 10 बड़े अखबारों में नौ अखबार हिंदी अथवा दूसरी भारतीय भाषाओं के हैं. इससे दो निष्कर्ष निकाले जा सकते है. पहला यह कि संख्याबल के आधार पर भारतीय भाषाओं के मुकाबले अंग्रेजी कहीं नहीं है. 
भारतीय भाषाओं के लिए खतरा है अंग्रेजी
डॉ. ललित किशोर मोदरा, सहायक संपादक, एनबीटी

सरकार की अब तक की गतिविधियां यही बताती हैं कि हिंदी का प्रचार-प्रसार उसकी प्राथमिकता में नहीं है. अन्यथा आजादी के छह दशक बीतने के बाद भी हिंदी अब तक राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पाई? पूरे देश में हिंदी को लेकर उदासीनता है, मौसमी तौर पर लोग हिंदी के विकास के लिए बयानबाजी करते हैं. सरकार के पास इसके प्रति 'विजन' का पूर्ण अभाव है. हिंदी के विकास के लिए राष्ट्रीय पुनर्जागरण की जरूरत है. विदेशों में लोग हिंदी सीखने पर जोर दे रहे हैं. और हमारे यहां लोग अंग्रेजी के पीछे भाग रहे हैं. हिंदी के विकास के लिए हम हिंदी भाषियों पर ही खास तौर से जिम्मेदारी है, बावजूद इसके हम इसके लिए पूरी ईमानदारी से काम नहीं कर रहे. लोगों में हिंदी के प्रति प्रेम और जागरूकता लाने के लिए हम लोग पिछले 10-12 सालों से कोलकाता में हिंदी मेले का आयोजन करते आ रहे हैं, जिसमें बड़ी संख्या में युवा शिरकत करते है. हमें इसके सकारात्मक नतीजे भी देखने को मिल रहे हैं. यूनेस्को की रिपोर्ट बताती है कि अंग्रेजी न केवल हिंदी के लिए बल्कि विश्व की 196 भाषाओं के लिए भी खतरा बन गई है. दुनिया की सैंकड़ों भाषाओं पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है. इसे देखते हुए हमें अपनी भाषा के प्रति ईमानदार होना ही होगा. ऐसा करके 
ही हम हिंदी को अंग्रेजी के चंगुल से बचा पाएंगे. 

दरिद्र हो रही है हिंदी
कृष्णन दुबे,वरिष्ठ पत्रकार
अंग्रेजी को सैद्धांतिक तौर पर राष्ट्रभाषा का दर्जा भले ही न मिला हो, लेकिन व्यवहारिक तौर पर तो वही इस देश की राष्ट्रभाषा है. मेरे इस कथन में अतिरेक लग सकता है, लेकिन सही बात तो यह है कि वैश्वीकरण ने अंग्रेजी को विश्व भाषा बना दिया है. फिर भारत क्या, जापान और चीन जैसे देशों में भी अंग्रेजी जोर पकड़ रही है. हालांकि भारत और चीन में थोड़ा फर्क है. चीन में अंग्रेजी के प्रसार का यह मतलब नहीं है कि चीनी भाषा या साहित्य कमजोर हो रहा है, वे दुनिया से मुकाबला करने के लिए अंग्रेजी सीख रहे हैं. जबकि भारत में स्थिति एकदम उलट है. यहां अंग्रेजी इसलिए जोर पकड़ रही है, क्योंकि एक तो हम अभी गुलामी की मानसिकता से उबर नहीं पाए हैं और दूसरे हिंदी लगातार 'दरिद्र' होती जा रही है. हिंदी की 'सेवा' करने वालों ने हिंदी का सबसे अधिक नुकसान किया है. आज साहित्य, कला, संस्कृति, विज्ञान, वाणिज्य किसी भी चीज के बारे में गंभीर जानकारी चाहिए तो अंग्रेजी का मुंह ताकना पड़ता है. अंग्रेजी में छपा कोई उपन्यास अगर चर्चित होता है तो उसकी 10-15 लाख प्रतियां बिक जाती हैं, जबकि हिंदी के लेखकों को अपनी किताब छपवाने के लिए आग्रह-अनुग्रह के साथ-साथ पैसा भी खर्च करना पड़ता है. चूंकि पाठक नहीं हैं, इसलिए प्रकाशक तीन-चार सौ से ज्यादा प्रतियां नहीं छापता. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी चाहते थे कि बेशक लिपियां- देवनागिरी और फारसी- दो हों, पर राष्ट्रभाषा हिंदुस्तानी बने. लेकिन हिंदुस्तानी की जगह ले ली संस्कृतनिष्ठ हिंदी ने. हिंदी को कारोबार और रोजगार की भाषा बनाया जाना चाहिए.     
हिंदी को कामकाज की भाषा बनाने में झिझक न हो
बालेन्दु शर्मा दाधीच, पत्रकार

हिंदी को राष्ट्रभाषा भी कहा जाता है और राजभाषा भी. पर सच्चाई यह है कि यह न तो संवैधानिक रूप से राष्ट्रभाषा है और न ही पूरी तरह से राजभाषा. भले ही अंग्रेजी राष्ट्रभाषा न बने, लेकिन जब तक अंग्रेजी का वर्चस्व खत्म नहीं होगा, तब तक हिंदी में कामकाज भी नहीं होने वाला है. इसके लिए न सिर्फ सरकार को, बल्कि हर एक व्यक्ति को प्रयास करना होगा. मैं किसी विदेशी भाषा का विरोधी नहीं हूं, लेकिन अपनी भाषा के पक्ष में अपने समाज को जागृत जरूर देखना चाहता हूं. आज जो पीढ़ी आ रही है, उसका न तो अंग्रेजी भाषा पर अधिकार होता है और न ही अपनी भाषा यानी हिंदी पर. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि पब्लिक स्कूलों में आमतौर पर हिंदी को थोड़ी कम अहमियत दी जाती है. उन्हें अपने यहां हिंदी को सम्मान देने की शुरुआत करनी होगी. बच्चों को भी शुरू से समझाना होगा कि हिंदी ही हमारी अपनी भाषा है. उसे बोलने, लिखने, पढऩे और कामकाज की भाषा बनाने में किसी तरह की झिझक नहीं होनी चाहिए. हर व्यक्ति का थोड़ा-सा भी प्रयास इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.  
पूरे विश्व की भाषा बनेगी हिंदी
अजय कुमार गुप्ता, प्रबंध संपादक, गगनांचल

हिंदी के पतन के लिए अंग्रेजी के लोग नहीं, खुद हिंदी के लोग ही जिम्मेदार हैं. हिंदी को नीचा दिखाने का काम हिंदी वाले ही कर रहे हैं. सरकारी नौकरियों में उत्तर भारत के लोगों की अच्छी खासी तादाद है. लेकिन इसमें से 90 फीसदी अधिकारी हिंदी जानते हुए भी फाइलों पर अंग्रेजी में ही टिप्पणी करते हैं. यह स्थिति दुखद है. हिंदी की ऐसी दुखद स्थिति होने के बावजूद अंग्रेजी कभी भी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं बन सकती. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि नई पीढ़ी हिंदी की आ रही  है. रोजगार के नए अवसर इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. इसके अलावा हिंदी को बचाने में दक्षिण भारतीयों का विशेष योगदान होगा. रोजगार के लिए दक्षिण भारत से भारी संख्या में लोग उत्तर भारतीय नगरों में आ रहे हैं. रोजगार के नए अवसर उन्हें इस ओर खींच रहा है. इसके लिए वे हिंदी सीख रहे हैं. हिंदी भारत में ही नहीं, चीन, जापान, रूस और अमेरिका में भी लोग पढ़ और सीख रहे हैं. इसलिए हिंदी भारत की ही नहीं, विश्व की भाषा बनेगी. और ऐसा हमें जल्द ही देखने को मिलेगा. 
विचलित करता है अंग्रेजी का बोलबाला
नीता पांडेय, प्रबंधक (राजभाषा), भारतीय स्टेट बैंक 
हिंदी भारत की सम़ृद्ध भाषा है. इसे भारत की राष्‍ट्र भाषा, राज भाषा, राज्‍य भाषा एवं सं‍पर्क भाषा का दर्जा प्राप्‍त है. भारत एक बहुभाषी देश है, जिसमें संविधान की आठवीं अनुसूची के अं‍तर्गत शामिल भाषाएं, विभिन्‍न प्रां‍तों की राजभाषाएं एवं राज्‍य भाषाएं भी हैं. भारतीय भाषाएं अंग्रेजी के मुकाबले बहुत प्रचलित हैं. राज्यों में ज्यादातर कामकाज वहां की स्थानीय भाषा में ही होते हैं. राज्य सरकारों के कामकाज में भारतीय भाषाएं खूब फल-फूल रही हैं. लेकिन हिंदी सर्व सम्‍मति से भारत की संपर्क भाषा होने के कारण अंग्रेजी तथा अन्‍य भारतीय भाषाओं से एक कदम आगे है. इसलिए इसका अपना महत्व है. यह एक ऐसी भाषा है, जो भारत भर में बोली और समझी जाती है. अन्‍य भारतीय भाषाओं को उनकी राज्‍य सरकार के कार्यालयों में राजभाषा का दर्जा भी हासिल है. केंद्र सरकार के कार्यालयों में भले ही हिंदी में शत प्रतिशत कार्य नहीं किया जाता हो, लेकिन हिंदी भाषी राज्यों में इसमें खूब काम काज होता है. शिक्षा क्षेत्र खासकर तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा में जरूर अंग्रेजी का बोलबाला बढ़ा है. शहरी बच्चों में जिस कदर से अंग्रेजी बोलने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, वह हमें जरूर थोड़ा विचलित करती है. लेकिन फिर भी ऐसा नहीं लगता कि अंग्रेजी की वजह से हिंदी का अस्तित्व खत्म हो जाएगा.भारत की शिक्षा पद्धति एवं शिक्षा के माध्‍यम में हिंदी को एक विषय एवं माध्‍यम के रूप में अपनाया जा रहा है. लिखित परीक्षाओं एवं साक्षात्‍कार में भी हिंदी विकल्‍प चुनने की आजादी है. अंग्रेजी के कारण हिंदी का अस्तित्व समाप्‍त हो जाएगा, ऐसा नहीं है.  


 * कन्‍हैयालाल नंदन से यह बातचीत पिछले साल उनके देहावसान से पहले की गयी थी

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